श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 694, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें६७८ आनंदरामायणे [ सर्गः १०
देववेदाद्विजानां च गुरुगोत्रतिनां तथा। स्त्रीराजमहतां निंदां चैत्रस्नायी विवर्जयेत् ॥ ७३॥
माषमांसं विषं चूर्णं फले जंबीरमासम्। धान्ये मयूरिका प्रोक्ता चान्नं पर्युषितं तथा ॥७४॥
ब्रह्मचर्यमधःसुप्तिः पत्रावल्यां च भोजनम्। चतुर्थकाले भुंजीत कुर्याद्दानं सदा व्रती ॥७५॥
संवत्सरप्रतिपदि तैलमभ्यंग तु कारयेत्। चैत्रस्नायी नरोऽन्यत्र तैलाभ्यंगं न कारयेत् ॥ ७६॥
अलाबुं वापि वृंताकं कूष्मांडं पूर्तीफलम्। श्लेष्मातकं कलिंगं च कपित्थं चैव वर्जयेत् ॥७७॥
रजस्वलां त्यजेन्म्लेच्छपतितान्त्यजकैः सह। द्विजाद्विट्वेदवाह्यैश्च न वदेन्म्यर्वदा व्रती ॥७८॥
पलांडु लशुनं चैव छत्राकं गृंजनं तथा। नालिकामूलकं शिग्रुं चैत्रस्नायी विवर्जयेत् । ७९।
एभिः स्पृष्टं शपाकेश्च सूतकान्नं च वर्जयेत्। द्विपाचितं च दग्धान्नं चैत्रस्नायी विवर्जयेत् ॥८०॥
एतानि वर्जयेन्नित्यं व्रती सर्वत्र तेष्वपि। कृच्छ्राद्यं च प्रकुर्वीत स्वशक्त्या रामतुष्टये ॥८१॥
क्रमान्कूष्मांडवृंताकछत्राकं मूलकं तथा। श्रीफलं च कलिंगं च फलं धात्र्याभवं तथा ॥८२॥
नारिकेलमलाबू च पटोलं बदरीफलम्। चर्मवृन्ताककं वल्लीशाकं तुलसिजं तथा । ८३॥
शाकान्येतानि वर्ज्यानि क्रमात्प्रतिपदादिषु । धात्रीफलं रवौ तद्वद्वर्जयेन्मर्वदा गृही ।८४।
एभ्योऽन्यद्वर्जयेत्किञ्चिद्रामप्रीत्यर्थे नरः। दत्त्वा व्रतान्ते विप्राय भक्षयेत्सर्वदैव हि ॥८५॥
फाल्गुनीपौर्णमारभ्य यावच्चैत्री तु पूर्णिमा । चैत्रस्नानं तु तावद्धि नरैः कार्यं च भक्तितः ॥८६।
जयवा मनिमगो मानुर्यावत्पात्रान्तमाचरेत् । दशमीं फाल्गुनीं शुक्लां समारभ्य यथोदिताम् ।८७॥
यावच्छ्वैत्र शुक्ल दशमी तावत्स्नानं प्रफारयेत् स्नानस्यैव त्रयो भेदाः शिष्य ते समुदीरिताः ॥८८॥
चैत्रशुक्लतृतीयाया यावद्वैशाखमन्त्रता । तृतीया शुक्लभक्षस्य ह्यक्षयेति स्मृताऽथ या ॥८९॥
है । क्योंकि ये तीर्थके सब पुण्योंको नष्ट करनेवाले उत्पन्न हैं ॥ ७१ ॥ दाल, तिनका दल, कंकड़-पत्थर मिला हुआ अन्न, भावसे दूषित और बहुपर्युषित अन्नाका चैत्रस्नायी मनुष्य न खाय । ७२ ॥ देवता, वेद, ब्राह्मण, गुरुजन, गायत्री, स्त्री, राजा और अपनेसे बड़ेकी निन्दा का भी परित्याग कर देना चाहिए । ७३ ॥ प्र. थियाक, अलूका मांस, शममत्स्यका चूर्ण कञ्जम जंभार नावू, धान्यम मसूर और जूठा अन्न ये सब मांसतुल्य होते हैं, इसलिए इनको न खाय । ब्रह्मचर्य, पृथ्वीपर शयन, पत्तलमें भोजन और नौव प्रहरमें भ जन करता हुआ व्रती मनुष्य इन नियमांका बराबर पालन करे ॥७४-७५॥ केवल संवत्सरका मुख दिवाली प्रतिपदाका दिनमें तेल लगावे और किसी समय नहीं ॥ ७६ ॥ लौकी, भटा कुम्हड़ा, छोटा पपीता, लिसोढ़ा, तरबूज तथा कैथा इन वस्तुओंको न खाना चाहिए ॥७७॥ रजस्वला, चण्डाल, द्विजद्वेषी तथा वेदसे बहिष्कृत मनुष्योंसे बात भी न करे ॥७८॥ प्याज, लहशुन, छत्राक ( भुईंफोर), गाजर, मूली तथा सहिजन इन वस्तुओंको भी चैत्रस्नायी मनुष्य न खाय ॥७९॥ ऊपर बतलाये पतितों, कुत्ते तथा शौण्ड से छुए एवं सूतकके अन्नका भी परित्याग कर देना चाहिए । दोबारा पकाया और जला हुआ अन्न भी चैत्रस्नायी मनुष्य न खाय ॥ ८० ॥ ऊपर बताये चीज न खाय और अपनेसे बन पड़े तो रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेके लिए कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रत भी करे ॥ ८१ ॥ कुम्हड़ा, भंटा, भुईंफोड, मूली, बेल, तरबूज, आंवलेका फल नारियल, लौआ, परवल, बेर, चर्मवृन्ताक, बल्लीशक और तुलसी, इन्हे क्रमशः प्रतिपदा आदि तिथियोंको न खाय । उसी तरह रविवारको धात्रीफल (आंवला) न खाय ॥ ८२-८४ ॥ इनके अतिरिक्त भी रामको प्रसन्न करनेके लिए अपनी तरफसे कुछ वस्तुओंका परित्याग कर दे। किन्तु व्रतसमाप्तिके अनन्तर ब्राह्मणको उस वस्तु-का दान देकर खाय तो कोई हर्ज नही है ॥ ८५ ॥ फाल्गुनकी पूर्णिमासे लेकर चैत्रकी पूर्णिमा पर्यन्त भक्तिपूर्वक चैत्रस्नानका व्रत करना चाहिए ॥ ८६ ॥ अथवा जबतक सूर्य मीन राशिपर रहें, तबतक व्रत करता रहे फाल्गुण कृष्णपक्षकी दशमीसे लेकर चैत्रशुक्लकी दशमी तक स्नान करना चाहिए । इस तरह हे शिष्य ! इस चैत्रस्नानके भेद मैने तुमको बतलाये ॥८७।८८॥ चैत्रशुक्लकी तृतीयासे लेकर वैशाख शुक्लपक्षकी