श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 723, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७०६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १२ |
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युष्माभिर्जपनीयं वै तेनास्तु गतिरुत्तमा। इति दत्वा वरांस्ताभ्यः सीतामाह पुरःस्थिताम् ॥ ६५॥
सुखं याहि स्थलस्वार्थं तथेत्युक्त्वा विदेहजा। रामं प्रणम्य स्त्रीयुक्ता ययौ देवालयं पुनः ॥ ६६॥
देवालयगता भूत्वा दुर्गरूपं दधार सा। तदातिविस्मयं प्रापुस्ता नार्यो निश्चितामिति ॥ ६७॥
तास्तां दुर्गां प्रपूज्याथ नार्यो जग्मुः स्थलं निजम्। रामोऽपि बन्धुपुत्रायैर्वृतो निजपुरीं प्रति ॥ ६८॥
ततो गेहे कुशः सीतां पप्रच्छ स्वविचेष्टितम्। दृष्टश्च यथा वृत्तं तथा सीता न्यवेदयत् ॥ ६९॥
ततस्ते लक्ष्मणाद्याश्च मेनिरे राघवं हरम्। सीतां साक्षान्महादुर्गां मेनिरे गतविभ्रमाः ॥ ७०॥
एवं शिष्य जनानां च रामेण शमनात्मना। द्वैतबुद्धिः खण्डिताऽथ दैवे कृत्वा तु कौतुकम् ॥ ७१॥
एवं वरेण रामस्य रामा नार्यत्र कथ्यते। तासामपि मनुश्चायं रमन्ते रामेति द्वयक्षरः ॥ ७२॥
नान्यो मन्त्रोऽस्ति नारीणां शूद्राणां चापि भो द्विज। सर्वेभ्यो मन्त्रवर्येभ्यो रामस्यायं मनुर्वरः ॥ ७३॥
त्रासे भये महाशापे बाधायां सर्वदा नरैः। रामेति द्वयक्षरं मन्त्रः कीर्त्तने जागति क्षितौ ॥ ७४॥
कृत्वा पापं महाघोरं पश्चात्तपेन यो नरः। सकृद्रामेति मन्त्रं हि कीर्त्तयेच्छुद्धिमाप्नुयात् ॥ ७५॥
रामेति मंत्रराजोऽयं गमने भोजने तथा। शयने काऽने रात्रौ स्थिते कार्यान्तरे नरैः ॥ ७६॥
जपनीयः सर्वदैव संध्ययोरुभयोरपि। चतुर्वर्णैः सदा जप्यश्चतुराश्रमवासिभिः ॥ ७७॥
नास्य मंत्रस्य कालोऽस्ति जपार्थं कालरूपिणः। तस्माज्जनेऽप्ययंयः सर्वदा मनुरुत्तमः ॥ ७८॥
राममंत्रो मुखे यस्य देहो मुद्रांकितस्तथा। राममुद्रांकितं वस्त्रं यस्य तं नेक्षतेयमः ॥ ७९॥
राममुद्रांकितं वस्त्रं समुद्रं वस्त्रमुच्यते। सर्ववस्त्रेषु तच्छ्रेष्ठं पवित्रं पापनाशकम् ॥ ८०॥
समुद्रं वसनं देहे बिभ्रत मानवोत्तमम्। कृतं पापं न लिप्येत पद्मपत्रमिवांभसा ॥ ८१॥
समुद्रवस्त्रसंयुक्तं दृष्ट्वा भुवि नरोत्तमम्। यमदूताः पलायन्ते सिंहं दृष्ट्वा मृगा यथा ॥ ८२॥
श्रापको प्राप्त करके तुम सब उत्तम सुख भोगोगे। मेरा 'राम' इस तारक मन्त्रको तुम लोग सदा जपते रहना, इससे तुम्हें उत्तम गति प्राप्त होगी। इस तरह उन स्त्रियोंको वरदान देकर सामने बैठी हुई सीताजीसे कहा कि अब आप आनन्दसे अपने मन्दिरको जाइए, 'तथास्तु' कहकर वे भी उन स्त्रियोंके साथ मन्दिरकी ओर चली गयीं ॥ ६४-६६ ॥ देवालयमें पहुँचकर उन्होंने फिर पूर्वकी तरह दुर्गाका रूप धारण कर लिया। उस समय वे स्त्रियां और भी विस्मित हुईं ॥ ६७॥ इसके बाद उन स्त्रियोंने दुर्गाकी पूजा की और अपने-अपने घरोंको चली गयीं। राम भी अपने बन्धुओं, पुत्रों एवं सेना आदिको साथ लेकर अयोध्या चल दिये ॥ ६८॥ घर पहुंचकर कुशने सीतासे यह वृत्तान्त पूछा तो माताने इस तरह सब कह सुनाया कि जैसे उन्होंने अपनी आंखों सब कुछ देखा हो ॥ ६९॥ तबतो लक्ष्मण आदिने सन्देहरहित होकर रामको महेश्वर और सीताको महादुर्गा माना ॥ ७० ॥ हे शिष्य! अपने भक्तोंकी द्वैत बुद्धिको दूर करनेके लिए ही रामने उत्तम इस प्रकारका कौतुक किया था ॥ ७१ ॥ रामचन्द्रजीके वरदानसे ही स्त्रियां रामा कहलाती हैं। उन लोगोंके लिए भी 'राम' यह दो अक्षरोंका मन्त्र बतलाया गया है ॥ ७२ ॥ स्त्रियां और शूद्रके लिए इसके सिवाय और कोई मन्त्र नहीं है। सब मन्त्रोंमें यह राममन्त्र सर्वश्रेष्ठ है ॥ ७३ ॥ किसी प्रकार त्रास बाधा या पाप मानकर लोग इसी नामका उच्चारण करते हैं ॥ ७४ ॥ महाघोर पाप करके भी जो प्राणी पश्चात्तापपूर्वक 'राम' इस मन्त्रका कीर्त्तन करता है, उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ ७५ ॥ किसीके लिए कि नहीं जाने समय, भोजन करते समय, सोते समय, विलग्र हुएके समय अथवा कोई भी कार्य करते समय और सायंकालका, चाहे वे किसी वर्ण तथा किसी आश्रमके हों, राम इस मन्त्रका जप करते रहें। क्योंकि यह बड़ा उत्तम मन्त्र है ॥ ७६-७८ ॥ जिसके मुखमें राममन्त्र है, जिसका शरीर रामनामसे अंकित है और जिसकी देहपर राममुद्रा-से अंकित वस्त्र पड़ा रहता है, उसे यमराज नहीं देख पाते ॥ ७९॥ राममुद्रासे अंकित वस्त्र समुद्र वस्त्र कहलाता है। यह वस्त्र सबमे श्रेष्ठ, पवित्र और पापनाशक होता है ॥ ८० ॥ इस समुद्र वस्त्रधारी प्राणीको किसी प्रकारका पातक नहीं लगता। जैसे कमलके पत्तेपर जलका असर नहीं होता ॥ ८१ ॥ समुद्र वस्त्र धारण किये हुए मनुष्यको