श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 698, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें६८२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १०
अतः परं प्रवक्ष्यामि चैत्रोद्यापनकं विधिम् । यत्कृत्वा सफलं सर्वं चैत्रस्नानं तु जायते ॥१४२॥
चैत्रे मासि सिते पक्षे या चैकादशी तिथिः । सर्वासु तिथिषु श्रेष्ठा चोपोष्या व्रतकाङ्गिभिः ॥१४३॥
श्रेष्ठा सा द्वादशी ज्ञेया यस्यां तु यमपूजनम् कार्यं दध्योदनं दत्त्वा जलकुंभः प्रदीयताम् ॥१४४॥
तिस्रश्च तिथयः श्रेष्ठाश्चैत्रे मासि महत्ससाः । त्रयोदशी तथाभूता पौर्णमासी तथैव च ॥१४५॥
यासु स्नानञ्च दानं च सर्ववाञ्छितदायकम् । येनै स्नानं चैत्रमासे न स्नातं नवरात्रके । १४६॥
तैस्तु चांत्यादिने स्नात्वा चैत्रस्नानफलम्भजेत् । तासु श्रेष्ठा पूर्णिमा हि सर्वपातकनाशिनी ॥१४७।
तस्यामुद्यापनं प्रोक्तं चैत्रस्नानफल प्रये । उपोष्य च चतुर्दश्यां पूर्ववन्मण्डपादिकम् ॥१४८।
कृत्वा तस्मिन् धान्यराशीं कलशं वारिपूरितम् । स्थापयित्वा तदुपरि हेमपात्रं सुविस्तृतम् ॥१४९॥
पंचरत्नयुतं स्थाप्य वस्त्रेणाच्छादयेच्च तत् । तस्मिन्सीतायुतं रामं सौवर्णे विधिपूर्वकम् ॥१५०॥
भ्रातृभिर्वायुपुत्रेण सुग्रीवेण समन्वितम् । विभीषणाङ्गदाभ्यां तु जांबवन्महिते तथा । १५१।
पूजयेद्देवदेवेशं परं गुरुनुलया । उपचारैः षोडशभिर्नानाभक्ष्यसमन्वितैः । १५२॥
रात्रौ जागरणं कुर्याद्गीतवाद्यादिमङ्गलैः । ततस्तु पौर्णमाश्यां च सपत्नीकान् द्विजोत्तमान् । १५३॥
त्रिंशन्मितानथैकं वा स्वशक्त्या वा निमन्त्रयेत् । ततस्तान् भोजयेद्विप्रांन्नानाभक्ष्यान्नादिना व्रती ॥१५४।
अतो देवा इति ह्यर्चा जुहुयात्तिलसर्पिषा । प्रीणयेद् देवदेवेशं देवांश्च पृथक् पृथक् ॥१५५॥
दक्षिणां च यथाशक्त्या प्रदद्याच्च ततो नमेत् पुनर्देवं समभ्यर्च्य देवांश्च तुलसीं तथा ॥१५६॥
ततो गां कपिलां तत्र पूजयेद्विधिना व्रती । गुरुञ्चतोपयेद्वार वस्त्रालङ्कारमण्डनैः । १५७॥
सपत्नीकं समभ्यर्च्य ततो विप्रान् क्षमापयेत् । युष्मत्प्रसादाद्देवशः सुप्रसन्नोऽस्तु वै मम ॥१५८॥
नवरात्रको बहुत ही श्रेष्ठ माना है। १४०॥ नवरात्रमं तो रामनवम्या परमाह्लाददायिनी है इसके समान शुभव्रद तिथि चैत्रमास भरमे कोई भी नहीं है ॥ १४१॥ इसके अनन्तर चैत्रके उस उद्यापनका विधान बतलाते हैं, जिसके करनेसे चैत्रस्नान सफल हो जाता है ॥ १४२॥ चैत्रमासके शुक्लपक्षमें जो एकादशी पड़ती है, वह सब तिथियोंमें श्रेष्ठ होती है। इसलिए चैत्रव्रत करनेवालोंको यह एकादशीव्रत अवश्य करना चाहिए । १४३। इसी तरह चैत्र शुक्लपक्षकी द्वादशी भी श्रेष्ठ है। इस रोज दही-भातस यमका पूजन करके जलसे पूर्ण घड़ेका दान करना चाहिए ॥ १४४॥ चैत्रमास भरमें तीन तिथियाँ श्रेष्ठ हैं। जैसे-द्वादशी, त्रयोदशी और पूर्णिमा ॥ १४५॥ इनमें स्नान-दान करनेसे ये तिथियाँ सब कामनाओंको पूर्ण करती हैं। जिसने चैत्रस्नान नहीं किया और जो नवरात्रस्नान भी नहीं कर पाया, वह अन्तिम दिन अर्थात् पूर्णिमाको स्नान करके चैत्रस्नानका फल प्राप्त कर लेता है। क्योंकि चैत्र भरकी सब तिथियोंमें पूर्णिमा तिथि श्रेष्ठ है और सब पातकोंको नष्ट करती है । १४६ ॥ १४७॥ अतः चैत्रस्नानका फल पानेके लिए इस पूर्णिमामें ही उद्यापन करना चाहिए। इसका विधान यह है कि चतुर्दशीको उपवास करके पूर्ववत् मण्डप आदि बनावे और उसमें धान्यराशि तथा वारिपूर्ण कलश रखकर उसके ऊपर एक बड़ासा स्वर्णपात्र रक्खे ॥ १४८ । १४९ ॥ उसमे पंचरत्न डालकर वस्त्रस ढक दे। तदनन्तर सीता, लक्ष्मण आदि भ्राताओं, हनुमान्जी, सुग्रीव, विभीषण, अङ्गद तथा जाम्बवान् सहित रामकी सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित करके गुरुकी आज्ञासे वेष वशेण रामकी षोडश उपचारों एवं विविध भक्ष्य पदार्थोंस पूजन करे ॥ १५०-१५२॥ रात्रि भर जागरण करता हुआ गावे-बजावे और सवेरे हाथ सपत्नीक ब्राह्मणों अथवा जैसा सामर्थ्य हो उसके अनुसार ब्राह्मणोंको बुलाकर खीर-पूरी आदि भोजन करावे ॥ १५३ । १५४॥ इसके बाद 'अतो देवा' इस मन्त्रके द्वारा तिल और घीसे हवन करे। इस हवनसे देवदेव राम तथा अन्यान्य देषत ओंको प्रसन्न किया जाता है ।॥ १५५॥ यह सब करनेके बाद ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा देकर प्रणाम करे। फिर समस्त देवताओं तथा तुलसी देवीक फिरस पूजन करके विधिपूर्वक कपिला गौका पूजन करे और नाना प्रकारके वस्त्र-आभूषण देकर बनके उपदेश सपत्नीक गुरुकी पूजा कर ॥ १५६ ॥ १५७॥ यह सब करनेके बाद ब्राह्मणोंसे क्षमाप्रार्थना करता हुआ