भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 687

सर्गः ९ ] मनोहरकाण्डम् ६७१


वसुकामो वसून् रुद्रान्वीर्यकामोऽथ वीर्यवान् । अन्नाद्यकामस्त्वदितिं स्वर्गकामोऽदितेः सुतान् ॥१६२॥
विद्वान् वेदान् राज्यकामः साध्यान्मंत्रांश्च विश्रुतम् ।
आयुष्कामोऽश्विनौ देवौ पुष्टिकाम इलां यजेत् ॥१६३॥
प्रतिष्ठाकामः पुरुषो रोदसी लोकमातरौ । रूपाभिकामो गंधर्वांस्त्रीं कामोऽप्सर उद्भिताम् ॥१६४॥
आधिपत्यकामः सर्वेषां यजेत परमेष्ठिनम् । यज्ञं यजेद्यशस्कामः कोशकामः प्रचेतसम् ॥१६५॥
विद्याकामस्तु गिरिशं दांपत्यार्थमुमां सतीम् । धर्मार्थं उत्तमश्लोकं तंतुं तन्वन पितॄन् यजेत् ॥१६६॥
रक्षार्थामः पुण्यजनांस्तेजस्कामो मरुद्गणान् राज्यकामो मनून्देवान् निर्ऋतिं त्वभिचर्यजेत् ॥१६७॥
कामकामो यजेत्सोममकामः पुरुषं परम् । अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः ॥१६८॥
तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत रघुनन्दनम् । रामेण सदृशो देवो न भूतो न भविष्यति ॥१६९॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रामचन्द्रं प्रपूजयेत् । तस्याद्यवर्णसामर्थ्याद्यद्वस्तुचव रादिकम् ॥१७०॥
परं श्रेष्ठतमञ्चात्र विस्तारेण वदाम्यहम् । रुक्मं रत्नं रथो रामा रक्षसो रजतं रजः ॥१७१॥
रक्षा रणो रमा रक्तं रजको रागरामठौ, राजं रोगो रवि रात्री राज्यं रजस्वला तथा । १७२।
एवमादीन्यनेकानि श्रेष्ठान्येवात्र भो द्विज । रुक्मं पीतं महार्हं च रत्नं रम्यं सुदुर्लभम् ॥१७३॥
रथो यानं श्रेष्ठेषु च रामा यस्या इदं जगत् । राक्षसो देवत्रस्तो रजतं तन्मुदुर्लभम् ॥१७४॥
रजः साक्षात्परमाणुर्नित्यः सोऽत्र प्रकीर्त्यते । रक्षा रक्षाकरी ज्ञेया रणो जयकरः स्मृतः ॥१७५॥


कामना पूर्ण करनेकी अभिलाषा हो तो इन्द्रकी, सन्तानकी इच्छा हो तो प्रजापतिकी, श्रीवृद्धिकी इच्छा हो तो मायादेवीकी तेजवृद्धिकी अभिलाषा हो तो सूर्याभगवतीकी, धनवृद्धिकी इच्छा हो तो आठो वसुओकी, पराक्रमकी अभिलाषा हो तो रुद्रभगवान्की, अन्न आदिकी इच्छा हो तो अदितिकी, स्वर्गकी इच्छा हो तो अदितिके पुत्रों अर्थात् देवताओंका ॥ १६१ । १६२ ॥ राज्यकी इच्छा हो तो इलाको, प्रतिष्ठा चाहनेवालेको लोकमताओको, सौन्दर्यकी अभिलाषा हो तो गन्धर्वोको, स्त्रीकी कामना हा तो उर्वशी आदि अप्सराओंकी और आधिपत्यकी इच्छा हो तो सब देवताओंका पूजा करे । जिसे यश पानेकी इच्छा हो उसे यज्ञ करना चाहिये । कोषकी इच्छा हो तो वरुणकी, विद्याकी इच्छा हो तो शिवका दम्पत्यसुखकी इच्छा हो तो पार्वती जीकी, धर्मकी अभिलाषा हो तो उत्तमश्लोक (विष्णु भगवान्) की और वंशविस्तारकी इच्छा हो तो पितरोंकी पूजा करनी चाहिए १६३-१६६। आत्मरक्षाकी इच्छा हो तो पुण्यजनोंकी तेजोट्रद्धिकी अभिलाषा हो तो मरुद्गणोंकी राज्यकी इच्छा हो तो चौदह मनुओका आभिचारिककी दिश करनी हा तो राक्षसों-की, अभीष्टविषयिउ काम पूर्तिरी इच्छा हो तो चन्द्रमाका, निष्काम होनेकी अभिलाषा हो तो परम पुरुष परमेश्वरकी, अकाम या सकामभावसे मोक्षकी कामना रखता हो तो उसे चाहिए कि तीव्र भक्तियोगसे रघुनन्दन रामचन्द्रकी पूजा करे । रामचन्द्रजीके समान न कोई देवता हुआ है और न होना ॥ १६७-१६९ ॥ अतएव हर तरह प्रयत्न करके रामचन्द्रर्ज पूजा करे । उनके नामके आदिम वर्ण 'र' की सामर्थ्यसे संसारमें जितनी वस्तुएं रकारादि हैं, वे सब अतिशय श्रेष्ठ मानी गया हैं। उन वस्तुओंको अब मै विस्तारपूर्वक बतला रहा हूँ। जैसे-रुक्म (सुवर्ण), रत्न, रथ, रामा (स्त्री), राक्षस (विद्याधर आदि), रजत (चाँदी), रज (धूलि), रक्षा, रण, रमा (लक्ष्मी), रक्त, रजक (धोबी), राग, रामठ (हींग), राजा, रोग, रवि (सूर्य), रात्रि, राज्य, रजस्वला आदि अनेक नाम श्रेष्ठ मान गये हैं। ऊपर बताया हुआ रुक्म (सुवर्ण) पीतवर्णको बहुमूल्य धातु है। रत्न देखनेमें सुन्दर लगता है और कठिनाईसे प्राप्त होता है। रथ एक श्रेष्ठ सवारी है! रामा (स्त्री) वह वस्तु है, जिससे जगत् उत्पन्न हुआ है। राक्षस ऐसे भयानक होते हैं, जिनसे देवता भी भयभीत रहा करते हैं। रजत (चाँदी) भी एक दुर्लभ वस्तु है। रज (धूलि) साक्षात् परमाणु और नित्य है, रक्षा रक्षाकारी है। रण (संग्राम) विजयदायक होता है ॥ १७०-१७५ ॥