भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 706

सर्गः १२ ] मनोहरकाण्डम् ६८९

कथयस्व द्विजश्रेष्ठ कृपां कृत्वा तु कौतुकात् । नृसिंह उवाच शृणुध्वं कथयिष्यामि यद्वृत्तं च पुरातनम् ॥८३॥ शिवकांचीपुरीमध्ये कश्चिद्विप्रः शुचिव्रतः संबभूव चिरं कालं तस्थौ स च स्वभार्यया ॥८४॥ स कस्मिंश्चिद्दिने विप्रश्चैकाम्रेशशिवांतिके । पौराणिकाद्वचश्चैत्रमासमाहात्म्यमव्रतान्विताम् ॥८५॥ कथां श्रोतुं समायातस्तत्र श्रुत्वा महत्फलम् । अयोध्यायां हि चैत्रस्य स्नानात्कैवल्यदायकम् ॥८६॥ ततो बहुगते काले संस्मरंस्तां कथां शुभाम् । ज्ञात्वा समागतं चैत्रं स्वगृहान्निर्गतस्तदा ॥८७॥ भार्यया सहितो विप्र शनैर्मार्गेण वै ययौ । तीर्त्वा तां जाह्नवीं रम्यां यावदग्रे स गच्छति ॥८८॥ तावद्दूरो हि भिल्लेन कर्कशाख्येन कानने । गृहीत्वा सञ्चरं चापं धर्षयित्वा च भूसुरम् ॥८९॥ लुण्ठतः कर्कशः क्रूरो वस्त्रेणैकेन तं द्विजम् । मुमोच तस्य पाथेयं गृहीत्वा सकलं शुभम् ॥९०॥ द्विजोऽपि प्रार्थयामास कर्कशं च पुनः पुनः । वस्त्रादिकं गृहाण त्वं प्रत्यर्पय ददस्व माम् ॥९१॥ तत्तस्य वचनं श्रुत्वा मुक्त्वा तद्वस्त्रबंधनम् सर्वं ददर्श पाथेयं नानाविधमनुत्तमम् ॥९२॥ तस्मिन्ददर्श स व्याधो दश रंभाफलानि वै अपक्वान्यतिशुष्काणि ततश्चित्तेऽविचारयत् ॥९३॥ एतै फलैर्न मे कार्यं जानामि ब्राह्मणोत्तमम् । नाहं दास्याम्यद दानं क्षुधाक्रांतं च सन्द्विजम् ॥९४॥ इति निश्चित्य स व्याधो ददौ तानि द्विजन्मने । गृहीत्वाऽभक्षयद्विप्रः प्रारम्भे भार्यया मधौ ॥९५॥ तद्रंभाफलदानेन कर्कशस्य हृदा शुभा जाता बुद्धिः क्षणादेव सात्विकी क्रूरता गता ॥९६॥ एवं पिशाचाः सकलास्ततः परं भिल्लाय तस्मै तु शुभा मतिर्बभूव । समागतं चाथ कुतः स पृष्टवान् विप्रं स वै प्राह वने च कर्कशम् ॥९७॥ शम्भुरुवाच कांचिपुर्याः समायातो गम्यतेऽयोध्यां पुरीम् । चैत्रमासेऽवगाहार्थं शरयूनिर्मले जले ॥९८॥

बतलाइए । हे द्विजश्रेष्ठ हमपर इतना कृपा करिए । नृसिंह कहने लगे-अच्छा सुनो। मैं एक पुरातन कथा तुम लोगोंको सुनाऊँगा ॥ ८१-८३ ॥ शिवकांचीपुरीम पवित्रव्रतधारी एक ब्राह्मण रहता था । उसका नाम शम्भु था वह बहुत दिनों तक अपनी स्त्रीके साथ उस नगर में रहा । ८४ ॥ एक दिन वह ब्राह्मण किसी वनाम्र एकांश्र्वर नामक शिवके समीप पौराणिकके मुखसे चैत्रमास माहात्म्यकी कथा सुनने गया । वहाँ पहुंचकर उसने चैत्रमासमें अयोध्यास्नानका बड़ा फल सुना ॥ ८५ ॥ बहुत दिना बाद उस कथाका स्मरण करके वह चैत्रमास लगनेके पहले ही अयोध्या जानेके लिए अपने घरसे निकल पड़ा । उसने अपन साथ अपनी स्त्रीको भी ले लिया था। वह धीरे धीरे अयोध्याकी ओर चला । राहमे गङ्गाजी पड़ीं तो उन्ह पार किया । वहाँसे थोड़ी दूर आगे बढ़ा ही था कि वनमे कर्कश नामका एक भील धनुष-बाण लिये हुए मिला । उसने ब्राह्मण-देवताका धमकाकर सब कुछ छीन लिया और केवल एक कपड़ा पहनाकर छोड़ दिया । यहाँ तक कि उसने इन लोगोंका पवित्र पाथेय भी ले लिया ॥ ८६-६० ॥ तब ब्राह्मणने उससे प्रार्थना की कि मेरे कपड़े-लत्ते सब कुछ ले लो । लेकिन रास्तेमे खानेकी वस्तुओंवाली यह पोटला वापस दे दो ॥ ९१ ॥ ब्राह्मणकी बात सुनकर कर्कशने वह पोटली खोली और देखा कि उसमें बहुत-सी खाने-पीनेकी चीजें बँधी है ॥ ९२ ॥ उस व्याधने उसमें दस केलेके फल भी देखे वे फल कच्चे और सूखे हुए थे । उन फलोंको देखकर उसने मनमें सोचा कि इन फलोंकी तो हमे कोई आवश्यकता है नहीं, फिर हम क्यों न दे दें ॥ ९३ ॥ ९४ ॥ ऐसा निश्चय करके उसने केले वापस दे दिये और उस सपत्नीक ब्राह्मणने चैत्रमासके प्रारम्भमें वे कलक फल खाये ॥ ९५ ॥ उस रम्भाफलके दानसे कर्कश व्याधके हृदयमें शुभ बुद्धिका प्रादुर्भाव हो गया। जिससे उसकी क्रूरता नष्ट हो गयी और सात्त्विकता आ गयी ॥ ९६ ॥ हे पिशाचो ! जब उस भीलकी मति पवित्र हो गयी तो उसने