भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ
६७४आनन्दरामायणे[ सर्गः १०

श्रेष्ठस्सर्वनागानां पक्षिणां गरुडो यथा । देवानां तु यथा विष्णुर्वर्णानां ब्राह्मणो यथा ॥१०॥
प्राणश्चप्रियवस्तूनां भार्यैव सुहृदां यथा । आपगानां यथा गंगा तेजसां तु रविर्यथा ॥११॥
आयुधानां यथा वज्रं धातूनां कांचनं यथा । वैष्णवानां यथा रुद्रो रत्नानां कौस्तुभो यथा ॥१२॥
पुण्येषु च यथा धर्म स्सतां मानसं यथा ।
मासानां धर्महेतूनां चैत्रमासस्तथा स्मृतः । नानेन सदृशो लोके विष्णुप्रीतिविधायकः ॥१३॥
चैत्रस्नाने च खिन्ने मीने प्रातर्भूर्योदयात् । लक्ष्मीसहायी भगवान्प्रीतिं तस्मिन्करोत्यलम् ॥१४॥
जन्तूनां प्रीणनं यद्वदन्नेनैव हि जायते । तद्वच्चैत्रे च स्नानेन विष्णुः प्रीणात्यसंशयः ॥१५॥
यश्चैत्रस्नाननिरतान् जनान् दृष्ट्वाऽनुमोदते । तावन्मात्रेऽपि विमुक्ताघो विष्णुलोके महीयते ॥१६॥
सकृत्स्नात्वा मीनगस्थे सूर्ये प्रातः कृतह्निकः । महापातैर्विमुक्तोऽसौ विष्णोःसायुज्यमाप्नुयात् ॥१७॥
स्नानार्थं चैत्रमासे यः पादमेकं चलेद्यदि । सोऽश्वमेधाऽयुतानां च फलं प्राप्नोत्यसंशयः ॥१८॥
अथवा कूटचित्तस्तु कुर्यात्सङ्कल्पमात्रकम् । सोऽपि क्रतुशतं पुण्यं लभत्येव न संशयः ॥१९॥
यो गच्छेद्धनुषांयावत् स्नातुं मीनगते रवौ । सर्वबंधविनिर्मुक्तो विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात् ॥२०॥
त्रैलोक्ये यानि तीर्थानि ब्रह्मांडान्तर्गतानि च । तानिसर्वाणि भो शिष्य मयि बाह्येऽनेऽल्पके ॥२१॥
तावंत्तुवन्ति पापानि गर्जन्ति यमशासने । यावन्न कुरुते ऽतुर्थेक्षेत्रे स्नानं जलाल्पप ॥२२॥
तीर्थाधिदेवताः सर्वाश्चैत्रे मयि द्विजोत्तम । बहिर्जले ममाश्रित्य यदा सन्निहिताः शिशो ॥२३॥
सूर्योदयं समारभ्य यावत् षड्घटिकावधि । तिष्ठति चाज्ञया विष्णोस्तद्गणां हितकाम्यया ॥२४॥
तथाप्यकुर्वतां स्नानं शापं दत्त्वा सुदारुणम् । स्वस्थानं यांति भो शिष्य तस्मात्स्नानं समाचरेत् २५॥


श्रेष्ठके समान, सर्पोंमें शेषनागके समान, पक्षियोंमें गरुडके समान, देवताओंमें विष्णुभगवान्के सदृश और वर्णोंमें ब्राह्मणके समान श्रेष्ठ है ॥ ९ ॥ १० । संसारकी प्रिय वस्तुओंमें प्राणकी भांति, मित्रोंमें भार्याकी तरह, नदियोंमें गङ्गाकी तरह, तेजस्वियोंमें सूर्य की नांई, शस्त्रोंमें वज्रकी तरह धातुओंमें सुवर्णकी तरह, वैष्णवोंमें रुद्रभगवान्‌के समान, रत्नोंमें कौस्तुभ मणिकी तरह पुण्योंमें कमलकी तरह मानवोंमें मानकरोक्तकी तरह धर्महेतुक सब मासोंमें यह चैत्रमास सर्वश्रेष्ठ है । भगवान्के प्रति प्रीति बढ़ानेवाला और कोई मास नहीं है ॥ ११-१३ ॥ जब कि मीन लग्नपर सूर्य हो, ऐसे चैत्रमासमें अरुणोदयके पहले स्नान करनेसे लक्ष्मीके साथ-साथ विष्णुभगवान् भी प्रसन्न होते हैं ॥१४॥ जिस तरह संसारके प्राणी अन्नसे तृप्ति तथा प्रसन्न रहते हैं। उसी तरह चैत्रमासमें स्नान करनेसे विष्णुभगवान् तृप्त होते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है ॥१५॥ जो मनुष्य किसी-को चैत्रस्नानमें संलग्न देखकर उसका अनुमोदन करता है तो शीघ्र ही उसके सब पाप छूट जाते हैं और वह प्राणी विष्णुलोकमें सम्मान पाता है ॥ १६ ॥ जब कि सूर्य मान राशिपर हों, ऐसे समय केवल एक बार प्रातःकालके समय स्नान और नित्यकर्म करनेवाला प्राणी बड़े बड़े पापोंसे मुक्त होकर विष्णुभगवान्‌की सायुज्य मुक्ति पाता है । १७ ॥ चैत्रमासमें स्नानके निमित्त जो मनुष्य एक पग भी चलता है वह दस हजार अश्वमेध यज्ञका फल पाता है । १८ ॥ जो प्राणी स्थिर चित्तसे चैत्रस्नानका सङ्कल्पमात्र करता है, वह भी सैकड़ों यज्ञ करनेका फल प्राप्त कर लेता है। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १९ । मीनगत सूर्यके समय जो प्राणी एक धनुष विस्तृत मार्ग भी चैत्रस्नानके लिए चलता है, वह सब बंधनोंसे छूटकर विष्णुकी सायुज्य मुक्ति पाता है ॥ २० ॥ त्रैलोक्य या ब्रह्माण्डके अन्तर्गत जितने भी तीर्थ हैं वे सब उस समय यहाँके थोड़ेसे जलमें विद्यमान रहते हैं ॥ २१ ॥ जब तक प्राणी चैत्रमासमें किसी जलाशयमें स्नान नहीं करता, तभीतक यमराजके आज्ञानुसार सब पातक गरजते हैं । २२ ॥ हे शिशो सब तीर्थ और सब देवता चैत्रमासमें जलके बाहर आकर ठहर जाते हैं । २३ ॥ सूर्योदयसे लेकर छः घडी दिन चढ़े तक विष्णुभगवान्‌के आज्ञानुसार सब देवता मनुष्योंके कल्याणार्थ जलके बाहर बैठे रहते हैं । २४ । उस समय भी यदि कोई स्नान नहीं करता तो

सर्गः १०] मनोहरकाण्डम् १७९

सर्गः १०] मनोहरकाण्डम् १७९

न हि चैत्रसमो मासो न कृतेन समं युगम् । न च वेदसमं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम् ॥२६॥ न जलेन समं दानं न सुखं भार्यया समम् । न हि चैत्रसमं लोके पवित्रं कश्यपो विदुः ॥२७॥ तस्मादयं चैत्रमासः शेषशायिप्रियः सदा । अव्रतेन नयेद्यस्तु चांडालत्वं स ऋच्छति ॥२८॥ यथा गृहं सर्वगुणोपपन्नं परिच्छदैर्हीनमशोभने तथा । यथैव कन्या सकलैर्गुणैर्युक्ताप्यलंक्रियाहीनतया न शोभते ॥२९॥ शाकं तु षड्रसयुतेन हीनं न शोभते सर्वगुणोपपन्नम् । यथा ललनामेव विना सभा नैवोत्सवेन हीना ललना न शिष्ये ॥ तथाऽन्यमासेषु कृतो हि धर्मश्चैत्रेण हीनश्च वृथैव याति ॥३०॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन येन केनापि वेदिना । चैत्रमासस्य यो धर्मः कर्तव्य इति निश्चयः ॥३१॥ न नन्दनोः पृथ्व्याम् समो न रामतोऽन्यो वसुदेवसूनुः । अन्य श्चाप्य पुरश्चररूप चैत्रे तु कार्यं विधिवत्प्रपूजनम् ॥३२॥ अजकीर्तिमुद्दिश्य मीनमध्ये दिवाकर । प्रातः स्नात्वा जपेद्राममन्यथा नार्क व्रजेत् ॥३३॥ चैत्रमासो हि सकलः स तारादण्डैवतः । यद्यत्कर्म हि तन्मर्त्य तमुद्दिश्य चरेन्नरः ॥३४॥ जानकीकांत हे राम चैत्रे मीनगते रवौ । प्रातःस्नानं करिष्यामि निर्विघ्नं कुरु राघव ॥३५॥ चैत्रस्य मीनगे भानौ प्रातःस्नानपरायणः । अर्घ्यं तेऽहं प्रदास्यामि गृहाण रघुनन्दन । ३६ । गङ्गायाः सलिलैः सर्वैर्निर्यान्ति जलदा नदाः । प्रतिगृह्य मया दत्तमर्घ्यं सम्यक् प्रसीदथ ॥३७॥ ब्रह्माद्या देवताः सर्वा ऋषयो ये च वैष्णवाः । ते गृह्णन्तु मया दत्तं प्रसीदन्त्वर्घ्यदानतः ॥३८॥

उसे दण्डरूप रूप देकर बदलता अपने स्थानपर चले जाते हैं । अतएव हे शिष्य ! इस समय अवश्य स्नान करना चाहिए । २५ ॥ चैत्रके समान कोई मास नहीं है, सत्ययुगके समान कोई युग नहीं है, वेदके समान कोई शास्त्र नहीं है, गंगाके समान कोई तीर्थ नहीं है, जलदानके समान कोई दान नहीं है, भार्याके समान कोई सुख नहीं है, उसी तरह चैत्रके समान और कोई वस्तु पवित्र नहीं है ॥ २६ ॥ २७ ॥ इसलिए यह चैत्रमास सदा विष्णुरूप भगवान्‌का प्रिय रहा है । जो मनुष्य बिना व्रत किए ही यह मास बिता देता है, वह चांडाल होता है ॥ २८ ॥ जिस तरह कि सर्वसम्पत्तिमय होकर भी बिना छत्रके घर नहीं अच्छा लगता, जिस तरह कि कोई कन्या सब सुलक्षणोंसे युक्त होती हुई वा औपनयिका न हो तो वह नहीं अच्छी मालूम होती, जिस तरह कि नमकके बिना शाक अच्छा नहीं लगता, जिस तरह बिना उत्सवके सभा नहीं अच्छी लगती, बिना वस्त्रविहीन नारी नहीं शोभन होती, उसी तरह और-और मासोमें शुभकार्य करनेका भी कोई लाभ नहीं हुआ अर्थात् वह व्यर्थ ही जाता है ॥ २९ ॥ ३० ॥ अतएव कोई भी मनुष्य हो, उसे चैत्रमासके धर्मका पालन करना ही चाहिए ॥ ३१ ॥ श्रीकृष्णसे पृथक् अगम नहीं है और न श्रीरामसे पृथक् श्रीकृष्ण ही है। इसलिए यह उचित है कि चैत्रमासमें श्रद्धाभक्तिपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीका विधिवत् पूजन करे ॥ ३२ ॥ जबकि सूर्यदेव मीन राशिपर चले गये हों, उस समय प्रातःस्नान करके रामनामका जप करना चाहिए । जो ऐसा नहीं करता, वह नरकगामी होता है ॥ ३३ ॥ सारे चैत्रमासके देवता राम और सीता ही हैं । अतएव उस समय जो कुछ भी कार्य करे, वह सब उन्हींके उद्देश्यसे करे ॥ ३४ ॥ स्नानके पहिले इस तरह प्रार्थना करनी चाहिए कि हे जानकीकान्त ! हे राम ! सूर्यके मीन राशिपर जानेके अनन्तर मैं चैत्रमासमें प्रातः- स्नान करूँगा । कृपया मेरे इस पुनीत स्नानकार्यको निर्विघ्न समाप्त होने दीजिए ॥ ३५ ॥ आज सूर्य- देवके मीन राशिपर चले जानेके अनन्तर मैं प्रातःस्नान करके आपको अर्घ्य दूँगा । हे रघुनन्दन ! उसे आप स्वीकार कीजिए । गंगा आदिके सब नदें, सारे तीर्थ, मेघ तथा नद आदिका जल लेकर मैं आपको अर्घ्य प्रदान कर रहा हूँ, इससे आप प्रसन्न हों ॥ ३६ । ३७ ॥ ब्रह्मा आदि देवता, समस्त नदियाँ और सब वैष्णव

६७६ आनन्दरामायणे [ सर्ग १०


ऋषभः पापिनां शास्ता त्वं नृपं समदर्शनः । गृहाणार्थ्यं मया दत्तं यथोक्तफलदो भव ॥३९॥
इति चार्घ्यं समर्प्याथ पश्चात्स्नानं समाचरेत् । वाससी परिधायाथ कुर्यात् कर्माणि सर्वशः ॥४०॥
जानकीकांतमभ्यर्च्य प्रसूनैर्मधुसंभवैः । श्रुत्वा रामकथां दिव्यामेतन्मासप्रशंसिनीम् ॥४१॥
कोटिजन्मार्जितात्पापान्मुक्तो मोक्षमवाप्नुयात् । चैत्रे यः कांस्यभोजी हि तथा चाश्रुतसत्कथः ॥४२॥
न स्नानञ्चाप्यदत्ता च नारकानेव विंदति । यथा माघः प्रयागे हि स्नानतः पुण्यमिच्छताम्॥४३॥
कार्तिकोऽपि यथा काश्यां पञ्चगङ्गाजले स्मृतः । द्वारकायां यथा प्रोक्तो वैशाखो माधवप्रियः । ४४॥
अयोध्यायां रामतीर्थे तथा चैत्रे प्रकीर्तितः । प्रयागे मासमात्रेण यत्फलं प्राप्यते नरैः ॥४५॥
अयोध्यायां रामतीर्थे सकृत्स्नानेन तत्फलम् । वैशाखद्वादशभवं पुण्यं यद्गोमतीजले ॥४६॥
तत्पुण्यं सरयूतोयेऽयोध्यायां प्राप्यते नरैः । चैत्रे मयि त्रिभिः स्नानै रामतीर्थे न संशयः ॥४७॥
कार्तिके पंचगङ्गायां यैः स्नां द्वादशाब्दकम् । अयोध्यायां रामतीर्थे चैत्रे पक्षेण तत्फलम् ॥४८॥
अयोध्या दुर्लभा लोके नराणां पापकारिणाम् । तावद्गर्जन्ति पापानि यावद्दृष्टा न सा पुरी ॥४९॥
अयोध्याया यदाऽभावस्तदा रामकृतानि च । जगन्त्यां यानि तीर्थानि तत्र स्नानं विधीयताम्५०॥
यत्रापोध्यापुरी नास्ति स्नानार्थे सरयूर्न च । रामतीर्थं न यत्रास्ति तदा तीर्थेषु कारयेत् ॥५१॥
तैलाभ्यंगं दिवास्वापस्तथा वै कांस्यभोजनम् । खट्वानिद्रा गृहे स्नानं निषिद्धस्य च भक्षणम् ॥५२॥
चैत्रे तु वर्जयेदेतौ द्विरुक्तं नक्तभोजनम् । चैत्रे माघे तु मध्याह्ने श्रान्तानां च द्विजन्मनाम् ॥५३॥
पादावनेजनं कुर्यात्सुव्रतं तु व्रतोत्तमम् । मार्गेऽध्वगानां यो मर्त्यः प्रपादानं च चैत्रके ॥५४।


