श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 709, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें६९२ आनन्दरामायणे [ सर्ग ११
एकादश्यां चैत्रशुक्ले कृतवान्ब्राह्मणोजनम् । ताम्बूलो दक्षिणायुक्तः कट्या वस्त्रेन्वया धृतः ॥१३३॥ द्वादश्यां प्रातरुत्थाय गत्वा स्नानं त्वया कृतम् । पतितः स हि तांबूलो विस्मृत्या गौतमीतटे ॥१३४॥ दक्षिणामहितो दृष्टः स केनापि द्विजेन वै । गृहीत्वा स हि द्वादश्यां न जानंश्च त्वया पुनः ॥१३५॥ तांबूलदानाद्दुश्चैत्रमासे जाता बने मेऽद्य हि संगतिस्ते । तस्मान्मधौ राक्षस मानवैर्हि ताम्बूलदानं करणीयमेतत् ॥१३६॥ इत्युक्त्वा राक्षसं शम्भुश्चैत्रमाहात्म्यमुत्तमम् । उभाभ्यां श्रावयित्वाऽथ कर्कशं वाक्यमब्रवीत् ॥१३७॥ भो कर्कश महाबुद्धे शृणुष्व वचनं मम । आगच्छ त्वं महैवाद्य मयाऽयोध्यापुरीं प्रति ॥१३८॥ सरयूस्रानमात्रेण सद्यो पापाद्विमोक्ष्यसे । इत्युक्त्वा कर्कशं शम्भुस्ततः प्रोवाच राक्षसस् ॥१३९॥ भो राक्षस त्वमत्रैव मासमात्रं स्थितो भव । अयोध्यायां प्रवेशश्च राक्षसानां न विद्यते ॥१४०॥ अतोऽहं मधुमासे हि स्नानस्त्रानेन परा पुनः । यदागच्छामि कांचीं त्वां चोद्धरिष्याम्यहं तदा ॥१४१॥ मा संदेहोऽस्तु ते चित्ते शपथं कारयाम्यहम् । यत्पापं ब्रह्महत्यायास्तथा गायत्रिनिंदनात् ॥१४२॥ नोद्धृत्य त्वां हि गच्छामि तर्हि तन्मयि तिष्ठतु मद्यपने च यत्पापं हेमस्तेयादिकं च यत् ॥१४३॥ नोद्धृत्य त्वां हि गच्छामि तर्हि तन्मयि तिष्ठतु । यत्पापं भ्रूणहत्यायास्तथा चैत्रे ह्यमज्जनात् ॥१४४॥ नोद्धृत्य त्वां हि गच्छामि तर्हि तन्मयि तिष्ठतु । इत्यादिशपथैर्नर्हि राक्षसं दृढयन् द्विजः ॥१४५॥ यावत्पश्यति सर्वत्र तावज्जातं हि कौतुकम् । व्याधाय चैत्रमासस्य माहात्म्यस्योपदेशतः ॥१४६॥ तरवः फलिनो जाता परितो दशयोजनम् । पत्रैः पुष्पैर्नित्राश्च सौगंधः पवनो ववौ ॥१४७॥ नद्यस्तोयं वहन्त्यश्च ननृतुर्बर्हिणो वने । तद्दृष्ट्वा कर्कशश्चापि चैत्रमाहात्म्यकीर्तनात् ॥१४८॥ दुर्वर्णं सुवर्णं जातं चैत्रश्रेष्ठत्यमन्यत । ततस्ते द्वितयस्तस्मादनाम्नागोष्ठं निर्गताः ॥१४९॥
मैं बतला रहा हूँ उसके प्रभावसे हमारे तुम्हार साक्षात्कार हुआ है । एक बार तुमने चैत्रशुक्ल एका- दशीको किसीके यहां भोजन किया, ताम्बूल दक्षिणा ली और एक वस्त्रम रखकर उसे तुमने अपनी कमरमें लपेट लिया ॥१३३॥ द्वादशीको तुम सबेरे उठे और गङ्गास्नान करने चले गये । वह कमरमें लिपटी हुई दक्षिणा और ताम्बूल भूलसे गौतमी नदीके तटपर गिर गया । उस किसी ब्राह्मणने उठा लिया, किन्तु उसके विषयमें तुम्हें कुछ ख्याल नहीं था । १३३-१३५॥ चैत्रमासम उस दक्षिणा और ताम्बूलके दानसे ही आज इस निर्जन वनमें हम- से साक्षात्कार हुआ है । देखो, केवल ताम्बूलके दानका कितना बडा माहात्म्य है ! अतएव इस मासमें ताम्बूल- दान अवश्य करना चाहिए ॥१३६॥ इस तरह उस राक्षसको चैत्रम मासका माहात्म्य सुनाकर शम्भुने कर्कशसे कहा—हे महाबुद्धिमान् कर्कश ! मेरी बात मानो और आज ही मेरे साथ अयोध्यापुरीको चल दो ॥१३७॥ १३८॥ चैत्रमासम सरयूस्नानमात्र से तुम सब पापोंसे मुक्त हो जाओगे ऐसा कर्कशसे कहकर शम्भुने उस राक्षससे कहा कि तुम महीना भर इसी स्थानपर रहो । क्योंकि अयोध्या नगरमें राक्षसलोक नहीं जा सकते ॥१३६ ॥ १४०॥ इस कारण जब मैं चैत्रस्नान करके उधरसे लौटूंगा और यहां आऊँगा, तब तुम्हारा उद्धार करूँगा ॥१४१॥ तुम इसमें कुछ सन्देह मत करो । मैं कसम खाता हूँ कि ब्राह्मणहत्या करने तथा गौ एवं मुनियोंकी निन्दा करनेसे जो पातक होता है, वह पातक मुझे लगे यदि मैं तुम्हारा उद्धार किए बिना जाऊँ। मद्य पीने और सुवर्ण चुरानेसे जो पातक होता है यदि मैं तुम्हारा उद्धार किये बिना जाऊं तो मुझे वे पातक लगे जो पाप भ्रूणहत्या तथा चैत्रमासमें स्नान न करनेसे लगता है वह मुझे लगे । यदि विना तुम्हारा उद्धार किये विना जाऊँ । इस तरह विविध प्रकारकी शपथें खाकर शम्भुन उस ब्रह्मराक्षसको आश्वासन दिया इसके बाद जब व्याधन चारों ओर दृष्टि उठाकर देखा तो चैत्रस्नानका माहात्म्य सुननेके कारण उस वनके दस योजन तक उसे सब वृक्ष फल फूलोंसे लद दिखायी दिये और सुगन्धित वायु चलने लगा ॥१४२-१४७॥ उस वनकी सब नदियां घणघोर निनाद करता हुआ जल बहने लगा और मयूरमण्डल