श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ११] मनोहरकाण्डम् ६८७
स्नात्वा तस्मिन् रम्यतीर्थे सरयूसङ्गमन्विते । रामचन्द्रं स्वर्णगिरौ पूजयामास भक्तितः ॥५४॥ प्रदक्षिणाः स्वर्णगिरेश्चकार नव प्रत्यहम् । नवपुष्पैश्च नैवेद्यैः पूजयामास राघवम् ॥५५॥ चैत्रशुक्लतृतीयाया यावद्वैशाखसंभवः । तृतीया शीतला गौरी स्नानं चक्रे च भार्यया ॥५६॥ एवं मासं व्रतं कृत्वा स द्विजस्तृप्तमानसः । प्रत्यर्कं प्रति मार्गेण ययौ लक्ष्म्या समन्वितः ॥५७॥ यावन्मार्गे द्विजोऽगच्छत्तावद्दृष्टास्त्रयो नराः । पिशाचाः क्षुत्प्रक्रान्तेस्नानुद्धार्य सभार्यया ॥५८॥ ययौ स्वनगरं रम्यं गोदानाभिर्विराजितम् । चैत्रस्नानप्रभावेण जातस्तन्मानुषस्त्वदम् ॥५९॥ तस्मान्मया ते कथित वर हि स्नानं मधौ ते सरयूज़ले वै । साकेतपुर्यां नराप्रतीर्थे भुक्तिप्रदं मोक्षदसुन्दम् च ॥६०॥
विष्णुदास उवाच कथ पिशाचयोन्यास्ते मुक्ता विप्रेण वै त्रयः । कस्मात्पापाच्च ते सर्वे पैशाचीं योनिमाश्रिताः ॥६१॥ तन्मर्वं विस्तरेणैव श्रोतुमिच्छामि त्वन्मुखात् ।
श्रीरामदास उवाच शृणु शिष्य प्रवक्ष्यामि रम्भानाम्नी वराऽप्सराः ॥६२॥ चैत्रे स्नात्वा चरायोद्ध्याम्रयूनिर्मले जले । आर्द्रवस्त्रवृता चारुहास्यालंकारमण्डिता ॥६३॥ गृहीत्वा सरयूतोयं रत्नकांचननिर्मिते । पात्रे रामेश्वरं सेतुं द्रष्टुं मौनेन सा जगात् ॥६४॥ ययावाकाशमार्गेण पिशाचा यत्र ते त्रयः । तदार्द्रवस्त्रचांचल्यत्किंबिन्दुभिः प्रोक्षिताश्च ते ॥६५॥ क्रूरस्वभावमुत्सृज्य चाश्चर्यं परमं ययुः । पूर्वजन्मानुस्मरणमभूत्तेषां तदा नृप ॥६६॥ विस्मयाविष्टचित्तास्ते तां दृष्ट्वाप्सरसं दिवि । बहुधा प्रार्थनामासुस्त्वन्मा पप्रच्छ संस्रया ॥६७॥
॥ ५१ ॥ ५२ ॥ वहाँ रहकर उन्होंने एक मास पर्यन्त चैत्रस्नान किया। उनका यह नियम था कि प्रतिदिन सूर्योदयमें पहले होकर उठ जात और नित्यकृत्यसे निबटकर सरयूसङ्गमपर विद्यमान तीर्थमें स्नान करते और भक्तिपूर्वक स्वर्णगिरिपर रामचन्द्रजीको पूजा किया करते थे ॥ ५३, ५४ ॥ प्रतिदिन वे उस स्वर्णगिरिकी नौ परिक्रमा करते और नौ पुष्पों और विविध प्रकारके नैवेद्योस रामका पूजन करते थे। वह व्रत उनका तबतक चलता रहा, जबतक वैशाखके शुक्लपक्षका तृतीया नहीं आयी। तृतीयाके आनेपर उन्होंने तृतालागौरी नामक स्नान किया ॥ ५५ ॥ ५६ । इस तरह एक मास तक व्रत करके प्रसन्न चित्तसे वे ब्राह्मणदेवता अपनी पत्नीके साथ कमलपुरको चले ॥ ५७ ॥ जाते-जाते रास्तेम उनको तीन पिशाच मिले। वे तीनो बडे भूखे थे मेरे पिता-माताने उनका उद्धार किया और अपने नगरको गये। उसी चैत्रस्नानके प्रभावसे वे उनका पुत्र होकर जन्मा ॥ ५८ ॥ ५९ ॥ इसलिए मैने चैत्रमासमे अयोध्याके पवित्रतीर्थम मुक्ति-मुक्तिप्रद सरयूजलमे स्नानका विधान बतलाया है ॥ ६० ॥ विष्णुदासने कहा-वे तीनों पिशाच किस तरह उस पिशाचयोनिसे छूटे और किस पापसे वे पिशाचयोनिमें पड़े थे। यह वृत्तान्त भो विस्तारपूर्वक मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ। श्रीरामदास कहने लगे-हे शिष्य ! सुनो, यह कथानक भी मै कहता हूँ। रम्भा नामकी एक सुन्दरी अप्सरा थी ॥ ६१ ॥ ६२ ॥ उसने चैत्रमासमें अयोध्याके सरयूजलमें स्नान किया। उसक कपड़े भींग गये थे मन्द मुस्कान उसके होठोपर खेल रही थी और उसके अंगमें पड़े हुए विविध प्रकारके आभूषण अपनी असाधारण शोभा दिखा रहे थे ॥ ६३ ॥ स्नानके अनन्तर उसने रत्न और कांचनसे बने हुए पात्रमें रामेश्वर शिवको स्नान करानेके लिये सरयूजल भरा और मौन होकर आकाशमार्गसे रामेश्वरको चल पड़ी। जाते-जाते वह उस स्थानपर पहुंची, जहाँ वे तीनों पिशाच रहते थे। रम्भाक भीगे वस्त्रसे पानीकी कई बूंदें गिरकर इन पिशाचोँपर पड़ीं ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ इससे उनका क्रूर स्वभाव छूट गया और उन्हे पूर्वजन्मकी सब बात याद आ गयीं ॥ ६६ ॥ तदनन्तर वे तीनों विस्मित होकर बहुत तरहस प्रार्थना करने लगे। रम्भाने संत्रसमें उनसे पूछा- ॥ ६७ ॥
६८८ आनन्दरामायणे [सर्ग ११
कस्माद्ययं पिशाचा हि जातास्तत्कथ्यतां मम। इति तत्करुणसंतापेरितास्ते ऽब्रवन्स्तदा। ६८॥
तेषु द्वौ वदन्मातौ हि कथयामासतुश्च ताम् । शृणु भामिनि वार्ता हि पूर्वजन्मनि भूसुरात् । ६९।
विरजायां समुत्पन्नौ श्रोत्रियाद्धरशर्मणः । उपाध्यायन कर्तुं कञ्चिन्नारायणाह्वयम् । ७०॥
शुश्रूषया तोषयित्वा गुरुं तत्रैव मध्यतुः । नारायणसुतां चारुहासां चन्द्रनिभाननाम् ॥७१॥
दृष्ट्वा ऽऽभ्यां मैथुनं दृष्ट्वा प्रार्थ्य तां स्त्रियम । आवाभ्यां च दिना मुक्ता तज्ज नं गुरुणा चिरात् ७२।
आवाभ्यां च ददौ शापं तस्यै चाप्यशरुत्क्रुधा । युवां चापि कुमार्य्य विशाचत्वं गमिष्यथ । ७३॥
ततोऽस्माभिस्तिभिस्तं तु मुनिं नत्वा पुन पुनः । शापस्यान्तस्तो लब्धस्तच्छृणु मनागये । ७४॥
चैत्रमासे नृसिंहारख्यः कश्चिद्विप्रश्च कानने ददाति स्नानजं पुण्यं तदोद्धारो भविष्यति ॥७५॥
एवं जाता पिशाचा हि वयं व्यङ्गाङ्गिबुद्धिभिः। प्रोक्षिताः स्मोऽद्य तेऽङ्गैर पूर्वजन्मस्मृतिः शुभा ७६॥
तत्तंषां वचनं श्रुत्वा ज्ञात्वा शापस्य मोक्षणम् । मान्वोथन्त्य कारणेन शीघ्रं म नृहरिः प्रिया ॥७७॥
आगमिष्यति मा चिंतां कुरुतेति वरांगना । ययौ रामेश्वरं शीघ्र पूजयित्वा गता दिवम् । ७८॥
चैत्रमासे संतिक्रांते संगतः नृहरिद्विजः । भार्यया सहितो दृष्ट्वा पिशाचैस्तैः पिता मम ॥७९॥
स्थित्वा दूर च ते सर्वे तमूचुर्नृहरिं द्विजम् । नैजं वृत्तं समस्तं हि शापस्यापि विम क्षणम् , ८०।
तच्छ्रुत्वा नृहरिर्विप्रस्तानूवाच मुदान्वितः । मा मेष्टव्यं पिशाचा अद्यथा शम्भुद्विजेन सः । ८१॥
राक्षसो मोचितः पूर्वं मोचयिष्याम्यहं तथा ।
पिशाच उवाच
कः शम्भुश्च कदा मुक्तो राक्षसः कः सविस्तरम् ॥८२॥
तुमलोग इस पिशाचयोनिको क्यों प्राप्त हुए हो सो कहो। इस प्रकार रम्भाके सुधोक्त संकेत पाकर उन तीनोंमेंसे दो बोले-हे भामिनी ! सुनो पूर्वजन्मम हम दोनों विरजा नाम्नी स्त्री द्वारा हर शर्मा नामक ब्राह्मणसे उत्पन्न हुए थे। अवस्थानुसार हम दोनों विद्या पढ़नेके लिए नारायण नामक एक गुरुके यहाँ गये वहाँ उनकी सेवा करते हुए रहने लगे । गुरुजीकी एक सुन्दरी कन्या थी । उसको मनोहारिणी मुसकान थी और चन्द्रमा के समान मुख था ।। ६८-७१ । उस देखकर हम दोनोंने उससे मित्रता कर ली और समय पाकर बहुत अनुनय विनय करके हम दोनोंने उसके साथ भोग किया। बहुत दिनों बाद यह बात गुरुजीको ज्ञात हो गयी ॥ ७२ । उन्होंने कुपित होकर हम तथा उस कन्याको शाप देते हुए कहा कि इस कुमारीके साथ तुम दोनों पिशाच हो जाओ । ७३ ।। इसके बाद हम तीनोंने उन मुनीश्वरको बार-बार प्रणाम करके किसी तरह शापके अन्तका वचन पाया सो भो सुन लो ॥ ७४ । उन्होंने कहा कि चैत्रमासमें कोई नृसिंह नामका ब्राह्मण इस वनमें आयेगा और वह अपने नैत्यस्नानका पुण्य तुम्हे प्रदान करेगा तब तुम्हारा उद्धार होगा । ७५ ।। इस तरह हमलोगोंको यह पिशाचयोनि मिली । अहोहम आपके अमृतरससे प्रोक्षित हो गये। इस कारण हमें पूर्वजन्मकी सब बातें याद आ गयीं ॥ ७६ । इस प्रकार उनकी बात सुनकर रम्भाने संशयहीन हो कहा कि तुम लोग धैर्य रखो । अब शीघ्र ही नृसिंह ब्राह्मण अपनी स्त्रीके साथ इस वनमें आनेवाले हैं ॥ ७७ ॥ तुमलोग किसी प्रकारकी चिन्ता मत करो। इतना कहकर रम्भा रामेश्वर चली गयी। वहाँ उसने शिवजीका पूजन किया और आकाशमार्गमें होकर अपने स्थानको चली गयी ॥ ७८ ॥ चैत्रमास वनन्तर नृसिंह अपनी भार्याके साथ उस वनमें पहुंचे और उन पिशाचोंको देखा । ७९ ।। वे तीनों पिशाच नृसिंहके पास न आकर थोड़े दूरपर खड़े हो गये और अपन पूर्वजन्मका वृत्तान्त एवं शापसे मुक्ति पानेका उपाय कह सुनाया ॥ ८० ॥ उनकी बात सुनकर मेरे पिताजीने कहा-तुम लोग घबड़ाओ नहीं । जिस प्रकार शम्भुनामक ब्राह्मणने उस राक्षसको पिशाचयोनि से मुक्त किया था उसी तरह मैं भी तुम लोगोंको इस योनिसे मुक्त कर दूंगा उनकी बात काटकर पिशाचों-मसे एकने कहा कि शम्भु विप्र कौन थे और वह राक्षस कौन था ? यह वृत्तान्त विस्तारपूर्वक आप हमें
सर्गः १२ ]
सर्गः १२ ] मनोहरकाण्डम् ६८९
कथयस्व द्विजश्रेष्ठ कृपां कृत्वा तु कौतुकात् । नृसिंह उवाच शृणुध्वं कथयिष्यामि यद्वृत्तं च पुरातनम् ॥८३॥ शिवकांचीपुरीमध्ये कश्चिद्विप्रः शुचिव्रतः संबभूव चिरं कालं तस्थौ स च स्वभार्यया ॥८४॥ स कस्मिंश्चिद्दिने विप्रश्चैकाम्रेशशिवांतिके । पौराणिकाद्वचश्चैत्रमासमाहात्म्यमव्रतान्विताम् ॥८५॥ कथां श्रोतुं समायातस्तत्र श्रुत्वा महत्फलम् । अयोध्यायां हि चैत्रस्य स्नानात्कैवल्यदायकम् ॥८६॥ ततो बहुगते काले संस्मरंस्तां कथां शुभाम् । ज्ञात्वा समागतं चैत्रं स्वगृहान्निर्गतस्तदा ॥८७॥ भार्यया सहितो विप्र शनैर्मार्गेण वै ययौ । तीर्त्वा तां जाह्नवीं रम्यां यावदग्रे स गच्छति ॥८८॥ तावद्दूरो हि भिल्लेन कर्कशाख्येन कानने । गृहीत्वा सञ्चरं चापं धर्षयित्वा च भूसुरम् ॥८९॥ लुण्ठतः कर्कशः क्रूरो वस्त्रेणैकेन तं द्विजम् । मुमोच तस्य पाथेयं गृहीत्वा सकलं शुभम् ॥९०॥ द्विजोऽपि प्रार्थयामास कर्कशं च पुनः पुनः । वस्त्रादिकं गृहाण त्वं प्रत्यर्पय ददस्व माम् ॥९१॥ तत्तस्य वचनं श्रुत्वा मुक्त्वा तद्वस्त्रबंधनम् सर्वं ददर्श पाथेयं नानाविधमनुत्तमम् ॥९२॥ तस्मिन्ददर्श स व्याधो दश रंभाफलानि वै अपक्वान्यतिशुष्काणि ततश्चित्तेऽविचारयत् ॥९३॥ एतै फलैर्न मे कार्यं जानामि ब्राह्मणोत्तमम् । नाहं दास्याम्यद दानं क्षुधाक्रांतं च सन्द्विजम् ॥९४॥ इति निश्चित्य स व्याधो ददौ तानि द्विजन्मने । गृहीत्वाऽभक्षयद्विप्रः प्रारम्भे भार्यया मधौ ॥९५॥ तद्रंभाफलदानेन कर्कशस्य हृदा शुभा जाता बुद्धिः क्षणादेव सात्विकी क्रूरता गता ॥९६॥ एवं पिशाचाः सकलास्ततः परं भिल्लाय तस्मै तु शुभा मतिर्बभूव । समागतं चाथ कुतः स पृष्टवान् विप्रं स वै प्राह वने च कर्कशम् ॥९७॥ शम्भुरुवाच कांचिपुर्याः समायातो गम्यतेऽयोध्यां पुरीम् । चैत्रमासेऽवगाहार्थं शरयूनिर्मले जले ॥९८॥
