भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६९३

शनैः शनैरथोद्यातः पश्यंश्चैत्रवनस्थलीम् । तत्र च्छन्दो महान् जातः सिंहमातंगसङ्गवः ॥१५०॥
धावन्नग्रे तु मातंगः पृष्ठे धावंश्च केसरी। एवं तौ शृङ्गतस्तूर्ण प्रयांतौ कलहकारिणौ ॥१५१॥
मार्गरोधकरौ दृष्टौ तौ दृष्ट्वा शंभुशर्मनो। पश्य कर्कश विघ्नानि चैत्रस्नाने पदे पदे ॥१५२॥
संभवंतीति वै पुरुषाश्चैत्रस्नानं न लङ्घयेत्। कन्यां विवाहे गीतायां गयायां रामसेवने ॥१५३॥
चैत्रस्नाने महादाने विघ्नानि संभवन्ति हि। एवं वदति विप्रेंद्रे तौ दृष्टौ करिसिंहकौ ॥१५४॥
चैत्ररामश्रवात्पूर्वजन्मस्मृत्वाऽतिविस्मितौ। भूत्वा वै त्राहि त्राहीति कृत्वा दार्धे महास्मृतम् ॥१५५॥
शरणं द्विजवर्यस्य जग्मतुः शम्भुशर्मणः । सोऽपि शङ्कुश्रवाभ्यांहि पृष्टवांस्तत्कृपान्वितः॥१५६॥
कियद्यं दृष्टनातिर्हि प्रमा नूक्तप्रपञ्चं मम । इति विप्रवचः श्रुत्वा केसरी वाक्यमब्रवीत् । १५७॥
सोऽहं रामेश्वरक्षेत्रे पूर्वजन्मम्यहं द्विजः। निन्दकः सर्वधर्माणां पाखण्डव्यक्तकन्धरः ॥१५८॥
कदाचिच्चैत्रमासे तु तत्र श्रीराममण्डके। तीर्थे जनसमूहं च श्रुत्वा पौराणिकीं कथाम् । १५९॥
पौराणिकेने कथितां चैत्रमाहात्म्यसंज्ञिकाम्। कृतवान् निन्दनं चाहं वारं वारं पुनः पुनः । १६०॥
तन्मत्कृतं निंदनं च कश्चिद्देवरथस्थितः। शुश्राव सकलं दुष्टं तत शप्ताऽस्म्यहं तदा । १६१॥
करा जातिं त्वं गच्छ यदा शंभवकीर्तनम्। भविष्यति महत्पुण्यं शापशान्तिस्तदनु च । १६२॥
एवं प्रोक्तं मया सर्वं पूर्वजन्मानि यत्कृतम्। तेन शापेन जातोऽस्मि कथग भयकारकः । १६३॥
चैत्ररामश्रवाज्जाता पूर्वस्मृतिरनुत्तमा। इदानीं रक्ष मां विप्र त्वं चतन्मिहेद्द्रुतः।
इति सिंहस्य वृष तु शास्त्रवाच गत द्विजः ॥१६४॥
कस्मञ्च्च मातंग गतोऽसि दुष्टात्तौ वदष्वाय महाप्रमघात् ।
स चापि मातंगवरः समस्तं वृत्तं निजं चाकथयच्च जानन् । १६५।

नाचते लगे। वैशाखामिक चैत्रमास माहात्म्यस वनका वह सुपमा देखकर ककजाने भा चैत्रमासका सब सांगोपा ङ्गेण्ड मरा। उस पर वे दोनो उस वेषके भागके आधार लिए चल पडे ॥१४८। १४६। वे वनस्थलीकी शोभा देखते हुए चलेजा रह थ। तबतक उन्होने सिह और हाथीका महान् गजन सुना ॥१५०॥ आगे आगे हाथी भागा जा रहा था और उसे पदछम सिह खदरता जाता था। लडत हुए वे दोनो उसी मागपर आ पहुंचे, जहाँसे ये दानों ब्राह्मण जा रहे थे ॥ १५१ ॥ उन दुष्टोका रास्ता राकन देखकर शम्भुने ककशस कहा-देखा कर्कश ! चैत्रस्नान करनेवालोके पद-पदपर विघ्न आते हैं। किन्तु लोगोका चाहिए कि विघ्न-बाधात्रास डरकर पीछे न हटे। काशी-यासम, पुत्र-पुत्राक विवाहस, गयापाडय गया ध्यान करनम् वैत्रस्नानम और कुछ आरि महादानम बड़े-बड़े विघ्न आया करत है प्रत्तायक उस शब्दोका सुनकर उन दोनो दुष्टा (हाथा और सिह) को अपने पूर्वजन्मफा स्मरण हा बाया जिससे 'मेरी रक्षा करो-मेरी रक्षा करो' इस तरह बहुत दूर व चिल्लाने लग ॥१५२-१५५॥ वे उस शम्भुनामक ब्राह्मणकी शरणमे गये शम्भु भी उनपर दयालु होकर उनसे पूछने लगे कि तुम लोगोको यह दुष्टयानि क्यो मिली ? यह वृत्तान्त हमें सुनाओ । इस तरह विप्रका प्रश्न सुनकर सिंहने कहा- ॥ १५६ । १५७ ॥ इसके पूर्वकाल अम्मम में रामेश्वरक्षेत्रका निवासी एक ब्राह्मण था। मैं सब धर्माका निन्दक था और पाषण्डमे भगे बाते किया करना था ॥ १५८ ॥ एक बार चैत्रके महीनेमें श्रीरामतीर्थमे एक ब्राह्मणके मुखसे चैत्रमासका माहात्म्य सुन लिया और उसकी भरपूर निन्दा को। मेरी उन निन्दाकी बातोको पास ही बैठे हुए किसी तपस्वी ब्राह्मणने सुन लिया और उसने उसी समय मुझे झाप देते हुए कहा-तूने चैत्रमासकी निन्दा की है। इसलिए तू सिह क्रूरजातिमें जाकर जन्म ले । जब कि एक बनमे तू किसी ब्राह्मणके मुखस चैत्रमासका माहात्म्य सुनेगा, उस समय तेरे शापकी शान्ति होगी । १४९-१६२ ॥ हे विप्र ! इस तरह मैने आपको अपने पूर्व-जन्मका वृत्तान्त कह सुनाया उसके श्रापसे मै महाभयदायिनी इस सिंहकी योनिमें आ पड़ा हूँ । १६३ । आज आपके मुखसे चैत्रमासमे रामनाम सुननेसे मुझे मेरे पूर्वजन्मकी बाते स्मरण आ गयीं । हे विप्र ! अब मुझे इस सिंहयानिसे बचाइए ॥ १६४ । इस प्रकार सिहकी बात