भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 676, कुल 811 में से

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पृष्ठ 676
६६०आनन्दरामायणे[ सर्गः ८

विवेकस्तस्य कर्तव्यो द्रव्यदाने विशेषतः । यस्त्वन्नस्य क्षुधितः पात्रं पानीयस्य पिपासितः ॥१०७॥
द्रव्यदाने तु कर्तव्यं विशेषात्पात्रपरीक्षणम् । गवां गतं पयो दुग्धं नागानां पयसो विषम् ॥१०८॥
पात्रापात्रविचारण मन्वाग्रे दानमुत्तमम् । यत्तु युक्तं तथा पात्रं तथा दानं फलाधिकम् ॥१०९॥
ज्ञानाधिक्यात्तपोध्याधिक्यात्पात्रं श्रेष्ठं हि जायते । रामभक्त्य... सर्वैः संमान्यो न सर्वथा ॥११०॥
रामद्वेषी वर्जनीयो दर्शनालापनादिषु । सोऽद्य चेत्पुण्डरीकाक्षं मान्यो नान्यथा ॥१११॥
पञ्चांशेनाधिकं द्रव्याद्दानं तद्विशिष्यते । वित्तादर्थेन यद्दानं न तद्दानं स्मृतं बुधैः ॥११२॥
देशकालविशेषेण पात्रपात्रविशेषतः । दानस्य फलमृद्धिश्चाधिकं न्यूनमेव च ॥११३॥
विप्रशुल्कं तु यो मूढो न दद्याच्छक्तिसंभवम् । विष्ठाकृमिर्भवत्येव मुनीनां च संमत्या ॥११४॥
दिव्यवर्षाणि नैवात्र त्वया कार्यस्तु संशयः । यत्तु ज्ञानवता कर्म क्रियते पुण्यदायकम् ॥११५॥
अधिकं तत्फलं प्रोक्तमज्ञानिकृतकर्मणः । यथा यथाधिकं ज्ञानं पापहानिस्तथा तथा ॥११६॥
यत्तु ज्ञानरतः कर्म क्रियते पापकारकम् । तन्न्यूनफलदं ज्ञेयमज्ञानीकृतपातकात् ॥११७॥
यथा यथाऽधिकं ज्ञानं पापहानिस्तथा तथा । यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुते क्षणात् ॥११८॥
ज्ञानाग्निर्दग्धकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा । यथाधिक्यं यथा हेम्नो वह्निसंगेन जायते ॥११९॥
पुण्याधिक्यं तथा शिष्य ह्यग्निसंगेन जायते । पुण्ये न वर्द्धते पुण्यं पापं न्यूनं च जायते ॥१२०॥
पापेन पापवृद्धिस्तु पुण्यं स्वल्पं च जायते । अयं सूक्ष्मो विचारोऽयं दुर्ज्ञेयः स्थूलदृष्टिभिः ॥१२१॥
तथाप्येष विचार्यो स्यात्तज्ज्ञानानुसारतः । यस्तु सन्त्यधिकारेऽपि ज्ञाने वा पठनेऽपि वा ॥१२२॥

धनुर्वेद और दण्डनीति, ये दोनों ब्राह्मणको अविहित हैं ॥१०३-१०५॥ किन्तु क्षत्रियोंको वे वेदके उक्त फल देते हैं। ऊपर बतलायी हुई सब बातोंमें ज्ञानके अनुसार ही पुण्य होता है। इसलिए लोगोंको चाहिए कि विशेष करके द्रव्यदानके विषयमें विचार करें, भूखको अन्नदान और प्यासेको पानी पिलाना श्रेष्ठ धर्म है ॥१०६। १०७। द्रव्यदान देते समय पात्रका विचार करना आवश्यक है क्योंकि दुष्ट गोमें भी दूध होता है और सर्पके पेटमें दूध जानकर दूध का विष बन जाता है ॥१०८॥ इस तरह पात्र और अपात्रका विचार करके सन्यासम दान देना अच्छा है। दानका पात्र जितना ही अच्छा होगा, उतना ही अधिक पुण्य होगा ॥१०९॥ इस पात्र और अपात्रका विचार ज्ञानकी अधिकता, पुण्यकी अधिकता तथा परिश्रमकी अधिकता देखकर किया जाता है। जो मनुष्य रामका भक्त है, वही पात्र है और जो रामभक्तिसे रहित है, उसीको अपात्र जानना चाहिए। जो मनुष्य रामसे द्वेष रखता हो, उसका दर्शन और उससे सम्भाषण आदि कदापि न करें। जो मनुष्य भक्तिका मार्ग करता है, वह अपवित्र मनुष्य भी पवित्र हो जाता है ॥११०। १११॥ अपनी शक्तिसे अधिक जो दान दिया जाता है वही दान दान है और कंजूसीके साथ जो दान दिया जाता है, वह दान दान नहीं है ॥११२॥ देश, काल एवं पात्र अपात्रका विशेषताके अनुसार अधिक या न्यून फल कहा गया है ॥११३॥ जो मनुष्य ब्राह्मणको पारिश्रमिक नहीं देता, वह उन पैसोंकी संख्याके अनुसार दिव्य वर्षों तक विष्टाका क्रिमि बना रहता है। इसमे किसी प्रकारका संशय नहीं करना चाहिये। ज्ञानवान् मनुष्य जिन पवित्र कर्मोंको करता है अज्ञानियों की अपेक्षा उसे अधिक फल मिलता है जैसे-जैसे ज्ञानकी मात्रा बढ़ती जाती है वैसे-वैसे उसके पाप नष्ट होने लगते है ॥११४-११६॥ ज्ञानी मनुष्य यदि कोई पाप करता है तो अज्ञानियों द्वारा किये पातकोंकी अपेक्षा उस पापका भी न्यून ही कुफल मिलता है ॥११७॥ जैसे जैसे ज्ञान होता जाता है वैसे-वैसे पाप अपने आप नष्ट होते जाते हैं। जिस तरह जलती हुई अग्नि लकड़ियोंको जलाती है, उसी तरह ज्ञानाग्नि समस्त कर्मोको भस्म कर डालती है। जिस तरह अग्निके संयोगसे कंचनकी कान्ति अधिक हो जाती है, उसी तरह अनियोंका भस्म करनेसे पुण्यकी मात्रा बढ़ती जाती है। पुण्यसे पुण्य बढ़ता है और पाप कम होता जाता है ॥११८-१२०॥ पापसे पापकी वृद्धि होती है और पुण्य कम होता जाता है यह बड़ा ही सूक्ष्म विचार है और स्थूलदृष्टिवालोंके लिए तो और

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