बतलाइए । हे द्विजश्रेष्ठ हमपर इतना कृपा करिए । नृसिंह कहने लगे-अच्छा सुनो। मैं एक पुरातन कथा तुम लोगोंको सुनाऊँगा ॥ ८१-८३ ॥ शिवकांचीपुरीम पवित्रव्रतधारी एक ब्राह्मण रहता था । उसका नाम शम्भु था वह बहुत दिनों तक अपनी स्त्रीके साथ उस नगर में रहा । ८४ ॥ एक दिन वह ब्राह्मण किसी वनाम्र एकांश्र्वर नामक शिवके समीप पौराणिकके मुखसे चैत्रमास माहात्म्यकी कथा सुनने गया । वहाँ पहुंचकर उसने चैत्रमासमें अयोध्यास्नानका बड़ा फल सुना ॥ ८५ ॥ बहुत दिना बाद उस कथाका स्मरण करके वह चैत्रमास लगनेके पहले ही अयोध्या जानेके लिए अपने घरसे निकल पड़ा । उसने अपन साथ अपनी स्त्रीको भी ले लिया था। वह धीरे धीरे अयोध्याकी ओर चला । राहमे गङ्गाजी पड़ीं तो उन्ह पार किया । वहाँसे थोड़ी दूर आगे बढ़ा ही था कि वनमे कर्कश नामका एक भील धनुष-बाण लिये हुए मिला । उसने ब्राह्मण-देवताका धमकाकर सब कुछ छीन लिया और केवल एक कपड़ा पहनाकर छोड़ दिया । यहाँ तक कि उसने इन लोगोंका पवित्र पाथेय भी ले लिया ॥ ८६-६० ॥ तब ब्राह्मणने उससे प्रार्थना की कि मेरे कपड़े-लत्ते सब कुछ ले लो । लेकिन रास्तेमे खानेकी वस्तुओंवाली यह पोटला वापस दे दो ॥ ९१ ॥ ब्राह्मणकी बात सुनकर कर्कशने वह पोटली खोली और देखा कि उसमें बहुत-सी खाने-पीनेकी चीजें बँधी है ॥ ९२ ॥ उस व्याधने उसमें दस केलेके फल भी देखे वे फल कच्चे और सूखे हुए थे । उन फलोंको देखकर उसने मनमें सोचा कि इन फलोंकी तो हमे कोई आवश्यकता है नहीं, फिर हम क्यों न दे दें ॥ ९३ ॥ ९४ ॥ ऐसा निश्चय करके उसने केले वापस दे दिये और उस सपत्नीक ब्राह्मणने चैत्रमासके प्रारम्भमें वे कलक फल खाये ॥ ९५ ॥ उस रम्भाफलके दानसे कर्कश व्याधके हृदयमें शुभ बुद्धिका प्रादुर्भाव हो गया। जिससे उसकी क्रूरता नष्ट हो गयी और सात्त्विकता आ गयी ॥ ९६ ॥ हे पिशाचो ! जब उस भीलकी मति पवित्र हो गयी तो उसने
६९० आनन्दरामायणे [ सर्गः ११
इति विप्रवचः श्रुत्वा पुनः पप्रच्छ कर्कशः । किं लभ्यते हि स्नानेन तन्मे वद सविस्तरम् ॥९९॥ पुनः प्राह स विप्रेंद्रः कर्कशं भक्तितः फलम् । स्नानेन मधुमासे हि रघुनाथः प्रसीदति ॥१००॥ प्रसादात्सकलान्भोगान् लभते मानवा भुवि । अंते मोक्षोऽपि भो भिल्ल लभ्यते नात्र संशयः ॥१०१ । इति विप्रवचः श्रुत्वा पुनः पप्रच्छ कर्कशः । मोक्षस्वरूपं कथय कृपां कृत्वा ममोपरि ॥१०२॥ तत्तस्य वचनं श्रुत्वा पत्नीं प्राह द्विजोत्तमः । पश्य पश्य वरारोहे कौतुकं महदद्भुतम् ॥१०३। यद्रांभाफलदानेन चैत्रे मासि वनानने । अय क भिल्लजातीयः क प्रश्नस्तादृशः शुभः ॥१०४। मोक्षस्वरूपज्ञानार्थं तस्माद्दानं प्रशस्यते । इत्युक्त्वा तां प्रियां विप्रः कर्कशं प्राह सादरम् ॥१०५। साधु साधु महाव्याध सम्यक्प्रश्नः कृतस्त्वया । इदानीं प्रोच्यते मोक्षस्वरूपं तन्निशामय ॥१०६। स मोक्षस्त्वं हि जानीहि यतो नास्ति पुनर्भवेः । इति विप्रवचः श्रुत्वा पुनः पप्रच्छ कर्कशः ॥१०७॥
तस्य प्राप्तिर्यथा स्यान्मे तन्मे वद द्विजोत्तम । शृणु कर्कश तन्प्राप्तिर्यथा स्यात्तद्वदामि ते । १०८॥
दारपुत्रगृहादीनां प्रीतिं मुक्त्वा जनार्दनम् दिवारात्रं चिंतयित्वा सर्वदेहस्य चालकम् ॥१०९॥ आत्मानं बहुपुण्यौघैर्निर्मलीकृत्य मानसम् तन्स्वरूपे यदा निक्षिप्यन् मुक्तो नेत्तरो जनः ॥११०॥ एवं वदति विप्रेन्द्रे व्याधो मुक्त्वा शरं धनुः । शंभुशर्मा जगन्मात्वा त्राहि त्राहीति वै वदन् ॥१११। प्रोवाच द्विजवर्यं स व्याधो भ्रामुद्गतेति च । एतस्मिन्नन्तरे तत्र राक्षसो घोरदर्शनः ॥११२। दुद्राव दीर्घशब्देन यत्रासंस्ते त्रयो वने । आयांतं राक्षसं दृष्ट्वा चक्रुस्ते तु पलायनम् ॥११३॥ तावज्जवेन तान् धर्तुं निकटं राक्षसो ययौ । तं दृष्ट्वा निकटं शुंभुर्मुञ्चिकां मजलां निजाम् ॥११४।
उन ब्राह्मण देवतासे पूछा कि आप किस कार्यस इधर आ पहुँचे ? । ६७॥ शम्भुने उत्तर दिया कि मैं कांची- पुरोसं आया हूँ और अयोध्या जा रहा हूँ । वहाँ चैत्रमासमें स्नान करूंगा ॥ ९८ । इस तरह ब्राह्मणकी बात सुनकर कर्कशने कहा कि चैत्रस्नानसे क्या लाभ होता है ? यह बात विस्तारपूर्वक हम बतलाइए । ९९॥ ब्राह्मण भक्तिपूर्वक कर्कशको चैत्रमासके स्नानका फल बतलाने लगा । उसने कहा कि चैत्रस्नानसे भगवान् रामचन्द्र प्रसन्न होते हैं ॥ १०० । संसारके प्राणी उन्हींकी कृपासे सब प्रकारके सुखोंको भोगते हैं और अन्तमें उन्हें मोक्ष भी मिलता है * इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ १०१ ॥ इस तरह विप्रका बात सुनकर कर्कशने कहा कि कृपा करके आप हमें मोक्षका स्वरूप बतलाइए ॥ १०२ ॥ इस प्रकार कर्कशका प्रश्न सुनकर ब्राह्मणने अपनी पलीसे कहा-प्रिये ! देखो तो कितने आश्चर्यकी बात है! चैत्रमासमें केलेके फलोंके दानसे यह मोक्ष कैसे कैसे प्रश्न कर रहा है। इतनी बात अपनी स्त्रीस कहकर ब्राह्मण प्रेमपूर्वक कर्कशसे कहने लगा- ॥ १०३-१०५ ॥ हे महाव्याध ! तुम्हारा प्रश्न बहुत ठीक है। अब मैं तुमको मोक्षका स्वरूप बतला रहा हूँ। तुम सावधान मनसे सुनो । १०६ । मोक्ष उस कहते है, जिस पाकर प्राणीको फिर जन्म न लेना पड़े । इस तरह ब्राह्मणकी बात सुनकर कर्कशने फिर कहा-उसकी प्राप्ति मुझे जिस तरह हो सके, वह उपाय बतलाए। शम्भु ब्राह्मणने कहा-हे कर्कश ! जिस तरह तुम्हे मोक्षकी प्राप्ति हो सकती है। वह उपाय मैं बतलाता हूँ सुनो ॥ १०७ ॥ १०८ ॥ जो मनुष्य स्त्री, पुत्र, गृह आदिका प्रीतिका परित्याग करके रात-दिन सब प्राणियोंके संचालक भगवान् जनार्दनका ध्यान करता है और बहुतसे पुण्योसे अपने चित्तको निर्मल करके उन्हीं के स्वरूपमें लौ लगाये रहता है वही प्राणी मुक्त होता है और कोई नहीं १०९ ॥ ११० ॥ ऐसा कहने- पर कर्कशने अपना धनुष-बाण फेंक दिया और उनके साथ शम्भुके पैरोंपर गिर पड़ा और कहने लगा-हे ब्राह्मणदेवता ! हमारी रक्षा करो। उसी समय एक राक्षस दौड़ता हुआ उस स्थानपर आ पहुँचा, जहाँ ये तीनों बैठे वार्तालाप कर रहे थे । राक्षसको आते देखकर ये तीनों भागे राक्षस भी उन्हें पकड़नेके लिए
सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६९१
सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६९१
कुम्भोत्थं शशिरश्मिसन्निभमहं मत्वा रामचन्द्रं स्मरेत् । प्रावित्रं शमनात्मजा च यतयो युष्मासि वै ॥११५॥ तस्यैकादशमस्यापि जलं पूर्वस्मृतिर्भवः। ततः सशङ्कनो दूरं स्थित्वा शंभुं व्यजिज्ञपत् ॥११६॥ मामुद्धर मुनिश्रेष्ठ घोराद्राक्षसदेहतः। शरणं ते गतोऽस्म्यद्य जलं पूर्वस्मृतिर्भवम् ॥११७॥ इति तकैतुकं दृष्ट्वा रक्षसं प्राह स द्विजः। कस्मात्ते राक्षसवं हि अप पृष्ठ वदाऽधुना ॥११८॥ राक्षसः प्राह वेगेन शृणु शून्ये निजं वद। जनस्थाने पुरा चाहं विप्रः कर्मपराङ्मुखः ॥११९॥ प्रतिग्रहपरः पापी दुर्मार्गव्यसनी सदा। तस्मिन्नेवौदरे चैत्रे मम भार्या सती शुभा ॥१२०॥ स्नानार्थं गभतीर्थं सा मामपृष्ट्वा गृहाययौ। त्वां मार्गे समया दृष्ट्वा धृत्वा सर्गे चलां सुभाम् ॥१२१॥ प्रोक्ता क्रोधेन्वया रंडे ममपृष्ट्वा क्व यास्यसि। सा प्राह भवभीरु तु रामतीर्थे प्रगम्यते ॥१२२॥ मधुमासऽवगाहार्थं न मया दुष्कृतं कृतम्। एवं ब्रुवति तद्वाक्यं ताडिता सा मया बलात् ॥१२३॥ प्रेषिता स्वगृहं भर्त्सयन्तः कालान्तरे गते। मृतोऽहं च तदा नातो यमलोकं यमानुगैः ॥१२४॥ चित्रगुप्तोऽथ दृष्ट्वा मां धिग्धृत्वा वै पुनः पुनः। यमराजं स वै प्राह घर्षयन्मां रुषान्वितः ॥१२५॥ भो धर्मराज पापोऽयं चैत्रस्नाननिवारकः। लुब्धादी राक्षसीं योनिं निरयान् मोक्तुमर्हति १२६॥ इति तद्वचनं श्रुत्वा यमः प्राहानुगांस्तदा। भो भटा राक्षसीं योनिदीयतां निर्जने वने ॥१२७॥ पादितेऽस्यै च षष्ठांशात्संस्थाप्य यमार्जुनैः। दत्ता मे राक्षसीं योनिं त्यक्त्व चात्रगता यमम् १२८॥ तदाऽरभ्य वने चाहं क्षुत्तृट्परिपीड़ितः। पञ्चविंशत्सहस्राणि वर्षाण्यत्र स्थितस्त्वियम्। १२९॥ किं मया सुकृतं पूर्वं कृतं यस्मादिने नरा। गंगतिश्चाथ वै जाता मधुसंगतो गतिप्रदः ।१३०॥ इति तद्वचनं श्रुत्वा शंभुर्व्याप्त्वा दृशं हृदि। ज्ञात्वा यत्सुकृतं पूर्वं राक्षसाय न्यवेदयत् ॥१३१॥ शृणु राक्षस यत्पूर्वे कृतं वै सुकृतं त्वया। तस्माज्जाता संगतिर्मे वने निर्भासुरे शुभा ॥१३२॥
बिन्दुजल समीप पहुँचने पर उसका घमण्ड देखकर शम्भुने रामचन्द्रका स्मरण करके अपना तूंबीका जल उस राक्षसके मुखमें फेंक दिया। रामनामसे पवित्रोभूत जलके पड़नेसे उस राक्षसको अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो आया। इसलिए वह दूर ही खड़ा होकर शम्भुसे कहने लगा—हे मुनिराज ! इस घोर राक्षसदेह-से आप मेरी रक्षा करिए। मैं आपकी शरण हूँ। आपके जलसिञ्चनसे मुझे अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो आया है॥ ११५-११७॥ इस प्रकारका कौतुक देखकर ब्राह्मणने उस राक्षससे कहा—पहले तुम हमें यह बतलाओ कि तुम राक्षसदेहका किस तरह प्राप्त हुए ॥११८॥ राक्षसने अपने पूर्वजन्मका हाल बताना प्रारम्भ किया। उसने कहा—इसके पहले मै जन्ममें जनस्थान पुरमें एक ब्राह्मण था ॥ ११९॥ उस समय मै जैसे तैसे द्रव्य लेता हुआ दुराचार और व्यसन में अपना जीवन बिता रहा था। उसी समय मेरी स्त्री बिना मुझसे पूछे ही चैत्रस्नान करनेके लिए रामतीर्थको चल पड़ी। मैंने उसे रास्तेमें देखा तो पकड़ लिया और उससे कहा—अरी राँड ! बिना हमसे पूछे तू कहाँ जा रही है ? भयभीत होकर उसने उत्तर दिया कि मै चैत्रस्नान करनेके लिए रामतीर्थ (अयोध्या) जा रही हूँ ॥ १२०-१२२॥ ऐसा करनेमें मैंने कोई पाप नहीं समझा इसलिए चल पड़ी। ऐसी निष्कपट बात सुनकर भी मैंने उसे बहुत मारा और घर लौटा दिया। कुछ दिन बाद मेरी मृत्यु हुई और यमके दूत पकड़कर मुझे यमलोक ले गये ॥ १२३ ॥ १२४॥ चित्रगुप्तने मुझे देखा तो बहुत धिक्कारा और धमकाकर यमराजसे कहा—हे धर्मराज ! इस पापीने अच्छी स्त्रीको चैत्रस्नानसे रोका था। अतएव यह लुब्ध राक्षसी योनिको भोगकर दण्ड पाने का अधिकारी है ॥ १२५ ॥ १२६ ॥ इस प्रकार चित्रगुप्तकी बात सुनकर धर्मराजने अपने कर्मचारियों से कहा कि इसे किसी निर्जन वनमें राक्षसी योनि दे दो। उनके आज्ञानुसार यमदूत मुझे इस वनमें छोड़ कर लौट गये। तभीसे भूखे-प्यासे रहकर मैंने पच्चीस हजार वर्ष बिताये हैं ॥ १२७-१२९॥ मुझे नहीं मालूम कि मैंने कौन सा पुण्य किया था, जिसके प्रभावसे इस निर्जन वनमें आप जैसे सज्जनका दर्शनरूप गतिप्रद उत्तम फल प्राप्त हुआ ॥ १३० ॥ उसकी बात सुनकर शंभुने क्षणभर अपने हृदयमें उसके पूर्व सुकृतका ध्यान किया और कहने लगे—॥ १३१ ॥ हे राक्षस तुमने पूर्वजन्ममें जो सुकृत किया था, वह