ऋषि मेरे इस अर्घ्यदानको ग्रहण करते हुए प्रसन्न हों । ३८ । हे पाषियोंपर शासन करनेवाले यमदेवता ! आप समदर्शी हैं । मेरे इस अर्घ्यदानको ग्रहण करिए और यथोचित फल दीजिए । ३९ । इस तरह अर्घ्य समर्पण करनेके अनन्तर स्नान करे । तदनन्तर कपडे बदलकर और कोई काम करना चाहिए । ४० ॥ इसके बाद वसन्त ऋतुमें उत्पन्न फूलोंसे जानकीकान्तका पूजन करे और चैत्रमासकी प्रशंसा करनेवाली कथाएं सुने । ४१ ॥ ऐसा करनेसे करोड़ों जन्मके एकत्रित पातक नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य चैत्रमासमें काँसेके पात्रमें भोजन करता है और मन्दो अञ्छा कथाने नहीं सुनता, न किसी पवित्र तीर्थमें स्नान करता है और न दान ही देता है, उसे नरकके सिवाय और किसी गतिकी प्राप्ति नहीं होती । जिस तरह कि पुण्यप्राप्तिके लिए लोग माघमासमें प्रयागस्नान करते हैं ; ४२ ॥ ४३ ॥ जैसे कात्तिकमासमें काशीकी पञ्चगङ्गामें स्नान करते हैं, वैसे वैशाखमासमें द्वारकाजीमें स्नान करते हैं, उसी तरह रामभक्तोंको चाहिए कि चैत्रमासमें अयोध्या-स्नान अवश्य करें । एक महीना प्रयागमें स्नान करनेसे जो फल प्राप्त होता है. वही फल अयोध्याके रामतीर्थमें केवल एक बारके स्नानसे मिल जाता है। बारह बार वैशाखमासमें द्वारकाकी गोमती नदीमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वही फल अयोध्याके सरयूजलमें स्नान करनेसे प्राप्त होता है। किन्तु यह फल तब मिलता है, जब चैत्र मासमें तीन बार रामतीर्थम स्नान किया जाय ॥ ४४-४७ ॥ बारह बरस तक कात्तिकमें काशीकी पञ्चगङ्गामें स्नान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही फल केवल एक पखतक अयोध्या-की सरयूजीमें स्नान करनेसे प्राप्त होता है । ४८ ॥ पापियोंके लिए अयोध्या दुर्लभ तीर्थ है; पापगण तभी तक गर्जन करते हैं, जबतक प्राणी अयोध्यापुरीका दर्शन नहीं कर लेता । ४९ । यदि किसी शावक फलकी अयोध्या प्राप्त न हो सके तो रामचन्द्रज ने जिन तीर्थोंका निर्माण किया हो वहाँपर स्नान करे ॥ ५० ॥ जहाँ कि न अयोध्या है, न सरयूजी हैं और न कोई रामतीर्थ ही है। वहाँ जो कोई भी तीर्थ हो, उसीमें स्नान कर ले ॥ ५१ ॥ तेल लगाना, दिनमें सोना, कांस्यपात्रमें भोजन करना, चारपाईपर सोना, घरमें स्नान करना, किसी प्रकारका निषिद्ध भोजन, रात्रिके समय भोजन तथा दिनमें दो बार भोजन इन आठ बातोंको चैत्रमासमें छोड़ देना चाहिए । चैत्रमासमें जो प्राणी दोपहरके समय थके हुए ब्राह्मणोंके पैर धोता है, वह मानो सर्वोत्तम व्रत करता है। जो प्राणी चैत्रमासमें राह चलनेवालोंको जल पिलाता है और रास्तेमें

सर्ग १०] मनोहरकाण्डम् १७७

सर्ग १०] मनोहरकाण्डम् १७७

मार्गे छायां तु यः कुर्यान्म स्वर्गे च मदायते । मल्लिं मल्लारकां वाऽय यों लाथ मिच्छति ।५५। व्यजनं व्यजनाकांक्षी दानमेतत्तु चैत्रके।

जलं छत्रं तु व्यजनं दानं मीने विशिष्यते । चैत्रे मासे तु सम्प्राप्ते ब्राह्मणाम् कुसुमोत्करे ।५६। अल्पोदकद्रुमं तु चानको भुवि जायते । चैत्रे देयं जलं चान्नं तथा शय्या मनोरमा ।५७। आदर्शदानं ताम्बूलगुडदानं प्रकारयेत् । गोधूममुद्गयोर्दानं दानं दध्यादनस्य च ।५८। घृतयुक्तं कांस्यपात्रं दानमित्युत्तमस्य च । तथा श्रीफलदानं च दानं चाम्रफलस्य च ।५९। सूक्ष्मवस्त्रमंचकयोः पानपात्रं कमण्डलम् । यतीनां दण्डदानं वै तैलदानं मठेषु च ॥६०। जीर्णोद्धारं मठानां च घटानां करणं तथा । प्रासादकरणं चैव वापीकूपादिकं तथा ।६१। मार्गस्थानां छत्रदानं मध्याह्ने ऽतिथिपूजनम् । कमपात्रं यतीनां च पदोपानं तु शक्तितोऽपि ।६२। एतानि चैत्रमासे तु दानानि कथितानि हि । फल शाकं तु मूलं च कंदं पुष्पं तु चन्दनम् ॥६३। उशीरः शीनलं द्रव्यं कर्पूरं कस्तुरी शुभा। दीपदानं धेनुदानं गोहदानं तथा ऽमृतम् ॥६४॥ गोरसानां पृथग्दानं पवित्राह्मणभोजनम् । सुवासिनीपूजनं च रामनामप्रलेखनम् ॥६५॥ पुस्तकानां तथा दानं तथा कुङ्कुमकेशरे । जात्राफलं लवंगाश्च जातिपत्रीशशांकके ।६६। धातकीं नागरं धूपं बीजपूरं कलिंगकम् । जंबीरं पनसंबैवं कपित्थं मातुलुंगकम् ॥६७। कूष्मांडदानमार्गमञ्जनं मार्गशोधनम् । नयोशानहदानं च गजवाजिभवं तथा ।६८। एतानि चैत्रमासे तु दानानि कथितानि हि । यानि चैत्रे तु वर्ज्यानि तानि ते प्रवदाम्यहम् ॥६९॥ सर्वाणि चैव शाकानि क्षौद्रं मौर्य्याकं तथा राजमाषारुकं चापि चैत्रस्नायी प्रवर्जयेत् ।७०। परान्नं च परद्रोहं परदारागमं तथा । तीर्थेन्तानि सर्वत्रैव चैत्रस्नायी प्रवर्जयेत् ।७१॥ द्विदलं विलतैलं च तथा ऽन्नं शल्यदूषितम् । भावदुष्टं शब्ददुष्टं चैत्रस्नायी तु वर्जयेत् ॥७२॥

छायाका प्रबन्ध करता है, वह स्वर्गलोकमें जाकर बहुवैभवके द्वारा पूजित होता है इस मासमें लोगोंको चाहिए कि जो मधुर पंखा चाहता हो, उसे पंखा दे। जो छाताका इच्छुक हो, उसे छाता दे। जो पानी चाहता हो, उसे पानी पिलावे। यह दान विशेष करके चैत्रमासके लिए बड़ा ही उपयोगी है। जो मनुष्य चैत्रमास आनेपर विप्रां कुटुम्बी ब्राह्मणको जलथरा शय्या नह देनों, वह परखर घातक होता है। इसलिए चैत्रमासमे जल अन्न तथा सुन्दर शय्याका दान देना चाहिये ॥ ५२-५७ ॥ इनके अतिरिक्त दर्पणका दान, ताम्बूल और गुड़का दान, गहूं, मूंग, दही, बादाम, घास भर हुए कांस्यपात्रका दान, आँवले रसका दान, बलका दान, आमका दान, महीन कपड़े और पलंगका दान, जल पीनेका पात्र, कमण्डलु तथा संन्यासियोंके लिये दण्डदान, मठोंमं तेलका दान, मठोंका जीर्णोद्धार, घंटाघर बनवाना, मकान बनवाना, कुआँ-बावली आदि बनवाना मार्गमें चलनेवालोंके लिय छत्रदान, दोपहरके समय अतिथियांका पूजन, यतियोंका कमण्डलु-दान और गोओंको ग्रासदान व चैत्रमासके दान बतलाये गये हैं। इनके अतिरिक्त चैत्रमासमें ये दान और बतलाये गये हैं। जैसे-फल शाक, मूल, कन्द, पुष्प, चन्दन ॥ ५८-६३। खस, इसी तरह और-और ठण्डी चीजें, कपूर, कस्तूरी, दीपदान धेनुदान गोदान, घासदान, यतियों और ब्राह्मणोंका भाजनदान, सोहागिन स्त्रियोंका पूजन, रामन मका लेखन, पुस्तकदान, कुमकुम और केशरका दान, आम्रफल, लौंग, जावित्री । ६४-६६ ॥ धातकी, नागरमोथा, धूप, बीजपूर, तरबूज, उम्बीर, नींबू, कटहल, कैंथा, कूष्माण्डदान, बगीचा लगाना, रास्ता साफ करवाना, जूनेका दान, हाथ एवं घड़ेका दान, ये सब दान चैत्रमासके लिए कहे गये हैं। अब मैं तुम्हें यह बतलाता हूँ कि चैत्रमासमें किन-किन वस्तुओंका परित्याग करना चाहिए ॥ ६७-६९ ॥ चैत्रस्नान करनेवालेको सब प्रकारके शाक, मधु, कांजी एवं राजमाष आदि वस्तुओंका परित्याग कर देना चाहिए ॥ ७० ॥ दूसरेका अन्न, दूसरेसे द्रोह और दूसरी स्त्रीके साथ समागम, चैत्रस्नायी इन कामोंको सर्वदाके लिए छोड़

६७८ आनंदरामायणे [ सर्गः १०

देववेदाद्विजानां च गुरुगोत्रतिनां तथा। स्त्रीराजमहतां निंदां चैत्रस्नायी विवर्जयेत् ॥ ७३॥
माषमांसं विषं चूर्णं फले जंबीरमासम्। धान्ये मयूरिका प्रोक्ता चान्नं पर्युषितं तथा ॥७४॥
ब्रह्मचर्यमधःसुप्तिः पत्रावल्यां च भोजनम्। चतुर्थकाले भुंजीत कुर्याद्दानं सदा व्रती ॥७५॥
संवत्सरप्रतिपदि तैलमभ्यंग तु कारयेत्। चैत्रस्नायी नरोऽन्यत्र तैलाभ्यंगं न कारयेत् ॥ ७६॥
अलाबुं वापि वृंताकं कूष्मांडं पूर्तीफलम्। श्लेष्मातकं कलिंगं च कपित्थं चैव वर्जयेत् ॥७७॥
रजस्वलां त्यजेन्म्लेच्छपतितान्त्यजकैः सह। द्विजाद्विट्‌वेदवाह्यैश्च न वदेन्म्यर्वदा व्रती ॥७८॥
पलांडु लशुनं चैव छत्राकं गृंजनं तथा। नालिकामूलकं शिग्रुं चैत्रस्नायी विवर्जयेत् । ७९।
एभिः स्पृष्टं शपाकेश्च सूतकान्नं च वर्जयेत्। द्विपाचितं च दग्धान्नं चैत्रस्नायी विवर्जयेत् ॥८०॥
एतानि वर्जयेन्नित्यं व्रती सर्वत्र तेष्वपि। कृच्छ्राद्यं च प्रकुर्वीत स्वशक्त्या रामतुष्टये ॥८१॥
क्रमान्कूष्मांडवृंताकछत्राकं मूलकं तथा। श्रीफलं च कलिंगं च फलं धात्र्याभवं तथा ॥८२॥
नारिकेलमलाबू च पटोलं बदरीफलम्। चर्मवृन्ताककं वल्लीशाकं तुलसिजं तथा । ८३॥
शाकान्येतानि वर्ज्यानि क्रमात्प्रतिपदादिषु । धात्रीफलं रवौ तद्वद्वर्जयेन्मर्वदा गृही ।८४।
एभ्योऽन्यद्वर्जयेत्किञ्चिद्रामप्रीत्यर्थे नरः। दत्त्वा व्रतान्ते विप्राय भक्षयेत्सर्वदैव हि ॥८५॥
फाल्गुनीपौर्णमारभ्य यावच्चैत्री तु पूर्णिमा । चैत्रस्नानं तु तावद्धि नरैः कार्यं च भक्तितः ॥८६।
जयवा मनिमगो मानुर्यावत्पात्रान्तमाचरेत् । दशमीं फाल्गुनीं शुक्लां समारभ्य यथोदिताम् ।८७॥
यावच्छ्वैत्र शुक्ल दशमी तावत्स्नानं प्रफारयेत् स्नानस्यैव त्रयो भेदाः शिष्य ते समुदीरिताः ॥८८॥
चैत्रशुक्लतृतीयाया यावद्वैशाखमन्त्रता । तृतीया शुक्लभक्षस्य ह्यक्षयेति स्मृताऽथ या ॥८९॥


है । क्योंकि ये तीर्थके सब पुण्योंको नष्ट करनेवाले उत्पन्न हैं ॥ ७१ ॥ दाल, तिनका दल, कंकड़-पत्थर मिला हुआ अन्न, भावसे दूषित और बहुपर्युषित अन्नाका चैत्रस्नायी मनुष्य न खाय । ७२ ॥ देवता, वेद, ब्राह्मण, गुरुजन, गायत्री, स्त्री, राजा और अपनेसे बड़ेकी निन्दा का भी परित्याग कर देना चाहिए । ७३ ॥ प्र. थियाक, अलूका मांस, शममत्स्यका चूर्ण कञ्जम जंभार नावू, धान्यम मसूर और जूठा अन्न ये सब मांसतुल्य होते हैं, इसलिए इनको न खाय । ब्रह्मचर्य, पृथ्वीपर शयन, पत्तलमें भोजन और नौव प्रहरमें भ जन करता हुआ व्रती मनुष्य इन नियमांका बराबर पालन करे ॥७४-७५॥ केवल संवत्सरका मुख दिवाली प्रतिपदाका दिनमें तेल लगावे और किसी समय नहीं ॥ ७६ ॥ लौकी, भटा कुम्हड़ा, छोटा पपीता, लिसोढ़ा, तरबूज तथा कैथा इन वस्तुओंको न खाना चाहिए ॥७७॥ रजस्वला, चण्डाल, द्विजद्वेषी तथा वेदसे बहिष्कृत मनुष्योंसे बात भी न करे ॥७८॥ प्याज, लहशुन, छत्राक ( भुईंफोर), गाजर, मूली तथा सहिजन इन वस्तुओंको भी चैत्रस्नायी मनुष्य न खाय ॥७९॥ ऊपर बतलाये पतितों, कुत्ते तथा शौण्ड से छुए एवं सूतकके अन्नका भी परित्याग कर देना चाहिए । दोबारा पकाया और जला हुआ अन्न भी चैत्रस्नायी मनुष्य न खाय ॥ ८० ॥ ऊपर बताये चीज न खाय और अपनेसे बन पड़े तो रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेके लिए कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रत भी करे ॥ ८१ ॥ कुम्हड़ा, भंटा, भुईंफोड, मूली, बेल, तरबूज, आंवलेका फल नारियल, लौआ, परवल, बेर, चर्मवृन्ताक, बल्लीशक और तुलसी, इन्हे क्रमशः प्रतिपदा आदि तिथियोंको न खाय । उसी तरह रविवारको धात्रीफल (आंवला) न खाय ॥ ८२-८४ ॥ इनके अतिरिक्त भी रामको प्रसन्न करनेके लिए अपनी तरफसे कुछ वस्तुओंका परित्याग कर दे। किन्तु व्रतसमाप्तिके अनन्तर ब्राह्मणको उस वस्तु-का दान देकर खाय तो कोई हर्ज नही है ॥ ८५ ॥ फाल्गुनकी पूर्णिमासे लेकर चैत्रकी पूर्णिमा पर्यन्त भक्तिपूर्वक चैत्रस्नानका व्रत करना चाहिए ॥ ८६ ॥ अथवा जबतक सूर्य मीन राशिपर रहें, तबतक व्रत करता रहे फाल्गुण कृष्णपक्षकी दशमीसे लेकर चैत्रशुक्लकी दशमी तक स्नान करना चाहिए । इस तरह हे शिष्य ! इस चैत्रस्नानके भेद मैने तुमको बतलाये ॥८७।८८॥ चैत्रशुक्लकी तृतीयासे लेकर वैशाख शुक्लपक्षकी

