श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 675, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ८ ] मनोहरकाण्डम् ६५९
तेषां वै स्मृतयो नाम ... केचिद्वैदिकेषु कर्मस्वधिकृताः पराः ॥९१॥
अवैदिकेषु मन्त्रेषु केचिद्यज्ञरता भुवि। अवैदिकेण मन्त्रेण नाधिकारो भवेत्क्वचित् ॥९२॥
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा। यथोक्तं कर्म कुर्वीत विप्राणां यच्च यद्विशेषतः ॥९३॥
कदा कुत्र कथं कर्म केन कार्यमिति स्फुटम्। यच्छास्त्रं न विजानात्यथा दोषभाग्भवेत् ॥९४॥
अदेशे यत्कृतं व्यङ्गकालवेलाविहितं च यत्। प्रत्येकं बहुवक्तव्यं प्रमादेनोदितं भवेत् ॥९५॥
तस्मादावश्यकं तत्र विप्राणां च विशेषतः। स्मृत्यर्थं ज्ञानतो वापि वेदार्थज्ञानतोऽधिकम् ॥९६॥
ऋग्वेदस्योपवेदः स्यादायुर्वेदश्च हि वैदिकः। परोपकारार्थमथ स्वस्यारोग्यार्थमेव वा ॥९७॥
जीविकार्थमप्यसौ हि पठितव्यो द्विजातिभिः। श्रह्मणं रोगिणं संप्रमुपचारेण जीवयेत् ॥९८॥
अद्यान्यभावं पापं तस्य नश्यति वै ध्रुवम्। परस्य च कृतो पुण्यं चरःकृच्छ्रमनुत्तमम् ॥९९॥
एवं पुण्यं भवेत्तस्य ... यत्नं कृतेऽपि रोगार्तः प्रायश्चापुनः शयात् ॥१००॥
सोऽप्यर्धफलभाग्नेति नात्र संशयो भवेत्। जीविकार्थे ... कथं दृष्टं विद्याचतुष्टयम् ॥१०१॥
इह लोके फलं तस्य परलोके न विद्यते। ... मानवः ॥१०२॥
कस्मात्त्वं कुरुते धर्मः का वा पूजा न मानिता। ... ॥१०३॥
गतश्रीश्च गतायुश्च ब्रह्मणाश्च द्विजो मृषाः। गान्धर्वशास्त्रमधीयानो रामग्रे यश्च गायति ॥१०४॥
तद्धन्तिकुलको लभते गांधर्वं सम्मुखे हरेः। चतुर्विधा जना... तु जीविका ॥१०५॥
क्षत्रियाणां तु सा प्रोक्ता दृष्टमुभयतः। ब्राह्मणेषु परेषु पुण्यं श्रुतानुगमनः ॥१०६॥
रहता है। वह ... । जिनमें तांत्रिक प्रकारके कर्मोंका आविष्कार हुआ है। उनमेंसे कुछ लोग वैदिक कर्मोंके अधिकृत हैं। कुछ तांत्रिकपद्धतिसे सब कर्म करते हैं और कुछ बिल्कुल पशुओंकी तरह ... भी अधिकार नहीं दिया गया है ततः ... मिश्रित धर्म माने गये हैं ॥ ९३ ॥ कब कहां और कर्म करना चाहिए वे सब बात यथार्थशास्त्र के निर्णय से जानी जा सकती हैं। यदि उनसे निर्णय किये बिना कोई कर्म किया जाय तो उसका भागी बनना पड़ता है ॥ ९४ ॥ जो कर्म अदेशार्थ, अङ्गरहित, बिना समयके अथवा ... जाता है, वह सब व्यर्थ होता है और पुण्यके स्थानमें पाप ही होता ... निर्णय कर लेना आवश्यक है। तिसमें भी ब्राह्मणको तो ... आज्ञा और स्मृतिसे भी वेदकी आज्ञा विशेष मानना है ॥ ९६ ॥ ... आयुर्वेद है। उसे परोपकारके लिए अथवा अपनी आरोग्यताके लिए या ... द्विजातियोंको अवश्य पढ़ना चाहिए। यदि कोई ब्राह्मण रोगी होनेके कारण दरिद्र हो तो उसका कष्ट बढ़ाकर देना चाहिए ॥ ९७ ॥ ९८ ॥ ऐसा करनेसे दवा देनेवालेके ... हो जाता है। यही उसे चार कृच्छ्रव्रतप्रायश्चित्त करनेके पुण्यकी प्राप्ति होती है ॥ ९९ ॥ इस ... पुण्य होता है। यदि यत्न करने पर भी कोई रोगी आयु पूर्ण हो जानेके कारण बच न सके तो भी दवा देनेवालेको आधा पुण्य होता ही है। इसमें किसी प्रकारका विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। जो मनुष्य अपनी जीविका चलानेके लिए चारों उपविद्याओंका उपयोग करता है उसे इस लोकमें अवश्य फल मिलता है, किन्तु परलोकमें कुछ भी नहीं मिलता। जो मनुष्य रोगरूपी समुद्रमें डूबे हुए निर्धनी मनुष्यका उद्धार करता है ॥ १०० ॥ १०१ ॥ उसने कौन-सा धर्म नहीं कर लिया और कौन-सी पूजा नहीं की। अर्थात् उसने सब कुछ कर लिया। जिस प्राणीकी श्री नष्ट हो जाती है, वह ज्योतिर्विदोंसे द्वेष करता है। जिसकी आयु क्षीण हो जाती है वह वैद्योंसे द्वेष करता है। गतश्री एवं गतायु ये दोनों प्राणी बहुतसा द्वेष किया करते हैं। जो मनुष्य गान्धर्वविद्या (संगीत) का अध्ययन करके रामचन्द्रजीके सम्मुख गाता है, उसे उत्तम गन्धर्वलोककी प्राप्ति होती है,