श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८८ आनन्दरामायणे [सर्ग ११
कस्माद्ययं पिशाचा हि जातास्तत्कथ्यतां मम। इति तत्करुणसंतापेरितास्ते ऽब्रवन्स्तदा। ६८॥
तेषु द्वौ वदन्मातौ हि कथयामासतुश्च ताम् । शृणु भामिनि वार्ता हि पूर्वजन्मनि भूसुरात् । ६९।
विरजायां समुत्पन्नौ श्रोत्रियाद्धरशर्मणः । उपाध्यायन कर्तुं कञ्चिन्नारायणाह्वयम् । ७०॥
शुश्रूषया तोषयित्वा गुरुं तत्रैव मध्यतुः । नारायणसुतां चारुहासां चन्द्रनिभाननाम् ॥७१॥
दृष्ट्वा ऽऽभ्यां मैथुनं दृष्ट्वा प्रार्थ्य तां स्त्रियम । आवाभ्यां च दिना मुक्ता तज्ज नं गुरुणा चिरात् ७२।
आवाभ्यां च ददौ शापं तस्यै चाप्यशरुत्क्रुधा । युवां चापि कुमार्य्य विशाचत्वं गमिष्यथ । ७३॥
ततोऽस्माभिस्तिभिस्तं तु मुनिं नत्वा पुन पुनः । शापस्यान्तस्तो लब्धस्तच्छृणु मनागये । ७४॥
चैत्रमासे नृसिंहारख्यः कश्चिद्विप्रश्च कानने ददाति स्नानजं पुण्यं तदोद्धारो भविष्यति ॥७५॥
एवं जाता पिशाचा हि वयं व्यङ्गाङ्गिबुद्धिभिः। प्रोक्षिताः स्मोऽद्य तेऽङ्गैर पूर्वजन्मस्मृतिः शुभा ७६॥
तत्तंषां वचनं श्रुत्वा ज्ञात्वा शापस्य मोक्षणम् । मान्वोथन्त्य कारणेन शीघ्रं म नृहरिः प्रिया ॥७७॥
आगमिष्यति मा चिंतां कुरुतेति वरांगना । ययौ रामेश्वरं शीघ्र पूजयित्वा गता दिवम् । ७८॥
चैत्रमासे संतिक्रांते संगतः नृहरिद्विजः । भार्यया सहितो दृष्ट्वा पिशाचैस्तैः पिता मम ॥७९॥
स्थित्वा दूर च ते सर्वे तमूचुर्नृहरिं द्विजम् । नैजं वृत्तं समस्तं हि शापस्यापि विम क्षणम् , ८०।
तच्छ्रुत्वा नृहरिर्विप्रस्तानूवाच मुदान्वितः । मा मेष्टव्यं पिशाचा अद्यथा शम्भुद्विजेन सः । ८१॥
राक्षसो मोचितः पूर्वं मोचयिष्याम्यहं तथा ।
पिशाच उवाच
कः शम्भुश्च कदा मुक्तो राक्षसः कः सविस्तरम् ॥८२॥
तुमलोग इस पिशाचयोनिको क्यों प्राप्त हुए हो सो कहो। इस प्रकार रम्भाके सुधोक्त संकेत पाकर उन तीनोंमेंसे दो बोले-हे भामिनी ! सुनो पूर्वजन्मम हम दोनों विरजा नाम्नी स्त्री द्वारा हर शर्मा नामक ब्राह्मणसे उत्पन्न हुए थे। अवस्थानुसार हम दोनों विद्या पढ़नेके लिए नारायण नामक एक गुरुके यहाँ गये वहाँ उनकी सेवा करते हुए रहने लगे । गुरुजीकी एक सुन्दरी कन्या थी । उसको मनोहारिणी मुसकान थी और चन्द्रमा के समान मुख था ।। ६८-७१ । उस देखकर हम दोनोंने उससे मित्रता कर ली और समय पाकर बहुत अनुनय विनय करके हम दोनोंने उसके साथ भोग किया। बहुत दिनों बाद यह बात गुरुजीको ज्ञात हो गयी ॥ ७२ । उन्होंने कुपित होकर हम तथा उस कन्याको शाप देते हुए कहा कि इस कुमारीके साथ तुम दोनों पिशाच हो जाओ । ७३ ।। इसके बाद हम तीनोंने उन मुनीश्वरको बार-बार प्रणाम करके किसी तरह शापके अन्तका वचन पाया सो भो सुन लो ॥ ७४ । उन्होंने कहा कि चैत्रमासमें कोई नृसिंह नामका ब्राह्मण इस वनमें आयेगा और वह अपने नैत्यस्नानका पुण्य तुम्हे प्रदान करेगा तब तुम्हारा उद्धार होगा । ७५ ।। इस तरह हमलोगोंको यह पिशाचयोनि मिली । अहोहम आपके अमृतरससे प्रोक्षित हो गये। इस कारण हमें पूर्वजन्मकी सब बातें याद आ गयीं ॥ ७६ । इस प्रकार उनकी बात सुनकर रम्भाने संशयहीन हो कहा कि तुम लोग धैर्य रखो । अब शीघ्र ही नृसिंह ब्राह्मण अपनी स्त्रीके साथ इस वनमें आनेवाले हैं ॥ ७७ ॥ तुमलोग किसी प्रकारकी चिन्ता मत करो। इतना कहकर रम्भा रामेश्वर चली गयी। वहाँ उसने शिवजीका पूजन किया और आकाशमार्गमें होकर अपने स्थानको चली गयी ॥ ७८ ॥ चैत्रमास वनन्तर नृसिंह अपनी भार्याके साथ उस वनमें पहुंचे और उन पिशाचोंको देखा । ७९ ।। वे तीनों पिशाच नृसिंहके पास न आकर थोड़े दूरपर खड़े हो गये और अपन पूर्वजन्मका वृत्तान्त एवं शापसे मुक्ति पानेका उपाय कह सुनाया ॥ ८० ॥ उनकी बात सुनकर मेरे पिताजीने कहा-तुम लोग घबड़ाओ नहीं । जिस प्रकार शम्भुनामक ब्राह्मणने उस राक्षसको पिशाचयोनि से मुक्त किया था उसी तरह मैं भी तुम लोगोंको इस योनिसे मुक्त कर दूंगा उनकी बात काटकर पिशाचों-मसे एकने कहा कि शम्भु विप्र कौन थे और वह राक्षस कौन था ? यह वृत्तान्त विस्तारपूर्वक आप हमें