सर्गः १०] प्रबोधकाव्यम् १७९

तावच्च शीतला गौरी स्नातव्या भूतलेऽमये । मीनाक्षीह तु नारीभिः पूजनीया च जानकी ॥९०॥ तृतीया या तु चैत्रस्य सितपक्षेऽथवा तथा । वैशाखशुक्लपक्षे या तृतीयाऽक्षय्यसंज्ञिका ॥९१॥ नारी या शीतलागौरींनैतन्नानपरायणा अन्यत्र मा करोत्वेवंनपोसिद्धिर्नान्यादिने कदा ॥९२॥ त्रिंशच्च तिथयः पुष्याश्चैत्रमासे महत्तमाः । तथापि हि विशेषोऽत्र तिथीनां वर्ण्यते मया ॥९३॥ चैत्रमासे कृष्णपक्षे पंचमी दशमी तथा । एकादशी द्वादशी च शिवरात्रिस्तथा तथा ॥९४॥ एताः शुभर्भवेत्कृष्णे महापातकनाशनाः । इदानीं चैत्रमासस्य भिक्षपक्षोद्भवाः शुभाः ॥९५॥ वर्ण्यन्ते तिथयः श्रेष्ठा नराणां हितकाम्यया । संवत्सरप्रतिपद्भारभ्य वज्रमीदिनम् ॥९६॥ यावत्ताबच्छुभाः शस्ताः स्नानदानादिकर्मणि । यत्कृतं च प्रतिपदि स्नानादानादिकं द्विज् ॥९७. द्वितीयायां च तम्परोक्तं द्विगुणं नात्र संशयः । यत्कृतं च द्वितीयायां भक्त्या स्नानादिकं वरैः ॥९८॥ द्विगुणं तत्तृतीयायां चैत्रमासे नृपोत्तम । एवं सप्तांशु तिथयः शुल्काभ्यासमर्थाः शुभाः ॥९९॥ अत्र विशेषो ज्ञातव्यो यथा क्षीरादिसुखप्रदान् । यथा क्षीरादपि प्रोक्तं दध्नस्तु नवनीतकम् ॥१००॥ नवनीताद्घृतं यद्वत्तथाऽत्र निशिनिर्णयः । चैत्रश्च मत्सु मासानां तत्र पक्षः सितो वरः ॥१०१॥ सितपक्षे च चैत्रस्य यावत्सा नवमी तिथिः । तावदेकैकशः श्रेष्ठा नराशु नवमी वरा ॥१०२॥ यस्यां जातं रामचन्द्र धर्मस्थापनणाय हि । तस्मात्सर्वार्थदा या ब्रूया कर्मणेनेकसक्षमा ।१०३। तस्यां दत्तं हुतं जप्तं यत्किञ्चिच्च कृतं शुभम् । सर्वं तदक्षयं विद्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥१०४॥ प्रतिपद्दिनमारभ्य नवराव्रमुपोषणेत । प्रच्छं सुपुरीम्य पूज चैत्रं कारयन् ॥१०५॥ संवत्सरप्रतिपदि ध्वजाः सौधोपरि स्थिताः । दिव्यवस्त्रेण सम्बध्य मण्डिताश्च मनोरमाः ॥१०६॥

नवमीदिन या तक इस संसारमें शीतला गौरीका निशाम रहता है। इसलिए स्त्रियोंको सुखके लिए सीताताभय जाकर स्नान तथा गौरीका पूजन करना चाहिए ॥८६॥ ९०॥ चैत्रशुक्लपक्ष तृतीया तथा वैशाखशुक्लकी तृतीया ये दोनों तृतीया अक्षय्यसंज्ञक माना गया है ॥९१॥ अथवा जो लोग शीतला गौरीका व्रत कर रही हो, उसे चाहिये कि इन दोनों तिथियोंको स्नान नभ त्यागे । इतर विचार और किसी अन्य दिनमें ऐसा करना वर्जित है ॥९२॥ वैसे तो चैत्रमासकी तीसों तिथियाँ पवित्र हैं । फिर भी इनमें जो विशेषता है, उसे मैं तुमको सुनाता हूँ ॥९३॥ चैत्र कृष्णपक्षका पंचमी दशमी एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, अमावास्या, ये चैत्र कृष्णपक्षकी तिथियाँ बड़ी पवित्र और महान् पापको नाश करनेवाली कही गया है। अब मैं चैत्रके शुक्लपक्षकी शुभ तिथियोंको गिनता हूँ ॥९४॥ ९५॥ इससे मनुष्योंका बड़ा कल्याण होगा। यह मेरा दृढ़ विश्वास है। संवत्सर-प्रतिपदा (प्रतिपद्) से लेकर नवमी पर्यन्त जितनी तिथियाँ हैं, वे सब स्नान-दान और कर्मोंमें शुभ कही गई हैं। उनमें भी प्रतिपदाको स्नान-दान आदि कर्मोंका जो फल शास्त्रमें कहा गया है उससे द्वितीय द्विगुणित फलदायक होता है। द्वितीयाको जो फल कहा है, उससे तृतीयामें द्विगुणित फल होता है। इस तरह नवमी तिथि पर्यन्त सब तिथियाँ शुभ हैं। इनमें इस प्रकारका विशेषत: है कि जैसे ऊँखका रस प्रथम मीठा होकर आदिसे श्रेष्ठतर क्रममें मीठा होता है। जैसे गोसे दूध होता है, दूधसे दही तैयार होता है, दही से मक्खन निकलता है और मक्खनसे घी तैयार होता है। उसी तरह यहाँ तिथियोंका भी निर्णय होता है। पहले तो सब मासोंमें चैत्रमास ही श्रेष्ठ है। उनमें भी शुक्लपक्ष श्रेष्ठ है और शुक्लपक्षमें भी प्रतिपदासे लेकर नवमी तकका तिथियाँ श्रेष्ठ हैं। उनमें भी नवमी तिथि सर्व-प्रधान तिथि है ॥९६-१०३॥ नवमी तिथिका धर्मकी रक्षाका करनेके लिए रामका जन्म हुआ था, इसीसे यह तिथि समस्त कर्मोंको नष्ट करनेवाला माना गयी है ।१०३। उसमें जो कुछ दान दिया जाता, हवन किया जाता, तप किया जाता अथवा जो कोई भी शुभ कर्म किया जाता है, वह सब अक्षय होता है; इसमें संशय कोई करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥१०४॥ इसलिए साधक चाहिये कि प्रतिपदा तिथिसे लेकर नौ रात्रितक उपवास करके रामचन्द्रजीका पूजन करें ॥१०५॥ संवत्सरकी प्रतिपदाको मकानके ऊपर दिव्य वस्त्र

६८०आनन्दरामायणे[ सर्ग १०

रामजन्ममहोत्सवार्थं प्रीत्यर्थं राघवस्य च । गृहे गृहे नरैः कार्याः पूजोपाया भक्तितः ॥१०७॥
गृहे देवालये वाऽथ गोष्ठे वृन्दावने शुभे । सम्मार्जनादिकं नित्यं कार्यं चन्दनवारिभिः ॥१०८॥
ततः पाथरजेश्चैव नानोपद्यादिकानि हि । लेखनीयानि भूम्यां तु नीलपीतादिवर्णकैः ॥१०९॥
अष्टोत्तरसहस्रस्य रामतोभद्रमुत्तमम् । शतास्यं वा लिखेद्भद्रमथवाऽन्यन्मनोरमम् ॥११०॥
तस्योपरि महत् रम्यंविचित्रवर्णश्च मण्डपः । देयो द्वाराणि चत्वारि कार्याणि तोरणानि च ॥१११॥
कदलीस्तंभयुक्तानि इक्षुदण्डयुतानि च । नानावण्टाकिङ्किणीभिर्ध्वनितान्युज्ज्वलानि च ॥११२॥
रम्यादाशर्मैडिनानि विचित्राणि शुभानि च । नानाचित्रवितानैश्च मुक्ताहारैर्युतानि च ॥११३॥
तस्यां षोडशमाषैश्च प्रतिमा काञ्चनोद्भवा ॥११४॥
द्विभुजा रामचन्द्रस्य सर्वलक्षणलक्षिता । चतुरुनिर्मापश प्रतिमा रजतोद्भवा ॥११५॥
कौशल्यायाः शुभा कार्या पूज्याया मनोरमा । यथावित्तानुसारोण पूजयप्रत्यहं नरः ॥११६॥
भेरीमृदङ्गनेयैश्च गीतनृत्यादि कम्पन । नानाप्रकारनैवेद्यैरुपचारैः सुपूजयेत् ॥११७॥
प्रतिपद्दिनमारम्य यावत्तु नवमीदिनम् । रामायणं तावदेव पठनीयमिदं शुभम् ॥११८।
यद्वै वाल्मीकिना गीतं श्रवणाम्भ्रमलप्रदम् । आनन्दसञ्ज्ञकं रम्य पठनीयं मनोरमम् ॥११९।
नव काण्डानि नवभिर्दिनैश्च पठन्नरः । दिवसे दिवसे काण्डं पठनार्थं प्रयत्नतः ॥१२०॥
अथवा प्रत्यहं सर्गाः पठितव्यास्तु द्वादश शतान्येकः कदा मध्येऽधिकः सोऽपि पठेन्नरः ॥१२१॥
अष्टोत्तरशतैः सर्गे रामकीर्तनमालिका । मेरुयुक्ता पठेद्देवं रामाग्रे नवभिर्दिनैः ॥१२२॥
सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वदानेषु यत्फलम् । रामायणस्य पठनात्तत्फलं नवरात्रके ॥१२३॥


और यान्ना आदिके अलंकृत ध्वजाराम रामजन्मकी सूचक लगा रामको प्रसन्न करनेके लिए घर-घर स्थापित करके भक्तिपूर्वक उनका पूजन करना चाहिए । १०७ । १०८॥ घरमें, देवालयमें गोशालामें तथा तुलसीकी बगीचा-में उन दिनों चन्दनके जलका छिड़काव करना चाहिए । १०८ ॥ इसके बाद पत्थरके रंगीन नील-पीत आदि वर्णोंवाले कमल आदि बनाने चाहिए । तदनन्तर अष्टोत्तरसहस्रात्मक रामतोभद्र या शतात्मक अथवा शेष छासठको अन्य उस भद्रका रचना कर १०९ । ११० । उसके ऊपर अतिशय सुन्दर चित्र-विचित्र वर्णोंका मण्डप कराये । उस मण्डपमें चार द्वार बनाये और स्थान-स्थानपर तोरणकी स्थापना करे । १११ ॥ जहाँ-तहाँ कदली खंभ तथा इक्षुदण्ड खड़ा करें । उनपर तरह तरहके घण्टा और किङ्किणी आदि लगा दे, जिनकी मधुर ध्वनि सुनायी पड़ना रहे ॥११२॥ जहांतहां मुकुर और यन्त्र-यंत्र शीशे लगा दे विविध प्रकारके चित्र लगावे तरह तरहकी चन्दन कुकुम लगावे और मोतियोंके हार लटकावे । उसमें सुवर्णमय एवं रत्नमण्डित मंचकी रचनाकर और उसपर अरू भ्रात कल्पोद्भव स... रेशम का वस्त्र बिछावे । फिर उसपद सोरह मासेकी काञ्चनमयी प्रतिमा स्थापित करे ॥ ११३ ॥ ११४ । रामचन्द्र का यह सुवर्णमयी प्रतिमा सब सुलक्षणोंसे लक्षित होनी चाहिए। ६५० अकतया वीर्यस पत्यो रजतमा प्रतिमा कौसल्याकी बनाये और उसकी पूजा करें। जैसा अपने सामर्थ्य हो, अनु अनुसार प्रतिदिन पूजन करे ॥ ११५ ॥ ११६ । उनके सामने भेरी, मृदंग, तुरही आदि बाजा बजावे और नाच गाव । नाना प्रकारके नेवेद्यो और उपचारोंसे पूजन करे ॥ ११७ ॥ प्रतिपदा तिथिसे लेकर नवमी तिथि पर्यन्त इस आनन्दरामायणका पाठ करे । ११८॥ इसका बाल्मीकि मुनिने गान किया है। यह सुननेमें मङ्गलप्रद और सनातन है। इससे इसका पाठ आवश्यक है ॥ ११९ ॥ इसके नौ कांडोंको नौ दिनमे समाप्त करना चाहिए । पाठ करनेवालेको चाहिए कि प्रयत्नपूर्वक प्रतिदिन एक एक काण्डका पाठ करे । १२० ॥ यदि ऐसा न हो सके तो प्रतिदिन बारह सर्गोंका पाठ करे । ऐसा पाठ करनेस एक सर्ग बाकी बचेगा । उसे बीचमें किसी रोज पूरा कर देना चाहिए ॥ १२१ ॥ इस तरह अष्टोत्तरशत सर्गात्मक इस रामकीर्तन-मालिकाको नौ दिनोंमे रामचन्द्रजीके समक्ष पाठ करना चाहिए ॥ १२२ ॥ सब

सर्गः १० ] मनोहरकाण्डम् ६८१


श्लोकं वा श्लोकपादं वा यद्वाऽप्याधमक्षरम् । नवरात्रे पठिष्यन्ति चैत्रे ते मोक्षभागिनः ॥१२४॥
एवं हि प्रत्यहं कार्यं कौसल्यारामपूजनम् । मधुप्राशौ तु नारीणां तन्न कार्यं प्रपूजनम् ॥१२५॥
सपुत्रद्विजवर्गाणां विशेषान्पूजनं स्मृतम् । वस्त्रालङ्कारयुक्तं चित्रभोजनभोजनम् ॥१२६॥
एवं कृत्वा विधिं सर्वं नवम्यां च विसर्जनम् । पूजयित्वा रामचन्द्रं वाहनाङ्कसुनाटकम् ॥१२७॥
भेरीमृदङ्गघोषैश्च तूर्यदुन्दुभिनिःस्वनैः । वारस्त्रीणांनृत्यैश्च गायकानां च गायनैः ॥१२८॥
एवं नानामहोत्साहैर्दिनेन सहतोषितम् । चामरैर्वीज्यमानं च पुष्पके संस्थितं परम् ॥१२९॥
रामोद्यानिकं नीत्वा रथात्समुत्तरेत्ततः । स्नापयेद्रघुवीरं हि पुण्यतोयैरनेकशः परम् ॥१३०॥
रुद्रसूक्तैर्विष्णुसूक्तैः सहस्रैर्नामभिस्तु वा । मांगल्यद्रव्यमिश्रैश्चैवैक्षमाध्वीकमिक्षयेत् ॥१३१॥
कांगस्यवरद्रव्यैश्च युक्तं तन्मंगलाभिधम् । प्रोच्यते मङ्गलस्नानं सर्वक्षेत्रे दुर्लभं नृणाम् ॥१३२॥
तत्स्थानमुक्तीर्थं तु तीर्थमध्ये विनिक्षिपेत् । तत्र सर्वजनैः शीघ्रं स्नाप्तव्यं तदनन्तरम् ॥१३३॥
सहस्रामृतस्नानैर्यत्फलं प्राप्यते नरैः । तत्फलं रामचन्द्रस्य मङ्गलस्नानकारणात् ॥१३४॥
पुष्करादिषु तीर्थेषु गङ्गाद्यासु मनिन्सु च । प्राप्यते यत्फलं स्नानात्तन्मङ्गलात्प्लुत्य लब्धयेत् ॥१३५॥
एवं रामं तु संस्नाप्य सीतापृक्तं प्रपूज्य च । पुनः पूर्वोक्तवाद्यादि मङ्गलेनानयेद्गृहम् ॥१३६॥
गृहे रामं पुनः पूज्य समाप्यनकृतं वरम् । पारायणं समाप्त्यर्थं पुस्तकं पूजयेच्छुभम् ॥१३७॥
नानोत्सवैर्दिने नीत्वा कार्यं जागरण निशि । दशम्यां प्रातरुत्थाय भोजयित्वा द्विजान् बहून् ॥१३८॥
पूजयित्वा पुनः सर्वं गुरवे तन्निवेदयेत् । ततः स्वयं सुहृन्मित्रैः कृतभोजनमुत्सवम् ॥१३९॥
एवं व्रतं समाख्यातं चैत्रस्य नवरात्रके । अतस्तन्नवरात्रे हि श्रेष्ठं चैत्रं महत्तमम् ॥१४०॥
नवरात्रेष्वपि सा रामनवमी परमार्थदा । तन्ममात्रा विधिवन्मान्या चैत्रमासे शुभप्रदा ॥१४१॥


