भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 704, कुल 811 में से

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पृष्ठ 704

सर्गः ११] मनोहरकाण्डम् ६८७


स्नात्वा तस्मिन् रम्यतीर्थे सरयूसङ्गमन्विते । रामचन्द्रं स्वर्णगिरौ पूजयामास भक्तितः ॥५४॥ प्रदक्षिणाः स्वर्णगिरेश्चकार नव प्रत्यहम् । नवपुष्पैश्च नैवेद्यैः पूजयामास राघवम् ॥५५॥ चैत्रशुक्लतृतीयाया यावद्वैशाखसंभवः । तृतीया शीतला गौरी स्नानं चक्रे च भार्यया ॥५६॥ एवं मासं व्रतं कृत्वा स द्विजस्तृप्तमानसः । प्रत्यर्कं प्रति मार्गेण ययौ लक्ष्म्या समन्वितः ॥५७॥ यावन्मार्गे द्विजोऽगच्छत्तावद्दृष्टास्त्रयो नराः । पिशाचाः क्षुत्प्रक्रान्तेस्नानुद्धार्य सभार्यया ॥५८॥ ययौ स्वनगरं रम्यं गोदानाभिर्विराजितम् । चैत्रस्नानप्रभावेण जातस्तन्मानुषस्त्वदम् ॥५९॥ तस्मान्मया ते कथित वर हि स्नानं मधौ ते सरयूज़ले वै । साकेतपुर्यां नराप्रतीर्थे भुक्तिप्रदं मोक्षदसुन्दम् च ॥६०॥

विष्णुदास उवाच कथ पिशाचयोन्यास्ते मुक्ता विप्रेण वै त्रयः । कस्मात्पापाच्च ते सर्वे पैशाचीं योनिमाश्रिताः ॥६१॥ तन्मर्वं विस्तरेणैव श्रोतुमिच्छामि त्वन्मुखात् ।

श्रीरामदास उवाच शृणु शिष्य प्रवक्ष्यामि रम्भानाम्नी वराऽप्सराः ॥६२॥ चैत्रे स्नात्वा चरायोद्ध्याम्रयूनिर्मले जले । आर्द्रवस्त्रवृता चारुहास्यालंकारमण्डिता ॥६३॥ गृहीत्वा सरयूतोयं रत्नकांचननिर्मिते । पात्रे रामेश्वरं सेतुं द्रष्टुं मौनेन सा जगात् ॥६४॥ ययावाकाशमार्गेण पिशाचा यत्र ते त्रयः । तदार्द्रवस्त्रचांचल्यत्किंबिन्दुभिः प्रोक्षिताश्च ते ॥६५॥ क्रूरस्वभावमुत्सृज्य चाश्चर्यं परमं ययुः । पूर्वजन्मानुस्मरणमभूत्तेषां तदा नृप ॥६६॥ विस्मयाविष्टचित्तास्ते तां दृष्ट्वाप्सरसं दिवि । बहुधा प्रार्थनामासुस्त्वन्मा पप्रच्छ संस्रया ॥६७॥


॥ ५१ ॥ ५२ ॥ वहाँ रहकर उन्होंने एक मास पर्यन्त चैत्रस्नान किया। उनका यह नियम था कि प्रतिदिन सूर्योदयमें पहले होकर उठ जात और नित्यकृत्यसे निबटकर सरयूसङ्गमपर विद्यमान तीर्थमें स्नान करते और भक्तिपूर्वक स्वर्णगिरिपर रामचन्द्रजीको पूजा किया करते थे ॥ ५३, ५४ ॥ प्रतिदिन वे उस स्वर्णगिरिकी नौ परिक्रमा करते और नौ पुष्पों और विविध प्रकारके नैवेद्योस रामका पूजन करते थे। वह व्रत उनका तबतक चलता रहा, जबतक वैशाखके शुक्लपक्षका तृतीया नहीं आयी। तृतीयाके आनेपर उन्होंने तृतालागौरी नामक स्नान किया ॥ ५५ ॥ ५६ । इस तरह एक मास तक व्रत करके प्रसन्न चित्तसे वे ब्राह्मणदेवता अपनी पत्नीके साथ कमलपुरको चले ॥ ५७ ॥ जाते-जाते रास्तेम उनको तीन पिशाच मिले। वे तीनो बडे भूखे थे मेरे पिता-माताने उनका उद्धार किया और अपने नगरको गये। उसी चैत्रस्नानके प्रभावसे वे उनका पुत्र होकर जन्मा ॥ ५८ ॥ ५९ ॥ इसलिए मैने चैत्रमासमे अयोध्याके पवित्रतीर्थम मुक्ति-मुक्तिप्रद सरयूजलमे स्नानका विधान बतलाया है ॥ ६० ॥ विष्णुदासने कहा-वे तीनों पिशाच किस तरह उस पिशाचयोनिसे छूटे और किस पापसे वे पिशाचयोनिमें पड़े थे। यह वृत्तान्त भो विस्तारपूर्वक मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ। श्रीरामदास कहने लगे-हे शिष्य ! सुनो, यह कथानक भी मै कहता हूँ। रम्भा नामकी एक सुन्दरी अप्सरा थी ॥ ६१ ॥ ६२ ॥ उसने चैत्रमासमें अयोध्याके सरयूजलमें स्नान किया। उसक कपड़े भींग गये थे मन्द मुस्कान उसके होठोपर खेल रही थी और उसके अंगमें पड़े हुए विविध प्रकारके आभूषण अपनी असाधारण शोभा दिखा रहे थे ॥ ६३ ॥ स्नानके अनन्तर उसने रत्न और कांचनसे बने हुए पात्रमें रामेश्वर शिवको स्नान करानेके लिये सरयूजल भरा और मौन होकर आकाशमार्गसे रामेश्वरको चल पड़ी। जाते-जाते वह उस स्थानपर पहुंची, जहाँ वे तीनों पिशाच रहते थे। रम्भाक भीगे वस्त्रसे पानीकी कई बूंदें गिरकर इन पिशाचोँपर पड़ीं ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ इससे उनका क्रूर स्वभाव छूट गया और उन्हे पूर्वजन्मकी सब बात याद आ गयीं ॥ ६६ ॥ तदनन्तर वे तीनों विस्मित होकर बहुत तरहस प्रार्थना करने लगे। रम्भाने संत्रसमें उनसे पूछा- ॥ ६७ ॥

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