भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 721, कुल 811 में से

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पृष्ठ 721
४०२आनन्दरामायणे( सर्गः १२

ततः सा शबरी ताभ्यो दर्शयामास राघवम् । ता नेत्रपङ्कजैः सर्व्वा दृष्ट्वा नत्वा रघूत्तमम् ॥३०॥ दिव्यान्नानि पुरः स्थाप्य हेमपात्रैर्जलान्यपि । ततस्तं प्रार्थयामासुः स्त्रियः सर्व्वा पुरःस्थिताः ॥३१॥ त्वयाऽद्य हारिता राम वयं भार्य्यैः सहस्रशः । शबरीं प्रेष्य गहने वनेऽत्र परमादरात् ॥३२॥ अन्नानि स्वीकुरुष्वान्त्र देव्या त्वां प्रेषितानि हि । तासां वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह सस्मितः ॥३३॥ देव्या किमुक्तं भो भार्य्यः कथ्यतां ममार्थ तत् । ताः प्रोचु राघव नारी दुर्गावाक्यं सविस्तरम् ॥३४॥ दुर्गावाक्यं शृणुष्वाद्य त्वहमेवात्र जानकी । रामः साक्षान्महादेवो नात्र भेदः कदाचन ॥३५॥ मानयन्त्यत्र भेदं ये रौरवेषु पतन्ति ते । ममो रामं तोषयित्वा तदुच्छिष्ट त्वहं ततः ॥३६॥ भोक्ष्यामि नार्यो गच्छध्वं क्षुधान्तं रघुनन्दनम् । देव्येत्थं भाषिते राम ततस्त्वां समुपागताः ॥३७। अग्रे त्वं पूर्वपुण्यैर्नो भुङ्क्षवान्नं रघुनन्दन । ततस्ताः प्राह श्रीरामो विहस्य मुदिताननः ॥३८॥ यदि देवीवचः सत्यं तत्रांत्र गहने वने । सीतारूपेण सा दुर्गा मां समायातु सत्वरम् ॥३९॥ युष्मन्नारीप्रसङ्गात्तु काचिन्नारी गिरीन्द्रजाम् । गत्वा मद्वचनं दुर्गा श्रावयन्त्वद्य कौतुकात् ॥४०॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा त्वेका स्त्री लोकदण्डकात् । गत्वा दुर्गां रामवाक्यं श्रावयामास सादरम् ॥४१॥ दुर्गा श्रुत्वा रामवाक्यं तद्वेत्थ्युक्त्वा तु तां स्त्रियम् । किञ्चित्कपाटमुद्घाट्य सीतारूपेण निर्ययौ ॥४२॥ ततः पुनर्दृढं बद्ध्वा कपाटं जानकी जवात् । तोयपात्रं करे धृत्वा ययौ रामं स्मितानना ॥४३॥ नमस्कृत्या रामचन्द्रं तस्यार्धं संस्थिताऽभवत् । तदा ताः सकला नार्यस्तद्भूवन् विस्मिता हृदि ॥४४। ततो रामो वरान्नानि विप्रस्त्रीणां तथा पुनः । क्षत्रियाणां च नारीणां भोक्तुं स्नानार्थमुद्यतः ॥४५॥ ततः शरासने बाण संधाय जगदीश्वरः । भुवं भित्त्वाऽथ पातालाज्जलं तत्र समाह्वयत् ॥४६॥


इस तरह देवीकी बात सुनकर वे सब गजगामिनी स्त्रियें विस्मित होकर शबरीके पीछे-पीछे चलीं ॥२९॥ वहाँ जाकर शबरीने उन सब स्त्रियोंको रामचन्द्रजीका दर्शन कराया । उन नारियोंने कमल सरीखे नेत्रोंवाले रामको देखा और प्रणाम किया । इसके बाद दिव्य अ न्न सामने रखकर सुवर्णके पात्रोंमें जल भरकर रक्खा और उन सब स्त्रयोंने एक स्वरसे भगवान्से प्रार्थना की-॥३०। ३१॥ हे राम ! आपने शबराके द्वारा अपने आनेका संदेश भेजकर हम लोगोंको हार दिया है ॥३२॥ साक्षात् दुर्गाजीके द्वारा भेजवाये इस खाद्य पदार्थोंको आप स्वीकार करें । उनकी बातोंको सुन तो मुसकाकर राम बोले-हे नारियों ! दुर्गाजीने हमारे विषयमें क्या कहा था, सो तो बतलाओ । स्त्रियां विस्तारपूर्वक दुर्गाजीके द्वारा कही गयी ब त बतलाती हुई कहने लगीं-उन्होंने कहा था कि राम साक्षात् महेश्वर हैं और मैं जानकी हूँ जो लोग हम दोनोंम किसी प्रकारका भेद मानते हैं, वे रौरव नरकम पड़ते हैं । इसलिए तुमलोग बहुने रामको भोजन कराके प्रसन्न कर आओ। उनमे जो कुछ बचेगा सो मैं सहर्ष स्वीकार करूंगी । हे स्त्रिया ! अब तुमलोग उस भूखे रामजीके पास जाओ । इस तरह देवीकी ब त सुनकर हम सब आपके पास दौड़े आयीं ॥३३-३७॥ अब हमारे पूर्वसञ्चित पुण्योंके प्रतापसे इस अन्नको ग्रहण करिए । इसके अनन्तर हंसकर श्रीरामचन्द्रजीने कहा-॥३८। यदि देवीकी बात सच है तो वे सीतारूपसे यहाँ मेरे पास आय ॥३९। तुममेंसे कोई स्त्री जाकर मेरा यह सन्देश दुर्गाजीको सुना आये । ४०॥ रामके आज्ञानुसार उनमेंसे एक स्त्री दौड़ती हुई दुर्गाजीके पास पहुँची और रामका संदेश कह सुनाया ॥ ४१॥ उस स्त्रीके मुखसे इस प्रकार रामका संदेश सुनकर दुर्गाजीने थोड़ासा दरवाजा खोला और सीतारूपमें बाहर निकल आया । ४२॥ उन्होंने मन्दिरके दरवाजाको मजबूत बन्द किया और हाथमें जलपात्र लेकर मुसकराती हुई रामकी ओर चल पड़ीं ॥४३॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने रामको प्रणाम किया और उनकी बगलमें जा बैठीं । यह कौतुक देखकर सब स्त्रियां बहुत विस्मित हुईं ॥ ४४॥ इसके बाद राम उन ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्योंकी स्त्रियोंका अन्न लानेके लिए स्नान करनेको उद्यत हुए ॥ ४५॥ एतदर्थं रामने अपने धनुषपर बाण चढ़ाया और पृथिवीको फोड़कर पाताल-

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