तीर्थोंमें और सब दानोंमें जो पुण्य है, वह फल नवरात्रमें इस रामायणका फल करनेमें है ॥ १२३ ॥ नवरात्रमें जो लोग एक श्लोक अथवा श्लोकके एक चरणका भी पाठ करेंगे, वे मोक्षके भागी होंगे ॥१२४॥ इस तरह प्रतिदिन कौसल्या और रामका पूजन करना चाहिए । उन समय पुत्रवान् स्त्रीके पूजनका विधान है ॥ १२५ ॥ इस सब परस्पर पुत्रवान् ब्राह्मणोंके भी पूजनका विधान मङ्गल माना गया है । पूजनके बाद उन विविधप्रकारके वस्त्र, अलङ्कार और तरह तरहके भोजन दे ॥ १२६ ॥ इस विधिसे नवरात्रका विसर्जनकर नवमः तिथिको वाहनपर आरूढ रामका पूजन करके भेरी, मृदंग, शहनाई, दुन्दुभी आदिके गम्भीर निनाद, गणिकाओंके नृत्य, गायकोंके गायन आदि नाना प्रकारके उत्साहसहित सुन्दर छत्रसे सुशोभित, चमरसे अलंकृत, पुष्पक विमानपर आरूढ रामचन्द्रजीको रामतीर्थपर ले जाकर रथपरसे चढ़ा तथा पवित्र जलसे स्नान करावे ॥ १२७-१३० ॥ स्नान कराते समय रुद्रसूक्त, विष्णुसूक्त अथवा सहस्रनामावलिका पाठ कराया जाय । पहले ही जलमें विविध प्रकारके मङ्गलमय द्रव्य मिला ले ॥ १३१ ॥ इस तरह मङ्गलद्रव्य मिले जलसे रचित कटोरेको मङ्गलस्नान कहते हैं । यह केवलमात्र किया जाता है और बडी कठिनतासे लोगोंको ऐसा सुयोग प्राप्त होता है ॥ १३२ ॥ उस स्नानके पश्चात्सुखो रित्तो व संडे डाल दे और पूज्यके जितन लोग सम्मिलित हुए हों, वे सब उस तीर्थमें जाकर स्नान करें । तभी प्राणोंका मङ्गलस्नानका फल प्राप्त होता है ।। १३३ ।। १३४ ॥ पुष्कर आदि तीर्थों तथा गङ्गा आदि नदियोंमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वह फल मङ्गलस्नान करनेवालेको प्राप्त होता है ॥ १३५ ॥ इस तरह सीता समेत रामको स्नान कराकर उनकी पूजा करे और पूर्वोक्त बाजे गाजेके साथ फिर उन्हें अपने घर ले जावे ॥ १३६ ॥ घरपर रामको लाकर उनकी पूजा करे । तदनन्तर आनन्दरामायणका पारायण समाप्त करके पुस्तककी पूजा करे ॥ १३७ ॥ नाना प्रकारके उत्सव मनाता हुआ दिन बितावे और रात-भर जागरण करे । दशमीको सबेरे उठे और निष्ठापूर्वक मिलकर बहुतसे ब्राह्मणोंको भोजन करावे ॥ १३८ ॥ इसके बाद गुरुकी पूजा करके उन्हें सब वस्तुयें दान दे । तत्पश्चात् सम्बन्धियों और मित्रोंके साथ स्वयं भोजन करे ॥ १३९ ॥ चैत्रके नवरात्रमें इस तरह व्रत करनेका विधान बतलाया गया है । इसीलिए लोगोंने चैत्रके

६८२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १०


अतः परं प्रवक्ष्यामि चैत्रोद्यापनकं विधिम् । यत्कृत्वा सफलं सर्वं चैत्रस्नानं तु जायते ॥१४२॥
चैत्रे मासि सिते पक्षे या चैकादशी तिथिः । सर्वासु तिथिषु श्रेष्ठा चोपोष्या व्रतकाङ्गिभिः ॥१४३॥
श्रेष्ठा सा द्वादशी ज्ञेया यस्यां तु यमपूजनम् कार्यं दध्योदनं दत्त्वा जलकुंभः प्रदीयताम् ॥१४४॥
तिस्रश्च तिथयः श्रेष्ठाश्चैत्रे मासि महत्ससाः । त्रयोदशी तथाभूता पौर्णमासी तथैव च ॥१४५॥
यासु स्नानञ्च दानं च सर्ववाञ्छितदायकम् । येनै स्नानं चैत्रमासे न स्नातं नवरात्रके । १४६॥
तैस्तु चांत्यादिने स्नात्वा चैत्रस्नानफलम्भजेत् । तासु श्रेष्ठा पूर्णिमा हि सर्वपातकनाशिनी ॥१४७।
तस्यामुद्यापनं प्रोक्तं चैत्रस्नानफल प्रये । उपोष्य च चतुर्दश्यां पूर्ववन्मण्डपादिकम् ॥१४८।
कृत्वा तस्मिन् धान्यराशीं कलशं वारिपूरितम् । स्थापयित्वा तदुपरि हेमपात्रं सुविस्तृतम् ॥१४९॥
पंचरत्नयुतं स्थाप्य वस्त्रेणाच्छादयेच्च तत् । तस्मिन्सीतायुतं रामं सौवर्णे विधिपूर्वकम् ॥१५०॥
भ्रातृभिर्वायुपुत्रेण सुग्रीवेण समन्वितम् । विभीषणाङ्गदाभ्यां तु जांबवन्महिते तथा । १५१।
पूजयेद्देवदेवेशं परं गुरुनुलया । उपचारैः षोडशभिर्नानाभक्ष्यसमन्वितैः । १५२॥
रात्रौ जागरणं कुर्याद्गीतवाद्यादिमङ्गलैः । ततस्तु पौर्णमाश्यां च सपत्नीकान् द्विजोत्तमान् । १५३॥
त्रिंशन्मितानथैकं वा स्वशक्त्या वा निमन्त्रयेत् । ततस्तान् भोजयेद्विप्रांन्नानाभक्ष्यान्नादिना व्रती ॥१५४।
अतो देवा इति ह्यर्चा जुहुयात्तिलसर्पिषा । प्रीणयेद् देवदेवेशं देवांश्च पृथक् पृथक् ॥१५५॥
दक्षिणां च यथाशक्त्या प्रदद्याच्च ततो नमेत् पुनर्देवं समभ्यर्च्य देवांश्च तुलसीं तथा ॥१५६॥
ततो गां कपिलां तत्र पूजयेद्विधिना व्रती । गुरुञ्चतोपयेद्वार वस्त्रालङ्कारमण्डनैः । १५७॥
सपत्नीकं समभ्यर्च्य ततो विप्रान् क्षमापयेत् । युष्मत्प्रसादाद्देवशः सुप्रसन्नोऽस्तु वै मम ॥१५८॥

नवरात्रको बहुत ही श्रेष्ठ माना है। १४०॥ नवरात्रमं तो रामनवम्या परमाह्लाददायिनी है इसके समान शुभव्रद तिथि चैत्रमास भरमे कोई भी नहीं है ॥ १४१॥ इसके अनन्तर चैत्रके उस उद्यापनका विधान बतलाते हैं, जिसके करनेसे चैत्रस्नान सफल हो जाता है ॥ १४२॥ चैत्रमासके शुक्लपक्षमें जो एकादशी पड़ती है, वह सब तिथियोंमें श्रेष्ठ होती है। इसलिए चैत्रव्रत करनेवालोंको यह एकादशीव्रत अवश्य करना चाहिए । १४३। इसी तरह चैत्र शुक्लपक्षकी द्वादशी भी श्रेष्ठ है। इस रोज दही-भातस यमका पूजन करके जलसे पूर्ण घड़ेका दान करना चाहिए ॥ १४४॥ चैत्रमास भरमें तीन तिथियाँ श्रेष्ठ हैं। जैसे-द्वादशी, त्रयोदशी और पूर्णिमा ॥ १४५॥ इनमें स्नान-दान करनेसे ये तिथियाँ सब कामनाओंको पूर्ण करती हैं। जिसने चैत्रस्नान नहीं किया और जो नवरात्रस्नान भी नहीं कर पाया, वह अन्तिम दिन अर्थात् पूर्णिमाको स्नान करके चैत्रस्नानका फल प्राप्त कर लेता है। क्योंकि चैत्र भरकी सब तिथियोंमें पूर्णिमा तिथि श्रेष्ठ है और सब पातकोंको नष्ट करती है । १४६ ॥ १४७॥ अतः चैत्रस्नानका फल पानेके लिए इस पूर्णिमामें ही उद्यापन करना चाहिए। इसका विधान यह है कि चतुर्दशीको उपवास करके पूर्ववत् मण्डप आदि बनावे और उसमें धान्यराशि तथा वारिपूर्ण कलश रखकर उसके ऊपर एक बड़ासा स्वर्णपात्र रक्खे ॥ १४८ । १४९ ॥ उसमे पंचरत्न डालकर वस्त्रस ढक दे। तदनन्तर सीता, लक्ष्मण आदि भ्राताओं, हनुमान्जी, सुग्रीव, विभीषण, अङ्गद तथा जाम्बवान् सहित रामकी सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित करके गुरुकी आज्ञासे वेष वशेण रामकी षोडश उपचारों एवं विविध भक्ष्य पदार्थोंस पूजन करे ॥ १५०-१५२॥ रात्रि भर जागरण करता हुआ गावे-बजावे और सवेरे हाथ सपत्नीक ब्राह्मणों अथवा जैसा सामर्थ्य हो उसके अनुसार ब्राह्मणोंको बुलाकर खीर-पूरी आदि भोजन करावे ॥ १५३ । १५४॥ इसके बाद 'अतो देवा' इस मन्त्रके द्वारा तिल और घीसे हवन करे। इस हवनसे देवदेव राम तथा अन्यान्य देषत ओंको प्रसन्न किया जाता है ।॥ १५५॥ यह सब करनेके बाद ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा देकर प्रणाम करे। फिर समस्त देवताओं तथा तुलसी देवीक फिरस पूजन करके विधिपूर्वक कपिला गौका पूजन करे और नाना प्रकारके वस्त्र-आभूषण देकर बनके उपदेश सपत्नीक गुरुकी पूजा कर ॥ १५६ ॥ १५७॥ यह सब करनेके बाद ब्राह्मणोंसे क्षमाप्रार्थना करता हुआ

सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ५८३


अतादस्माच्च यत्पापं सप्तजन्मकृतं मया । तत्सर्वं नाशमायातु स्थिरा मे चास्तु संततिः ॥ १५९॥
मनोरथास्तु सफलाः संतु नित्यं ममार्चनात् । देहांते वैष्णवं स्थानं मम चास्त्वतिदुर्लभम् ॥ १६०॥
इति क्षमाप्य तान् विप्रान् प्रसाद्य च विसर्जयेत् । तामर्चां गुरवे दद्याद्रत्नपुष्कां सदा व्रती ॥ १६१॥
ततः सुहृत्प्रियैर्युक्तः स्वयं भुंजीत भक्तिमान् । एवमुद्यापनविधिंश्चैत्रस्नानफलाप्तये ॥ १६२॥
सविस्तरश्च कर्तव्यश्चैत्रस्नानपरायणैः । एवं यः कुरुते सम्यक् चैत्रस्नानव्रतं नरः ॥ १६३॥
सर्वपापैर्विनिर्मुक्तो विष्णुमायुज्यमाप्नुयात् । सर्वव्रतैः सर्वतीर्थैः सर्वदानैश्च यत्फलम् ॥१६४॥
तत्कोटिगुणितं पुण्यं सम्यगस्य विधानतः । देहस्थितानि पापानि नाशमायांति तद्भयात् ॥१६५॥
क्व यास्यामो वदंत्येवं यच्चैत्रव्रतकृन्नरः । तस्मादवश्यमेवैतच्चैत्रस्नानं समाचरेत् ॥१६६॥
श्रीचैत्रव्रतकथनं पठन्ति भक्त्या ये वै तद्द्विजयतिवैष्णवान्वदिभिः ।
ते सम्यक् व्रतकरणात् फलं लभन्ते तत्सर्वं कलुषविनाशनं लभन्ते ॥ १६७॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकांडे
आदिकाव्ये चैत्रमहिमवर्णनं नाम दशमः सर्गः ॥ १० ॥


एकादशः सर्गः

( चैत्रस्नानस्य माहात्म्य )

विष्णुदास उवाच
किमर्थं सर्वमासेषु चैत्रमासः स्मृतो वरः । तत्कारणं वदस्वाद्य गुरो संतोषहेतवे ॥ १ ॥

श्रीरामदास उवाच
शृणु शिष्य महाबुद्धे सम्यक् पृष्टं त्वया मम । ब्रह्मप्रार्थनया विष्णुर्र्यदा भूम्यां द्विजोत्तम ॥ २ ॥
अयोध्यापालकस्याथ राज्ञो दशरथस्य हि । कौसल्यायास्तु भार्याया जठरान्निर्गतो बहिः ॥ ३ ॥


कहे कि आप लोगोंकी कृपासे देवेश रामभद्रजी हमपर सदा प्रसन्न रहें ॥ १५८ ॥ मैंने सात जन्म तक जो पाप किये हों, वे इस व्रतसे नष्ट होजायँ और मेरी सन्तति स्थायी हो ॥ १५९ ॥ इस पूजनके प्रभावसे मेरे सब मनोरथ सफल हों और देहान्त होनेपर हम अतिशय दुर्लभ वैकुण्ठ धाम प्राप्त हो ॥ १६० ॥ इस तरह क्षमायाचना करके उन ब्राह्मणोंको प्रसन्न करता हुआ विदा करे और रत्न तथा प्रतिमा समेत पूजनकी सब वस्तुयें गुरुको दान दे दे ॥ १६१ ॥ इसके बाद नातेदारों और मित्रोंके साथ भोजन करे। इस तरह चैत्रमासका फल प्राप्त करनेके लिए उद्यापन करनेका विधान है ॥ १६२ ॥ जो लोग चैत्रमासके व्रतमें लगे हों, उन्हें विस्तारसे यह उद्यापन करना चाहिए । जो मनुष्य अच्छी तरह चैत्रस्नानका व्रत करता है, वह सब पातकोंसे छूटकर विष्णुभगवान्की सायुज्य मुक्ति प्राप्त करता है। समस्त व्रतों, सब तीर्थों और समस्त दानोंसे जो फल प्राप्त होता है, उसका करोड़ोंगुना अधिक फल इस चैत्रमासके व्रतसे प्राप्त होता है। इसके भयसे चैत्रव्रतीके देहमें रहनेवाले समस्त पातक नष्ट हो जाते हैं। वे पाप कहते हैं कि अब हम कहाँ जायें ? अतः चैत्रव्रत करनेवाले मनुष्यको चैत्रस्नान अवश्य करना चाहिए । १६३-१६६ ॥ जो लोग इस चैत्रव्रतकी कथाको पढ़ते या विप्र तथा संन्यासी वैष्णवोंको सुनाते हैं, वे अच्छी तरह व्रत करनेका फल पाते हैं और उनके समस्त पातक नष्ट हो जाते हैं ॥ १६७ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत 'ज्योत्स्ना'-भाषाटीकासहिते मनोहरकाण्डे दशमः सर्गः ॥ १० ॥

