श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६९४ आनन्दरामायणे [सर्गः ११
शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पूर्ववृत्तं मया कृतम् । रामनाथपुरे चाहं कावेर्या उत्तरे तटे ॥१६६॥ विप्रः परमदुर्वृत्तः सर्वशास्त्रपराङ्मुखः । लक्ष्मीभ्रमदाक्रान्तः पण्यस्त्रीभोगकारकः ॥१६७॥ एकदा सुहृदा चाहं भोजनार्थं निमन्त्रितः । श्राद्धार्हे मधुमासे हि शुक्ले श्रीनवमीदिने ॥१६८॥ मया भुक्तं सुहृद्गेहे नवम्यां द्विजसत्तम । तेन पापेन जातोऽस्म्य करिणीर्ना न संशयः ॥१६९॥ सर्वदा प्रतिमासेऽपि नवम्यां न हि भोजनम् । कार्यं विशेषतो रामनवम्यां त्रिदिनं च तत् ॥१७०॥ इदानीं न हि जानामि केन पुण्येन तेऽत्र वै । संगतिश्च वने जाता सर्वपापप्रणाशिनी ॥१७१॥ इति तस्य वचः श्रुत्वा शत्रुघ्नोऽपि विचिन्तयत् । ज्ञात्वा मातङ्गपुण्यं तु प्रोवाच करिणं द्विजः ॥१७२॥ शृणु मातङ्ग वक्ष्यामि यत्पुण्यं नु त्वया कृतम् । पूर्वजन्मनि तन्मर्त्य येन मे संगतिर्वने ॥१७३॥ जाता त्वामुद्धरिष्यामि मा चिन्तां कुरु सर्वथा । रामनाथपुरे रम्ये कावेरीतटशोभिते ॥१७४॥ रामायणकथा चैत्रे श्रुता श्रीनवमीदिने । रामतीर्थे त्वया स्नानं दृष्टो रामेश्वरः शिवः ॥१७५॥ तेन पुण्येन ते जाता संगतिर्मम कानने । इदानीं शृणु सिंह त्वं शृणोतु च करी महान् ॥१७६॥ साकेते मधुमासे हि स्नात्वाऽनेन पथा पुनः । यदा गच्छामि तां कांचीं युवामुद्धारयाम्यहम् ॥१७७॥ मा संदेहोऽत्र कर्तव्यः शपथैः प्रत्ययं कुरु । संतोपार्थं युष्माकं हि प्रोच्यन्ते शपथा मया ॥१७८॥ परस्त्रीगमनात्पापं तथा मित्रवधादिकम् । युवां नोद्धृत्य गच्छामि यदि तन्मयि तिष्ठतु ॥१७९॥ ब्रह्मस्वहरणात्पापं यत्स्मृतं मातृनिन्दनात् । युवां नोद्धृत्य गच्छामि यदि तन्मयि तिष्ठतु । १८० । इत्युक्त्वा द्विजवर्यः स स्त्रिया भिल्लेन संयुतः । करिसिंहौ वने स्थाप्य गच्छन्मार्गे शनैः शनैः ॥१८१॥
सुनकर ब्राह्मणने हाथीसे कहा कि तुम किस कर्मसे इस दुर्योनिमें आये हो ? तब हाथीने अपने पूर्वजन्मका हाल सुनाते हुए कहा-हे विप्र ! मैं भी अपने पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाता हूँ, सुनिए । उस जन्ममें मैं कावेरी नदीके उत्तरी तटपर रामनाथपुर नामक नगरमें बड़ा दुराचारी, सब शास्त्रोंसे पराङ्मुख, धनके मदसे मतवाला और वेश्यालम्पट ब्राह्मण था । एक बार चैत्रमासकी नवमीका मेरा किसी मित्रने श्राद्धमें भोजन करनेके लिए मुझे निमन्त्रण दिया ॥१६६-१६८॥ तदनुसार हे द्विजश्रेष्ठ ! नवमीके दिन मैंने मित्रके यहाँ भोजन किया । उसी पापसे इस हाथीकी योनिमें आ पड़ा हूँ । १६९ । क्योंकि शास्त्रोंका यह विधान है कि प्रत्येक मासकी नवमीको किसीके यहाँ भोजन न करे । यदि ऐसा न हो सके तो चैत्रशुक्ल रामनवमीको तो अवश्य इस बातपर ध्यान दे ॥ १७० ॥ मैं नहीं जानता कि किस पुण्यसे इस समय सब प्रकारके कल्मषोंको हरनेवाला आपका संसर्ग प्राप्त हुआ ॥ १७१ ॥ उसका यह बात सुनकर शत्रुघ्न क्षणभर अपने मनमें ध्यान किया और उसके पुण्यको जानकर कहने लगा-हे मातंग ! सुनो, तुमने जो पुण्य किया है सो मैं तुम्हें बतलाता हूँ । उसीके प्रभावसे आज हमसे भेंट हुई है ॥ १७२ ॥ ॥ १७३ ॥ अब तुम घबराओ मत, मैं तुम्हारा हर तरहसे उद्धार करूँगा । उस जन्ममें तुमने रमणीक कावेरीके तटपर स्थित रामनाथपुरमें श्रीरामनवमीको रामकी कथा सुनी थी । उस दिन तुमने रामतीर्थमें स्नान और रामेश्वर शिवका दर्शन भी किया था ॥ १७४ । १७५ ॥ उसी पुण्यसे आज इस वनमें हमसे भेंट हुई है । अब हे मातंग और सिंह ! मेरी बात सुनो मैं इस समय चैत्रमासका स्नान करनेके लिए अयोध्या जा रहा हूँ । स्नान करके जब मैं कांचीकी ओर लौटूंगा, तब यहाँ आकर तुम दोनोंका उद्धार करूँगा । १७६ ॥ १७७ । मेरी बातपर किसी प्रकारका संदेह मत करना । तुम्हारे विश्वासके लिए मैं शपथ खाता हूँ, सुनो १७८ । यदि मैं तुम्हारा उद्धार किये बिना जाऊँ तो परस्त्रीगमन करने और मित्रको मारनेसे जो पातक लगता है, मैं उस पातकका भागी बनूँ ॥ १७९ ॥ जो पाप ब्राह्मणका धन हड़पने और माताकी निन्दा करनेमें होता है, उन सब पापोंका भागी बनूँ, यदि तुम्हारा उद्धार किये बिना जाऊँ ॥ १८० ॥ इतना कहकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने अपनी स्त्री तथा उस भीलका साथ लिया और वहाँसे अयोध्याके लिए चल पड़ा । उसने हाथी तथा सिंहको उस वनमें ही छोड़ दिया । १८१ ॥