६९२ आनन्दरामायणे [ सर्ग ११
एकादश्यां चैत्रशुक्ले कृतवान्ब्राह्मणोजनम् । ताम्बूलो दक्षिणायुक्तः कट्या वस्त्रेन्वया धृतः ॥१३३॥ द्वादश्यां प्रातरुत्थाय गत्वा स्नानं त्वया कृतम् । पतितः स हि तांबूलो विस्मृत्या गौतमीतटे ॥१३४॥ दक्षिणामहितो दृष्टः स केनापि द्विजेन वै । गृहीत्वा स हि द्वादश्यां न जानंश्च त्वया पुनः ॥१३५॥ तांबूलदानाद्दुश्चैत्रमासे जाता बने मेऽद्य हि संगतिस्ते । तस्मान्मधौ राक्षस मानवैर्हि ताम्बूलदानं करणीयमेतत् ॥१३६॥ इत्युक्त्वा राक्षसं शम्भुश्चैत्रमाहात्म्यमुत्तमम् । उभाभ्यां श्रावयित्वाऽथ कर्कशं वाक्यमब्रवीत् ॥१३७॥ भो कर्कश महाबुद्धे शृणुष्व वचनं मम । आगच्छ त्वं महैवाद्य मयाऽयोध्यापुरीं प्रति ॥१३८॥ सरयूस्रानमात्रेण सद्यो पापाद्विमोक्ष्यसे । इत्युक्त्वा कर्कशं शम्भुस्ततः प्रोवाच राक्षसस् ॥१३९॥ भो राक्षस त्वमत्रैव मासमात्रं स्थितो भव । अयोध्यायां प्रवेशश्च राक्षसानां न विद्यते ॥१४०॥ अतोऽहं मधुमासे हि स्नानस्त्रानेन परा पुनः । यदागच्छामि कांचीं त्वां चोद्धरिष्याम्यहं तदा ॥१४१॥ मा संदेहोऽस्तु ते चित्ते शपथं कारयाम्यहम् । यत्पापं ब्रह्महत्यायास्तथा गायत्रिनिंदनात् ॥१४२॥ नोद्धृत्य त्वां हि गच्छामि तर्हि तन्मयि तिष्ठतु मद्यपने च यत्पापं हेमस्तेयादिकं च यत् ॥१४३॥ नोद्धृत्य त्वां हि गच्छामि तर्हि तन्मयि तिष्ठतु । यत्पापं भ्रूणहत्यायास्तथा चैत्रे ह्यमज्जनात् ॥१४४॥ नोद्धृत्य त्वां हि गच्छामि तर्हि तन्मयि तिष्ठतु । इत्यादिशपथैर्नर्हि राक्षसं दृढयन् द्विजः ॥१४५॥ यावत्पश्यति सर्वत्र तावज्जातं हि कौतुकम् । व्याधाय चैत्रमासस्य माहात्म्यस्योपदेशतः ॥१४६॥ तरवः फलिनो जाता परितो दशयोजनम् । पत्रैः पुष्पैर्नित्राश्च सौगंधः पवनो ववौ ॥१४७॥ नद्यस्तोयं वहन्त्यश्च ननृतुर्बर्हिणो वने । तद्दृष्ट्वा कर्कशश्चापि चैत्रमाहात्म्यकीर्तनात् ॥१४८॥ दुर्वर्णं सुवर्णं जातं चैत्रश्रेष्ठत्यमन्यत । ततस्ते द्वितयस्तस्मादनाम्नागोष्ठं निर्गताः ॥१४९॥
मैं बतला रहा हूँ उसके प्रभावसे हमारे तुम्हार साक्षात्कार हुआ है । एक बार तुमने चैत्रशुक्ल एका- दशीको किसीके यहां भोजन किया, ताम्बूल दक्षिणा ली और एक वस्त्रम रखकर उसे तुमने अपनी कमरमें लपेट लिया ॥१३३॥ द्वादशीको तुम सबेरे उठे और गङ्गास्नान करने चले गये । वह कमरमें लिपटी हुई दक्षिणा और ताम्बूल भूलसे गौतमी नदीके तटपर गिर गया । उस किसी ब्राह्मणने उठा लिया, किन्तु उसके विषयमें तुम्हें कुछ ख्याल नहीं था । १३३-१३५॥ चैत्रमासम उस दक्षिणा और ताम्बूलके दानसे ही आज इस निर्जन वनमें हम- से साक्षात्कार हुआ है । देखो, केवल ताम्बूलके दानका कितना बडा माहात्म्य है ! अतएव इस मासमें ताम्बूल- दान अवश्य करना चाहिए ॥१३६॥ इस तरह उस राक्षसको चैत्रम मासका माहात्म्य सुनाकर शम्भुने कर्कशसे कहा—हे महाबुद्धिमान् कर्कश ! मेरी बात मानो और आज ही मेरे साथ अयोध्यापुरीको चल दो ॥१३७॥ १३८॥ चैत्रमासम सरयूस्नानमात्र से तुम सब पापोंसे मुक्त हो जाओगे ऐसा कर्कशसे कहकर शम्भुने उस राक्षससे कहा कि तुम महीना भर इसी स्थानपर रहो । क्योंकि अयोध्या नगरमें राक्षसलोक नहीं जा सकते ॥१३६ ॥ १४०॥ इस कारण जब मैं चैत्रस्नान करके उधरसे लौटूंगा और यहां आऊँगा, तब तुम्हारा उद्धार करूँगा ॥१४१॥ तुम इसमें कुछ सन्देह मत करो । मैं कसम खाता हूँ कि ब्राह्मणहत्या करने तथा गौ एवं मुनियोंकी निन्दा करनेसे जो पातक होता है, वह पातक मुझे लगे यदि मैं तुम्हारा उद्धार किए बिना जाऊँ। मद्य पीने और सुवर्ण चुरानेसे जो पातक होता है यदि मैं तुम्हारा उद्धार किये बिना जाऊं तो मुझे वे पातक लगे जो पाप भ्रूणहत्या तथा चैत्रमासमें स्नान न करनेसे लगता है वह मुझे लगे । यदि विना तुम्हारा उद्धार किये विना जाऊँ । इस तरह विविध प्रकारकी शपथें खाकर शम्भुन उस ब्रह्मराक्षसको आश्वासन दिया इसके बाद जब व्याधन चारों ओर दृष्टि उठाकर देखा तो चैत्रस्नानका माहात्म्य सुननेके कारण उस वनके दस योजन तक उसे सब वृक्ष फल फूलोंसे लद दिखायी दिये और सुगन्धित वायु चलने लगा ॥१४२-१४७॥ उस वनकी सब नदियां घणघोर निनाद करता हुआ जल बहने लगा और मयूरमण्डल
सर्गः ११ ]
सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६९३
शनैः शनैरथोद्यातः पश्यंश्चैत्रवनस्थलीम् । तत्र च्छन्दो महान् जातः सिंहमातंगसङ्गवः ॥१५०॥
धावन्नग्रे तु मातंगः पृष्ठे धावंश्च केसरी। एवं तौ शृङ्गतस्तूर्ण प्रयांतौ कलहकारिणौ ॥१५१॥
मार्गरोधकरौ दृष्टौ तौ दृष्ट्वा शंभुशर्मनो। पश्य कर्कश विघ्नानि चैत्रस्नाने पदे पदे ॥१५२॥
संभवंतीति वै पुरुषाश्चैत्रस्नानं न लङ्घयेत्। कन्यां विवाहे गीतायां गयायां रामसेवने ॥१५३॥
चैत्रस्नाने महादाने विघ्नानि संभवन्ति हि। एवं वदति विप्रेंद्रे तौ दृष्टौ करिसिंहकौ ॥१५४॥
चैत्ररामश्रवात्पूर्वजन्मस्मृत्वाऽतिविस्मितौ। भूत्वा वै त्राहि त्राहीति कृत्वा दार्धे महास्मृतम् ॥१५५॥
शरणं द्विजवर्यस्य जग्मतुः शम्भुशर्मणः । सोऽपि शङ्कुश्रवाभ्यांहि पृष्टवांस्तत्कृपान्वितः॥१५६॥
कियद्यं दृष्टनातिर्हि प्रमा नूक्तप्रपञ्चं मम । इति विप्रवचः श्रुत्वा केसरी वाक्यमब्रवीत् । १५७॥
सोऽहं रामेश्वरक्षेत्रे पूर्वजन्मम्यहं द्विजः। निन्दकः सर्वधर्माणां पाखण्डव्यक्तकन्धरः ॥१५८॥
कदाचिच्चैत्रमासे तु तत्र श्रीराममण्डके। तीर्थे जनसमूहं च श्रुत्वा पौराणिकीं कथाम् । १५९॥
पौराणिकेने कथितां चैत्रमाहात्म्यसंज्ञिकाम्। कृतवान् निन्दनं चाहं वारं वारं पुनः पुनः । १६०॥
तन्मत्कृतं निंदनं च कश्चिद्देवरथस्थितः। शुश्राव सकलं दुष्टं तत शप्ताऽस्म्यहं तदा । १६१॥
करा जातिं त्वं गच्छ यदा शंभवकीर्तनम्। भविष्यति महत्पुण्यं शापशान्तिस्तदनु च । १६२॥
एवं प्रोक्तं मया सर्वं पूर्वजन्मानि यत्कृतम्। तेन शापेन जातोऽस्मि कथग भयकारकः । १६३॥
चैत्ररामश्रवाज्जाता पूर्वस्मृतिरनुत्तमा। इदानीं रक्ष मां विप्र त्वं चतन्मिहेद्द्रुतः।
इति सिंहस्य वृष तु शास्त्रवाच गत द्विजः ॥१६४॥
कस्मञ्च्च मातंग गतोऽसि दुष्टात्तौ वदष्वाय महाप्रमघात् ।
स चापि मातंगवरः समस्तं वृत्तं निजं चाकथयच्च जानन् । १६५।
नाचते लगे। वैशाखामिक चैत्रमास माहात्म्यस वनका वह सुपमा देखकर ककजाने भा चैत्रमासका सब सांगोपा ङ्गेण्ड मरा। उस पर वे दोनो उस वेषके भागके आधार लिए चल पडे ॥१४८। १४६। वे वनस्थलीकी शोभा देखते हुए चलेजा रह थ। तबतक उन्होने सिह और हाथीका महान् गजन सुना ॥१५०॥ आगे आगे हाथी भागा जा रहा था और उसे पदछम सिह खदरता जाता था। लडत हुए वे दोनो उसी मागपर आ पहुंचे, जहाँसे ये दानों ब्राह्मण जा रहे थे ॥ १५१ ॥ उन दुष्टोका रास्ता राकन देखकर शम्भुने ककशस कहा-देखा कर्कश ! चैत्रस्नान करनेवालोके पद-पदपर विघ्न आते हैं। किन्तु लोगोका चाहिए कि विघ्न-बाधात्रास डरकर पीछे न हटे। काशी-यासम, पुत्र-पुत्राक विवाहस, गयापाडय गया ध्यान करनम् वैत्रस्नानम और कुछ आरि महादानम बड़े-बड़े विघ्न आया करत है प्रत्तायक उस शब्दोका सुनकर उन दोनो दुष्टा (हाथा और सिह) को अपने पूर्वजन्मफा स्मरण हा बाया जिससे 'मेरी रक्षा करो-मेरी रक्षा करो' इस तरह बहुत दूर व चिल्लाने लग ॥१५२-१५५॥ वे उस शम्भुनामक ब्राह्मणकी शरणमे गये शम्भु भी उनपर दयालु होकर उनसे पूछने लगे कि तुम लोगोको यह दुष्टयानि क्यो मिली ? यह वृत्तान्त हमें सुनाओ । इस तरह विप्रका प्रश्न सुनकर सिंहने कहा- ॥ १५६ । १५७ ॥ इसके पूर्वकाल अम्मम में रामेश्वरक्षेत्रका निवासी एक ब्राह्मण था। मैं सब धर्माका निन्दक था और पाषण्डमे भगे बाते किया करना था ॥ १५८ ॥ एक बार चैत्रके महीनेमें श्रीरामतीर्थमे एक ब्राह्मणके मुखसे चैत्रमासका माहात्म्य सुन लिया और उसकी भरपूर निन्दा को। मेरी उन निन्दाकी बातोको पास ही बैठे हुए किसी तपस्वी ब्राह्मणने सुन लिया और उसने उसी समय मुझे झाप देते हुए कहा-तूने चैत्रमासकी निन्दा की है। इसलिए तू सिह क्रूरजातिमें जाकर जन्म ले । जब कि एक बनमे तू किसी ब्राह्मणके मुखस चैत्रमासका माहात्म्य सुनेगा, उस समय तेरे शापकी शान्ति होगी । १४९-१६२ ॥ हे विप्र ! इस तरह मैने आपको अपने पूर्व-जन्मका वृत्तान्त कह सुनाया उसके श्रापसे मै महाभयदायिनी इस सिंहकी योनिमें आ पड़ा हूँ । १६३ । आज आपके मुखसे चैत्रमासमे रामनाम सुननेसे मुझे मेरे पूर्वजन्मकी बाते स्मरण आ गयीं । हे विप्र ! अब मुझे इस सिंहयानिसे बचाइए ॥ १६४ । इस प्रकार सिहकी बात
६९४ आनन्दरामायणे [सर्गः ११
शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पूर्ववृत्तं मया कृतम् । रामनाथपुरे चाहं कावेर्या उत्तरे तटे ॥१६६॥ विप्रः परमदुर्वृत्तः सर्वशास्त्रपराङ्मुखः । लक्ष्मीभ्रमदाक्रान्तः पण्यस्त्रीभोगकारकः ॥१६७॥ एकदा सुहृदा चाहं भोजनार्थं निमन्त्रितः । श्राद्धार्हे मधुमासे हि शुक्ले श्रीनवमीदिने ॥१६८॥ मया भुक्तं सुहृद्गेहे नवम्यां द्विजसत्तम । तेन पापेन जातोऽस्म्य करिणीर्ना न संशयः ॥१६९॥ सर्वदा प्रतिमासेऽपि नवम्यां न हि भोजनम् । कार्यं विशेषतो रामनवम्यां त्रिदिनं च तत् ॥१७०॥ इदानीं न हि जानामि केन पुण्येन तेऽत्र वै । संगतिश्च वने जाता सर्वपापप्रणाशिनी ॥१७१॥ इति तस्य वचः श्रुत्वा शत्रुघ्नोऽपि विचिन्तयत् । ज्ञात्वा मातङ्गपुण्यं तु प्रोवाच करिणं द्विजः ॥१७२॥ शृणु मातङ्ग वक्ष्यामि यत्पुण्यं नु त्वया कृतम् । पूर्वजन्मनि तन्मर्त्य येन मे संगतिर्वने ॥१७३॥ जाता त्वामुद्धरिष्यामि मा चिन्तां कुरु सर्वथा । रामनाथपुरे रम्ये कावेरीतटशोभिते ॥१७४॥ रामायणकथा चैत्रे श्रुता श्रीनवमीदिने । रामतीर्थे त्वया स्नानं दृष्टो रामेश्वरः शिवः ॥१७५॥ तेन पुण्येन ते जाता संगतिर्मम कानने । इदानीं शृणु सिंह त्वं शृणोतु च करी महान् ॥१७६॥ साकेते मधुमासे हि स्नात्वाऽनेन पथा पुनः । यदा गच्छामि तां कांचीं युवामुद्धारयाम्यहम् ॥१७७॥ मा संदेहोऽत्र कर्तव्यः शपथैः प्रत्ययं कुरु । संतोपार्थं युष्माकं हि प्रोच्यन्ते शपथा मया ॥१७८॥ परस्त्रीगमनात्पापं तथा मित्रवधादिकम् । युवां नोद्धृत्य गच्छामि यदि तन्मयि तिष्ठतु ॥१७९॥ ब्रह्मस्वहरणात्पापं यत्स्मृतं मातृनिन्दनात् । युवां नोद्धृत्य गच्छामि यदि तन्मयि तिष्ठतु । १८० । इत्युक्त्वा द्विजवर्यः स स्त्रिया भिल्लेन संयुतः । करिसिंहौ वने स्थाप्य गच्छन्मार्गे शनैः शनैः ॥१८१॥