विष्णुदास बोले—हे गुरुदेव ! सब मासोंमें यह चैत्रमास क्यों श्रेष्ठ माना गया है ? सो मेरे सन्तोषके लिए कहिए ॥ १ ॥ श्रीरामदासने कहा-हे महाबुद्धिमान् शिष्य ! तुमने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया है। मैं

45

३८४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२

चैत्रे मासि सिते पक्षे नवम्यां परमे दिने । पुनर्वस्वृक्षसंयुक्त प्रोच्चस्थे ग्रहपंचके ॥ ४ ॥
मध्याह्ने प्रकटो जातः श्रीरामो राजसद्मनि । आनन्दश्च तदा जातः सर्वत्र जगतीतले ॥ ५ ॥
देवदुंदुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः शुभावपत् । राजसद्मनि वाद्यानां संघा नेदुः पृथक् पृथक् ॥ ६ ॥
ननृतुर्वारनार्यश्च जगुर्गीतं मनोरमम् । तदा सर्वं हि भूमिस्या जना द्रष्टुं शिशुं शुभम् ॥ ७ ॥
प्रययुर्नृपजं बालं दृष्ट्वा मुदमवाप्नुयुः । नानाविमानमारूढा दिवि देवाः सवासवाः । ८ ॥
मिलित्वा राघवं द्रष्टुं कौसल्याजठरोद्भवम् । ब्रह्मा रुद्रश्च सूर्य्यश्च देवेंद्रोऽदितिसुताः शुभाः । ९ ॥
उत्सवान् विदधुः सर्वं तदा श्रीरामजन्मनि । एवमुत्साहसमये देवा हर्षाद्दिवि स्थिताः । १० ॥
नमस्कृत्य रामचन्द्रं तुष्टुवुर्विविधैः स्तवैः । प्रोचुस्तदा सुराः सर्वे हर्षाहर्षं रघूत्तमम् ॥ ११ ॥
अद्य धन्या वयं देव मुक्ताश्चासुरजद्भयात् । यन्निमित्तं त्वया देव ह्यवतारः कृतो भुवि , १२॥
अस्माकं हर्षकालोऽयं नैवदेव कृपानिधे । तस्मादयं सदा पुण्यः श्रेष्ठः कालो भविष्यति ॥१३॥
त्वं चाप्यंगीकुरुष्व द्य देह्यस्मै सुवहून् वरान् इति तेषां वचः श्रुत्वा देवानां राघवः शुभम् ॥ १४।
तुतोष नितरां तेषु वरंदेषु भगवान्हरिः ।

श्रीराम उवाच
सम्यक् प्रोक्तं सुराः सर्वे त्रैलोक्योपकारकम् १५।
भवद्भिः प्रार्थितोऽहं तु हर्षकाले महत्समे । शृणुध्वं वचनं मेऽद्य यद्वषांत्प्रोच्यते मया ।। १६ ।।
सर्वषामेव मासानां श्रेष्ठोऽयं भविष्यति । वैशाखात्कात्तिकः श्रेष्ठः कार्त्तिकान्माघ एव च । १७।
माधमासादथाद्य चैत्रमासो भविष्यति । चैत्रमासे कृतं दत्तं हुतं स्नातं विचितितम् । १८ ॥
सर्वं कोटिगुणं प्रोक्तमयोध्यायां विशेषतः । यत्पुण्यञ्च समेधेन यद्गोमेधेन वै फलम् ॥ १९।
यत्फलं सोमयागेन तच्चैत्रे स्नानमात्रतः । सूर्य्यग्रहे कुरुक्षेत्रे यत्पुण्यः स्नानदानतः । २० ।


उसका उत्तर देता हूँ सुनो-॥ २ । अयोध्या नगरीक पालक महाराज दशरथकी रानी कौमल्याके उदरसे चैत्रमासके शुक्लपक्षको नवमी तिथिको पुनर्वसु नक्षत्रमे जब कि पांच ग्रह केंच स्थानमे वैठे थे, तव मध्याह के समय अयोध्या दशरथक घरम श्रीरामचन्द्रजी अवतरे । उस समय जगततलमें सर्वत्र आनन्द छा गया ॥३-५॥
देवताभान दुन्दुभियां बजायी और पुष्पवृष्टि की । राजाके महलोंमें अलग-अलग विविध प्रकारके बाजे बजे ॥ ६ ॥ वेश्याय नाचन और गाने लगीं उस समय पृथ्वीमण्डलके प्रमुख मनुष्य उस बच्चेको देखनेके लिए आये और उस देख देखकर बड़ प्रसन्न हुए । उसो तरह नाना प्रकारके विमानोपर चढ़-चढ़कर इन्द्र आदि देवता भी एकत्र होकर कौसल्याके गभस उत्पन्न रामको देखनेके लिए आये । उस समय ब्रह्मा, रुद्र, सूर्य तथा देवेन्द्र आदि देवताओने श्रीरामचन्द्रजीके जन्मक उपलक्ष्यमे विविध उत्सव किये । इस तरह उत्साहके समय आकाशमे विद्यमान दबला रामको प्रणाम करके ना। प्रकारके स्तोत्रोंसे स्तुति कर रहे थे । समय पाकर देवतालोंने रामसे कहा- । ७-११ ॥ हे देव ! अज हम लोग धन्य हैं । अब हम लोग राक्षसोंके भयसे मुक्त हो गये । क्योंकि इसीलिए आपने अवतार लिया है ॥ १२ ॥ हे देव ! हे कृपानिधे ! यह हम लोगोंके लिए महान् हर्षका समय है । इसीके कारण यह पवित्र समय सर्वश्रेष्ठ माना जायगा ॥ १३ ॥ आप भी इस बातको अङ्गीकार करते हुए इस समयको बहुतसे वरदान दीजिए । उनकी ऐसी बात सुनकर भगवान् रामचन्द्रजी उन-पर बहुत प्रसन्न हुए और कहा-हे देवताओ ! आपलोगोंने बड़ी अच्छी बात कही है और तीनो लोकोंके उपकार करनेवाले विविध स्तोत्रोंसे स्तुति की है। इससे मै बहुत प्रसन्न होकर कहता हूँ । १४-१६ ॥ यह मास सब मासोंमें श्रेष्ठ होगा । वैशाखसे कार्तिक श्रेष्ठ है, कार्तिकस माघ श्रेष्ठ है और माघस भी यह चैत्रमाह श्रेष्ठ होगा । इस मासमें किया हुआ दान, हवन, स्नान और ध्यान यह सब कर्म करोड़गुना फल देगा और अयोध्यामे तो उससे भी विशेष फल प्राप्त होगा जो फल अश्वमेधसे होता है, जो फल गोमेधसे होता है

६८४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२

चैत्रे मासि सिते पक्षे नवम्यां परमे दिने । पुनर्वस्वर्क्षसंयुक्त प्रोच्चस्थे ग्रहपंचके ॥ ४ ॥ मध्याह्ने प्रकटो जातः श्रीरामो राजसद्मनि । आनन्दश्च तदा जातः सर्वत्र जगतस्तले ॥ ५ ॥ देवदुंदुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः शुभावपत् । राजसद्मनि वाद्यानां संघा नेदुः पृथक् पृथक् ॥ ६ ॥ ननृतुर्वारनार्यश्च जगुर्गीतं मनोरमम् । तदा सर्वं हि भूमिस्या जना द्रष्टुं शिशुं शुभम् ॥ ७ ॥ अययुर्नृपजं बालं दृष्ट्वा मुदमवाप्नुयुः । नानाविमानमारूढा दिवि देवाः सवासवाः ॥ ८ ॥ मिलित्वा राघवं द्रष्टुं कौसल्याजठरोद्भवम् । ब्रह्मा रुद्रश्च सूर्यश्च देवेंद्रायसुराः शुभाः । ९ ॥ उत्सवान् विदधुः सर्वं तदा श्रीरामजन्मनि । एवमुत्साहसमये देवा हर्षाद्दिवि स्थिताः ॥ १०॥ नमस्कृत्या रामचंद्रं तुष्टुवुविविधैः स्तवैः । प्रोचुस्तदा सुराः सर्वे हर्षार्हं रघूत्तमम् ॥ ११॥ अद्य धन्या वयं देव मुक्ताश्चासुरजाद्भयात् । यन्निमित्तं त्वया देव ह्यवतारः कृतो भुवि ॥ १२॥ अस्माकं हर्षकालोऽयं नैवदेव कृपानिधे । तस्मादयं मदा पुण्यः श्रेष्ठः कालो भविष्यति ॥ १३॥ त्वं चाप्यंगीकुरुष्व ह्य देह्यस्मै सुवहून् वरान् इति तेषां वचः श्रुत्वा देवानां राघवः शुभम् ॥ १४॥ तुतोष नितरां तेषु वरेषु भगवान्हरिः । श्रीराम उवाच सम्यक् प्रोक्तं सुराः सर्वे त्रैलोक्योपकारकम् १५ । भवद्भिः प्रार्थितोऽहं तु हर्षकाले महत्समे । शृणुध्वं वचनं मेऽद्य यत्पर्वांप्रोच्यते मया ॥ १६॥ सर्वषामेव मासानां श्रेष्ठोऽयं भविष्यति । वैशाखात्कात्तिकः श्रेष्ठः कार्तिकात्माघ एव च ॥ १७॥ माधमासादथावाय चैत्रमासो भविष्यति । चैत्रमासे कृतं दत्तं हुतं स्नातं त्रिवितिनम् । १८॥ सर्वं कोटिगुणं प्रो क्तमयोध्यायां विशेषतः । यत्प्प्लवाश्व समेधेन यद्गोमेधेन वै फलम् ॥ १९ । यत्फलं सोमयागेन तच्चैत्रे स्नानमात्रतः । सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे यत्पुण्यः स्नानदानतः ॥ २०।

उसका उत्तर देता हूँ सुनो-॥ २ । अयोध्या नगरीके पालक महाराज दशरथकी रानी कौसल्याके उदरसे चैत्रमासके शुक्लपक्षकी नवमी तिथिको पुनर्वसु नक्षत्रमें जब कि पाँच ग्रह ऊंच स्थानमें बैठे थे, तब मध्याह्नके समय अवधेश दशरथके घरमें श्रीरामचन्द्रजी अवतरे । उस समय जगततलमें सर्वत्र आनन्द छा गया ॥ ३-५॥ देवताओने दुन्दुभियां बजायीं और पुष्पवृष्टि की । राजाके महलोंमें अलग-अलग विविध प्रकारके बाजे बजे ॥ ६ ॥ वेश्याय नाचन और गाने लगीं उस समय पृथ्वीमण्डलके प्रमुख मनुष्य उस बच्चेको देखनके लिए आये और उस देख देखकर बड़ प्रसन्न हुए । उसी तरह नाना प्रकारके विमानोंपर चढ़-चढ़कर इन्द्र आदि देवता भी एकत्र होकर कौसल्याके गर्भस उत्पन्न रामको देखनके लिए आये । उस समय ब्रह्मा, रुद्र, सूर्य तथा देवेन्द्र आदि देवताओंने श्रीरामचन्द्रजीके जन्मक उपलक्ष्यमे विविध उत्सव किये । इस तरह उत्साहके समय आकाशमे विद्यमान दयता रामको प्रणाम करके नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे स्तुति कर रहे थे । समय पाकर देवताओने रामसे कहा- । ७-११॥ हे देव ! आज हम लोग धन्य हैं। अब हम लोग राक्षसोंके भयसे मुक्त हो गये । क्योंकि इसीलिए आपने अवतार लिया है ॥ १२ ॥ हे देव ! हे कृपानिधे ! यह हम लोगोंके लिए महान् हर्षका समय है । इसीके कारण यह पवित्र समय सर्वश्रेष्ठ माना जायगा ॥ १३ ॥ अप भी इस बातको अङ्गीकार करते हुए इस समयको बहुतसे वरदान दीजिए । उनकी ऐसी बात सुनकर भगवान् रामचन्द्रजी उनपर बहुत प्रसन्न हुए और कहा-हे देवताओ ! आपलोगोंने बड़ी अच्छी बात कही है और तीनों लोकोंके उपकार करनेवाले विविध स्तोत्रोंसे स्तुति की है। इससे मैं बहुत प्रसन्न होकर कहता हूँ । १४-१६ ॥ यह मास सब मासोंमें श्रेष्ठ होगा । वैशाखसे कार्तिक श्रेष्ठ है, कार्तिकसे माघ श्रेष्ठ है और माघसे भी यह चैत्रमास श्रेष्ठ होगा । इस मासमें किया हुआ दान, हवन, स्नान और ध्यान यह सब कर्म करोड़गुना फल देगा और अयोध्यामे तो उससे भी विशेष फल प्राप्त होगा जो फल अश्वमेधसे होता है, जो फल गोमेधसे होता है

सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६८५

सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६८५

तत्क्षेत्र्यैः स्वान्ध्रधौ स्नानादयोध्यायाः सुरोत्तमाः पुत्र वै साधुवीरे रावणं लोकरावणम् ॥२१। हत्वा तत्पापशांत्यर्थं करिष्यामि क्रतुं शुभम् । यत्र यागमहासिद्धिर्भविष्यति सुरोत्तमाः २२। तत्तीर्थं मम नाम्ना हि ख्यातिं श्रेष्ठांगमिष्यति । अयोध्यायां सर्वतीर्थं मामुञ्जलप्रथग्यगे ॥२३॥ चैत्रस्नानं प्रकुर्वाणास्ते नरा मोक्षभागिनः । यथा माघे प्रयागे हि स्नातव्यः सुखमिच्छता॥२४॥ कार्तिकोऽपि यथा काश्यां पञ्चगंगाजलेऽसृत् । द्वारकायां यथा प्रोक्तो वैशाखो माधवप्रियः ॥२५' अयोध्यायां सर्वतीर्थं तथा चैत्रो भविष्यति । सर्वेषामेव मासानानादौ श्रेष्ठो भविष्यति ।२६॥ चैत्रमासे तु संप्राप्ते सर्वे देवाः सवासवाः, बर्हिर्जले समाश्रित्य तिष्ठध्वं हि ममाज्ञया । २७॥ एवं हरिरुतान् मध्वादोन्दान् सुरानुक्त्वा सूर्यश्चैव नमस्कृतो ययौ । वृषेंद्रमारुह्य शिवो निजं स्थलं ययौ सुरास्तेऽपि ययुर्निजं स्थलम् ॥२८॥ तस्मात्सर्वेषु मासेषु मुख्यश्चैत्रः प्रकीर्त्यते । मासादो प्रथमः सर्वैः प्रोच्यते हि वराद्धरेः ॥२९॥ एवं शिष्य यथा पृष्ट तथा ते विनिवेदितम् । कल्पं चैत्रमासस्य रामचंद्रवरादिकम् । ३०॥

शिष्यपुत्र उवाच स्वामिन् गुरो त्वया चैत्रस्नानं पुण्यतमं स्मृतम् । तत्केनाचरितं पूर्वं का सिद्धिरस्तत्प्रभावतः ॥३१॥ तत्सर्वं विस्तरेणैव ममात्र त्वं निवेदय ।

अगस्त्य उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स शृणु म्वं रत्नार्थवन्मते ॥३२॥ मम तातो नृसिंहारख्यः शुभद्रामीदु द्विजोत्तमः । प्रत्यहं नियमञ्चाण प्रत्रहं भृगुगेत्तमम् ३३॥ एकमप्यन्नक्षेत्रस्थं द्विजमभ्याथितं नृप भूरान्नापुत्रवनदशमंदानादिभियुक्तम् ॥३ ।

