श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 686, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६७४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ९ ] |
|---|
निशायां च प्रकर्तव्यमधिरामनमुत्तमम् । शुचौ देशे मण्डपादि कृत्वा पूर्वोक्तवस्तुभिः ॥ १४५ ॥
रामलिंगान्तके भद्रे धान्यराशीं महत्तमम् । सजलं कलशं स्थाप्य ताम्रपात्रं तु तन्मुखे ॥ १४६ ॥
स्थाप्य वस्त्रं दोलक्स्थं रामचन्द्रं प्रपूजयेत् । हैमी वाराजतो वापि दोलकाधिपतेः स्मृताः ॥ १४७ ॥
हैमीं पलमितां राममूर्तिः कार्या मनोरमा । तावन्मिता रौप्यमयीः सीतायाश्चापि कारयेत् ॥ १४८ ॥
नानोपचारैः संपूज्य रात्रौ जागरणं चरेत् । नृत्यगीतमंगलाद्यैः पुराणश्रवणादिभिः । १४९ ।
प्रभाते चं पुनः पूज्य रामं सीताराममन्त्रितम् । मष्टम हवनं कार्यं तिलाज्यपायसादिभिः । १५० ॥
तर्पणं राममंत्रेण क्षीरेणैव प्रकारयेत् । ततो गुरुं सपत्नीक संपूज्य वसनादिभिः ॥ १५१ ॥
रामाय प्रार्थयेद्भक्त्या प्रबद्धकरसम्पुटः । सार्द्धमामद्वयं राम वसन्ते तव पूजनम् ॥ १५२ ॥
दोलकस्थस्य जानक्या यथाशक्त्या मया कृतम् । प्रसादात्तेन श्रीराम मामुद्धर भवार्णवात् ॥ १५३ ॥
एवं संप्रार्थ्य श्रीराम ताम्रवीं मूर्त्तिमुत्तमाम् । दद्यान्नत्वागुरवे भक्त्या तं प्रणम्य पुनः पुनः ॥ १५४ ॥
पंचसप्तवियुग्मानि ह्यष्टविंशन्नितानि वा । तदर्द्धांन्यथवा भक्त्या भोजयेद्गुरुणा सुधीः ॥ १५५ ॥
हतः स्वञ्च सुतृन्मित्रैः कार्यं च भोजनं सुताम् । आंडोऽपि यथाशक्त्या वसंतेऽतु सदा ॥ १५६ ॥
करोतु रामतुष्ट्यर्थं वसंतपूजन वरम् । इदं शिष्य त्वया पृष्टं विशेषं च पूजनम् १५७ ॥
सीतारामस्य तत्सर्वं द आख्यातय ते मया ।
विष्णु उवाच
गुरो ते प्रष्टुमिच्छामि यत्त्वं वद मतिमान् । १५८ ।
कया कामनया कस्य कार्यं पूजनमुत्तमम् । तन्मयं कथयस्तद्य मयि कृत्वा परां कृपाम् । १५९॥
श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स सावधानमनाः शृणु । ब्रह्मवर्चसकामस्तु यजेत ब्रह्मणस्पतिम् । १६० ॥
इंद्रमिंद्रियकामस्तु प्रजाकामः प्रजापतीन् । देवीं मार्ग तु श्रीकामस्तेजस्कामो विभावसुम् ॥ १६१ ॥
अथ एक द १ भारी धान्यराशिका स्थापन करके उसपर सजल कलश रक्खे और उसके मुखपर एक ताम्बेका पात्र धरें । फिर झूलपर कपड़ा बिछाकर रामजीको बैठावे और उनका पूजा करे वह झूला चाहे सोनेका अथवा चाँदी का हो सकता था । कमसे कम पलभर परिमाण प्रमाणवाली सोने की रामजीकी और उतनेही वजनके सोने अथवा चाँदीकी प्रतिमा भी बनाना चाहिये । १४५–१४८ ॥ इसके अनन्तर नानाप्रकारके उपचारोंसे पूजन करके रातभर जागरण और उस समय नाच गान आदि मंगलकार्य करे । १४९ । सबेरे फिर रामकी पूजा करके तिल, घृत तथा खीर मात्रसे विधिवत् हवन और राममन्त्रसे क्षीरद्वारा तर्पण करता हुआ पूजन समाप्त करे । तत्पश्चात् सपत्नीक गुरुको वस्त्रभूषण आदि देवे ॥ १५०-१५१ ॥ इसके बाद हाथ जोड़कर रामकी प्रार्थना करता हुआ कहे–हे राम ! मैंने बड़े सद्भावसे वसन्त ऋतुमें जानकीके साथ आपकी पूजा की है। मेरे इस कार्यसे आप प्रसन्न हों और भवसागरसे मेरा उद्धार करें ॥ १५२–१५३ ॥ इस तरह प्रार्थना करनेके अनन्तर प्रतिमा समेत वह पूजायोग्य अपने गुरुको दे दे और उन्हें बार बार प्रणाम करे ॥ १५४ ॥ इसके बाद डेढ़ सौ, अड़तालीस अथवा छब्बीस धार्मिक ब्राह्मणोंको इसमें अर्धसंख्यक ब्राह्मणोंको भोजन करावे । १५५ । इसके पश्चात् अपने सम्बन्धीवर्ग और मित्रोंके साथ-साथ स्वयं भी भोजन करे । कोई प्राणी यदि अशक्त हो तो उन अपनी शक्तिके अनुसार ही यह व्रत और वसन्तऋतुमें रामचन्द्रजीका पूजन करना चाहिए । हे शिष्य ! तुमने मुझसे रामकी पूजाके विषयमें जो प्रश्न किया था । सो मैंने दोलस्थ राम तथा साङ्ग पूजनके विषयकी सब बात कह सुनायी । विष्णुशर्मने कहा—हे गुरो ! मैं आपसे कुछ और पूछना चाहता हूँ । वह आप विस्तारपूर्वक हमें बतलाइए । यदि आप ऐसा करेंगे तो बड़ी कृपा होगी । दया करके आप हमें यह बतलाइए कि किस कामनासे किस देवताका पूजन करना चाहिए ?–१५९ ॥ श्रीरामदासने कहा–हे वत्स ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है । सावधान मनसे सुनो । ही अपना ब्रह्मतेज बढ़ाना हो, उसे ब्रह्मणस्पतिका पूजन करना चाहिए ॥ १६० ॥ इन्द्रियकी कोई