श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 712, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६१९
ददर्शान्यपथा यान्तं श्रेष्ठं कार्पटिकोत्तमम् । वहन्तं रामलिंगार्थं श्रेष्ठं भागीरथीजलम् ॥ १८४॥
शम्भुः पप्रच्छ तं नत्वा नम्रं कार्पटिकोत्तमम् । कुतः समागतं विप्र गम्यते काधुना वद ॥१८३॥
कार्पटिक उवाच
प्रयागादागतं विद्धि मां त्वं भूसुरमत्तम । मधुमासेऽवगाहार्थमयोध्यां प्रति गम्यते ॥ १८४॥
इदानीं त्वं निजं वृत्तं वद ब्राह्मणसत्तम । कुतः समागतं काथ गम्यते क्वाधुना वद । १८५॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा शम्भुः प्रोवाच तं तदा । शिवकाञ्च्याः समायातमयोध्यां प्रति गम्यते ॥१८६॥
चैत्रमासेऽवगाहार्थं गम्यते कथितं मया । इति शम्भुवचः श्रुत्वा पुनः कार्पटिकोत्तमः । १८७॥
पप्रच्छ द्विजवर्य्याय कौतुकाविष्टमानसः । शिवकाञ्च्यां शंभुनामा कश्चिद्विप्रोऽस्ति भो द्विज ॥८८॥
तत्तस्य वचनं श्रुत्वा पुनः शम्भुस्तमब्रवीत् । बहवः शंभुनामानो वर्तन्ते द्विज तत्र हि ॥१८९ ।
कस्त्वया पृच्छयते तस्य वद गोत्रोपनामनी । इति विप्रवचः श्रुत्वा पुनः कार्पटिकोऽब्रवीत् ॥१९०॥
भारद्वाजकुलोत्पन्नं चकेगाधूपनामकम्
महादेवसुतं सर्ववेदशास्त्रविशारदम् । तं क्षणं शंभुनामानं जानीषे त्वं न वा वद ॥१९१॥
एवं महाकार्पटिकेन सर्वं गोत्रापमाणादिकमादरेण ।
प्रोक्तं यथा तन्नम भूसूतोऽपि ज्ञात्वा निजं सर्वमथावदत्तम् ॥ १९२ ॥
भो भोकार्पटिकश्रेष्ठ किमर्थं त्वं हि पृच्छसि वददस्य सविस्तारं मा शंकां कुरु चात्र हि । १९३॥
कार्पटिक उवाच
शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि यदर्थं पृच्छयते मया । यदाऽहं गतवान् गंगासागरं द्रष्टुमादरात् ॥१९४॥
सीताकुण्डसमीपे हि देशे कंकटनामके । दृष्टोऽहं मार्गमध्ये च पिशाचेनोग्ररूपिणा ॥१९५॥
मां हन्तुं निकट प्राप्तं तं दृष्ट्वाऽहं तदा द्विज । श्रीनामकीर्तनं दीर्घं कृतवान् भयकम्पितः ॥१९६॥
कीर्तनाद्रामचन्द्रस्य स पिशाचः पलायनम् । मनः कृत्वा दूरदेशे स्थित्वा शुश्राव कीर्तनम् ॥१९७।
रास्तेमें शम्भुने एक कार्पार्थी विप्रको देखा, जो रामेश्वर शिवके लिए गङ्गाका उत्तम जल लिये जा रहा था ॥ १८४॥ उसे देखकर शम्भुने पूछा -हे विप्र ! इस समय तुम कहाँसे आ रहे हो और कहाँ जाओगे ? ॥ १८३ ॥ उसने उत्तर दिया हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! इस समय मैं प्रयागसे आ रहा हूँ और चैत्रस्नान करनेके लिए अयोध्या जा रहा हूँ ॥ १८४ ॥ अब आप अपना वृत्तान्त बतलाते हुए कहिए कि कहाँसे आये है और कहाँ जायेंगें ? ॥ १८५ ॥ ब्राह्मणका प्रश्न सुनकर शम्भुने कहा कि मैं शिवकाञ्ची से आता हूँ और अयोध्या जा रहा हूँ ॥ १८६ ॥ हम भी चैत्रस्नान करना है । इस प्रकार शम्भुकी बात सुनकर ब्राह्मणने कहा कि हे द्विज ! शिवकाञ्चीमें कोई शम्भु नामका ब्राह्मण रहता है ? । १८७ ।' १८८ ॥ ब्राह्मणकी बातके उत्तरमें शम्भुने कहा कि शिवकाञ्चीमें बहुतसे शम्भु नामक ब्राह्मण हैं ॥ १८९ ॥ आप किस शम्भुको पूछते हैं ? जिसे पूछते हों, उसका गोत्र और उपनाम बतलाइए । शम्भुकी बात सुनकर उस ब्राह्मणने कहा कि जिन्हें मैं पूछता हूँ, वे भारद्वाज कुलमे उत्पन्न हुए हैं और चक्रेगाँव उनका उपनाम है । वे महादेवके पुत्र हैं। वे सब वेदों और शास्त्रोंको जानते हैं। उन शम्भुको आप जानते हैं या नहीं, सो बतलाइए ॥ १९० ॥ १६१ ॥ इस तरह ब्राह्मणके मुखसे अपना गोत्र और उपनाम आदि सुनकर शम्भुने कहा- हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! तुम शम्भुको क्यों पूछ रहे हो, मुझे विस्तारपूर्वक बतलाओ । इसमें किसी प्रकारका सन्देह मत करो ॥ १९२ ॥ १९३ ॥ कार्पटिकने कहा- हे विप्र ! जिसलिए मैं उन्हें पूछ रहा हूँ सो बतलाता हूँ । जब कि मैं गंगासागरका दर्शन करने गया था तो सीताकुण्डके समीप कंकट देशमें मुझे एक उग्ररूपवाले पिशाचने देख लिया ॥ ९४ ॥ १९५ ॥ वह मारनेके लिये बिल्कुल मेरे पास आ पहुँचा । मैं उसे देखकर जोर-जोरसे रामनामका कीर्तन करने और भयसे काँपने लगा ॥ १९६॥ रामनामके कीर्तनसे वह भाग खड़ा हुआ और मेरे पाससे थोड़ी दूरपर रुककर कीर्तन