भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 702

सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६८५

तत्क्षेत्र्यैः स्वान्ध्रधौ स्नानादयोध्यायाः सुरोत्तमाः पुत्र वै साधुवीरे रावणं लोकरावणम् ॥२१। हत्वा तत्पापशांत्यर्थं करिष्यामि क्रतुं शुभम् । यत्र यागमहासिद्धिर्भविष्यति सुरोत्तमाः २२। तत्तीर्थं मम नाम्ना हि ख्यातिं श्रेष्ठांगमिष्यति । अयोध्यायां सर्वतीर्थं मामुञ्जलप्रथग्यगे ॥२३॥ चैत्रस्नानं प्रकुर्वाणास्ते नरा मोक्षभागिनः । यथा माघे प्रयागे हि स्नातव्यः सुखमिच्छता॥२४॥ कार्तिकोऽपि यथा काश्यां पञ्चगंगाजलेऽसृत् । द्वारकायां यथा प्रोक्तो वैशाखो माधवप्रियः ॥२५' अयोध्यायां सर्वतीर्थं तथा चैत्रो भविष्यति । सर्वेषामेव मासानानादौ श्रेष्ठो भविष्यति ।२६॥ चैत्रमासे तु संप्राप्ते सर्वे देवाः सवासवाः, बर्हिर्जले समाश्रित्य तिष्ठध्वं हि ममाज्ञया । २७॥ एवं हरिरुतान् मध्वादोन्दान् सुरानुक्त्वा सूर्यश्चैव नमस्कृतो ययौ । वृषेंद्रमारुह्य शिवो निजं स्थलं ययौ सुरास्तेऽपि ययुर्निजं स्थलम् ॥२८॥ तस्मात्सर्वेषु मासेषु मुख्यश्चैत्रः प्रकीर्त्यते । मासादो प्रथमः सर्वैः प्रोच्यते हि वराद्धरेः ॥२९॥ एवं शिष्य यथा पृष्ट तथा ते विनिवेदितम् । कल्पं चैत्रमासस्य रामचंद्रवरादिकम् । ३०॥

शिष्यपुत्र उवाच स्वामिन् गुरो त्वया चैत्रस्नानं पुण्यतमं स्मृतम् । तत्केनाचरितं पूर्वं का सिद्धिरस्तत्प्रभावतः ॥३१॥ तत्सर्वं विस्तरेणैव ममात्र त्वं निवेदय ।

अगस्त्य उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स शृणु म्वं रत्नार्थवन्मते ॥३२॥ मम तातो नृसिंहारख्यः शुभद्रामीदु द्विजोत्तमः । प्रत्यहं नियमञ्चाण प्रत्रहं भृगुगेत्तमम् ३३॥ एकमप्यन्नक्षेत्रस्थं द्विजमभ्याथितं नृप भूरान्नापुत्रवनदशमंदानादिभियुक्तम् ॥३ ।

और सोमवाससे जिस फलकी प्राप्ति होती है, उस फलकी प्राप्ति उस चैत्रमासके स्नानमात्रसे ही जाया करेगी । कुरुक्षेत्रमें सूर्यग्रहणके समय स्नान दानका जो फल होता है ॥ २१-२४ ॥, वह सब अयोध्याधाम अथवा व्यासाश्रम स्नान करनेसे प्राप्त होगा । इस शरीरमें रावणादि महाबलवान् राक्षसोंको मारकर ब्रह्महत्याके पाप- की शांतिके लिए मैं शुभ यज्ञ करूंगा । हे सुरगण ! जिस स्थानपर वह यज्ञ सम्पन्न होगा, वह स्थान मम नामसे विख्यात होगा । अपितु अयोध्याके सब तीर्थोंका जो स्नान करेगा, वह मनुष्य मोक्षभागी होगा । जिस तरह सुखकी इच्छा रखनेवालोंको माघमें प्रयाग स्नान करना आवश्यक हुआ है ॥ २१-२४ ॥ जिस तरह कार्तिकमें काश्यांके पंचगंगामें स्नान करना उचित है और जिस तरह वैशाख द्वारकामें माधवका परम प्रिय माना गया है, उसी तरह अयोध्या में चैत्रमासका स्नान सर्वश्रेष्ठ होगा । यह मास सब मासोंके आदिम और सबसे श्रेष्ठ माना जायगा ॥ २५-२६ ॥ चैत्रमासके आनेपर इन्द्रसमेत समस्त देवता यहाँ आकर निवास करें । यह मेरा आज्ञा है, ॥ २७ ॥ विष्णुभगवान्‌ने इन्द्र आदि देवताओंसे ऐसा कहा और देवताओंने उनका प्रणाम किया । जिससे मनुष्यताका एक असाधारण कान्ति चमक उठा । तद- नन्तर शिवजी नन्दीपर सवार होकर अपने स्थानको चल पड़े । अन्य देवता भी अपने-अपने स्थानको चल पड़े ॥ २८ ॥ इसी कारण चैत्रमास सब मासोंमें श्रेष्ठ माना जाता है और भगवान्के वरसे सब मासोंके आदि- में गिना जाता है ॥ २९ ॥ इस प्रकार हे शिष्य ! जैसा तुमने पूछा, वह रामचंद्रजीके वरदान आदिका वृत्तान्त मैंने कह सुनाया ॥ ३० ॥ शिष्यपुत्रने कहा हे स्वामिन् ! हे गुरु ! आपने पवित्र चैत्रस्नानका विधान बतलाया । अब यह बताइए कि इस व्रतको किसने किया था और इससे उसे कौन-सी सिद्धि प्राप्त हुई या ॥ ३१ ॥ यह सब विस्तारपूर्वक आप हमें बतलाइए । श्रीअगस्त्यने कहा-तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है । अब मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे सुनो ॥३२॥ मेरे पिता नृसिंहका एक नियम था । वे कमलगुडसेवनोंमें एक ब्राह्मणको पुत्र-कलत्र एवं दास-दासी समेत बुलाकर सार कुटुम्बका भोजन कराते और अच्छी तरह आदर-सत्कार करते थे ।