भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 707

६९० आनन्दरामायणे [ सर्गः ११

इति विप्रवचः श्रुत्वा पुनः पप्रच्छ कर्कशः । किं लभ्यते हि स्नानेन तन्मे वद सविस्तरम् ॥९९॥ पुनः प्राह स विप्रेंद्रः कर्कशं भक्तितः फलम् । स्नानेन मधुमासे हि रघुनाथः प्रसीदति ॥१००॥ प्रसादात्सकलान्भोगान् लभते मानवा भुवि । अंते मोक्षोऽपि भो भिल्ल लभ्यते नात्र संशयः ॥१०१ । इति विप्रवचः श्रुत्वा पुनः पप्रच्छ कर्कशः । मोक्षस्वरूपं कथय कृपां कृत्वा ममोपरि ॥१०२॥ तत्तस्य वचनं श्रुत्वा पत्नीं प्राह द्विजोत्तमः । पश्य पश्य वरारोहे कौतुकं महदद्भुतम् ॥१०३। यद्रांभाफलदानेन चैत्रे मासि वनानने । अय क भिल्लजातीयः क प्रश्नस्तादृशः शुभः ॥१०४। मोक्षस्वरूपज्ञानार्थं तस्माद्दानं प्रशस्यते । इत्युक्त्वा तां प्रियां विप्रः कर्कशं प्राह सादरम् ॥१०५। साधु साधु महाव्याध सम्यक्प्रश्नः कृतस्त्वया । इदानीं प्रोच्यते मोक्षस्वरूपं तन्निशामय ॥१०६। स मोक्षस्त्वं हि जानीहि यतो नास्ति पुनर्भवेः । इति विप्रवचः श्रुत्वा पुनः पप्रच्छ कर्कशः ॥१०७॥

तस्य प्राप्तिर्यथा स्यान्मे तन्मे वद द्विजोत्तम । शृणु कर्कश तन्प्राप्तिर्यथा स्यात्तद्वदामि ते । १०८॥

दारपुत्रगृहादीनां प्रीतिं मुक्त्वा जनार्दनम् दिवारात्रं चिंतयित्वा सर्वदेहस्य चालकम् ॥१०९॥ आत्मानं बहुपुण्यौघैर्निर्मलीकृत्य मानसम् तन्स्वरूपे यदा निक्षिप्यन् मुक्तो नेत्तरो जनः ॥११०॥ एवं वदति विप्रेन्द्रे व्याधो मुक्त्वा शरं धनुः । शंभुशर्मा जगन्मात्वा त्राहि त्राहीति वै वदन् ॥१११। प्रोवाच द्विजवर्यं स व्याधो भ्रामुद्गतेति च । एतस्मिन्नन्तरे तत्र राक्षसो घोरदर्शनः ॥११२। दुद्राव दीर्घशब्देन यत्रासंस्ते त्रयो वने । आयांतं राक्षसं दृष्ट्वा चक्रुस्ते तु पलायनम् ॥११३॥ तावज्जवेन तान् धर्तुं निकटं राक्षसो ययौ । तं दृष्ट्वा निकटं शुंभुर्मुञ्चिकां मजलां निजाम् ॥११४।

उन ब्राह्मण देवतासे पूछा कि आप किस कार्यस इधर आ पहुँचे ? । ६७॥ शम्भुने उत्तर दिया कि मैं कांची- पुरोसं आया हूँ और अयोध्या जा रहा हूँ । वहाँ चैत्रमासमें स्नान करूंगा ॥ ९८ । इस तरह ब्राह्मणकी बात सुनकर कर्कशने कहा कि चैत्रस्नानसे क्या लाभ होता है ? यह बात विस्तारपूर्वक हम बतलाइए । ९९॥ ब्राह्मण भक्तिपूर्वक कर्कशको चैत्रमासके स्नानका फल बतलाने लगा । उसने कहा कि चैत्रस्नानसे भगवान् रामचन्द्र प्रसन्न होते हैं ॥ १०० । संसारके प्राणी उन्हींकी कृपासे सब प्रकारके सुखोंको भोगते हैं और अन्तमें उन्हें मोक्ष भी मिलता है * इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ १०१ ॥ इस तरह विप्रका बात सुनकर कर्कशने कहा कि कृपा करके आप हमें मोक्षका स्वरूप बतलाइए ॥ १०२ ॥ इस प्रकार कर्कशका प्रश्न सुनकर ब्राह्मणने अपनी पलीसे कहा-प्रिये ! देखो तो कितने आश्चर्यकी बात है! चैत्रमासमें केलेके फलोंके दानसे यह मोक्ष कैसे कैसे प्रश्न कर रहा है। इतनी बात अपनी स्त्रीस कहकर ब्राह्मण प्रेमपूर्वक कर्कशसे कहने लगा- ॥ १०३-१०५ ॥ हे महाव्याध ! तुम्हारा प्रश्न बहुत ठीक है। अब मैं तुमको मोक्षका स्वरूप बतला रहा हूँ। तुम सावधान मनसे सुनो । १०६ । मोक्ष उस कहते है, जिस पाकर प्राणीको फिर जन्म न लेना पड़े । इस तरह ब्राह्मणकी बात सुनकर कर्कशने फिर कहा-उसकी प्राप्ति मुझे जिस तरह हो सके, वह उपाय बतलाए। शम्भु ब्राह्मणने कहा-हे कर्कश ! जिस तरह तुम्हे मोक्षकी प्राप्ति हो सकती है। वह उपाय मैं बतलाता हूँ सुनो ॥ १०७ ॥ १०८ ॥ जो मनुष्य स्त्री, पुत्र, गृह आदिका प्रीतिका परित्याग करके रात-दिन सब प्राणियोंके संचालक भगवान् जनार्दनका ध्यान करता है और बहुतसे पुण्योसे अपने चित्तको निर्मल करके उन्हीं के स्वरूपमें लौ लगाये रहता है वही प्राणी मुक्त होता है और कोई नहीं १०९ ॥ ११० ॥ ऐसा कहने- पर कर्कशने अपना धनुष-बाण फेंक दिया और उनके साथ शम्भुके पैरोंपर गिर पड़ा और कहने लगा-हे ब्राह्मणदेवता ! हमारी रक्षा करो। उसी समय एक राक्षस दौड़ता हुआ उस स्थानपर आ पहुँचा, जहाँ ये तीनों बैठे वार्तालाप कर रहे थे । राक्षसको आते देखकर ये तीनों भागे राक्षस भी उन्हें पकड़नेके लिए