और सोमवाससे जिस फलकी प्राप्ति होती है, उस फलकी प्राप्ति उस चैत्रमासके स्नानमात्रसे ही जाया करेगी । कुरुक्षेत्रमें सूर्यग्रहणके समय स्नान दानका जो फल होता है ॥ २१-२४ ॥, वह सब अयोध्याधाम अथवा व्यासाश्रम स्नान करनेसे प्राप्त होगा । इस शरीरमें रावणादि महाबलवान् राक्षसोंको मारकर ब्रह्महत्याके पाप- की शांतिके लिए मैं शुभ यज्ञ करूंगा । हे सुरगण ! जिस स्थानपर वह यज्ञ सम्पन्न होगा, वह स्थान मम नामसे विख्यात होगा । अपितु अयोध्याके सब तीर्थोंका जो स्नान करेगा, वह मनुष्य मोक्षभागी होगा । जिस तरह सुखकी इच्छा रखनेवालोंको माघमें प्रयाग स्नान करना आवश्यक हुआ है ॥ २१-२४ ॥ जिस तरह कार्तिकमें काश्यांके पंचगंगामें स्नान करना उचित है और जिस तरह वैशाख द्वारकामें माधवका परम प्रिय माना गया है, उसी तरह अयोध्या में चैत्रमासका स्नान सर्वश्रेष्ठ होगा । यह मास सब मासोंके आदिम और सबसे श्रेष्ठ माना जायगा ॥ २५-२६ ॥ चैत्रमासके आनेपर इन्द्रसमेत समस्त देवता यहाँ आकर निवास करें । यह मेरा आज्ञा है, ॥ २७ ॥ विष्णुभगवान्‌ने इन्द्र आदि देवताओंसे ऐसा कहा और देवताओंने उनका प्रणाम किया । जिससे मनुष्यताका एक असाधारण कान्ति चमक उठा । तद- नन्तर शिवजी नन्दीपर सवार होकर अपने स्थानको चल पड़े । अन्य देवता भी अपने-अपने स्थानको चल पड़े ॥ २८ ॥ इसी कारण चैत्रमास सब मासोंमें श्रेष्ठ माना जाता है और भगवान्के वरसे सब मासोंके आदि- में गिना जाता है ॥ २९ ॥ इस प्रकार हे शिष्य ! जैसा तुमने पूछा, वह रामचंद्रजीके वरदान आदिका वृत्तान्त मैंने कह सुनाया ॥ ३० ॥ शिष्यपुत्रने कहा हे स्वामिन् ! हे गुरु ! आपने पवित्र चैत्रस्नानका विधान बतलाया । अब यह बताइए कि इस व्रतको किसने किया था और इससे उसे कौन-सी सिद्धि प्राप्त हुई या ॥ ३१ ॥ यह सब विस्तारपूर्वक आप हमें बतलाइए । श्रीअगस्त्यने कहा-तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है । अब मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे सुनो ॥३२॥ मेरे पिता नृसिंहका एक नियम था । वे कमलगुडसेवनोंमें एक ब्राह्मणको पुत्र-कलत्र एवं दास-दासी समेत बुलाकर सार कुटुम्बका भोजन कराते और अच्छी तरह आदर-सत्कार करते थे ।

६४६आनन्दरामायणे[ सर्गः ११

कुटुम्बभोजं हर्म्ये स ऽस्थापयामास । लक्ष्म्याऽत्मानौ तु मन्याना तावुभौ रामतत्परौ ॥३५॥
पुत्राभावमदृष्ट्वा तौ वृद्धौ पुत्रार्थमुद्यतौ । रूपदोषपरिहारार्थमुपायं कर्तुमुद्यतौ ॥३६॥
निदासाख्ये पुरे गत्वा देवीं मातङ्गीं शुभाग् । स्वायेष्टदेवतामम्बां प्रवरातीरवासिनीम् ॥३७॥
दृष्ट्वा दम्पत्य तौ सेवां नित्यं तत्र प्रचक्रतुः । गते बहुतिथे काले वादा या महालया ॥३८॥
प्रत्यक्षात द्विजं भूत्वा प्राह तदावशांतये । हे नृसिंह महाबुद्ध गच्छाथोध्यापुरीं प्रति ॥३९॥
तत्र वै सायुताये रामतीर्थे महामये । चैत्र मासि वसंतर्तो यदा स्यान्मीनगो रविः ॥४०॥
चैत्रस्नानं मासमेकं कुरु तत्र द्विजोत्तम । पातकं सकलं त्यक्त्वा पुत्र प्राप्स्यस्यसंशयम् ॥४१॥
इति देव्या वचः श्रुत्वा द्विर्जावत्तारवस्तदा । ययौ मार्गे हृदि ध्यायन्नयोध्याख्यां पुरीं शुभाम् ॥४२॥
चिंतया परया व्याप्तः कथं गतुं हि शक्यते । मयाऽयोध्यापुरी दूरमिता कष्टं च जीवितम् ॥४३॥
इति चिंतायुतो मार्गे क्वचित्तिष्ठन्क्वचित्स्खलन् । भार्यायाश्च करे धृत्वा वृद्धश्चैव ययौ द्विजः ॥४४॥
एवं गोदावरीतीरं गत्वा स्नात्वा द्विजोत्तमः । राममूर्त्ति पुरः स्थाप्य पूजयामास भक्तितः ॥४५॥
तावन्तमे प्रसन्नोऽभूद्रामो देव्याः प्रमादतः । द्विजं प्राह नृश्रेष्ठो भो नृसिंह द्विजोत्तम ॥४६॥
माऽयोध्यां त्वमितो गच्छ शृणु मे वचनं शुभम् । इतः पूर्वं षड्वि हि याजनद्वयसम्मतम् ॥४७॥
प्रतिष्ठानाभिधं क्षेत्रं गोदाया उत्तरे तटे । तत्रास्ति रामतीर्थ हि मन्नाम्ना च मया कृतम् ॥४८॥
तत्रन्त्वं गच्छ विप्रेंद्र स्नात्वा तीर्थे हि भार्यया । चैत्रमासे वसंततौं यदा स्यान्मीनगो रविः ॥४९॥
तदा कुरु विधिश्रेण पूजांन्चिन्ता च मा शुभम् । रापत्तयः पुत्रलाभो भविष्यति न संशयः ॥५०॥
इत्युक्त्वा रघुवास्तु तत्रैवांतरधायत । यत्र शृंगाद्दद रामः प्रसन्नोऽभूद्द्विजाय हि ॥५१॥
तस्मात्स वै रामह्रदो नाम्ना सर्वत्र गीयते । तद्रामवचनपद्विप्रः प्रतिष्ठानपुरं ययौ ॥५२॥
मासमेकं च वै स्थित्वा चैत्रस्नानं चकार ह । सूर्योदये समुत्थाय कृतशौचादिक्रियः ॥५३॥


रुकमानाम्नी भर, माता और पिता ये दोनों असाधारण रामभक्त थे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ किन्तु वृद्धावस्था पर्यन्त पुत्रका अभाव देखकर उन्होंने अपना दोष शान्त करनेके लिए उपाय करना प्रारम्भ किया ॥ ३५ ॥ इसके लिए वे प्रवराके तीरपर रहनेवाली अपनी इष्टदेवी अम्बा मातङ्गीके पास गये ॥ ३६ ॥ उनका दर्शन करके उन्होंने बहुत दिनों तक देवीकी आराधना की कुछ दिनों बाद देवी प्रत्यक्ष होकर कहने लगी—हे महाबुद्धिमान् नृसिंह ! तुम यहाँसे अयोध्यापुरी जाओ । वहाँके महातीर्थ सरयूतीरके जलमें जब वसन्त ऋतुके समय सूर्य मीनराशिपर आयें, तब एक महीना चैत्रस्नान करो । ऐसा करनेसे तुम्हारे सब पातक नष्ट हो जायँगे और तुम्हे पुत्रकी प्राप्ति होगी ॥ ३७-४१ ॥ देवीकी यह बात सुनकर वे अयोध्यापुरीका ध्यान करते हुए चले । उन्हें यह बडा चिन्ता थी कि अयोध्यापुरी तो यहाँसे बहुत दूर है और मुझे अपना जीवन भी भारी हो रहा है ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ ऐसा सोचते हुए वे कभी बैठ जाते, कभी गिर पडते और कभी अपनी स्त्रीका हाथ पकडकर वे मेरे वृद्ध पिता चले थे ॥ ४४ ॥ इस तरह किसी प्रकार वे गोदावरी के तटतक पहुंचे। वहाँ उन्होंने स्नान किया और सामने रामकी मूर्ति रखकर भक्तिपूर्वक पूजन करने लगे ॥ ४५ ॥ तबतक देवीके आशीर्वाद्से रामचन्द्रजी प्रसन्न होकर सामने आये और कहने लगे—हे द्विजोत्तम नृसिंह ! अब तुम अयोध्या मत जाओ ! यहाँसे केवल तीन योजन दूर गोदावरीके उत्तर तटपर प्रतिष्ठान नामक क्षेत्र है। वहाँ मेरे नामसे प्रसिद्ध रामतीर्थ है। मैंने ही उसकी स्थापना की है ॥ ४६-४८ ॥ तुम वहाँ जाओ और चैत्रमासमें जब सूर्य मीन राशिपर आयें, तब भार्याके साथ स्नान करके मेरा विधिवत् पूजन करो । ऐसा करनेसे तुम्हारे सब पातक नष्ट हो जायेंगे और तुम्हे पुत्रकी प्राप्ति होगी। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ४९ ॥ ५० ॥ ऐसा कहकर रामचन्द्रजी वहीं ही अन्तर्धान हो गये। जिस शृङ्गानामक सरोवरके तटपर राम प्रसन्न हुए थे, वह स्थान रामह्रदके नामसे विख्यात हुआ। रामके कथनानुसार व वृद्धदम्पती अपनी भार्याके साथ उस प्रतिष्ठानतीर्थको गये

सर्गः ११] मनोहरकाण्डम् ६८७


स्नात्वा तस्मिन् रम्यतीर्थे सरयूसङ्गमन्विते । रामचन्द्रं स्वर्णगिरौ पूजयामास भक्तितः ॥५४॥ प्रदक्षिणाः स्वर्णगिरेश्चकार नव प्रत्यहम् । नवपुष्पैश्च नैवेद्यैः पूजयामास राघवम् ॥५५॥ चैत्रशुक्लतृतीयाया यावद्वैशाखसंभवः । तृतीया शीतला गौरी स्नानं चक्रे च भार्यया ॥५६॥ एवं मासं व्रतं कृत्वा स द्विजस्तृप्तमानसः । प्रत्यर्कं प्रति मार्गेण ययौ लक्ष्म्या समन्वितः ॥५७॥ यावन्मार्गे द्विजोऽगच्छत्तावद्दृष्टास्त्रयो नराः । पिशाचाः क्षुत्प्रक्रान्तेस्नानुद्धार्य सभार्यया ॥५८॥ ययौ स्वनगरं रम्यं गोदानाभिर्विराजितम् । चैत्रस्नानप्रभावेण जातस्तन्मानुषस्त्वदम् ॥५९॥ तस्मान्मया ते कथित वर हि स्नानं मधौ ते सरयूज़ले वै । साकेतपुर्यां नराप्रतीर्थे भुक्तिप्रदं मोक्षदसुन्दम् च ॥६०॥

विष्णुदास उवाच कथ पिशाचयोन्यास्ते मुक्ता विप्रेण वै त्रयः । कस्मात्पापाच्च ते सर्वे पैशाचीं योनिमाश्रिताः ॥६१॥ तन्मर्वं विस्तरेणैव श्रोतुमिच्छामि त्वन्मुखात् ।

श्रीरामदास उवाच शृणु शिष्य प्रवक्ष्यामि रम्भानाम्नी वराऽप्सराः ॥६२॥ चैत्रे स्नात्वा चरायोद्ध्याम्रयूनिर्मले जले । आर्द्रवस्त्रवृता चारुहास्यालंकारमण्डिता ॥६३॥ गृहीत्वा सरयूतोयं रत्नकांचननिर्मिते । पात्रे रामेश्वरं सेतुं द्रष्टुं मौनेन सा जगात् ॥६४॥ ययावाकाशमार्गेण पिशाचा यत्र ते त्रयः । तदार्द्रवस्त्रचांचल्यत्किंबिन्दुभिः प्रोक्षिताश्च ते ॥६५॥ क्रूरस्वभावमुत्सृज्य चाश्चर्यं परमं ययुः । पूर्वजन्मानुस्मरणमभूत्तेषां तदा नृप ॥६६॥ विस्मयाविष्टचित्तास्ते तां दृष्ट्वाप्सरसं दिवि । बहुधा प्रार्थनामासुस्त्वन्मा पप्रच्छ संस्रया ॥६७॥


॥ ५१ ॥ ५२ ॥ वहाँ रहकर उन्होंने एक मास पर्यन्त चैत्रस्नान किया। उनका यह नियम था कि प्रतिदिन सूर्योदयमें पहले होकर उठ जात और नित्यकृत्यसे निबटकर सरयूसङ्गमपर विद्यमान तीर्थमें स्नान करते और भक्तिपूर्वक स्वर्णगिरिपर रामचन्द्रजीको पूजा किया करते थे ॥ ५३, ५४ ॥ प्रतिदिन वे उस स्वर्णगिरिकी नौ परिक्रमा करते और नौ पुष्पों और विविध प्रकारके नैवेद्योस रामका पूजन करते थे। वह व्रत उनका तबतक चलता रहा, जबतक वैशाखके शुक्लपक्षका तृतीया नहीं आयी। तृतीयाके आनेपर उन्होंने तृतालागौरी नामक स्नान किया ॥ ५५ ॥ ५६ । इस तरह एक मास तक व्रत करके प्रसन्न चित्तसे वे ब्राह्मणदेवता अपनी पत्नीके साथ कमलपुरको चले ॥ ५७ ॥ जाते-जाते रास्तेम उनको तीन पिशाच मिले। वे तीनो बडे भूखे थे मेरे पिता-माताने उनका उद्धार किया और अपने नगरको गये। उसी चैत्रस्नानके प्रभावसे वे उनका पुत्र होकर जन्मा ॥ ५८ ॥ ५९ ॥ इसलिए मैने चैत्रमासमे अयोध्याके पवित्रतीर्थम मुक्ति-मुक्तिप्रद सरयूजलमे स्नानका विधान बतलाया है ॥ ६० ॥ विष्णुदासने कहा-वे तीनों पिशाच किस तरह उस पिशाचयोनिसे छूटे और किस पापसे वे पिशाचयोनिमें पड़े थे। यह वृत्तान्त भो विस्तारपूर्वक मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ। श्रीरामदास कहने लगे-हे शिष्य ! सुनो, यह कथानक भी मै कहता हूँ। रम्भा नामकी एक सुन्दरी अप्सरा थी ॥ ६१ ॥ ६२ ॥ उसने चैत्रमासमें अयोध्याके सरयूजलमें स्नान किया। उसक कपड़े भींग गये थे मन्द मुस्कान उसके होठोपर खेल रही थी और उसके अंगमें पड़े हुए विविध प्रकारके आभूषण अपनी असाधारण शोभा दिखा रहे थे ॥ ६३ ॥ स्नानके अनन्तर उसने रत्न और कांचनसे बने हुए पात्रमें रामेश्वर शिवको स्नान करानेके लिये सरयूजल भरा और मौन होकर आकाशमार्गसे रामेश्वरको चल पड़ी। जाते-जाते वह उस स्थानपर पहुंची, जहाँ वे तीनों पिशाच रहते थे। रम्भाक भीगे वस्त्रसे पानीकी कई बूंदें गिरकर इन पिशाचोँपर पड़ीं ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ इससे उनका क्रूर स्वभाव छूट गया और उन्हे पूर्वजन्मकी सब बात याद आ गयीं ॥ ६६ ॥ तदनन्तर वे तीनों विस्मित होकर बहुत तरहस प्रार्थना करने लगे। रम्भाने संत्रसमें उनसे पूछा- ॥ ६७ ॥

