श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 699, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ५८३
अतादस्माच्च यत्पापं सप्तजन्मकृतं मया । तत्सर्वं नाशमायातु स्थिरा मे चास्तु संततिः ॥ १५९॥
मनोरथास्तु सफलाः संतु नित्यं ममार्चनात् । देहांते वैष्णवं स्थानं मम चास्त्वतिदुर्लभम् ॥ १६०॥
इति क्षमाप्य तान् विप्रान् प्रसाद्य च विसर्जयेत् । तामर्चां गुरवे दद्याद्रत्नपुष्कां सदा व्रती ॥ १६१॥
ततः सुहृत्प्रियैर्युक्तः स्वयं भुंजीत भक्तिमान् । एवमुद्यापनविधिंश्चैत्रस्नानफलाप्तये ॥ १६२॥
सविस्तरश्च कर्तव्यश्चैत्रस्नानपरायणैः । एवं यः कुरुते सम्यक् चैत्रस्नानव्रतं नरः ॥ १६३॥
सर्वपापैर्विनिर्मुक्तो विष्णुमायुज्यमाप्नुयात् । सर्वव्रतैः सर्वतीर्थैः सर्वदानैश्च यत्फलम् ॥१६४॥
तत्कोटिगुणितं पुण्यं सम्यगस्य विधानतः । देहस्थितानि पापानि नाशमायांति तद्भयात् ॥१६५॥
क्व यास्यामो वदंत्येवं यच्चैत्रव्रतकृन्नरः । तस्मादवश्यमेवैतच्चैत्रस्नानं समाचरेत् ॥१६६॥
श्रीचैत्रव्रतकथनं पठन्ति भक्त्या ये वै तद्द्विजयतिवैष्णवान्वदिभिः ।
ते सम्यक् व्रतकरणात् फलं लभन्ते तत्सर्वं कलुषविनाशनं लभन्ते ॥ १६७॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकांडे
आदिकाव्ये चैत्रमहिमवर्णनं नाम दशमः सर्गः ॥ १० ॥
एकादशः सर्गः
( चैत्रस्नानस्य माहात्म्य )
विष्णुदास उवाच
किमर्थं सर्वमासेषु चैत्रमासः स्मृतो वरः । तत्कारणं वदस्वाद्य गुरो संतोषहेतवे ॥ १ ॥
श्रीरामदास उवाच
शृणु शिष्य महाबुद्धे सम्यक् पृष्टं त्वया मम । ब्रह्मप्रार्थनया विष्णुर्र्यदा भूम्यां द्विजोत्तम ॥ २ ॥
अयोध्यापालकस्याथ राज्ञो दशरथस्य हि । कौसल्यायास्तु भार्याया जठरान्निर्गतो बहिः ॥ ३ ॥
कहे कि आप लोगोंकी कृपासे देवेश रामभद्रजी हमपर सदा प्रसन्न रहें ॥ १५८ ॥ मैंने सात जन्म तक जो पाप किये हों, वे इस व्रतसे नष्ट होजायँ और मेरी सन्तति स्थायी हो ॥ १५९ ॥ इस पूजनके प्रभावसे मेरे सब मनोरथ सफल हों और देहान्त होनेपर हम अतिशय दुर्लभ वैकुण्ठ धाम प्राप्त हो ॥ १६० ॥ इस तरह क्षमायाचना करके उन ब्राह्मणोंको प्रसन्न करता हुआ विदा करे और रत्न तथा प्रतिमा समेत पूजनकी सब वस्तुयें गुरुको दान दे दे ॥ १६१ ॥ इसके बाद नातेदारों और मित्रोंके साथ भोजन करे। इस तरह चैत्रमासका फल प्राप्त करनेके लिए उद्यापन करनेका विधान है ॥ १६२ ॥ जो लोग चैत्रमासके व्रतमें लगे हों, उन्हें विस्तारसे यह उद्यापन करना चाहिए । जो मनुष्य अच्छी तरह चैत्रस्नानका व्रत करता है, वह सब पातकोंसे छूटकर विष्णुभगवान्की सायुज्य मुक्ति प्राप्त करता है। समस्त व्रतों, सब तीर्थों और समस्त दानोंसे जो फल प्राप्त होता है, उसका करोड़ोंगुना अधिक फल इस चैत्रमासके व्रतसे प्राप्त होता है। इसके भयसे चैत्रव्रतीके देहमें रहनेवाले समस्त पातक नष्ट हो जाते हैं। वे पाप कहते हैं कि अब हम कहाँ जायें ? अतः चैत्रव्रत करनेवाले मनुष्यको चैत्रस्नान अवश्य करना चाहिए । १६३-१६६ ॥ जो लोग इस चैत्रव्रतकी कथाको पढ़ते या विप्र तथा संन्यासी वैष्णवोंको सुनाते हैं, वे अच्छी तरह व्रत करनेका फल पाते हैं और उनके समस्त पातक नष्ट हो जाते हैं ॥ १६७ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत 'ज्योत्स्ना'-भाषाटीकासहिते मनोहरकाण्डे दशमः सर्गः ॥ १० ॥
विष्णुदास बोले—हे गुरुदेव ! सब मासोंमें यह चैत्रमास क्यों श्रेष्ठ माना गया है ? सो मेरे सन्तोषके लिए कहिए ॥ १ ॥ श्रीरामदासने कहा-हे महाबुद्धिमान् शिष्य ! तुमने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया है। मैं
45