भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 677

सर्गः ९] मनोहरकाण्डम् ६६१


प्रयत्नं नैव कुर्वीत न नरो जायते पशुः । ज्ञातव्यमर्थं मतिमान् स्वयमेव विचारयेत् ॥ १२३॥
इति संक्षेपतः प्रोक्तमेतत्ते पृष्टमेव यत् । मया तदर्थं चावधार्य स्वयं निश्चयमाप्नुयात् ॥ १२४॥
धर्मास्तु बहवः सन्ति तथा पापानि भूरिशः । विविधानि च पापानि प्रायश्चित्तानि यानि वै ॥ १२५॥
कर्तव्यानि जनैस्तानि सम्यग्बुद्ध्या विचार्य च । सर्वधर्माणां सारश्च रहस्यं तु मयोदितम् ॥ १२६॥
ग्रहणीयं प्रयत्नेन न ह्यभक्ताय दीयताम् । शुश्रूषवे साधवे च रामभक्ताय दीयताम् ॥ १२७॥

इति शतकोटिरामचरितान्तर्गतायां श्रीमदानन्दरामायणे मनोहरकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥८॥
सर्वदा दर्शनात्फलश्रुतिर्नाम नवमः सर्गः ।


नवमः सर्गः

रामकाण्डस्य पूजाविधिः

गुरोऽन्यद्रामचन्द्रस्य विशेषेण च पूजनम् । कस्मिन्काले प्रकर्तव्यं तं कालं वदस्व माम् ॥ १ ॥
श्रीरामदास उवाच -
शृणु शिष्य प्रवक्ष्यामि कालं पुण्यतमं शुभम् । रामचन्द्रस्य पूजार्थं विशेषतः ॥ २ ॥
माघस्य शुक्लपक्षस्य या तु पञ्चमी तिथिः । श्रीपञ्चमीति विख्याता त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ ३ ॥
तदारभ्य साधनामादयं रामं महोत्सवैः । पूजयेत्सर्वदा यावद्वैशाखे कृष्णपञ्चमीम् ॥ ४ ॥
माघकृष्णचतुर्थ्याश्च नवमीं मधुशुक्लजाम् । यावत्केवलफलाहारैः चतुरशीति दिनानि हि ॥ ५ ॥
सीतारामस्य नित्यं हि केचित्कुर्वन्ति पूजनम् । पूर्णिमान्ताः स्मृताश्चात्र मासाः सर्वत्र भो द्विज ॥ ६ ॥
प्रत्यहं वाहना रूढं कृत्वा रामं महोत्सवैः । भेरीदुन्दुभिनिर्घोषैर्महावाद्यपुरःसरैः ॥ ७ ॥


नां कठिन है ॥ १२१ ॥ यह सब होते हुए भी तत्वज्ञानके अनुसार इसका विचार करना ही चाहिए। जो मनुष्य अधिकारी होता हुआ भी ज्ञानके लिए प्रयत्न नहीं करता, वह पशुयोनिमें जन्म पाता है। ज्ञान अथवा अध्ययनका विप्रका पुण्य कहना हुआ ॥ १२२, १२३ ॥ हे अनघ ! तुमने जो कुछ पूछा, मैंने उसे संक्षेपमें कह सुनाया; लोगोंको चाहिए कि इसका भलीभाँति विचारपूर्वक निश्चय कर लिया करे । १२४ ॥ पुण्य और पाप ये दोनों बहुत प्रकारके हैं । पाण्डवोंको यदुपतिने पापके प्रायश्चित्त बतलाये हैं । १२५ ॥ लोगोंको चाहिए, कि उनका अपनी बुद्धिसे अच्छी तरह विचार करें । सब धर्मोंका सार एवं रहस्य मैंने तुम्हारे आगे कह सुनाया । इसे यत्नके साथ ग्रहण करना चाहिए। इस भक्तिविहीन प्राणीको न देकर उसे देना चाहिए, जो शुश्रूषु, साधु एवं रामभक्त हो । १२६, १२७ ॥ इति शतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्द-रामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योतिराभाटीकासहित मनोहरकाण्डे अष्टम सर्गः ॥ ८ ॥

श्रीविष्णुदासने कहा—हे गुरो ! रामचन्द्रजीका विशेष पूजन किस समय करना चाहिए । वह समय आप मुझे बतलाइये ॥ १ ॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! सुनो, मैं तुम्हें रामकी पूजाका परम पुनीत समय बतलाता हूँ। रामचन्द्रजीका पूजन करनेके लिय वह समय बहुत ही उपयोगी होता है । माघमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथि बड़ी ही पवित्र तिथि है । श्रीपञ्चमी उसका नाम है । इसी नामसे वह तीनों लोकमें विख्यात है ॥ २ ॥ ३ ॥ तबसे लेकर जबतक वैशाखके कृष्णपक्षकी पञ्चमी न आ जाय अर्थात् ढाई महीनेतक महान् उत्सवोंके साथ रामचन्द्रजीका पूजन करे ॥ ४ ॥ माघके कृष्णपक्षकी चतुर्थीसे चैत्रके शुक्लपक्षकी नवमी तक अर्थात् इक्यासी दिन केवल फलाहार करके रहे ॥ ५ ॥ जो लोग नित्य सीतारामका पूजन करते हैं, उनके लिए पूर्णिमान्त ही मास माना जाता है ॥ ६ ॥ प्रतिदिन वाहनपर बैठे हुए रामको भेरी-दुन्दुभी आदि बाजे-गाजे, वेश्याओंके नृत्य, छत्र, चमर, तोरण, विविध प्रकारकी पुष्पवर्षा, नाना प्रकारके स्तोत्रपाठ, तरह-तरहके सुगन्धित