सुनकर ब्राह्मणने हाथीसे कहा कि तुम किस कर्मसे इस दुर्योनिमें आये हो ? तब हाथीने अपने पूर्वजन्मका हाल सुनाते हुए कहा-हे विप्र ! मैं भी अपने पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाता हूँ, सुनिए । उस जन्ममें मैं कावेरी नदीके उत्तरी तटपर रामनाथपुर नामक नगरमें बड़ा दुराचारी, सब शास्त्रोंसे पराङ्मुख, धनके मदसे मतवाला और वेश्यालम्पट ब्राह्मण था । एक बार चैत्रमासकी नवमीका मेरा किसी मित्रने श्राद्धमें भोजन करनेके लिए मुझे निमन्त्रण दिया ॥१६६-१६८॥ तदनुसार हे द्विजश्रेष्ठ ! नवमीके दिन मैंने मित्रके यहाँ भोजन किया । उसी पापसे इस हाथीकी योनिमें आ पड़ा हूँ । १६९ । क्योंकि शास्त्रोंका यह विधान है कि प्रत्येक मासकी नवमीको किसीके यहाँ भोजन न करे । यदि ऐसा न हो सके तो चैत्रशुक्ल रामनवमीको तो अवश्य इस बातपर ध्यान दे ॥ १७० ॥ मैं नहीं जानता कि किस पुण्यसे इस समय सब प्रकारके कल्मषोंको हरनेवाला आपका संसर्ग प्राप्त हुआ ॥ १७१ ॥ उसका यह बात सुनकर शत्रुघ्न क्षणभर अपने मनमें ध्यान किया और उसके पुण्यको जानकर कहने लगा-हे मातंग ! सुनो, तुमने जो पुण्य किया है सो मैं तुम्हें बतलाता हूँ । उसीके प्रभावसे आज हमसे भेंट हुई है ॥ १७२ ॥ ॥ १७३ ॥ अब तुम घबराओ मत, मैं तुम्हारा हर तरहसे उद्धार करूँगा । उस जन्ममें तुमने रमणीक कावेरीके तटपर स्थित रामनाथपुरमें श्रीरामनवमीको रामकी कथा सुनी थी । उस दिन तुमने रामतीर्थमें स्नान और रामेश्वर शिवका दर्शन भी किया था ॥ १७४ । १७५ ॥ उसी पुण्यसे आज इस वनमें हमसे भेंट हुई है । अब हे मातंग और सिंह ! मेरी बात सुनो मैं इस समय चैत्रमासका स्नान करनेके लिए अयोध्या जा रहा हूँ । स्नान करके जब मैं कांचीकी ओर लौटूंगा, तब यहाँ आकर तुम दोनोंका उद्धार करूँगा । १७६ ॥ १७७ । मेरी बातपर किसी प्रकारका संदेह मत करना । तुम्हारे विश्वासके लिए मैं शपथ खाता हूँ, सुनो १७८ । यदि मैं तुम्हारा उद्धार किये बिना जाऊँ तो परस्त्रीगमन करने और मित्रको मारनेसे जो पातक लगता है, मैं उस पातकका भागी बनूँ ॥ १७९ ॥ जो पाप ब्राह्मणका धन हड़पने और माताकी निन्दा करनेमें होता है, उन सब पापोंका भागी बनूँ, यदि तुम्हारा उद्धार किये बिना जाऊँ ॥ १८० ॥ इतना कहकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने अपनी स्त्री तथा उस भीलका साथ लिया और वहाँसे अयोध्याके लिए चल पड़ा । उसने हाथी तथा सिंहको उस वनमें ही छोड़ दिया । १८१ ॥
सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६१९
ददर्शान्यपथा यान्तं श्रेष्ठं कार्पटिकोत्तमम् । वहन्तं रामलिंगार्थं श्रेष्ठं भागीरथीजलम् ॥ १८४॥
शम्भुः पप्रच्छ तं नत्वा नम्रं कार्पटिकोत्तमम् । कुतः समागतं विप्र गम्यते काधुना वद ॥१८३॥
कार्पटिक उवाच
प्रयागादागतं विद्धि मां त्वं भूसुरमत्तम । मधुमासेऽवगाहार्थमयोध्यां प्रति गम्यते ॥ १८४॥
इदानीं त्वं निजं वृत्तं वद ब्राह्मणसत्तम । कुतः समागतं काथ गम्यते क्वाधुना वद । १८५॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा शम्भुः प्रोवाच तं तदा । शिवकाञ्च्याः समायातमयोध्यां प्रति गम्यते ॥१८६॥
चैत्रमासेऽवगाहार्थं गम्यते कथितं मया । इति शम्भुवचः श्रुत्वा पुनः कार्पटिकोत्तमः । १८७॥
पप्रच्छ द्विजवर्य्याय कौतुकाविष्टमानसः । शिवकाञ्च्यां शंभुनामा कश्चिद्विप्रोऽस्ति भो द्विज ॥८८॥
तत्तस्य वचनं श्रुत्वा पुनः शम्भुस्तमब्रवीत् । बहवः शंभुनामानो वर्तन्ते द्विज तत्र हि ॥१८९ ।
कस्त्वया पृच्छयते तस्य वद गोत्रोपनामनी । इति विप्रवचः श्रुत्वा पुनः कार्पटिकोऽब्रवीत् ॥१९०॥
भारद्वाजकुलोत्पन्नं चकेगाधूपनामकम्
महादेवसुतं सर्ववेदशास्त्रविशारदम् । तं क्षणं शंभुनामानं जानीषे त्वं न वा वद ॥१९१॥
एवं महाकार्पटिकेन सर्वं गोत्रापमाणादिकमादरेण ।
प्रोक्तं यथा तन्नम भूसूतोऽपि ज्ञात्वा निजं सर्वमथावदत्तम् ॥ १९२ ॥
भो भोकार्पटिकश्रेष्ठ किमर्थं त्वं हि पृच्छसि वददस्य सविस्तारं मा शंकां कुरु चात्र हि । १९३॥
कार्पटिक उवाच
शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि यदर्थं पृच्छयते मया । यदाऽहं गतवान् गंगासागरं द्रष्टुमादरात् ॥१९४॥
सीताकुण्डसमीपे हि देशे कंकटनामके । दृष्टोऽहं मार्गमध्ये च पिशाचेनोग्ररूपिणा ॥१९५॥
मां हन्तुं निकट प्राप्तं तं दृष्ट्वाऽहं तदा द्विज । श्रीनामकीर्तनं दीर्घं कृतवान् भयकम्पितः ॥१९६॥
कीर्तनाद्रामचन्द्रस्य स पिशाचः पलायनम् । मनः कृत्वा दूरदेशे स्थित्वा शुश्राव कीर्तनम् ॥१९७।
रास्तेमें शम्भुने एक कार्पार्थी विप्रको देखा, जो रामेश्वर शिवके लिए गङ्गाका उत्तम जल लिये जा रहा था ॥ १८४॥ उसे देखकर शम्भुने पूछा -हे विप्र ! इस समय तुम कहाँसे आ रहे हो और कहाँ जाओगे ? ॥ १८३ ॥ उसने उत्तर दिया हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! इस समय मैं प्रयागसे आ रहा हूँ और चैत्रस्नान करनेके लिए अयोध्या जा रहा हूँ ॥ १८४ ॥ अब आप अपना वृत्तान्त बतलाते हुए कहिए कि कहाँसे आये है और कहाँ जायेंगें ? ॥ १८५ ॥ ब्राह्मणका प्रश्न सुनकर शम्भुने कहा कि मैं शिवकाञ्ची से आता हूँ और अयोध्या जा रहा हूँ ॥ १८६ ॥ हम भी चैत्रस्नान करना है । इस प्रकार शम्भुकी बात सुनकर ब्राह्मणने कहा कि हे द्विज ! शिवकाञ्चीमें कोई शम्भु नामका ब्राह्मण रहता है ? । १८७ ।' १८८ ॥ ब्राह्मणकी बातके उत्तरमें शम्भुने कहा कि शिवकाञ्चीमें बहुतसे शम्भु नामक ब्राह्मण हैं ॥ १८९ ॥ आप किस शम्भुको पूछते हैं ? जिसे पूछते हों, उसका गोत्र और उपनाम बतलाइए । शम्भुकी बात सुनकर उस ब्राह्मणने कहा कि जिन्हें मैं पूछता हूँ, वे भारद्वाज कुलमे उत्पन्न हुए हैं और चक्रेगाँव उनका उपनाम है । वे महादेवके पुत्र हैं। वे सब वेदों और शास्त्रोंको जानते हैं। उन शम्भुको आप जानते हैं या नहीं, सो बतलाइए ॥ १९० ॥ १६१ ॥ इस तरह ब्राह्मणके मुखसे अपना गोत्र और उपनाम आदि सुनकर शम्भुने कहा- हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! तुम शम्भुको क्यों पूछ रहे हो, मुझे विस्तारपूर्वक बतलाओ । इसमें किसी प्रकारका सन्देह मत करो ॥ १९२ ॥ १९३ ॥ कार्पटिकने कहा- हे विप्र ! जिसलिए मैं उन्हें पूछ रहा हूँ सो बतलाता हूँ । जब कि मैं गंगासागरका दर्शन करने गया था तो सीताकुण्डके समीप कंकट देशमें मुझे एक उग्ररूपवाले पिशाचने देख लिया ॥ ९४ ॥ १९५ ॥ वह मारनेके लिये बिल्कुल मेरे पास आ पहुँचा । मैं उसे देखकर जोर-जोरसे रामनामका कीर्तन करने और भयसे काँपने लगा ॥ १९६॥ रामनामके कीर्तनसे वह भाग खड़ा हुआ और मेरे पाससे थोड़ी दूरपर रुककर कीर्तन
६९६ आनन्दरामायणे [सर्गः ११
तस्माज्जाता पूर्वजन्मस्मृतिस्तस्य शुभावहा । त्राहि त्राहीति मां प्राह मया पृष्टः स वै पुनः ॥ १९८ ॥ कस्मात्पिशाचदेहे त्वं जानंस्तद्वद मन्मथम् । इति मे वचनं श्रुत्वा पिशाचः प्राह मां पुनः ॥ १९९ ॥ काञ्चीपुर्यां द्विजश्चाहं दुण्डिनामा पुरा स्थितः । नान्नदानं मया पूर्वं कृतं स्वल्पमपि क्वचित् ॥ २०० ॥ तस्मात्पिशाचदेहत्वं प्राप्तं कार्पटिकोत्तम । इति तस्य वचः श्रुत्वा पुनः प्रोक्तः स वै मया ॥ २०१ ॥ कथं पिशाचयोन्यास्तु ते मुक्तिश्च भविष्यति । ततः पुनः स मां प्राह यदि मे तनयः सुधीः ॥ २०२ ॥ चैत्रे दर्शो ममोद्देशादन्नदानं करिष्यति । भविष्यति ममोद्धारस्तत्क्षणात्रात्र संशयः । २०३ । इति तद्वचनं श्रुत्वा पुनः प्रोक्तः स वै मया । वर्तते क्व सुतस्ते हि किंनामा वद मां प्रति । २०४ ॥ ततस्तेन यथा प्रोक्तं भारद्वाजाय निष्छलम् । तत्प्रोक्तं च मया सर्वं निकटे तव भो द्विज ॥ २०५ ॥ पिशाचं हि पुनश्चाहमुक्तवान् तद्गताशयम् । रामेश्वरार्थे भो पिशाच नीयते जाह्नवीजलम् । २०६ । मया कण्डमध्ये हि यदा गच्छामि दक्षिणाम् । दिशं कालेन काञ्चीं हि प्रवेक्ष्यामि यदा तदा । २०७ । तत्र पुत्राय वृत्तं हि कथयिष्याम्यहं तव । इति मद्द्वचनं श्रुत्वा सन्तोषं परमं गतः ॥ २०८ ॥ पिशाचः प्राह मां विप्र स्तुत्वा नत्वा पुनः पुनः । अवश्यमेव वक्तव्यं मे वृत्तं मम सूनवे २०९ । यथा दृष्टं त्वया पांथ यथोक्तं च मया तव । अन्यच्च कथ्यतां तस्मै मम पुत्राय सादरम् । २१० । मधुदर्शोऽन्नदानस्य महिमा श्रूयते दिवि । शतस्वं हि ममोद्देशादन्नदानं मधौ कुरु ॥ २११ । एवमुक्त्वा स पिशाचः शपथं मां चकार ह । न ब्रूषे स्मरणं कृत्वा मम पुत्राय तद् द्विज । २१२ । भविष्यति वृथा सर्वयात्रा तव महामते । इति मद्द्वचनं श्रुत्वा सान्त्वयित्वा च तं पुनः ॥ २१३ । निर्गतोऽस्मि मधौ स्नातुमयोध्यां गङ्गादरात् । कृत्वाऽयोध्यापुरीनद्ये चैत्रस्नानं महाफलम् ॥ २१४ । यदा गच्छामि तां काञ्चीं तदा तस्मै वदाम्यहम् । अतश्च मया प्रच्छन्नं शृङ्गीद्विजोत्तमः । २१५ ॥