६८८ आनन्दरामायणे [सर्ग ११

कस्माद्ययं पिशाचा हि जातास्तत्कथ्यतां मम। इति तत्करुणसंतापेरितास्ते ऽब्रवन्स्तदा। ६८॥
तेषु द्वौ वदन्मातौ हि कथयामासतुश्च ताम् । शृणु भामिनि वार्ता हि पूर्वजन्मनि भूसुरात् । ६९।
विरजायां समुत्पन्नौ श्रोत्रियाद्धरशर्मणः । उपाध्यायन कर्तुं कञ्चिन्नारायणाह्वयम् । ७०॥
शुश्रूषया तोषयित्वा गुरुं तत्रैव मध्यतुः । नारायणसुतां चारुहासां चन्द्रनिभाननाम् ॥७१॥
दृष्ट्वा ऽऽभ्यां मैथुनं दृष्ट्वा प्रार्थ्य तां स्त्रियम । आवाभ्यां च दिना मुक्ता तज्ज नं गुरुणा चिरात् ७२।
आवाभ्यां च ददौ शापं तस्यै चाप्यशरुत्क्रुधा । युवां चापि कुमार्य्य विशाचत्वं गमिष्यथ । ७३॥
ततोऽस्माभिस्तिभिस्तं तु मुनिं नत्वा पुन पुनः । शापस्यान्तस्तो लब्धस्तच्छृणु मनागये । ७४॥
चैत्रमासे नृसिंहारख्यः कश्चिद्विप्रश्च कानने ददाति स्नानजं पुण्यं तदोद्धारो भविष्यति ॥७५॥
एवं जाता पिशाचा हि वयं व्यङ्गाङ्गिबुद्धिभिः। प्रोक्षिताः स्मोऽद्य तेऽङ्गैर पूर्वजन्मस्मृतिः शुभा ७६॥
तत्तंषां वचनं श्रुत्वा ज्ञात्वा शापस्य मोक्षणम् । मान्वोथन्त्य कारणेन शीघ्रं म नृहरिः प्रिया ॥७७॥
आगमिष्यति मा चिंतां कुरुतेति वरांगना । ययौ रामेश्वरं शीघ्र पूजयित्वा गता दिवम् । ७८॥
चैत्रमासे संतिक्रांते संगतः नृहरिद्विजः । भार्यया सहितो दृष्ट्वा पिशाचैस्तैः पिता मम ॥७९॥
स्थित्वा दूर च ते सर्वे तमूचुर्नृहरिं द्विजम् । नैजं वृत्तं समस्तं हि शापस्यापि विम क्षणम् , ८०।
तच्छ्रुत्वा नृहरिर्विप्रस्तानूवाच मुदान्वितः । मा मेष्टव्यं पिशाचा अद्यथा शम्भुद्विजेन सः । ८१॥
राक्षसो मोचितः पूर्वं मोचयिष्याम्यहं तथा ।

पिशाच उवाच

कः शम्भुश्च कदा मुक्तो राक्षसः कः सविस्तरम् ॥८२॥


तुमलोग इस पिशाचयोनिको क्यों प्राप्त हुए हो सो कहो। इस प्रकार रम्भाके सुधोक्त संकेत पाकर उन तीनोंमेंसे दो बोले-हे भामिनी ! सुनो पूर्वजन्मम हम दोनों विरजा नाम्नी स्त्री द्वारा हर शर्मा नामक ब्राह्मणसे उत्पन्न हुए थे। अवस्थानुसार हम दोनों विद्या पढ़नेके लिए नारायण नामक एक गुरुके यहाँ गये वहाँ उनकी सेवा करते हुए रहने लगे । गुरुजीकी एक सुन्दरी कन्या थी । उसको मनोहारिणी मुसकान थी और चन्द्रमा के समान मुख था ।। ६८-७१ । उस देखकर हम दोनोंने उससे मित्रता कर ली और समय पाकर बहुत अनुनय विनय करके हम दोनोंने उसके साथ भोग किया। बहुत दिनों बाद यह बात गुरुजीको ज्ञात हो गयी ॥ ७२ । उन्होंने कुपित होकर हम तथा उस कन्याको शाप देते हुए कहा कि इस कुमारीके साथ तुम दोनों पिशाच हो जाओ । ७३ ।। इसके बाद हम तीनोंने उन मुनीश्वरको बार-बार प्रणाम करके किसी तरह शापके अन्तका वचन पाया सो भो सुन लो ॥ ७४ । उन्होंने कहा कि चैत्रमासमें कोई नृसिंह नामका ब्राह्मण इस वनमें आयेगा और वह अपने नैत्यस्नानका पुण्य तुम्हे प्रदान करेगा तब तुम्हारा उद्धार होगा । ७५ ।। इस तरह हमलोगोंको यह पिशाचयोनि मिली । अहोहम आपके अमृतरससे प्रोक्षित हो गये। इस कारण हमें पूर्वजन्मकी सब बातें याद आ गयीं ॥ ७६ । इस प्रकार उनकी बात सुनकर रम्भाने संशयहीन हो कहा कि तुम लोग धैर्य रखो । अब शीघ्र ही नृसिंह ब्राह्मण अपनी स्त्रीके साथ इस वनमें आनेवाले हैं ॥ ७७ ॥ तुमलोग किसी प्रकारकी चिन्ता मत करो। इतना कहकर रम्भा रामेश्वर चली गयी। वहाँ उसने शिवजीका पूजन किया और आकाशमार्गमें होकर अपने स्थानको चली गयी ॥ ७८ ॥ चैत्रमास वनन्तर नृसिंह अपनी भार्याके साथ उस वनमें पहुंचे और उन पिशाचोंको देखा । ७९ ।। वे तीनों पिशाच नृसिंहके पास न आकर थोड़े दूरपर खड़े हो गये और अपन पूर्वजन्मका वृत्तान्त एवं शापसे मुक्ति पानेका उपाय कह सुनाया ॥ ८० ॥ उनकी बात सुनकर मेरे पिताजीने कहा-तुम लोग घबड़ाओ नहीं । जिस प्रकार शम्भुनामक ब्राह्मणने उस राक्षसको पिशाचयोनि से मुक्त किया था उसी तरह मैं भी तुम लोगोंको इस योनिसे मुक्त कर दूंगा उनकी बात काटकर पिशाचों-मसे एकने कहा कि शम्भु विप्र कौन थे और वह राक्षस कौन था ? यह वृत्तान्त विस्तारपूर्वक आप हमें

सर्गः १२ ]

सर्गः १२ ] मनोहरकाण्डम् ६८९

कथयस्व द्विजश्रेष्ठ कृपां कृत्वा तु कौतुकात् । नृसिंह उवाच शृणुध्वं कथयिष्यामि यद्वृत्तं च पुरातनम् ॥८३॥ शिवकांचीपुरीमध्ये कश्चिद्विप्रः शुचिव्रतः संबभूव चिरं कालं तस्थौ स च स्वभार्यया ॥८४॥ स कस्मिंश्चिद्दिने विप्रश्चैकाम्रेशशिवांतिके । पौराणिकाद्वचश्चैत्रमासमाहात्म्यमव्रतान्विताम् ॥८५॥ कथां श्रोतुं समायातस्तत्र श्रुत्वा महत्फलम् । अयोध्यायां हि चैत्रस्य स्नानात्कैवल्यदायकम् ॥८६॥ ततो बहुगते काले संस्मरंस्तां कथां शुभाम् । ज्ञात्वा समागतं चैत्रं स्वगृहान्निर्गतस्तदा ॥८७॥ भार्यया सहितो विप्र शनैर्मार्गेण वै ययौ । तीर्त्वा तां जाह्नवीं रम्यां यावदग्रे स गच्छति ॥८८॥ तावद्दूरो हि भिल्लेन कर्कशाख्येन कानने । गृहीत्वा सञ्चरं चापं धर्षयित्वा च भूसुरम् ॥८९॥ लुण्ठतः कर्कशः क्रूरो वस्त्रेणैकेन तं द्विजम् । मुमोच तस्य पाथेयं गृहीत्वा सकलं शुभम् ॥९०॥ द्विजोऽपि प्रार्थयामास कर्कशं च पुनः पुनः । वस्त्रादिकं गृहाण त्वं प्रत्यर्पय ददस्व माम् ॥९१॥ तत्तस्य वचनं श्रुत्वा मुक्त्वा तद्वस्त्रबंधनम् सर्वं ददर्श पाथेयं नानाविधमनुत्तमम् ॥९२॥ तस्मिन्ददर्श स व्याधो दश रंभाफलानि वै अपक्वान्यतिशुष्काणि ततश्चित्तेऽविचारयत् ॥९३॥ एतै फलैर्न मे कार्यं जानामि ब्राह्मणोत्तमम् । नाहं दास्याम्यद दानं क्षुधाक्रांतं च सन्द्विजम् ॥९४॥ इति निश्चित्य स व्याधो ददौ तानि द्विजन्मने । गृहीत्वाऽभक्षयद्विप्रः प्रारम्भे भार्यया मधौ ॥९५॥ तद्रंभाफलदानेन कर्कशस्य हृदा शुभा जाता बुद्धिः क्षणादेव सात्विकी क्रूरता गता ॥९६॥ एवं पिशाचाः सकलास्ततः परं भिल्लाय तस्मै तु शुभा मतिर्बभूव । समागतं चाथ कुतः स पृष्टवान् विप्रं स वै प्राह वने च कर्कशम् ॥९७॥ शम्भुरुवाच कांचिपुर्याः समायातो गम्यतेऽयोध्यां पुरीम् । चैत्रमासेऽवगाहार्थं शरयूनिर्मले जले ॥९८॥

बतलाइए । हे द्विजश्रेष्ठ हमपर इतना कृपा करिए । नृसिंह कहने लगे-अच्छा सुनो। मैं एक पुरातन कथा तुम लोगोंको सुनाऊँगा ॥ ८१-८३ ॥ शिवकांचीपुरीम पवित्रव्रतधारी एक ब्राह्मण रहता था । उसका नाम शम्भु था वह बहुत दिनों तक अपनी स्त्रीके साथ उस नगर में रहा । ८४ ॥ एक दिन वह ब्राह्मण किसी वनाम्र एकांश्र्वर नामक शिवके समीप पौराणिकके मुखसे चैत्रमास माहात्म्यकी कथा सुनने गया । वहाँ पहुंचकर उसने चैत्रमासमें अयोध्यास्नानका बड़ा फल सुना ॥ ८५ ॥ बहुत दिना बाद उस कथाका स्मरण करके वह चैत्रमास लगनेके पहले ही अयोध्या जानेके लिए अपने घरसे निकल पड़ा । उसने अपन साथ अपनी स्त्रीको भी ले लिया था। वह धीरे धीरे अयोध्याकी ओर चला । राहमे गङ्गाजी पड़ीं तो उन्ह पार किया । वहाँसे थोड़ी दूर आगे बढ़ा ही था कि वनमे कर्कश नामका एक भील धनुष-बाण लिये हुए मिला । उसने ब्राह्मण-देवताका धमकाकर सब कुछ छीन लिया और केवल एक कपड़ा पहनाकर छोड़ दिया । यहाँ तक कि उसने इन लोगोंका पवित्र पाथेय भी ले लिया ॥ ८६-६० ॥ तब ब्राह्मणने उससे प्रार्थना की कि मेरे कपड़े-लत्ते सब कुछ ले लो । लेकिन रास्तेमे खानेकी वस्तुओंवाली यह पोटला वापस दे दो ॥ ९१ ॥ ब्राह्मणकी बात सुनकर कर्कशने वह पोटली खोली और देखा कि उसमें बहुत-सी खाने-पीनेकी चीजें बँधी है ॥ ९२ ॥ उस व्याधने उसमें दस केलेके फल भी देखे वे फल कच्चे और सूखे हुए थे । उन फलोंको देखकर उसने मनमें सोचा कि इन फलोंकी तो हमे कोई आवश्यकता है नहीं, फिर हम क्यों न दे दें ॥ ९३ ॥ ९४ ॥ ऐसा निश्चय करके उसने केले वापस दे दिये और उस सपत्नीक ब्राह्मणने चैत्रमासके प्रारम्भमें वे कलक फल खाये ॥ ९५ ॥ उस रम्भाफलके दानसे कर्कश व्याधके हृदयमें शुभ बुद्धिका प्रादुर्भाव हो गया। जिससे उसकी क्रूरता नष्ट हो गयी और सात्त्विकता आ गयी ॥ ९६ ॥ हे पिशाचो ! जब उस भीलकी मति पवित्र हो गयी तो उसने

६९० आनन्दरामायणे [ सर्गः ११

इति विप्रवचः श्रुत्वा पुनः पप्रच्छ कर्कशः । किं लभ्यते हि स्नानेन तन्मे वद सविस्तरम् ॥९९॥ पुनः प्राह स विप्रेंद्रः कर्कशं भक्तितः फलम् । स्नानेन मधुमासे हि रघुनाथः प्रसीदति ॥१००॥ प्रसादात्सकलान्भोगान् लभते मानवा भुवि । अंते मोक्षोऽपि भो भिल्ल लभ्यते नात्र संशयः ॥१०१ । इति विप्रवचः श्रुत्वा पुनः पप्रच्छ कर्कशः । मोक्षस्वरूपं कथय कृपां कृत्वा ममोपरि ॥१०२॥ तत्तस्य वचनं श्रुत्वा पत्नीं प्राह द्विजोत्तमः । पश्य पश्य वरारोहे कौतुकं महदद्भुतम् ॥१०३। यद्रांभाफलदानेन चैत्रे मासि वनानने । अय क भिल्लजातीयः क प्रश्नस्तादृशः शुभः ॥१०४। मोक्षस्वरूपज्ञानार्थं तस्माद्दानं प्रशस्यते । इत्युक्त्वा तां प्रियां विप्रः कर्कशं प्राह सादरम् ॥१०५। साधु साधु महाव्याध सम्यक्प्रश्नः कृतस्त्वया । इदानीं प्रोच्यते मोक्षस्वरूपं तन्निशामय ॥१०६। स मोक्षस्त्वं हि जानीहि यतो नास्ति पुनर्भवेः । इति विप्रवचः श्रुत्वा पुनः पप्रच्छ कर्कशः ॥१०७॥

तस्य प्राप्तिर्यथा स्यान्मे तन्मे वद द्विजोत्तम । शृणु कर्कश तन्प्राप्तिर्यथा स्यात्तद्वदामि ते । १०८॥

दारपुत्रगृहादीनां प्रीतिं मुक्त्वा जनार्दनम् दिवारात्रं चिंतयित्वा सर्वदेहस्य चालकम् ॥१०९॥ आत्मानं बहुपुण्यौघैर्निर्मलीकृत्य मानसम् तन्स्वरूपे यदा निक्षिप्यन् मुक्तो नेत्तरो जनः ॥११०॥ एवं वदति विप्रेन्द्रे व्याधो मुक्त्वा शरं धनुः । शंभुशर्मा जगन्मात्वा त्राहि त्राहीति वै वदन् ॥१११। प्रोवाच द्विजवर्यं स व्याधो भ्रामुद्गतेति च । एतस्मिन्नन्तरे तत्र राक्षसो घोरदर्शनः ॥११२। दुद्राव दीर्घशब्देन यत्रासंस्ते त्रयो वने । आयांतं राक्षसं दृष्ट्वा चक्रुस्ते तु पलायनम् ॥११३॥ तावज्जवेन तान् धर्तुं निकटं राक्षसो ययौ । तं दृष्ट्वा निकटं शुंभुर्मुञ्चिकां मजलां निजाम् ॥११४।

