भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 703
६४६आनन्दरामायणे[ सर्गः ११

कुटुम्बभोजं हर्म्ये स ऽस्थापयामास । लक्ष्म्याऽत्मानौ तु मन्याना तावुभौ रामतत्परौ ॥३५॥
पुत्राभावमदृष्ट्वा तौ वृद्धौ पुत्रार्थमुद्यतौ । रूपदोषपरिहारार्थमुपायं कर्तुमुद्यतौ ॥३६॥
निदासाख्ये पुरे गत्वा देवीं मातङ्गीं शुभाग् । स्वायेष्टदेवतामम्बां प्रवरातीरवासिनीम् ॥३७॥
दृष्ट्वा दम्पत्य तौ सेवां नित्यं तत्र प्रचक्रतुः । गते बहुतिथे काले वादा या महालया ॥३८॥
प्रत्यक्षात द्विजं भूत्वा प्राह तदावशांतये । हे नृसिंह महाबुद्ध गच्छाथोध्यापुरीं प्रति ॥३९॥
तत्र वै सायुताये रामतीर्थे महामये । चैत्र मासि वसंतर्तो यदा स्यान्मीनगो रविः ॥४०॥
चैत्रस्नानं मासमेकं कुरु तत्र द्विजोत्तम । पातकं सकलं त्यक्त्वा पुत्र प्राप्स्यस्यसंशयम् ॥४१॥
इति देव्या वचः श्रुत्वा द्विर्जावत्तारवस्तदा । ययौ मार्गे हृदि ध्यायन्नयोध्याख्यां पुरीं शुभाम् ॥४२॥
चिंतया परया व्याप्तः कथं गतुं हि शक्यते । मयाऽयोध्यापुरी दूरमिता कष्टं च जीवितम् ॥४३॥
इति चिंतायुतो मार्गे क्वचित्तिष्ठन्क्वचित्स्खलन् । भार्यायाश्च करे धृत्वा वृद्धश्चैव ययौ द्विजः ॥४४॥
एवं गोदावरीतीरं गत्वा स्नात्वा द्विजोत्तमः । राममूर्त्ति पुरः स्थाप्य पूजयामास भक्तितः ॥४५॥
तावन्तमे प्रसन्नोऽभूद्रामो देव्याः प्रमादतः । द्विजं प्राह नृश्रेष्ठो भो नृसिंह द्विजोत्तम ॥४६॥
माऽयोध्यां त्वमितो गच्छ शृणु मे वचनं शुभम् । इतः पूर्वं षड्वि हि याजनद्वयसम्मतम् ॥४७॥
प्रतिष्ठानाभिधं क्षेत्रं गोदाया उत्तरे तटे । तत्रास्ति रामतीर्थ हि मन्नाम्ना च मया कृतम् ॥४८॥
तत्रन्त्वं गच्छ विप्रेंद्र स्नात्वा तीर्थे हि भार्यया । चैत्रमासे वसंततौं यदा स्यान्मीनगो रविः ॥४९॥
तदा कुरु विधिश्रेण पूजांन्चिन्ता च मा शुभम् । रापत्तयः पुत्रलाभो भविष्यति न संशयः ॥५०॥
इत्युक्त्वा रघुवास्तु तत्रैवांतरधायत । यत्र शृंगाद्दद रामः प्रसन्नोऽभूद्द्विजाय हि ॥५१॥
तस्मात्स वै रामह्रदो नाम्ना सर्वत्र गीयते । तद्रामवचनपद्विप्रः प्रतिष्ठानपुरं ययौ ॥५२॥
मासमेकं च वै स्थित्वा चैत्रस्नानं चकार ह । सूर्योदये समुत्थाय कृतशौचादिक्रियः ॥५३॥


रुकमानाम्नी भर, माता और पिता ये दोनों असाधारण रामभक्त थे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ किन्तु वृद्धावस्था पर्यन्त पुत्रका अभाव देखकर उन्होंने अपना दोष शान्त करनेके लिए उपाय करना प्रारम्भ किया ॥ ३५ ॥ इसके लिए वे प्रवराके तीरपर रहनेवाली अपनी इष्टदेवी अम्बा मातङ्गीके पास गये ॥ ३६ ॥ उनका दर्शन करके उन्होंने बहुत दिनों तक देवीकी आराधना की कुछ दिनों बाद देवी प्रत्यक्ष होकर कहने लगी—हे महाबुद्धिमान् नृसिंह ! तुम यहाँसे अयोध्यापुरी जाओ । वहाँके महातीर्थ सरयूतीरके जलमें जब वसन्त ऋतुके समय सूर्य मीनराशिपर आयें, तब एक महीना चैत्रस्नान करो । ऐसा करनेसे तुम्हारे सब पातक नष्ट हो जायँगे और तुम्हे पुत्रकी प्राप्ति होगी ॥ ३७-४१ ॥ देवीकी यह बात सुनकर वे अयोध्यापुरीका ध्यान करते हुए चले । उन्हें यह बडा चिन्ता थी कि अयोध्यापुरी तो यहाँसे बहुत दूर है और मुझे अपना जीवन भी भारी हो रहा है ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ ऐसा सोचते हुए वे कभी बैठ जाते, कभी गिर पडते और कभी अपनी स्त्रीका हाथ पकडकर वे मेरे वृद्ध पिता चले थे ॥ ४४ ॥ इस तरह किसी प्रकार वे गोदावरी के तटतक पहुंचे। वहाँ उन्होंने स्नान किया और सामने रामकी मूर्ति रखकर भक्तिपूर्वक पूजन करने लगे ॥ ४५ ॥ तबतक देवीके आशीर्वाद्से रामचन्द्रजी प्रसन्न होकर सामने आये और कहने लगे—हे द्विजोत्तम नृसिंह ! अब तुम अयोध्या मत जाओ ! यहाँसे केवल तीन योजन दूर गोदावरीके उत्तर तटपर प्रतिष्ठान नामक क्षेत्र है। वहाँ मेरे नामसे प्रसिद्ध रामतीर्थ है। मैंने ही उसकी स्थापना की है ॥ ४६-४८ ॥ तुम वहाँ जाओ और चैत्रमासमें जब सूर्य मीन राशिपर आयें, तब भार्याके साथ स्नान करके मेरा विधिवत् पूजन करो । ऐसा करनेसे तुम्हारे सब पातक नष्ट हो जायेंगे और तुम्हे पुत्रकी प्राप्ति होगी। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ४९ ॥ ५० ॥ ऐसा कहकर रामचन्द्रजी वहीं ही अन्तर्धान हो गये। जिस शृङ्गानामक सरोवरके तटपर राम प्रसन्न हुए थे, वह स्थान रामह्रदके नामसे विख्यात हुआ। रामके कथनानुसार व वृद्धदम्पती अपनी भार्याके साथ उस प्रतिष्ठानतीर्थको गये