सुनाने लगा ॥ १९७ । उस कीर्तनके श्रवणसे उसे अपने पूर्वजन्मका स्मरण आ गया और आतंकके साथ 'त्राहि त्राहि' कहकर चिल्लाने लगा । मैंने उससे पूछा कि तुम क्यों इस पिशाचशरीरको प्राप्त हुए हो, सो मुझे शीघ्र बताओ। मेरी बात सुनकर पिशाचने कहा—॥ १९८ ॥ १९९ ॥ हे विप्र ! पूर्वजन्ममें काञ्चीपुरीनिवासी मैं दुण्डिनामका ब्राह्मण था । उस जन्ममें मैंने कभी थोड़ा भी अन्नदान नहीं किया था ॥ २०० । इसी कारण इस पिशाचदेहको प्राप्त हुआ हूँ। उसकी बात सुनकर मैंने कहा—किस उपायसे तुम पिशाचयोनिसे मुक्त होओगे ? यह सुनकर उसने कहा कि यदि चैत्रकी अमावास्याको मेरा पुत्र मेरे लिए अन्नदान करे तो तत्काल मेरा उद्धार हो जाय इसमें कोई संशय नहीं है । २०२ । २०३ । २०४ । इस प्रकार उसका वचन सुनकर मैंने पूछा कि तुम्हारा वह लड़का कहाँ रहता है ? उसका नाम बतलाओ ॥ २०४ । इसके बाद उसने शुद्ध सब परिचय बतला दिया, जो क्या मैंने आपसे कहा है । २०५ ॥ फिर मैंने कहा—हे पिशाच ! मैं इस काँवरमें गङ्गाजल लिये रामेश्वर शिवपर चढ़ाने जा रहा हूँ । कुछ दिनों बाद जब मैं दक्षिण दिशाकी ओर लौटूँगा तो काञ्चीपुरी अवश्य जाऊँगा । वहाँ पहुँचकर तुम्हारे लड़केको तुम्हारा सब समाचार कह सुनाऊँगा । इस बात सुनकर वह बहुत प्रसन्न हुआ और मुझे बार-बार प्रणाम करके उसने कहा— हे विप्र ! मेरा वृत्तान्त मेरे पुत्रसे अवश्य कहिएगा ॥ २०६-२०९ । आपने मुझे जो अवश्य देखा है व कुछ मैंने आपको बतलाया है और इसके अतिरिक्त जो जो उचित समझिए, वह सब कह देने की कृपा कीजिएगा ॥ २१० ॥ सुनता हूँ कि चैत्रामावास्यामें अन्नदान करनेका बड़ा माहात्म्य है । इसीलिए तुम चैत्रमास में मेरे उद्देश्यसे अन्नदान करो । ऐसा कहकर उसने मुझे शपथ दिलायी कि यदि आप ख्याल करके मेरे सन्देशको मेरे पुत्र से नहीं कहेंगे तो हे महामते आपकी यात्रा व्यर्थ हो जायगी । उसकी बात सुनकर मैंने बार-बार उसे सान्त्वना दी और चैत्रस्नान करनेके निमित्त अयोध्या चल पड़ा । महाफलदायी चैत्रमासका स्नान करनेके अनन्तर जब मैं कांची जाऊँगा तो उसके पुत्रको पिशाचका सन्देश सुना दूँगा । इसीलिए मैंने आपसे शृङ्गीके विषयमें पूछताछ की है
सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् १९७
सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् १९७
प्रोक्तं गोत्रादिभिर्लिङ्गैर्वर्तते चेद्वदस्व माम् । इति शंभुः पितुर्दुःखं श्रुत्वा मूर्छां जगाम ह ॥२१६॥ आश्वासितश्च भिल्लेन विप्रः प्रोवाच तं पुनः । भो भोः कर्पटिकश्रेष्ठ न ममोऽस्ति नरोऽधमः ॥२१७॥ यस्त्वया पृच्छ्यते शम्भुः सोऽहं विद्धि न संशयः । मया पुत्रेण न कृतं स्वपितुर्मुक्तिदायकम् ॥२१८॥ जन्नदानादिकं कृत्यं विधिषङ्गेमेऽयं वृथा भवः । इदानीं तव वाक्येन दास्याम्यत्र मया पितुः ॥२१९॥ एवं शम्भुः कर्पटिकाय चोक्तवाऽयोध्यां रम्यां दृष्ट्वे वै ददर्श । ते प्रणेमुर्जनां दम्पतीर्थाथभिल्लास्ततः शंभुश्चावदन्कर्पशं सः ॥२२०॥
शंभुरुवाच
पश्य पश्य महाप्राज्ञ मद्यायोध्यापुरीं शुभाम् । यस्यां स्नातुं समयाता दृश्यन्ते कोटिशो जनाः ॥२२१॥ जनीघानां ध्वनिरियं श्रूयते मेघशब्दवत् । नानाध्वजपताकाश्च दृश्यन्ते चेन्द्रचापवत् ॥२२२॥ यद्वा वाय्वग्निहोत्रस्य श्रूयते हि मनोहरः अग्रिहोत्रात्रिधूमैर्यन्त्यामं पश्य नभोऽङ्गणम् । कैलासगिरिसङ्काशानि पश्य सौधानि सर्वशः ॥२-३॥
| सरप्रतीकौपरिखावलयीकृतमेखलाम् । | सुबृहद्धर्म्यां विलसत्पताकाशतसंकुलाम् ॥२२४॥ |
| अभ्रंलिहमहापीतसुवर्णकलशोज्ज्वलाम् । | पश्यैषां पाद्यपूर्णां श्रेष्ठा मयपूरीरनादिताम् ॥२२५॥ |
| हाटकाद्याटिता रत्नखचितैर्वा कपाटर्कैः । | सुसंवृतैर्निवृतैः संसर्पिसर्पणीव लक्ष्यते ॥२२६॥ |
| दीधूयमानैररुना पताकांचलपुस्तैः । | आह्वयन्तीव पुरतो लक्ष्यन्ते पथिकान् जनान् ॥२२७॥ |
| अधःकृताधोभुवना जेतुमेकामरावतीम् । | प्रासादशलव्याजेन मन्वद्रैवाथ लक्ष्यते ॥२२८॥ |
| पवित्रे ऽस्मिन्महाक्षेत्रे निवसन्ति निरोगिताः । | ब्रह्मेशबर्हगादिः मरुद्गणास्ते कायगोपकाः ॥२२९॥ |
| कुबेरस्पर्द्धया यत्र चिन्वन्ति वसुमन्यवान् । | दानु मोक्तुं जनाः सर्वे स्वधर्मनिरताः सदा ॥२३०॥ |
| गेहे गेहे सदानन्द एवार्याद्यत्र वै पुरि । | पेषां प्रक्षालयन्ति स्म चरणान्नवापवादिकाः ॥२३१॥ |
इस तरह अपने पिताका वृत्तान्त सुनकर शम्भु मूच्छिर्त हो गया । २१६-२१५ । उसकी यह दशा देखकर उस भील और ब्राह्मणने उसे बहुत कुछ आश्वासन दिया । होशमें आकर शम्भुने कहा- हे कर्पटिकश्रेष्ठ ! जिस शम्भुके बारेमें आप पूछ रहे हैं, वह मैं ही हूँ । मेरे बराबर अधम और कोई नहीं हो सकता । मुझ अधम पुत्रने अपने पिताको मुक्ति के लिए कुछ भी अनुष्ठान नहीं किया । मेरे जन्मपर धिक्कार है; मैं अब आपके कथनानुसार इस तीर्थस्थान में अवश्य अन्नदान दूँगा । २१६ - २१७ - २१८ ॥ २१९ ॥ ऐसा कहकर शम्भु चल पड़ा और रम्य अयोध्या नगरीको दूरसे देखकर उस गृहस्थ, उक्त पथिक एवं भीलने प्रणाम किया और शम्भुने पथिकसे कहा - हे महाविज्ञ, इस अयोध्यापुरीको देखो जिसमें स्नान करनेके लिए करोड़ों मनुष्य आये हुए हैं ॥ २२० ॥ २२१ ॥ महान् जनसमुदायका ध्वनि मेघगर्जनके समान सुनायी दे रही है। उड़ती हुई विविध प्रकारकी पताकायें इन्द्रधनुषके समान देख पड़ रही हैं, अग्निहोत्री मनोहर ध्वनि सुनायी देती है। अग्निहोत्रके धूमसे सारा आकाक्षमण्डल भर गया है। हे हर्यक्ष ! यहाँ कैलासशिखरके समान उज्ज्वल और ऊँचा अट्टलिकायें दीख रही हैं । २२२ - २२३ । दीपों अटालियों और परिखाओंसे सारी नगरी घिरी हुई है। ऊँचे ऊँचे भवन बने हैं और उनपर सैकड़ों पताकायें फहरा रही हैं। आकाशको छूनेवाले बड़े बड़े भवनोंपर सुवर्णके कलशोंसे मयं अयोध्यापुरी शोभित हो रही है। सोने, चाँदीके और मणियोंसे मण्डित दरवाजोंसे भरा नगरी उनके खुलने और बन्द होनेपर ऐसा लगता है कि वह खल्क खींच छोड़ रही है। पताकाओंके अंचल चालन द्वारा उसपर ज्ञात होता है कि यह नगर दूर हाल में पथिकोंको बुला रहा है ॥ २२४-२२७ । इस नगरीने अपनी शोभासे पाताललोकको भी नीचा दिखा दिया है। अब केवल अमरावती पुरीको जीतना बाकी है। सो ऐसा लगता है कि प्रासादरूपी शुण्डको लिये हुए यह पूरी इंद्री श्री जीतनेकी तैयारी कर रही है। इस पुनीत क्षेत्रमें ब्रह्मा, विष्णु और शिवके साथ-साथ सब देवता और ऋषि गुप्तरूपसे निवास करते हैं । २२८ । २२९ ॥ यहाँके निवासी कुबेरको मातनेके लिए और दान तथा त्यागके सामने सर्वदा बद्धीर रहते हैं ॥ २३० ॥ इसी पुरीमें
३९८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ११
ते द्विजाः कस्य नो वन्द्या अयोध्यानागरीस्थिताः । औदार्ये कल्पतरवो गांभीर्ये सागरा इव ॥२३२॥ क्षमया क्षमया तुल्या जंगमा निगमा इव । दैन्यग्राहमहाग्रामाधिपामगस्त्यमहर्षयः ॥२३३॥ निवसंति द्विजा यत्र षड्धाः सर्वमहीभुजाम् । चतुर्वर्गफले पेत चतुरश्रममुज्ज्वलम् ॥२३४॥ चातुर्वर्ण्यमिहैवास्ते चतुरम्नायमाश्रगम् । कृमिकीटपतङ्गानां विना ज्ञानमयाभिभिः ॥२३५॥ अत्र निर्वाणपदवी सुलभाऽस्ति वनैचर । एतःपानघटान् भोक्तुं तरगान्कुश्यानिव ॥२३६॥ बिभर्ति धरणीतोयं निःश्रेणिर्योगमोक्षयोः । पश्य स्फाटिकसोपाननिविष्टमुनिसंस्तुताम् ॥२३७। सरयूनदीमुत्तराशां कुतामिव पुरन्दरा । इन्द्रनीलमहातुंगप्रतोलीचारुदर्शनाः ॥२३८॥ रामचन्द्रस्य दिव्योऽयं प्रासादस्तुलितारुणः । प्रतोली यस्य घटिता काश्मीरुपलैर्वरैः ॥२३९॥ सीतायाश्च महानैष प्रासादो रत्नतोरणः । नानारत्नैर्मण्डितश्च हेमस्तंभविराजितः । २४०॥ स्फटिकैरुपलैश्चित्रः मण्यूटीरसंश्रितः । रामतीर्थसमीपेऽयं सीतारामस्य वै पर ॥२४१॥ प्रासादो विमलो भाति तप्तकांचननिर्मितः । पताकाभिविचित्राभिः कलशैः सुविराजितः ॥२४२॥ उभयंजांबनदरत्नकुम्भः प्रवालवैदूर्यनिबद्धभूमिः । हेमप्रतोलीरचितः स एष प्रासादवर्योऽस्ति हि लक्ष्मणस्य । २४३ । चातुर्यं यत्र विश्रान्तं सकलं विश्वकर्मणः । सोऽयं भरतराजस्य प्रासादो हेमतोरणः । २४४ । तथा देदीप्यमानोऽयं रत्नभित्तिविनिर्मितः । प्रसादो दृश्यते रम्यः शत्रुघ्नस्य शुभावहः ।२४५। स्फटिकैर्भित्तिभिर्भित्तः प्रोच्चः कनकगेहिनः । प्रासादो वायुपुत्रस्य दृश्यतेऽयं महोज्ज्वलः, २४६।। य एष मुक्ताफलजालशोभी सुदर्शनार्कः खगराजकेतुः । कुशस्य रम्यस्त्वयमाविरास्ते प्रासादकुग्म किमु बालसूर्यः । २४७।
सदा आनन्द छाया रहता है। जहाँके निवासी ब्राह्मणोंके पैर इन्द्रादि देवता भी धोया करते हैं, तब व भला किसके वन्दनीय न होंगे। यहाँके विप्र उदारताम कल्पवृक्ष, गम्भीरतामें समुद्र, क्षमामे पृथ्वी, जंगमोंमें वेद तथा दरिद्रतारूपी महान् समुद्रके शोषणम अगस्त्यके सदृश हैं। संसारके सब राज इनकी मस्तक झुकाकर प्रणाम करत है। इनको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पदार्थांमें किसकी भी कमी नहीं रहती। ये आनन्दके मध्य ब्रह्मचर्य, गृहस्थ वानप्रस्थ एवं संन्यास, इन चारो आश्रमोंका उपभोग करत है ॥ २३१-२३४ ॥ यहाँपर चारों वेदोंके अनुसार चार वर्णके लोग निवास करत हैं। हे वनचर यहाँ ज्ञान और समाधिके बिना ही कीट-पतङ्ग आदिकोके लिए भी मुक्ति सुलभ है। यहाँ पापरूपी घड़ोंका जल पीनेके लिए योग और मोक्षकी निसेनी बनकर सरयूका जल शोभित हो रहा है। देखो न स्फटिक मणिकी बनी सीढ़ियोंपर मुनिगण बैठै हुए स्तुति कर रहे हैं। अयोध्याका उत्तर दिशामे इन्द्रनीलमणिसे बने मार्गके समान सुन्दर सरयू नदी बह रहा है । २३५-२३८ ॥ यह रामचन्द्रजीका दिव्य और ऊँचा प्रासाद है, जिसमें ऊँच कंगूरे बने हुए हैं। इसके आस-पासके मार्ग कश्मीरीक पत्थरोंस बने हैं ॥ २३६ ॥ इस ओर सीताका महाभवन दिखाई पड़ता है। जिसमें रत्नके तोरण और सुवर्णके स्तम्भ लगे हुए हैं ॥ २४० ॥ जहाँ तहाँ स्फटिक मणिके पत्थर लगे हैं, जिससे यह चित्र-विचित्र मालूम पर रहा है। रामतीर्थके पास ही सीता-रामका एक दूसरा भवन सुवर्णसे बना है। उसमें भी विचित्र प्रकारकी पताकाएं लगी हैं और सुन्दर कलश सुशोभित हो रहे हैं ॥ २४१ ॥ २४२ ॥ जिसमें उभारे सुवर्ण तथा रत्नोंके कलश हैं सुन्दर प्रनाल और वैदूर्यमणिकी दीवारें बनी हैं। इसके भी आस पास सुवर्णके माग बने हैं। यह श्रीलक्ष्मणजीका भवन है ॥ २४३ ॥ वह सामनेका भवन जिसके बनानेमें विश्वकर्माकी सारी चातुरी समाप्त हो चुकी है, श्रीभरतजीका भवन है। इसमें भी सुवर्णके तोरण लगे हुए हैं ॥ २४४ ॥ रत्नोंसे बनी दीवारवाला यह रम्य प्रासाद शत्रुघ्नजीका है । २४५ ॥ चांदीका कोठा ओर स्फटिक मणिसे बनी दीवारका यह सुवर्णमय प्रासाद वायुपुत्र श्रीहनुमान्जीका है ॥ २४६ .
सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६९९
सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६९९
प्रासादोऽयं लवस्यात्र बहुरत्नविराजितः । यत्र चित्राण्यनेकानि मोहयन्ति मृगीदृशाम् ॥ २४८॥
चक्षूंषि जातरूपाणि योगिनामपि मानसम् । विन्यस्तरत्नविन्यासः शातकुम्भमयी बहिः ॥ २४९॥
हेमपंक्तिव सततं रत्नभानुमहाप्रभाम् । रत्नप्रासादसंयुक्तामयोध्यां पश्य सुप्रभाम् ॥ २५०॥
यदंगणं क्षालयती मदांधं स्वोर्म्यजलैः सोऽयमगर्व्यन्नः ।
अभ्रंकषैर्हेममयैः स्वकुंभैर्विराजितोऽय खलु चित्रकेतोः । २५१ ।
दिव्यप्रवालघटिते कपाटे यत्र चञ्चले । प्रासादोऽयमंगदस्य रुक्मभित्तिर्विनिर्मितः ॥ २५२।
गरुडोद्गारघटितप्रतोलीपरिशोभितः । प्रासादः पुष्कगस्यायं नयनानंदतो नृणाम् ॥ २५३॥
विशुद्धजांबूनददिव्यभूर्मेर्लसत्पताकश्चिदशामिवद्यः ।
प्रासाद एषः परमो मनोज्ञस्तक्षकस्य वीरस्य महान् विभाति ॥ २५४॥
यस्याधिभूमि नवरत्नसिंहास्मिंश्च यदैव विजिताखयोऽपि ।
लोकश्चतुर्थो न हि दृश्यतेऽतः पद ममुद्यम्य किमाविरास्ते ॥ २५५॥
अघोवमनकरिणां घटा टापयितुं किमु । उद्धस्तहस्तो यस्य रत्नसिंहो विराजते । २५६॥
सोऽयं हेमभित्तिमयः प्रासादः प्रलन्तः शुभः । सुवाहो पश्य भो भित्त्रुरत्नमानुविराजितः । २५७॥
रत्नप्रवालस्फटिकनीलकाश्मर्वनिर्मितः । प्रासादोऽयं पुण्ड्रकेतोर्महान् दोपिमरः शुभः । २५८॥
कल्हाररुत्पलैः शोणैररविन्दैः शतपत्रकै । विराजित पराङ्गह रमनीयं प्रदृश्यते ॥ २५९॥
इन्दुर्यलं रवितलेनिविद्धा यम्य भूमरः । हरंति ग्रीष्ममनापं निश्चिदर्माकरोत्करः । २६०॥
अमंदकुरुविंदानां रिन्तामैर्यत्र बाहभिः । मद्यन्ति शुकयेनापि मृदृष्टाडिमशंकया । २६१॥
एवं पश्य शुभां रम्यां पताकाभिर्विराजिताम् । विहायोध्यां मुक्तिपुरीं द्वितीयाममरावतीम् ॥ २६२॥
जिसमें म तियोश्री जाल लगे हैं, सुदर्शन चक्र एवं गरुडके चिह्न मिश्रित पताकायें फहरा रही हैं, बालसूर्यकी तरह सुन्दर यह भवन कुशलका है ॥ २४८ बहुरत्न रत्नोंसे विराजित यह लवका दिव्य भवन है, जिसमें बने हुए चित्र स्त्रियोंका मन मोह लेते हैं ॥ २४८ ॥ जहाँ कि याचियोंकी बात कौन अहङ्कार शान्तभी बन जाती है, जिस नगरीके भवनोंमें विविध प्रकारके रत्नोंकी पच्चाकारी की हुई है, जिसके बाहरकी भूमि सुवर्णमयी है, जिसकी अटारियों सूर्यमुकुटकी तरह देदीप्यमान हो रही है, उस अयोध्यापुरीको देखो । जिसके प्रांगणको धोता हुई यह सरयू नदी विराजमान है। आकाशको छूनेवाले बावण रत्नदीप कलशोंसे सुशोभित यह पूरी साक्षात् चित्रकेतु गन्धर्वकी पुरीके समान सुन्दर दीख रही है ॥ २४९-२५१ ॥ दिव्य प्रवाल मणिसे बने हुए कपाट जिसमें लगे हैं और सुवर्णकी दीवारें बनी हैं यह अङ्गदका भवन है। गरुड़मणिकी जिसमें प्रतोलीयाँ बनी हैं, नयनोंका आनन्द देनवाला वह भवन पुष्करका है। जिसके फर्श विशुद्ध सुवर्णकी बनी है और सुन्दर पताकायें जिसमें फहरा रही हैं, यह परम मनोज्ञ प्रासाद वीर तक्षकका है। २५२-२५४॥ इधर देखो, नवरत्नमय सिंह विद्यमान है। इस नवरत्नमय सिंहकी बड़ी महिमा है। इसके प्रभावसे वामन भगवान्ने तीन पैरसे तीनों लोकोंको नाप लिया था। चौथा कोई लोक ही नहीं बना था, जिसे नापते ॥ २५५॥ जिसके घरमें ऊपरकी पेंड उठाये नवरत्नका सिंह विराजमान हो तो अघ (पाप) रूपी मतवाले हाथियोंका उसे कुछ भी भय नहीं रह जाता ॥ २५६ ॥ हेमभित्तिमय रत्नके शिखरम विराजित यह प्रासाद सुबाहुका है ॥ २५७ ॥ रत्न प्रवाल, स्फटिक और नीलम काश्मीरसे निर्मित यह प्रासाद पुण्ड्रकेतुका है ॥ २५८ ॥ कल्हार उत्पल, कोक, अरविन्द तथा शतपत्रसे विराजित समस्त पापोंको हरनेवाला यह रमणीय दिखलाई पड़ रहा है ॥ २५९ ॥ जिसकी भूमि चन्द्रकान्त मणिसे बनी है। अर्थात् टपकते हुए ठंढे जलोंकी बूंदोंके गिरनेसे ग्रीष्म-ऋतुका सन्ताप दूर हो जाता है। दमकते हुए कुरुविन्द मणिके लगे रहनेसे यहां शुकोंने मूंग और अनारके फलका भ्रम हो जाता है। २६० ॥ २६१ ॥ इस प्रकारकी सुन्दर, रम्य और पताकाओंसे विराजित दूसरी
७०८ आनन्दरामायणे [सर्गः ११
यत्र कार्त्तस्वरघटाः प्रतोलीशिरसि स्थिताः। रामं द्रष्टुमनस्तान प्राप्ताः सूर्या इवांबभूः ॥ २६३॥
नृसिंह उवाच
एवमुक्त्वा कर्कशेन पत्न्या कार्पटिकेन च । सहितश्च तदा शंभुस्सो पुरीं संविवेश सः ॥ २६४॥ रामतीर्थं ततो गत्वा कृत्वा क्षौरादिकं विधिम् उपोष्य दिनमेकं हि तीर्थश्राद्धं चकार सः ॥ २६५॥ अमावास्यां शुभां चैत्रे प्राप्तां ज्ञात्वा द्विजोत्तमः। मुक्त्यर्थं स्वपितुश्चक्रे अन्नदानं यथाविधि ॥ २६६॥ तच्चैत्रमासे रजनीशमक्षये दत्तं पितुर्मुक्तिमदं मनोहरम् । विप्रेण चान्नं पथिकस्य वाक्यतस्तस्मात्पिशाचः सुरमञ्च निर्ययौ ॥ २६७॥ अयोध्यायां ततः शंभुः कृत्वा चैत्रेऽवगाहनम् । उद्यापनविधिं चापि यथोक्तं च चकार सः ॥ २६८॥ कर्कशोऽपिमधौ स्नात्वा मुक्त्वा पापीयमुत्तरम् अयोध्यानगरीमध्ये साधुवृत्त्याऽवसद्चिरम् ॥ २६९ । श्रीरामचिंतनं कुर्वन्निनायायुष्यमक्षयम् । ततः प्राप हरेर्लोक मयोध्यामरणेन सः ॥ २७०॥ शंभुर्रापि मधौ स्नानं कृत्वा कांचीपुरीं पुनः गंतुं प्रतस्थे श्रीरामं नत्वाऽयोध्यां पुनः पुनः॥२७१ भार्यया सहितः शंभुस्तेन कार्पटिकेन च ययौ पूर्वेश्च मार्गेण यत्र तौ करिकाहरी ॥ २७२॥ स्थापितौ शपथैः कृत्वा ह्युनेस्तत्र मखागमत् । दत्त्वा दिनद्वय पुण्यमुभाभ्यां मधुमासजम् ॥ २७३॥ दत्त्वा स्वीयांजलौ तोयं तयोर्मुक्ति चकार सः । ततस्तौ करिमिहौ च दिव्यमाल्यनुलेपितौ । २७४॥ दिव्यं विमानमारुह्य विष्णुलोकं गतावभौ ततोऽग्रे द्विजवर्य्यः सः ययौ मार्गेण भार्यया ॥ २७५॥ स यत्र राक्षमुः पूर्वं स्थापितः शपथैर्वने । तं दृष्ट्व राक्षसश्रेष्ठं भार्या प्राह द्विजोत्तमः ॥ २७६॥ अपि काण्डाष्ट्ये रम्ये शृणु मे वचनं शुभम् । या त्वया शीतला गौरी स्नाता वै सरयूजले । २७७। तस्यैकदिवसस्याथ देहि पुण्यं शुभावहम् । राक्षसाय हि मद्वाक्याद्गृहीत्वा जलमञ्जलो ॥ २७८॥
अमरावतीपुरके समान ददीप्यमान इस अयोध्यापुरीको देखो ॥ २६२ ॥ जहाँ कि प्रतोलीके मस्तकपर विराज- मान सुवर्णके भवन ऐसे दीख रहे हैं, जैसे अनन्त सूर्य एक साथ रामचन्द्रजीका दर्शन करने आ गये हों ॥ २६३ ॥ नृसिंहने कहा- इस तरह कहकर अपनी पत्नी, कार्पटिक तथा कर्कशके साथ-साथ शम्भु अयोध्या पुरीमें प्रविष्ट हुआ ॥ २६४ ॥ पहल रामतीर्थपर पहुंचकर उसने क्षौर बादि कराया और एक दिनका उपवास करके तीर्थश्राद्ध किया ॥ २६५ ॥ जब चैत्रकृष्ण अमावास्या तिथि आयी ता उसने अपने पिताकी मुक्तिके लिए विधिवत् अन्नदान किया ॥ २६६ ॥ उस चैत्रमासमें अमावास्या को शम्भुने कार्पटिकके कथनानुसार जो अन्नदान किया, उसके पुण्यसे तत्काल उसका पिता पिशाचयोनिसे मुक्त होकर स्वर्गको चला गया ॥ २६७ ॥ तदनन्तर शम्भुने अयोध्यामें चैत्रस्नान और शास्त्रोक्त विधिसे उसका उद्यापन किया। कर्कश भी चैत्रस्नान करके सब पापोंसे मुक्त हो गया और साधुवृत्तिसे उसी अयोध्यामें ही बहुत दिन बिताये ॥ २६८ व २६९ ॥ अन्तमें रामका स्मरण करते-करते उसने शरीर त्याग दिया । अयोध्यामें मरनेसे उसे विष्णुलोककी प्राप्ति हुई ॥ २७० ॥ शम्भुने भी स्नान करनेके बाद श्रीरामचन्द्रजीको बारम्बार प्रणाम करके काञ्चीपुरीको जानेकी तैयारी की ॥ २७१ ॥ अपनी स्त्री और उस कार्पटिकको साथ लेकर शम्भु उसी मार्गसे लौटकर उधर चला, जहाँ कि अयोध्या आने समय सिंह और हाथीको छोड़ आया था । २७२ ॥ वहाँ पहुंचकर उसने हाथमें जल लिया और चैत्रस्नानके पुण्यमेंसे दो दिनका पुण्य देकर उन दोनोंकी उस योनिसे मुक्ति कर दी। इसके अनन्तर वे दोनों हाथी और सिंह दिव्यमाल्यसे अलंकृत हो और दिव्य विमानपर बारूढ़ होकर विष्णुलोकको चल गये। इसके बाद शम्भु अपनी स्त्रीके साथ आगे बढ़ा ॥ २७३-२७५ ॥ जात जात वह उस स्थानपर पहुंचा, जहाँ कि जाते समय शपथ करके उस राक्षसको वनमें छोड़ आया था । वहाँ राक्षसको सामने देखकर शम्भुने अपनी स्त्रीसे कहा- हे काणिके ! जो तुमने शीतला गौरीको व्रत किया है। हाथमें जल लेकर उसके एक दिनका पुण्य इस राक्षसको दे दो ॥ २७६-२७८ ॥
सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ७०१
इति शंखुवचः श्रुत्वा पद्मनेत्रा कृशोदरी । काशीनाम्नी द्विजपत्नी ददौ पुण्यं निजं तदा ॥२७९॥ दत्तः स राक्षसंभ्रंशस्त्यक्त्वा देहं मलीममम् । दिव्यं विमानमारुह्य गन्वा भार्यायुतं द्विजम् ॥२८०॥ दिव्यमाल्यांबरधरो हरिलोकं जगाम सः । शम्भुरपि प्रियायुक्तो मधुमामं विवर्णयन् ॥२८१॥ ययौ कांचीपुरीं श्रेष्ठां जनान् वृत्तं निवेदयन् । भो पिशाचा यथा वृत्तं भवद्भिश्श्च कथानकम् ॥२८२॥ तन्ममं च मयाऽऽख्यातं राक्षमोद्धारणादिकम् ।
श्रीरामदास उवाच
इत्युक्त्वा नृहरिर्विप्रो गृहीत्वा स्नांजले जलम् ॥२८३॥
| ददौ दिनद्वयस्यास्य पुण्यं चैत्रकृतं निजम् | ततः प्रोवाच भार्यां तु रम्ये चन्द्रसमे प्रिये ॥२८४॥ |
| या त्वया शीतलागौरी स्नाता सीताकृते वरे | तीर्थे वरस्य दिनैकस्य देहि पुण्यं शुभानने ॥२८५॥ |
| पिशाचिन्यै समुद्धर्तुं मा विचारोऽस्तु ते हृदि | इति भर्तुर्वचः श्रुत्वा रम्भा पद्मवलोचना ।२८६॥ |
| रूपीनाम्नी मम माता ददौ पुण्यं निजं तदा | ततः पिशाचास्ते सर्वे मुक्ताः शीघ्रं शुभावहाः ॥२८७॥ |
| निजरूपाणि वै प्रापु प्रणेमुर्नृहरिं जवान् । | नत्वा स्तुत्वा पुनर्नत्वा नृसिंहं तं प्रियायुतम् ॥२८८॥ |
| आपृच्छय जग्मिरे सर्वं स्वगुरोग्रहमं प्रति | गुरुश्चापि सुतां स्वीयां तां ददावतिहर्षितः ॥२८९॥ |
| तपोन्वेष्ठाय शिष्याय कनिष्ठ यापरां सुताम् । | स्त्रीयोदमगुणोपेतां ददावप्रतिमां वराम् ॥२९०॥ |
| सतस्त्री मखियो विप्रौ जग्मतुर्ना मुदान्वितौ | स्वस्वपितुराश्रमं हि तथास्तां पितरावपि ॥२९१॥ |
| दृष्ट्वा पुत्रौ समायातौ सस्त्रियौ तोषमापतु | नृहरिश्च पिशाचुक्तोऽब्जक प्रति समाययौ ॥२९२॥ |
| चैत्रस्नानेन तत्पुत्रो रामदासाभिधस्त्वहम् । | जातस्ततस्तौ देहान्ते जग्मतुर्विष्णवं पदम् ॥२९३॥ |
| एवं शिष्य मधुस्नानमहिमा बहुभिर्नरैः । | दैवैः सिद्धैश्च गंधर्वैः सदाऽनुभवितोऽस्ति हि ॥२९४॥ |
| तस्मान्मापावश्यस्य हि स्नात्वार्थं मानवोत्तमैः | रामतीर्थेषु सर्वत्र रामचन्द्रं प्रपूजयेत् ॥२९५॥ |
इस प्रकार शंखुकी बाता सुनकर उस काशी नाम्ना द्विजपत्नी ने अपना पुण्य उसका दे दिया ॥ २७९ ॥ इसके प्रभावस उस राक्षसने अपनो वह अधम देह छोड़ दा और दिव्य विमानपर चढ़कर ब्राह्मण तथा ब्राह्मण-पत्नीको प्रणाम करता हुआ विष्णुलोकको चला गया । शम्भु भा चैत्रमासक माहात्म्यका वर्णन करता हुआ कांचीपुरीका चल पड़ा। हे पिशाचगण ! आठ ताषोन जो कथा पूछी, सा राक्षसके उद्धारस सम्बन्ध रखनेवाली सब बात कह सुनायी। रामदासने कहा-ऐसा कहकर सोमहूत बजनाम जल लिया और अपने चैत्रस्नानके पुण्यमसं दो दिनका पुण्य उस न दिया। फिर अपनी स्त्रीस कहा कि तुमन असमे जो शीतला गौरीका स्नाव किया है। उसमसे एक दिनका पुण्य इस पिशाचिनीका द दो ॥ २८०-२८५ ॥ इससे इसका उद्धार हो जायगा । इसपर कुछ विचार मत करो। इस प्रकार स्वामीकी आज्ञा सुनकर उस कमलनयनाने अपना पुण्य दे दिया। तब शीघ्र ही वे सब पिशाचयोनिसे मुक्त होकर ॥ २८६ ॥ २८७ ॥ अपने-अपने रूपको प्राप्त हा गये। इसके अनन्तर उन्होंने नृसिंहको प्रणाम किया, बारम्बार उनका स्तुति की और उनसे पूछकर अपने गुरुके आश्रमको चल गये। गुरुन भी अतिशय हर्षित होकर अपन कन्या उन्हे दे दा। उनमें ज्येष्ठ भ्राताको ज्येष्ठ कन्या तथा कनिष्ठको एक दूसरी सर्वो कन्या समर्पित की ॥ २८८-२९० ॥ इसके अनन्तर वे दोनों अपनी-अपनी स्त्रींको साथ लेकर पिताके आश्रमपर गये ॥ २९१ ॥ उनके माता-पिता भी स्त्र के साथ अपने बेटको आते देखकर प्रसन्न हुए। नृसिह भी अपनी भार्याक साथ अब्जक नगरको चल गये ॥ २९२ ॥ चैत्रस्नानके पुण्यसे उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम रामदास है और वह मैं हूँ। कुछ दिनों बाद मेरे माता-पिताका देहांत हो गया और वे विष्णुलोकको प्राप्त हुए ॥ २९३॥ हे शिष्य ! इस प्रकार चैत्रस्नानकी महिमाका कितने ही मनुष्य, देवता, सिद्ध तथा गन्धर्वाने अनुभव किया है ॥ २९४ ॥ इस कारण अच्छे मनुष्योको चाहिए कि चैत्रमासमें अवश्य
