श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 690, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६७४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १० |
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श्रेष्ठस्सर्वनागानां पक्षिणां गरुडो यथा । देवानां तु यथा विष्णुर्वर्णानां ब्राह्मणो यथा ॥१०॥
प्राणश्चप्रियवस्तूनां भार्यैव सुहृदां यथा । आपगानां यथा गंगा तेजसां तु रविर्यथा ॥११॥
आयुधानां यथा वज्रं धातूनां कांचनं यथा । वैष्णवानां यथा रुद्रो रत्नानां कौस्तुभो यथा ॥१२॥
पुण्येषु च यथा धर्म स्सतां मानसं यथा ।
मासानां धर्महेतूनां चैत्रमासस्तथा स्मृतः । नानेन सदृशो लोके विष्णुप्रीतिविधायकः ॥१३॥
चैत्रस्नाने च खिन्ने मीने प्रातर्भूर्योदयात् । लक्ष्मीसहायी भगवान्प्रीतिं तस्मिन्करोत्यलम् ॥१४॥
जन्तूनां प्रीणनं यद्वदन्नेनैव हि जायते । तद्वच्चैत्रे च स्नानेन विष्णुः प्रीणात्यसंशयः ॥१५॥
यश्चैत्रस्नाननिरतान् जनान् दृष्ट्वाऽनुमोदते । तावन्मात्रेऽपि विमुक्ताघो विष्णुलोके महीयते ॥१६॥
सकृत्स्नात्वा मीनगस्थे सूर्ये प्रातः कृतह्निकः । महापातैर्विमुक्तोऽसौ विष्णोःसायुज्यमाप्नुयात् ॥१७॥
स्नानार्थं चैत्रमासे यः पादमेकं चलेद्यदि । सोऽश्वमेधाऽयुतानां च फलं प्राप्नोत्यसंशयः ॥१८॥
अथवा कूटचित्तस्तु कुर्यात्सङ्कल्पमात्रकम् । सोऽपि क्रतुशतं पुण्यं लभत्येव न संशयः ॥१९॥
यो गच्छेद्धनुषांयावत् स्नातुं मीनगते रवौ । सर्वबंधविनिर्मुक्तो विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात् ॥२०॥
त्रैलोक्ये यानि तीर्थानि ब्रह्मांडान्तर्गतानि च । तानिसर्वाणि भो शिष्य मयि बाह्येऽनेऽल्पके ॥२१॥
तावंत्तुवन्ति पापानि गर्जन्ति यमशासने । यावन्न कुरुते ऽतुर्थेक्षेत्रे स्नानं जलाल्पप ॥२२॥
तीर्थाधिदेवताः सर्वाश्चैत्रे मयि द्विजोत्तम । बहिर्जले ममाश्रित्य यदा सन्निहिताः शिशो ॥२३॥
सूर्योदयं समारभ्य यावत् षड्घटिकावधि । तिष्ठति चाज्ञया विष्णोस्तद्गणां हितकाम्यया ॥२४॥
तथाप्यकुर्वतां स्नानं शापं दत्त्वा सुदारुणम् । स्वस्थानं यांति भो शिष्य तस्मात्स्नानं समाचरेत् २५॥
श्रेष्ठके समान, सर्पोंमें शेषनागके समान, पक्षियोंमें गरुडके समान, देवताओंमें विष्णुभगवान्के सदृश और वर्णोंमें ब्राह्मणके समान श्रेष्ठ है ॥ ९ ॥ १० । संसारकी प्रिय वस्तुओंमें प्राणकी भांति, मित्रोंमें भार्याकी तरह, नदियोंमें गङ्गाकी तरह, तेजस्वियोंमें सूर्य की नांई, शस्त्रोंमें वज्रकी तरह धातुओंमें सुवर्णकी तरह, वैष्णवोंमें रुद्रभगवान्के समान, रत्नोंमें कौस्तुभ मणिकी तरह पुण्योंमें कमलकी तरह मानवोंमें मानकरोक्तकी तरह धर्महेतुक सब मासोंमें यह चैत्रमास सर्वश्रेष्ठ है । भगवान्के प्रति प्रीति बढ़ानेवाला और कोई मास नहीं है ॥ ११-१३ ॥ जब कि मीन लग्नपर सूर्य हो, ऐसे चैत्रमासमें अरुणोदयके पहले स्नान करनेसे लक्ष्मीके साथ-साथ विष्णुभगवान् भी प्रसन्न होते हैं ॥१४॥ जिस तरह संसारके प्राणी अन्नसे तृप्ति तथा प्रसन्न रहते हैं। उसी तरह चैत्रमासमें स्नान करनेसे विष्णुभगवान् तृप्त होते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है ॥१५॥ जो मनुष्य किसी-को चैत्रस्नानमें संलग्न देखकर उसका अनुमोदन करता है तो शीघ्र ही उसके सब पाप छूट जाते हैं और वह प्राणी विष्णुलोकमें सम्मान पाता है ॥ १६ ॥ जब कि सूर्य मान राशिपर हों, ऐसे समय केवल एक बार प्रातःकालके समय स्नान और नित्यकर्म करनेवाला प्राणी बड़े बड़े पापोंसे मुक्त होकर विष्णुभगवान्की सायुज्य मुक्ति पाता है । १७ ॥ चैत्रमासमें स्नानके निमित्त जो मनुष्य एक पग भी चलता है वह दस हजार अश्वमेध यज्ञका फल पाता है । १८ ॥ जो प्राणी स्थिर चित्तसे चैत्रस्नानका सङ्कल्पमात्र करता है, वह भी सैकड़ों यज्ञ करनेका फल प्राप्त कर लेता है। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १९ । मीनगत सूर्यके समय जो प्राणी एक धनुष विस्तृत मार्ग भी चैत्रस्नानके लिए चलता है, वह सब बंधनोंसे छूटकर विष्णुकी सायुज्य मुक्ति पाता है ॥ २० ॥ त्रैलोक्य या ब्रह्माण्डके अन्तर्गत जितने भी तीर्थ हैं वे सब उस समय यहाँके थोड़ेसे जलमें विद्यमान रहते हैं ॥ २१ ॥ जब तक प्राणी चैत्रमासमें किसी जलाशयमें स्नान नहीं करता, तभीतक यमराजके आज्ञानुसार सब पातक गरजते हैं । २२ ॥ हे शिशो सब तीर्थ और सब देवता चैत्रमासमें जलके बाहर आकर ठहर जाते हैं । २३ ॥ सूर्योदयसे लेकर छः घडी दिन चढ़े तक विष्णुभगवान्के आज्ञानुसार सब देवता मनुष्योंके कल्याणार्थ जलके बाहर बैठे रहते हैं । २४ । उस समय भी यदि कोई स्नान नहीं करता तो