श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 722, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १२ ] मनोहरकाण्डम् ७०५
तत्र स्नात्वा रामचन्द्रः कृत्वा बाप्यादिकं ततः। यावद्भोक्तुं मनश्चक्रे तावत्तेऽपि समाययुः ॥४७॥ कुशाद्याः सर्वसैन्यैश्च रामराजीवदानुगाः । ते मठे जानकीं दृष्ट्वा विस्मयं परमं ययुः ॥४८॥ ततस्ते शबरीवाक्यात्सर्वं श्रुत्वा कुशादिकाः । अवबोद्धा रामचन्द्रं मेनिरे चन्द्रशेखरम् ॥४९॥ सीतां गिरेस्तनूजां चापि मेनिरे ते विनिश्चयात् । ततो रामः कुशाद्यैश्च मुदा सैन्येन सीतया ॥५०॥ भुक्त्वा पीत्वा जलं स्वच्छं वाक्यं स्त्रीः प्राह सादरम् । वरयध्वं वराद्भार्या युष्माकं यत्तु रोचते ॥५१॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा स्त्रियः प्रोचू रघूत्तमम् । येनास्माक भवेत्कीर्तिस्तं वरं दातुमर्हसि ॥५२॥ ततः प्राह रामचन्द्रस्ता नारीस्तुष्टमानसः । मम नामास्तु युष्माकं रामेति जगतीतले ॥५३॥ युष्माकं मयि सद्भक्तिः पुरुषेभ्योऽपि चाधिका । भविष्यति सदा नार्यो वरेण मम निश्चयात् ॥५४॥ देवे विप्रे कथायां च धर्मे भक्तिर्भविष्यति । सदा यूयं पवित्राश्च भवध्वं सधवाः स्त्रियः ॥५५॥ मांगल्ये शकुने सर्वकर्मसु च पुरःसराः । यूयं भवध्वं सर्वत्र त्रिवेणीयुतमस्तकाः ॥५६॥ मम बाणात्कृतं तीर्थं मन्नाम्नेदं भविष्यति । इति रामवचः श्रुत्वा स्त्रियः प्रोचू रघूत्तमम् ॥५७॥ जन्मांतरेऽपि स्वामिंस्त्वं दर्शनं देहि नः पुनः । तमासां वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥५८॥ द्वापरे कृष्णरूपेण युष्माकं दर्शनं मम । भविष्यति वने यद्वै त्वक्रयात्राप्रसंगतः ॥५९॥ विप्रपत्त्यस्तदा यूयं भविष्यथ विप्रो वने । इयं तु शबरी पत्नी विप्रस्यैव भविष्यति ॥६०॥ महद्दर्शनार्थमुद्युक्तामेनामस्याः पतिर्यदा । स्तम्भे बद्ध्वा महादण्डं स करिष्यति वै गृहे ॥६१॥ तदेयं मद्गतमना वने यास्यति मां प्रति । भिन्नदेहेन शबरी कौतुकं तद्भविष्यति ॥६२॥ तदा यूयं स्त्रियः सर्वास्तद्दृष्ट्वा कौतुकं महत् । भूत्वाऽत्र मद्गतमना मां ध्यात्वा सर्वदा हृदि ॥६३॥ अंते मद्लोकमासाद्य भोक्ष्यथ सुखमुत्तमम् । रामेति तारकं नाम मम नित्यं हि सर्वदा ॥६४॥
सोतेसे जल निकाला ॥ ४६ ॥ उससे स्नान किया और मध्याह्नकृत्यके क्रियाओंसे फुरसत पायी। तब जैसे ही भोजन करनेको तैयार हुए तैसे ही कुश आदि भी सेनाके साथ राम स्थानपर आ पहुंचे। उन्होंने वहाँ जानकीको देखा तो उनके आश्चर्यका ठिकाना नहीं रहा ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ फिर शबरीके मुखसे उन्होंने सब समाचार सुना, तब उन लोगोंको विश्वास हुआ कि रामचन्द्रजी साक्षात् शिव ही हैं ॥ ४९ । और सीताजी साक्षात् पार्वती हैं। तत्पश्चात् रामचन्द्रजीने कुश आदि बालकों तथा सेनाके साथ भोजन किया, स्वच्छ जल पिया और उन स्त्रियोंसे कहा—हे स्त्रियो ! अब तुम लोगोंकी जो इच्छा हो, वह वर माँग लो ॥ ५० ॥ ५१ ॥ इस तरह रामकी बात सुनकर स्त्रियां बोलीं कि जिससे संसारमें हमारी सुकीर्ति हो, कोई ऐसा वरदान दीजिये ॥ ५२ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने प्रसन्न होकर उन नारियोंसे कहा कि जो नाम हमारा है, वही तुम्हारा भी "राम" यह नाम विख्यात होगा ॥ ५३ । हे स्त्रियो ! हमारे वरदानके प्रभावसे पुरुषोंकी अपेक्षा नारियोंको हमारेमें विशेष भक्ति रहेगी ॥ ५४ ॥ देवता, ब्राह्मण, हरिकथा एवं धर्ममें तुम्हारी विशेष रुचि रहा करेगी। तुम जैसी सधवा स्त्रियां सदा पवित्र रहेंगी ॥ ५५ ॥ अपने मस्तकपर तीन वेणी धारण करनेवाली स्त्रियां किसी माङ्गल्य कार्य तथा शकुन आदि सब कार्यों में आगे आगे चलेंगी ॥ ५६ । मेरे बाणसे इस सरोवरकी रचना हुई है। अतएव यह तीर्थ मेरे ही नामसे विख्यात होगा। इस तरह रामके द्वारा वरदान पाकर तब स्त्रियोंने कहा—हे राम ! आप जन्मान्तरमें भी हम लोगोंको अपना दर्शन दीजिएगा। उनकी बात सुनकर रामने कहा—द्वापरमें जब गोकुल प्रकटन हो कृष्णरूपसे मैं तुम लोगोंको दर्शन दूंगा ॥ ५७–५९ । उस समय जब वनमें तुम हमें मिलोगी, तब तुम सब ब्राह्मणका स्त्रिय रहोगी। यह शबरी भी उस समय विप्रपत्नी होगी ॥ ६० ॥ मेरे दर्शनके लिए जानेको उद्यत इस नारीका जब इसका पति खम्भेमें बाँधकर दण्ड देगा तो यह अपना मन मुझे अर्पण करके भिन्न रूपसे मेरे समीप चली आयेगी। उस समय यह कौतुक देखकर तुम सब बड़ी विस्मित होओगी और तबसे मुझमें अपना मन लगाकर सर्वदा मेरा ध्यान करोगी ॥ ६१–६३ ॥ अन्तमें मेरे