| ७०२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १२ |
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एवं त्वया यथा पृष्टं तथा सर्वं निवेदितम् । मया काऽन्या स्पृहा तेऽस्ति श्रोतुं तद्वद वच्म्यहम् ॥ २९६॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकाण्डे चैत्रस्नानमाहात्म्ये एकादशः सर्गः ॥ ११ ॥
द्वादशः सर्गः
( श्रीरामचन्द्र द्वारा अद्वैतभावका प्रदर्शन )
विष्णुदास उवाच
गुरोऽन्यद्रामचन्द्रस्य चरित्रं वद मां प्रति । शृण्वतो मे मुहूर्नास्ति तृप्तिः श्रोतुं स्पृहैधते ॥ १ ॥
श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु । एकदा हयमारूढो पुत्रबन्धुबलैः सह ॥ २ ॥
वनं ययौ विहारार्थं रामचन्द्रो मुदान्वितः । तत्र दृष्ट्वा मृगं श्रेष्ठं तं हन्तुं रघुनन्दनः ॥ ३ ॥
बाणमाकृष्य तत्पृष्ठे ययौ वेगेन सादरम् । वनाद्वनान्तरं रामा मृगस्य च पदानुगः ॥ ४ ॥
एकाकी हयमारूढो विवेश गहनं वनम् । पश्चाद्दूरस्थिताः सर्वे लक्ष्मणाद्या बलैः सह ॥ ५ ॥
रामोऽपि निजबाणेन मृगं हत्वा वनेऽचरत् । निर्जलेऽतितृषाक्रान्तः क्षुधाव्याप्तोऽप्यभूत्तदा ॥ ६ ॥
ततो रामो वृक्षतले क्षण तस्थौ श्रमान्वितः । तावत्तं शबरी काचिद् दृष्ट्वा रामं मुदान्विता ॥ ७ ॥
नृपं ज्ञात्वा राजचिह्नैस्तं प्रणम्य पुरःस्थिता । तां दृष्ट्वा राघवोऽप्याह वाक्यं शबरि मे शृणु ॥ ८ ॥
लक्ष्मणाद्याः स्थिता दूरं क्षुत्तृड्भ्यां पीडितोऽस्म्यहम् ।
किंचिद्यत्नं कुरुष्वात्र येन मेऽद्य सुखं भवेत् ॥ ९ ॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा शबरी वाक्यमब्रवीत् । इतोऽविदूरे आगच्छ दुग्धाब्धि सरसस्तटे ॥ १०॥
भीमवारेऽद्य नार्यश्च बहवोऽत्र समागताः । तत्र त्वं च मया राम यदि यास्यसि सांप्रतम् ॥ ११॥
स्नान करके रामतीर्थमें जाकर रामचन्द्रजीका पूजन करें ॥२९५॥ तुमने जो पूछा, मैंने सब कुछ कह सुनाया । अब क्या सुननेकी इच्छा है, सो कहो । मैं सुनाऊं । २९६ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योत्स्ना भाषाटीकासहित मनोहरकाण्डे एकादशः सर्गः ॥ ११ ॥
विष्णुदास बोले—हे गुरो ! अब रामचन्द्रजीका कोई और चरित्र सुनाइए । क्योंकि रामचरित्र सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं होती । जितना ही सुनता हूँ, सुननेकी इच्छा बढ़ती जाती है । १ ॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! तुमने बहुत ही अच्छी बात कही है, अब सावधान मनसे मेरी बात सुनो । एक बार घोड़ेपर सवार होकर रामचन्द्रजी अपने भाइयों, पुत्रों तथा सेनाके साथ मृगयाविहार करनेके लिए वनमें गये । वहाँ एक अच्छा-सा मृग देखा और उसे मारनेके लिए धनुषपर बाण चढ़ाकर उसके पीछे-पीछे दौड़ चले । जाते-जाते वे गहन वनमें पहुँच गये । फिर भी राम एक वनसे दूसरे और दूसरेसे तीसरे वनमें मृगके पीछे-पीछे दौड़ते चले जा रहे थे । लक्ष्मण आदि साथी सेनाके साथ-साथ बहुत पीछे छूट गये २-५ ॥ अन्तमें बड़ी दूर जाकर रामने उस मृगको मारा । वह स्थान निर्जल था और उन्हें भूख-प्यास जोरोंसे लगी थी ॥ ६ ॥ वहाँ ही वे एक वृक्षके नीचे बैठ गये । उसी समय किसी शबरीने रामको देखा और उनको वेश-भूषासे पहचान लिया कि ये कोई राजा हैं । वह रामके पास जा तथा प्रणाम करके सामने बैठ गयी । उसे देखकर रामने कहा हे शबरी ! तू मेरी बात सुन ॥ ७ ॥ ८ ॥ मेरे लक्ष्मण आदि साथी पीछे छूट गये हैं। मैं भूख-प्याससे बहुत दुखी हूँ। तू कोई ऐसा उपाय कर कि जिससे मेरा दुःख दूर हो जाय ॥ ९ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर शबरीने कहा—हे राम ! यहाँसे थोड़ी दूरपर तालाबके
सर्गः १२] मनोहरकाण्डम् ७०३
तर्हि तत्र विचित्रान्नैरैस्तृप्तिं प्राप्स्यसि वै क्षणात् । तत्तस्या वचनं श्रुत्वा शबरीं प्राह राघवः ॥१२॥
अहमत्रैव तिष्ठामि प्रतीक्षार्थं कुशस्य च । तापस्य स्तरणादीनां संत्वरस्व वनवासिनि ॥१३॥
गच्छ त्वमेव तां दुर्गां स्त्रीभ्यं वृत्तं निवेदय । तद्रामवचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा त्वरान्विता ॥१४॥
स्त्रीर्गत्वा शबरी प्राह शृणुध्वं वचनं मम । गता गजोपपन्नाश्चे शूशूर्णं कर्तुमागतः ॥१५॥
अविदूरे पद्वनेऽके सुखासीनः स्थितोऽस्ति हि । तैनाहं प्रेषिताऽम्यद्य शुश्रावार्थे जगन्मनः ॥१६॥
युष्माकं कथितं वृत्तं तस्य गच्छाम्यहं पुनः । शबर्यास्तद्वचः श्रुत्वा ताश्चार्यैः प्रश्वयान्विताः ॥१७॥
अभिनन्द्य निजैर्वाक्यैः शबरीं तां मुहुर्मुहुः । परस्परं तदा प्रोचुस्ता वार्योः साऽग्रो मुदा ॥१८॥
धन्योऽद्य दिवसोऽस्माकं यस्मिन् राघवदर्शनम् । भविष्वति वरान्नैश्च तोषयामो रघूत्तमम् ॥१९॥
आदौ दुर्गां पूजयित्वा नैवेद्यं तां निवेद्य च । ततः समर्च्य रामाय माशयामञ्च वयं ततः ॥२०॥
इति संमन्त्र्य तां नार्यो रूपसालङ्कारशोभिताः । पीनकीर्णश्रोणिबिम्बो वराङ्ख्या मृगलोचनाः ॥२१॥
विप्रक्षत्रियवैश्यानां शूद्राणां चापि वेगतः । नैवेद्यपात्रैस्तां दुर्गां ययुर्नूपुरनिःस्वनाः ॥२२॥
एतस्मिन्नन्तरे देवी स्वालयस्य समन्ततः । कपाटानि दृढं बद्ध्वा तूष्णीमामाद्रिरीऽद्रजा ॥२३॥
ततस्ता द्वारमासाद्य द्वागं बद्धं निरीक्ष्य च । बभ्रमुः सर्वद्वाराणि न मार्गं लेभिरे स्त्रियः ॥२४॥
तदाऽऽश्चर्यमनाः सर्वा द्वारदेशे स्थिताः क्षणम् । तावदेवालयच्छिद्रो निर्गतः शुश्रुवुः स्त्रियः ॥२५॥
अहमेषात्र श्रीराद्धम्नि गतः साक्षात्महेश्वरः । ये भिन्ने मानयन्त्यत्र मां सीतां राघव हरम् ॥२६॥
ते कोटिकल्पपर्यन्तं पच्यन्ते रौरवेषु हि । अतो गृहद्विमो नार्यो मन्नाथं च जगत्प्रभुम् ॥२७॥
दोषयन्नं वरान्नैश्च तत्तेषेण त्वहं गतः । तुष्टा भवामि गच्छध्वं तृषितं तं रघूत्तमम् ॥२८॥
इति वार्यो वचः श्रुत्वा हैम्वत्या विस्मयान्विताः । दुद्रुवुर्जगदामिन्यः शबरीचर णानुगाः ॥२९॥
किनारे एक दुर्गा मन्दिर है ॥ १० ॥ आज मङ्गलवार है, इसलिए वहाँ बहुत-सी स्त्रियें आयी होंगी। यदि मेरे साथ यहाँ चलें तो आपका नाना प्रकारके विचित्र अन्न खानेको मिलेगा, जिससे आप क्षणभरमें तृप्त हो जायेंगे । शबरीकी सलाह सुनकर रामने उत्तर दिया कि मैं यहाँ कुश आदिकी प्रतीक्षा करता हुआ बैठता हूँ। हे वनवासिनि ! तू ही जाकर उन स्त्रियोंको मेरा हाल सुना दे। रामके आज्ञानुसार शबरी तुरन्त चल पड़ी ॥ ११-१४ ॥ उनने वहाँ पहुँचकर उन स्त्रियोंसे कहा-कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् रामचन्द्र यहाँ विश्राम कर रहे हैं। पास ही पद्मकल्पमें धूप/छायामें बैठे हैं। उन्होंने आप लोगोंको यह सन्देश सुनानेके लिये मुझे भेजा है ॥ १५ ॥ १६ ॥ अब आप लोग जाकर कुछ करें, यह कहकर मैं रामचन्द्रजीको सुना दूँ । शबरीकी बात सुनी तो विस्मित भावसे उन्होंने शबरीका धन्यवाद दिया और कहा- ॥ १७ ॥ १८ ॥ हमारे लिए आजका दिन धन्य है, जिससे श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन प्राप्त होगा और हम मनचाहे व्यंजनोंसे उन्हें सन्तुष्ट करेंगी ॥ १९ ॥ हम पहले दुर्गाजीकी पूजा करके उनको नैवेद्य चढ़ावेंगी। उसके बाद रामको भोजन कराकर स्वयं भोजन करेंगी ॥ २० ॥ यह सुनकर सुवर्णके अलंकारोसे अलंकृत, पीछे कण्ठे पहने, सुन्दर मुख एवं मृगीके समान नेत्रवाली, के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रक घरोंकी स्त्रियें तुरन्त हाथोमे नैवेद्यके पात्र लेकर नूपुरकी मनोहर ध्वनि करती हुई चल पड़ीं ॥ २१ ॥ २२ ॥ उधर दुर्गाजीने चारों ओरसे मन्दिरका फाटक बन्द कर लिया और भीतर चुपचाप बैठ गयीं ॥ २३ ॥ वे स्त्रियाँ मन्दिरम पहुँची तो द्वार बन्द पाया । एक-एक करके वे सब द्वारोंपर घूम आयीं। लेकिन किसी तरफसे भी उन्हें भीतर जानेका मार्ग नहीं मिला ॥ २४ ॥ ऐसी अवस्था में वे विस्मित होकर वहीं बैठ गयीं। थोड़ी देर बाद मन्दिरके भीतरसे यह वाणी सुनायी दी, जिसे उन स्त्रियोंने सुना - २५ ॥ मैं ही सीता हूँ और राम साक्षात् शिव हैं। जो हममें और सीतामें, राममें तथा शिवमे भेद मानते हैं, वे करोड़ों कल्पपर्यन्त रौरव नरकमें सड़ते हैं। इस कारण हे स्त्रियो ! पहले मुझलोग अच्छे-अच्छे अन्नोंसे अघाले मेरे प्रभु रामको प्रसन्न करो। उनके जो बचें, सो लाकर मेरी पूजा करो। इससे मैं प्रसन्न होऊँगी। अच्छा, अब तुम लोग जाओ। रामचन्द्रजी भूखे-प्यासे बैठे हैं ॥२६-२८॥
| ४०२ | आनन्दरामायणे | ( सर्गः १२ |
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ततः सा शबरी ताभ्यो दर्शयामास राघवम् । ता नेत्रपङ्कजैः सर्व्वा दृष्ट्वा नत्वा रघूत्तमम् ॥३०॥ दिव्यान्नानि पुरः स्थाप्य हेमपात्रैर्जलान्यपि । ततस्तं प्रार्थयामासुः स्त्रियः सर्व्वा पुरःस्थिताः ॥३१॥ त्वयाऽद्य हारिता राम वयं भार्य्यैः सहस्रशः । शबरीं प्रेष्य गहने वनेऽत्र परमादरात् ॥३२॥ अन्नानि स्वीकुरुष्वान्त्र देव्या त्वां प्रेषितानि हि । तासां वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह सस्मितः ॥३३॥ देव्या किमुक्तं भो भार्य्यः कथ्यतां ममार्थ तत् । ताः प्रोचु राघव नारी दुर्गावाक्यं सविस्तरम् ॥३४॥ दुर्गावाक्यं शृणुष्वाद्य त्वहमेवात्र जानकी । रामः साक्षान्महादेवो नात्र भेदः कदाचन ॥३५॥ मानयन्त्यत्र भेदं ये रौरवेषु पतन्ति ते । ममो रामं तोषयित्वा तदुच्छिष्ट त्वहं ततः ॥३६॥ भोक्ष्यामि नार्यो गच्छध्वं क्षुधान्तं रघुनन्दनम् । देव्येत्थं भाषिते राम ततस्त्वां समुपागताः ॥३७। अग्रे त्वं पूर्वपुण्यैर्नो भुङ्क्षवान्नं रघुनन्दन । ततस्ताः प्राह श्रीरामो विहस्य मुदिताननः ॥३८॥ यदि देवीवचः सत्यं तत्रांत्र गहने वने । सीतारूपेण सा दुर्गा मां समायातु सत्वरम् ॥३९॥ युष्मन्नारीप्रसङ्गात्तु काचिन्नारी गिरीन्द्रजाम् । गत्वा मद्वचनं दुर्गा श्रावयन्त्वद्य कौतुकात् ॥४०॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा त्वेका स्त्री लोकदण्डकात् । गत्वा दुर्गां रामवाक्यं श्रावयामास सादरम् ॥४१॥ दुर्गा श्रुत्वा रामवाक्यं तद्वेत्थ्युक्त्वा तु तां स्त्रियम् । किञ्चित्कपाटमुद्घाट्य सीतारूपेण निर्ययौ ॥४२॥ ततः पुनर्दृढं बद्ध्वा कपाटं जानकी जवात् । तोयपात्रं करे धृत्वा ययौ रामं स्मितानना ॥४३॥ नमस्कृत्या रामचन्द्रं तस्यार्धं संस्थिताऽभवत् । तदा ताः सकला नार्यस्तद्भूवन् विस्मिता हृदि ॥४४। ततो रामो वरान्नानि विप्रस्त्रीणां तथा पुनः । क्षत्रियाणां च नारीणां भोक्तुं स्नानार्थमुद्यतः ॥४५॥ ततः शरासने बाण संधाय जगदीश्वरः । भुवं भित्त्वाऽथ पातालाज्जलं तत्र समाह्वयत् ॥४६॥