उन ब्राह्मण देवतासे पूछा कि आप किस कार्यस इधर आ पहुँचे ? । ६७॥ शम्भुने उत्तर दिया कि मैं कांची- पुरोसं आया हूँ और अयोध्या जा रहा हूँ । वहाँ चैत्रमासमें स्नान करूंगा ॥ ९८ । इस तरह ब्राह्मणकी बात सुनकर कर्कशने कहा कि चैत्रस्नानसे क्या लाभ होता है ? यह बात विस्तारपूर्वक हम बतलाइए । ९९॥ ब्राह्मण भक्तिपूर्वक कर्कशको चैत्रमासके स्नानका फल बतलाने लगा । उसने कहा कि चैत्रस्नानसे भगवान् रामचन्द्र प्रसन्न होते हैं ॥ १०० । संसारके प्राणी उन्हींकी कृपासे सब प्रकारके सुखोंको भोगते हैं और अन्तमें उन्हें मोक्ष भी मिलता है * इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ १०१ ॥ इस तरह विप्रका बात सुनकर कर्कशने कहा कि कृपा करके आप हमें मोक्षका स्वरूप बतलाइए ॥ १०२ ॥ इस प्रकार कर्कशका प्रश्न सुनकर ब्राह्मणने अपनी पलीसे कहा-प्रिये ! देखो तो कितने आश्चर्यकी बात है! चैत्रमासमें केलेके फलोंके दानसे यह मोक्ष कैसे कैसे प्रश्न कर रहा है। इतनी बात अपनी स्त्रीस कहकर ब्राह्मण प्रेमपूर्वक कर्कशसे कहने लगा- ॥ १०३-१०५ ॥ हे महाव्याध ! तुम्हारा प्रश्न बहुत ठीक है। अब मैं तुमको मोक्षका स्वरूप बतला रहा हूँ। तुम सावधान मनसे सुनो । १०६ । मोक्ष उस कहते है, जिस पाकर प्राणीको फिर जन्म न लेना पड़े । इस तरह ब्राह्मणकी बात सुनकर कर्कशने फिर कहा-उसकी प्राप्ति मुझे जिस तरह हो सके, वह उपाय बतलाए। शम्भु ब्राह्मणने कहा-हे कर्कश ! जिस तरह तुम्हे मोक्षकी प्राप्ति हो सकती है। वह उपाय मैं बतलाता हूँ सुनो ॥ १०७ ॥ १०८ ॥ जो मनुष्य स्त्री, पुत्र, गृह आदिका प्रीतिका परित्याग करके रात-दिन सब प्राणियोंके संचालक भगवान् जनार्दनका ध्यान करता है और बहुतसे पुण्योसे अपने चित्तको निर्मल करके उन्हीं के स्वरूपमें लौ लगाये रहता है वही प्राणी मुक्त होता है और कोई नहीं १०९ ॥ ११० ॥ ऐसा कहने- पर कर्कशने अपना धनुष-बाण फेंक दिया और उनके साथ शम्भुके पैरोंपर गिर पड़ा और कहने लगा-हे ब्राह्मणदेवता ! हमारी रक्षा करो। उसी समय एक राक्षस दौड़ता हुआ उस स्थानपर आ पहुँचा, जहाँ ये तीनों बैठे वार्तालाप कर रहे थे । राक्षसको आते देखकर ये तीनों भागे राक्षस भी उन्हें पकड़नेके लिए

सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६९१

सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६९१

कुम्भोत्थं शशिरश्मिसन्निभमहं मत्वा रामचन्द्रं स्मरेत् । प्रावित्रं शमनात्मजा च यतयो युष्मासि वै ॥११५॥ तस्यैकादशमस्यापि जलं पूर्वस्मृतिर्भवः। ततः सशङ्कनो दूरं स्थित्वा शंभुं व्यजिज्ञपत् ॥११६॥ मामुद्धर मुनिश्रेष्ठ घोराद्राक्षसदेहतः। शरणं ते गतोऽस्म्यद्य जलं पूर्वस्मृतिर्भवम् ॥११७॥ इति तकैतुकं दृष्ट्वा रक्षसं प्राह स द्विजः। कस्मात्ते राक्षसवं हि अप पृष्ठ वदाऽधुना ॥११८॥ राक्षसः प्राह वेगेन शृणु शून्ये निजं वद। जनस्थाने पुरा चाहं विप्रः कर्मपराङ्मुखः ॥११९॥ प्रतिग्रहपरः पापी दुर्मार्गव्यसनी सदा। तस्मिन्नेवौदरे चैत्रे मम भार्या सती शुभा ॥१२०॥ स्नानार्थं गभतीर्थं सा मामपृष्ट्वा गृहाययौ। त्वां मार्गे समया दृष्ट्वा धृत्वा सर्गे चलां सुभाम् ॥१२१॥ प्रोक्ता क्रोधेन्वया रंडे ममपृष्ट्वा क्व यास्यसि। सा प्राह भवभीरु तु रामतीर्थे प्रगम्यते ॥१२२॥ मधुमासऽवगाहार्थं न मया दुष्कृतं कृतम्। एवं ब्रुवति तद्वाक्यं ताडिता सा मया बलात् ॥१२३॥ प्रेषिता स्वगृहं भर्त्सयन्तः कालान्तरे गते। मृतोऽहं च तदा नातो यमलोकं यमानुगैः ॥१२४॥ चित्रगुप्तोऽथ दृष्ट्वा मां धिग्धृत्वा वै पुनः पुनः। यमराजं स वै प्राह घर्षयन्मां रुषान्वितः ॥१२५॥ भो धर्मराज पापोऽयं चैत्रस्नाननिवारकः। लुब्धादी राक्षसीं योनिं निरयान् मोक्तुमर्हति १२६॥ इति तद्वचनं श्रुत्वा यमः प्राहानुगांस्तदा। भो भटा राक्षसीं योनिदीयतां निर्जने वने ॥१२७॥ पादितेऽस्यै च षष्ठांशात्संस्थाप्य यमार्जुनैः। दत्ता मे राक्षसीं योनिं त्यक्त्व चात्रगता यमम् १२८॥ तदाऽरभ्य वने चाहं क्षुत्तृट्परिपीड़ितः। पञ्चविंशत्सहस्राणि वर्षाण्यत्र स्थितस्त्वियम्। १२९॥ किं मया सुकृतं पूर्वं कृतं यस्मादिने नरा। गंगतिश्चाथ वै जाता मधुसंगतो गतिप्रदः ।१३०॥ इति तद्वचनं श्रुत्वा शंभुर्व्याप्त्वा दृशं हृदि। ज्ञात्वा यत्सुकृतं पूर्वं राक्षसाय न्यवेदयत् ॥१३१॥ शृणु राक्षस यत्पूर्वे कृतं वै सुकृतं त्वया। तस्माज्जाता संगतिर्मे वने निर्भासुरे शुभा ॥१३२॥

बिन्दुजल समीप पहुँचने पर उसका घमण्ड देखकर शम्भुने रामचन्द्रका स्मरण करके अपना तूंबीका जल उस राक्षसके मुखमें फेंक दिया। रामनामसे पवित्रोभूत जलके पड़नेसे उस राक्षसको अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो आया। इसलिए वह दूर ही खड़ा होकर शम्भुसे कहने लगा—हे मुनिराज ! इस घोर राक्षसदेह-से आप मेरी रक्षा करिए। मैं आपकी शरण हूँ। आपके जलसिञ्चनसे मुझे अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो आया है॥ ११५-११७॥ इस प्रकारका कौतुक देखकर ब्राह्मणने उस राक्षससे कहा—पहले तुम हमें यह बतलाओ कि तुम राक्षसदेहका किस तरह प्राप्त हुए ॥११८॥ राक्षसने अपने पूर्वजन्मका हाल बताना प्रारम्भ किया। उसने कहा—इसके पहले मै जन्ममें जनस्थान पुरमें एक ब्राह्मण था ॥ ११९॥ उस समय मै जैसे तैसे द्रव्य लेता हुआ दुराचार और व्यसन में अपना जीवन बिता रहा था। उसी समय मेरी स्त्री बिना मुझसे पूछे ही चैत्रस्नान करनेके लिए रामतीर्थको चल पड़ी। मैंने उसे रास्तेमें देखा तो पकड़ लिया और उससे कहा—अरी राँड ! बिना हमसे पूछे तू कहाँ जा रही है ? भयभीत होकर उसने उत्तर दिया कि मै चैत्रस्नान करनेके लिए रामतीर्थ (अयोध्या) जा रही हूँ ॥ १२०-१२२॥ ऐसा करनेमें मैंने कोई पाप नहीं समझा इसलिए चल पड़ी। ऐसी निष्कपट बात सुनकर भी मैंने उसे बहुत मारा और घर लौटा दिया। कुछ दिन बाद मेरी मृत्यु हुई और यमके दूत पकड़कर मुझे यमलोक ले गये ॥ १२३ ॥ १२४॥ चित्रगुप्तने मुझे देखा तो बहुत धिक्कारा और धमकाकर यमराजसे कहा—हे धर्मराज ! इस पापीने अच्छी स्त्रीको चैत्रस्नानसे रोका था। अतएव यह लुब्ध राक्षसी योनिको भोगकर दण्ड पाने का अधिकारी है ॥ १२५ ॥ १२६ ॥ इस प्रकार चित्रगुप्तकी बात सुनकर धर्मराजने अपने कर्मचारियों से कहा कि इसे किसी निर्जन वनमें राक्षसी योनि दे दो। उनके आज्ञानुसार यमदूत मुझे इस वनमें छोड़ कर लौट गये। तभीसे भूखे-प्यासे रहकर मैंने पच्चीस हजार वर्ष बिताये हैं ॥ १२७-१२९॥ मुझे नहीं मालूम कि मैंने कौन सा पुण्य किया था, जिसके प्रभावसे इस निर्जन वनमें आप जैसे सज्जनका दर्शनरूप गतिप्रद उत्तम फल प्राप्त हुआ ॥ १३० ॥ उसकी बात सुनकर शंभुने क्षणभर अपने हृदयमें उसके पूर्व सुकृतका ध्यान किया और कहने लगे—॥ १३१ ॥ हे राक्षस तुमने पूर्वजन्ममें जो सुकृत किया था, वह

६९२ आनन्दरामायणे [ सर्ग ११

एकादश्यां चैत्रशुक्ले कृतवान्ब्राह्मणोजनम् । ताम्बूलो दक्षिणायुक्तः कट्या वस्त्रेन्वया धृतः ॥१३३॥ द्वादश्यां प्रातरुत्थाय गत्वा स्नानं त्वया कृतम् । पतितः स हि तांबूलो विस्मृत्या गौतमीतटे ॥१३४॥ दक्षिणामहितो दृष्टः स केनापि द्विजेन वै । गृहीत्वा स हि द्वादश्यां न जानंश्च त्वया पुनः ॥१३५॥ तांबूलदानाद्दुश्चैत्रमासे जाता बने मेऽद्य हि संगतिस्ते । तस्मान्मधौ राक्षस मानवैर्हि ताम्बूलदानं करणीयमेतत् ॥१३६॥ इत्युक्त्वा राक्षसं शम्भुश्चैत्रमाहात्म्यमुत्तमम् । उभाभ्यां श्रावयित्वाऽथ कर्कशं वाक्यमब्रवीत् ॥१३७॥ भो कर्कश महाबुद्धे शृणुष्व वचनं मम । आगच्छ त्वं महैवाद्य मयाऽयोध्यापुरीं प्रति ॥१३८॥ सरयूस्रानमात्रेण सद्यो पापाद्विमोक्ष्यसे । इत्युक्त्वा कर्कशं शम्भुस्ततः प्रोवाच राक्षसस् ॥१३९॥ भो राक्षस त्वमत्रैव मासमात्रं स्थितो भव । अयोध्यायां प्रवेशश्च राक्षसानां न विद्यते ॥१४०॥ अतोऽहं मधुमासे हि स्नानस्त्रानेन परा पुनः । यदागच्छामि कांचीं त्वां चोद्धरिष्याम्यहं तदा ॥१४१॥ मा संदेहोऽस्तु ते चित्ते शपथं कारयाम्यहम् । यत्पापं ब्रह्महत्यायास्तथा गायत्रिनिंदनात् ॥१४२॥ नोद्धृत्य त्वां हि गच्छामि तर्हि तन्मयि तिष्ठतु मद्यपने च यत्पापं हेमस्तेयादिकं च यत् ॥१४३॥ नोद्धृत्य त्वां हि गच्छामि तर्हि तन्मयि तिष्ठतु । यत्पापं भ्रूणहत्यायास्तथा चैत्रे ह्यमज्जनात् ॥१४४॥ नोद्धृत्य त्वां हि गच्छामि तर्हि तन्मयि तिष्ठतु । इत्यादिशपथैर्नर्हि राक्षसं दृढयन् द्विजः ॥१४५॥ यावत्पश्यति सर्वत्र तावज्जातं हि कौतुकम् । व्याधाय चैत्रमासस्य माहात्म्यस्योपदेशतः ॥१४६॥ तरवः फलिनो जाता परितो दशयोजनम् । पत्रैः पुष्पैर्नित्राश्च सौगंधः पवनो ववौ ॥१४७॥ नद्यस्तोयं वहन्त्यश्च ननृतुर्बर्हिणो वने । तद्दृष्ट्वा कर्कशश्चापि चैत्रमाहात्म्यकीर्तनात् ॥१४८॥ दुर्वर्णं सुवर्णं जातं चैत्रश्रेष्ठत्यमन्यत । ततस्ते द्वितयस्तस्मादनाम्नागोष्ठं निर्गताः ॥१४९॥

मैं बतला रहा हूँ उसके प्रभावसे हमारे तुम्हार साक्षात्कार हुआ है । एक बार तुमने चैत्रशुक्ल एका- दशीको किसीके यहां भोजन किया, ताम्बूल दक्षिणा ली और एक वस्त्रम रखकर उसे तुमने अपनी कमरमें लपेट लिया ॥१३३॥ द्वादशीको तुम सबेरे उठे और गङ्गास्नान करने चले गये । वह कमरमें लिपटी हुई दक्षिणा और ताम्बूल भूलसे गौतमी नदीके तटपर गिर गया । उस किसी ब्राह्मणने उठा लिया, किन्तु उसके विषयमें तुम्हें कुछ ख्याल नहीं था । १३३-१३५॥ चैत्रमासम उस दक्षिणा और ताम्बूलके दानसे ही आज इस निर्जन वनमें हम- से साक्षात्कार हुआ है । देखो, केवल ताम्बूलके दानका कितना बडा माहात्म्य है ! अतएव इस मासमें ताम्बूल- दान अवश्य करना चाहिए ॥१३६॥ इस तरह उस राक्षसको चैत्रम मासका माहात्म्य सुनाकर शम्भुने कर्कशसे कहा—हे महाबुद्धिमान् कर्कश ! मेरी बात मानो और आज ही मेरे साथ अयोध्यापुरीको चल दो ॥१३७॥ १३८॥ चैत्रमासम सरयूस्नानमात्र से तुम सब पापोंसे मुक्त हो जाओगे ऐसा कर्कशसे कहकर शम्भुने उस राक्षससे कहा कि तुम महीना भर इसी स्थानपर रहो । क्योंकि अयोध्या नगरमें राक्षसलोक नहीं जा सकते ॥१३६ ॥ १४०॥ इस कारण जब मैं चैत्रस्नान करके उधरसे लौटूंगा और यहां आऊँगा, तब तुम्हारा उद्धार करूँगा ॥१४१॥ तुम इसमें कुछ सन्देह मत करो । मैं कसम खाता हूँ कि ब्राह्मणहत्या करने तथा गौ एवं मुनियोंकी निन्दा करनेसे जो पातक होता है, वह पातक मुझे लगे यदि मैं तुम्हारा उद्धार किए बिना जाऊँ। मद्य पीने और सुवर्ण चुरानेसे जो पातक होता है यदि मैं तुम्हारा उद्धार किये बिना जाऊं तो मुझे वे पातक लगे जो पाप भ्रूणहत्या तथा चैत्रमासमें स्नान न करनेसे लगता है वह मुझे लगे । यदि विना तुम्हारा उद्धार किये विना जाऊँ । इस तरह विविध प्रकारकी शपथें खाकर शम्भुन उस ब्रह्मराक्षसको आश्वासन दिया इसके बाद जब व्याधन चारों ओर दृष्टि उठाकर देखा तो चैत्रस्नानका माहात्म्य सुननेके कारण उस वनके दस योजन तक उसे सब वृक्ष फल फूलोंसे लद दिखायी दिये और सुगन्धित वायु चलने लगा ॥१४२-१४७॥ उस वनकी सब नदियां घणघोर निनाद करता हुआ जल बहने लगा और मयूरमण्डल