इस तरह देवीकी बात सुनकर वे सब गजगामिनी स्त्रियें विस्मित होकर शबरीके पीछे-पीछे चलीं ॥२९॥ वहाँ जाकर शबरीने उन सब स्त्रियोंको रामचन्द्रजीका दर्शन कराया । उन नारियोंने कमल सरीखे नेत्रोंवाले रामको देखा और प्रणाम किया । इसके बाद दिव्य अ न्न सामने रखकर सुवर्णके पात्रोंमें जल भरकर रक्खा और उन सब स्त्रयोंने एक स्वरसे भगवान्से प्रार्थना की-॥३०। ३१॥ हे राम ! आपने शबराके द्वारा अपने आनेका संदेश भेजकर हम लोगोंको हार दिया है ॥३२॥ साक्षात् दुर्गाजीके द्वारा भेजवाये इस खाद्य पदार्थोंको आप स्वीकार करें । उनकी बातोंको सुन तो मुसकाकर राम बोले-हे नारियों ! दुर्गाजीने हमारे विषयमें क्या कहा था, सो तो बतलाओ । स्त्रियां विस्तारपूर्वक दुर्गाजीके द्वारा कही गयी ब त बतलाती हुई कहने लगीं-उन्होंने कहा था कि राम साक्षात् महेश्वर हैं और मैं जानकी हूँ जो लोग हम दोनोंम किसी प्रकारका भेद मानते हैं, वे रौरव नरकम पड़ते हैं । इसलिए तुमलोग बहुने रामको भोजन कराके प्रसन्न कर आओ। उनमे जो कुछ बचेगा सो मैं सहर्ष स्वीकार करूंगी । हे स्त्रिया ! अब तुमलोग उस भूखे रामजीके पास जाओ । इस तरह देवीकी ब त सुनकर हम सब आपके पास दौड़े आयीं ॥३३-३७॥ अब हमारे पूर्वसञ्चित पुण्योंके प्रतापसे इस अन्नको ग्रहण करिए । इसके अनन्तर हंसकर श्रीरामचन्द्रजीने कहा-॥३८। यदि देवीकी बात सच है तो वे सीतारूपसे यहाँ मेरे पास आय ॥३९। तुममेंसे कोई स्त्री जाकर मेरा यह सन्देश दुर्गाजीको सुना आये । ४०॥ रामके आज्ञानुसार उनमेंसे एक स्त्री दौड़ती हुई दुर्गाजीके पास पहुँची और रामका संदेश कह सुनाया ॥ ४१॥ उस स्त्रीके मुखसे इस प्रकार रामका संदेश सुनकर दुर्गाजीने थोड़ासा दरवाजा खोला और सीतारूपमें बाहर निकल आया । ४२॥ उन्होंने मन्दिरके दरवाजाको मजबूत बन्द किया और हाथमें जलपात्र लेकर मुसकराती हुई रामकी ओर चल पड़ीं ॥४३॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने रामको प्रणाम किया और उनकी बगलमें जा बैठीं । यह कौतुक देखकर सब स्त्रियां बहुत विस्मित हुईं ॥ ४४॥ इसके बाद राम उन ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्योंकी स्त्रियोंका अन्न लानेके लिए स्नान करनेको उद्यत हुए ॥ ४५॥ एतदर्थं रामने अपने धनुषपर बाण चढ़ाया और पृथिवीको फोड़कर पाताल-
सर्गः १२ ] मनोहरकाण्डम् ७०५
सर्गः १२ ] मनोहरकाण्डम् ७०५
तत्र स्नात्वा रामचन्द्रः कृत्वा बाप्यादिकं ततः। यावद्भोक्तुं मनश्चक्रे तावत्तेऽपि समाययुः ॥४७॥ कुशाद्याः सर्वसैन्यैश्च रामराजीवदानुगाः । ते मठे जानकीं दृष्ट्वा विस्मयं परमं ययुः ॥४८॥ ततस्ते शबरीवाक्यात्सर्वं श्रुत्वा कुशादिकाः । अवबोद्धा रामचन्द्रं मेनिरे चन्द्रशेखरम् ॥४९॥ सीतां गिरेस्तनूजां चापि मेनिरे ते विनिश्चयात् । ततो रामः कुशाद्यैश्च मुदा सैन्येन सीतया ॥५०॥ भुक्त्वा पीत्वा जलं स्वच्छं वाक्यं स्त्रीः प्राह सादरम् । वरयध्वं वराद्भार्या युष्माकं यत्तु रोचते ॥५१॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा स्त्रियः प्रोचू रघूत्तमम् । येनास्माक भवेत्कीर्तिस्तं वरं दातुमर्हसि ॥५२॥ ततः प्राह रामचन्द्रस्ता नारीस्तुष्टमानसः । मम नामास्तु युष्माकं रामेति जगतीतले ॥५३॥ युष्माकं मयि सद्भक्तिः पुरुषेभ्योऽपि चाधिका । भविष्यति सदा नार्यो वरेण मम निश्चयात् ॥५४॥ देवे विप्रे कथायां च धर्मे भक्तिर्भविष्यति । सदा यूयं पवित्राश्च भवध्वं सधवाः स्त्रियः ॥५५॥ मांगल्ये शकुने सर्वकर्मसु च पुरःसराः । यूयं भवध्वं सर्वत्र त्रिवेणीयुतमस्तकाः ॥५६॥ मम बाणात्कृतं तीर्थं मन्नाम्नेदं भविष्यति । इति रामवचः श्रुत्वा स्त्रियः प्रोचू रघूत्तमम् ॥५७॥ जन्मांतरेऽपि स्वामिंस्त्वं दर्शनं देहि नः पुनः । तमासां वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥५८॥ द्वापरे कृष्णरूपेण युष्माकं दर्शनं मम । भविष्यति वने यद्वै त्वक्रयात्राप्रसंगतः ॥५९॥ विप्रपत्त्यस्तदा यूयं भविष्यथ विप्रो वने । इयं तु शबरी पत्नी विप्रस्यैव भविष्यति ॥६०॥ महद्दर्शनार्थमुद्युक्तामेनामस्याः पतिर्यदा । स्तम्भे बद्ध्वा महादण्डं स करिष्यति वै गृहे ॥६१॥ तदेयं मद्गतमना वने यास्यति मां प्रति । भिन्नदेहेन शबरी कौतुकं तद्भविष्यति ॥६२॥ तदा यूयं स्त्रियः सर्वास्तद्दृष्ट्वा कौतुकं महत् । भूत्वाऽत्र मद्गतमना मां ध्यात्वा सर्वदा हृदि ॥६३॥ अंते मद्लोकमासाद्य भोक्ष्यथ सुखमुत्तमम् । रामेति तारकं नाम मम नित्यं हि सर्वदा ॥६४॥
सोतेसे जल निकाला ॥ ४६ ॥ उससे स्नान किया और मध्याह्नकृत्यके क्रियाओंसे फुरसत पायी। तब जैसे ही भोजन करनेको तैयार हुए तैसे ही कुश आदि भी सेनाके साथ राम स्थानपर आ पहुंचे। उन्होंने वहाँ जानकीको देखा तो उनके आश्चर्यका ठिकाना नहीं रहा ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ फिर शबरीके मुखसे उन्होंने सब समाचार सुना, तब उन लोगोंको विश्वास हुआ कि रामचन्द्रजी साक्षात् शिव ही हैं ॥ ४९ । और सीताजी साक्षात् पार्वती हैं। तत्पश्चात् रामचन्द्रजीने कुश आदि बालकों तथा सेनाके साथ भोजन किया, स्वच्छ जल पिया और उन स्त्रियोंसे कहा—हे स्त्रियो ! अब तुम लोगोंकी जो इच्छा हो, वह वर माँग लो ॥ ५० ॥ ५१ ॥ इस तरह रामकी बात सुनकर स्त्रियां बोलीं कि जिससे संसारमें हमारी सुकीर्ति हो, कोई ऐसा वरदान दीजिये ॥ ५२ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने प्रसन्न होकर उन नारियोंसे कहा कि जो नाम हमारा है, वही तुम्हारा भी "राम" यह नाम विख्यात होगा ॥ ५३ । हे स्त्रियो ! हमारे वरदानके प्रभावसे पुरुषोंकी अपेक्षा नारियोंको हमारेमें विशेष भक्ति रहेगी ॥ ५४ ॥ देवता, ब्राह्मण, हरिकथा एवं धर्ममें तुम्हारी विशेष रुचि रहा करेगी। तुम जैसी सधवा स्त्रियां सदा पवित्र रहेंगी ॥ ५५ ॥ अपने मस्तकपर तीन वेणी धारण करनेवाली स्त्रियां किसी माङ्गल्य कार्य तथा शकुन आदि सब कार्यों में आगे आगे चलेंगी ॥ ५६ । मेरे बाणसे इस सरोवरकी रचना हुई है। अतएव यह तीर्थ मेरे ही नामसे विख्यात होगा। इस तरह रामके द्वारा वरदान पाकर तब स्त्रियोंने कहा—हे राम ! आप जन्मान्तरमें भी हम लोगोंको अपना दर्शन दीजिएगा। उनकी बात सुनकर रामने कहा—द्वापरमें जब गोकुल प्रकटन हो कृष्णरूपसे मैं तुम लोगोंको दर्शन दूंगा ॥ ५७–५९ । उस समय जब वनमें तुम हमें मिलोगी, तब तुम सब ब्राह्मणका स्त्रिय रहोगी। यह शबरी भी उस समय विप्रपत्नी होगी ॥ ६० ॥ मेरे दर्शनके लिए जानेको उद्यत इस नारीका जब इसका पति खम्भेमें बाँधकर दण्ड देगा तो यह अपना मन मुझे अर्पण करके भिन्न रूपसे मेरे समीप चली आयेगी। उस समय यह कौतुक देखकर तुम सब बड़ी विस्मित होओगी और तबसे मुझमें अपना मन लगाकर सर्वदा मेरा ध्यान करोगी ॥ ६१–६३ ॥ अन्तमें मेरे
| ७०६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १२ |
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युष्माभिर्जपनीयं वै तेनास्तु गतिरुत्तमा। इति दत्वा वरांस्ताभ्यः सीतामाह पुरःस्थिताम् ॥ ६५॥
सुखं याहि स्थलस्वार्थं तथेत्युक्त्वा विदेहजा। रामं प्रणम्य स्त्रीयुक्ता ययौ देवालयं पुनः ॥ ६६॥
देवालयगता भूत्वा दुर्गरूपं दधार सा। तदातिविस्मयं प्रापुस्ता नार्यो निश्चितामिति ॥ ६७॥
तास्तां दुर्गां प्रपूज्याथ नार्यो जग्मुः स्थलं निजम्। रामोऽपि बन्धुपुत्रायैर्वृतो निजपुरीं प्रति ॥ ६८॥
ततो गेहे कुशः सीतां पप्रच्छ स्वविचेष्टितम्। दृष्टश्च यथा वृत्तं तथा सीता न्यवेदयत् ॥ ६९॥
ततस्ते लक्ष्मणाद्याश्च मेनिरे राघवं हरम्। सीतां साक्षान्महादुर्गां मेनिरे गतविभ्रमाः ॥ ७०॥
एवं शिष्य जनानां च रामेण शमनात्मना। द्वैतबुद्धिः खण्डिताऽथ दैवे कृत्वा तु कौतुकम् ॥ ७१॥
एवं वरेण रामस्य रामा नार्यत्र कथ्यते। तासामपि मनुश्चायं रमन्ते रामेति द्वयक्षरः ॥ ७२॥
नान्यो मन्त्रोऽस्ति नारीणां शूद्राणां चापि भो द्विज। सर्वेभ्यो मन्त्रवर्येभ्यो रामस्यायं मनुर्वरः ॥ ७३॥
त्रासे भये महाशापे बाधायां सर्वदा नरैः। रामेति द्वयक्षरं मन्त्रः कीर्त्तने जागति क्षितौ ॥ ७४॥
कृत्वा पापं महाघोरं पश्चात्तपेन यो नरः। सकृद्रामेति मन्त्रं हि कीर्त्तयेच्छुद्धिमाप्नुयात् ॥ ७५॥
रामेति मंत्रराजोऽयं गमने भोजने तथा। शयने काऽने रात्रौ स्थिते कार्यान्तरे नरैः ॥ ७६॥
जपनीयः सर्वदैव संध्ययोरुभयोरपि। चतुर्वर्णैः सदा जप्यश्चतुराश्रमवासिभिः ॥ ७७॥
नास्य मंत्रस्य कालोऽस्ति जपार्थं कालरूपिणः। तस्माज्जनेऽप्ययंयः सर्वदा मनुरुत्तमः ॥ ७८॥
राममंत्रो मुखे यस्य देहो मुद्रांकितस्तथा। राममुद्रांकितं वस्त्रं यस्य तं नेक्षतेयमः ॥ ७९॥
राममुद्रांकितं वस्त्रं समुद्रं वस्त्रमुच्यते। सर्ववस्त्रेषु तच्छ्रेष्ठं पवित्रं पापनाशकम् ॥ ८०॥
समुद्रं वसनं देहे बिभ्रत मानवोत्तमम्। कृतं पापं न लिप्येत पद्मपत्रमिवांभसा ॥ ८१॥
समुद्रवस्त्रसंयुक्तं दृष्ट्वा भुवि नरोत्तमम्। यमदूताः पलायन्ते सिंहं दृष्ट्वा मृगा यथा ॥ ८२॥
श्रापको प्राप्त करके तुम सब उत्तम सुख भोगोगे। मेरा 'राम' इस तारक मन्त्रको तुम लोग सदा जपते रहना, इससे तुम्हें उत्तम गति प्राप्त होगी। इस तरह उन स्त्रियोंको वरदान देकर सामने बैठी हुई सीताजीसे कहा कि अब आप आनन्दसे अपने मन्दिरको जाइए, 'तथास्तु' कहकर वे भी उन स्त्रियोंके साथ मन्दिरकी ओर चली गयीं ॥ ६४-६६ ॥ देवालयमें पहुँचकर उन्होंने फिर पूर्वकी तरह दुर्गाका रूप धारण कर लिया। उस समय वे स्त्रियां और भी विस्मित हुईं ॥ ६७॥ इसके बाद उन स्त्रियोंने दुर्गाकी पूजा की और अपने-अपने घरोंको चली गयीं। राम भी अपने बन्धुओं, पुत्रों एवं सेना आदिको साथ लेकर अयोध्या चल दिये ॥ ६८॥ घर पहुंचकर कुशने सीतासे यह वृत्तान्त पूछा तो माताने इस तरह सब कह सुनाया कि जैसे उन्होंने अपनी आंखों सब कुछ देखा हो ॥ ६९॥ तबतो लक्ष्मण आदिने सन्देहरहित होकर रामको महेश्वर और सीताको महादुर्गा माना ॥ ७० ॥ हे शिष्य! अपने भक्तोंकी द्वैत बुद्धिको दूर करनेके लिए ही रामने उत्तम इस प्रकारका कौतुक किया था ॥ ७१ ॥ रामचन्द्रजीके वरदानसे ही स्त्रियां रामा कहलाती हैं। उन लोगोंके लिए भी 'राम' यह दो अक्षरोंका मन्त्र बतलाया गया है ॥ ७२ ॥ स्त्रियां और शूद्रके लिए इसके सिवाय और कोई मन्त्र नहीं है। सब मन्त्रोंमें यह राममन्त्र सर्वश्रेष्ठ है ॥ ७३ ॥ किसी प्रकार त्रास बाधा या पाप मानकर लोग इसी नामका उच्चारण करते हैं ॥ ७४ ॥ महाघोर पाप करके भी जो प्राणी पश्चात्तापपूर्वक 'राम' इस मन्त्रका कीर्त्तन करता है, उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ ७५ ॥ किसीके लिए कि नहीं जाने समय, भोजन करते समय, सोते समय, विलग्र हुएके समय अथवा कोई भी कार्य करते समय और सायंकालका, चाहे वे किसी वर्ण तथा किसी आश्रमके हों, राम इस मन्त्रका जप करते रहें। क्योंकि यह बड़ा उत्तम मन्त्र है ॥ ७६-७८ ॥ जिसके मुखमें राममन्त्र है, जिसका शरीर रामनामसे अंकित है और जिसकी देहपर राममुद्रा-से अंकित वस्त्र पड़ा रहता है, उसे यमराज नहीं देख पाते ॥ ७९॥ राममुद्रासे अंकित वस्त्र समुद्र वस्त्र कहलाता है। यह वस्त्र सबमे श्रेष्ठ, पवित्र और पापनाशक होता है ॥ ८० ॥ इस समुद्र वस्त्रधारी प्राणीको किसी प्रकारका पातक नहीं लगता। जैसे कमलके पत्तेपर जलका असर नहीं होता ॥ ८१ ॥ समुद्र वस्त्र धारण किये हुए मनुष्यको