भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 724

[सर्गः १२] मनोहरकाण्डम् ७०७

पुरैकदा तु मुनयः संभूयोचु रघूत्तमम् । राम राम महाबाहो कलावग्रे द्विजोत्तमाः ॥८३॥ स्वप्रविना मंदधियो भविष्यन्त्यवनीतले निजजठरपूर्त्यर्थे द्वाराद्वाराद् भ्रमन्ति हि ॥८४॥ कुतोऽवकाशः स्मरणे तव तेषां भविष्यति । अतस्तेषां हितार्थाय त्वां याचामोऽद्य राघव । ८५॥ तेषां हितार्थं किंचिञ्चोपायं वक्तुमर्हसि । तेषां वचनं श्रुत्वा मुनीनां रघुनन्दनः । ८६॥ उवाच वाक्यं सन्तुष्टस्तन्मुनीन्द्रसमन्वभू । सम्यगुक्तं मुनेश्रेष्ठाः शृणुध्वं वचनं मम ॥८७॥ मम मुद्रांकितं वस्त्रं कलौ धार्यं जनैः सुखम् । मम मुद्रांकितं वस्त्रं विभ्रतं मानवोत्तमम् । ८८॥ न स्पृशेद्यमकं किंचित्कृतं वापि नरेण हि । शङ्खचक्रगदापद्मशतमद्रांकितं शुभम् ॥८९॥ वस्त्रं धार्यं नरैर्भक्त्या मुद्रयैवांक्तिं तु वा । शङ्खादिश्चिह्नसंयुक्तं सदा वस्त्रं मम प्रियम् । ९०॥ मन्मुद्राङ्कितं वापि वस्त्रं मत्तोऽपदं स्मृतम् । स्नात्वा धार्यं सदा तच्च जपकाले विशेषतः ॥९१॥ मलमूत्रोत्सर्जने च शयने क्रीडने तथा । अशुचौ च सथे शूद्रौ दृष्टे राजसभासु च ॥९२॥ पथि दुर्जनसंसर्गे मुद्रावस्त्रं न धारयेत् । तथा भोजनकालेऽपि विहारे नैव धारयेत् ॥९३॥ स्नानकाले व्रते तीर्थे पूजायां पितृकर्मभिः । होमे दाने जप कृच्छ्रचांद्रायणव्रतादिषु ॥९४॥ नित्यकर्मसु काम्येषु तथा नैमित्तकेष्वपि । तथा तपःसु मन्मुद्रावस्त्रं धार्यं सदैव हि ॥९५॥ मम मुद्रांकितं वस्त्रं विभ्रतं मनोत्तमम् । अहं मोक्षं प्रदास्यामि सत्यं मन्य मुनीश्वराः । ९६। एवं श्रुत्वा राघव वयं मुनयस्ते मुदान्विताः । रामं पृष्ट्वाऽऽश्रमं स्वं स्वं प्रतस्थू मुदिताननाः । ९७। तस्मान्मदा मवमुद्रावस्त्रं धार्यं नरैर्भुवि । रामेति द्वयक्षरो मन्त्रो जपनीयस्तु सर्वदा ॥९८॥ राममुद्रा शुभा धार्या गोपीचन्दनसंयुता । मुद्रांश्च मार्दवंभक्त्या शमतानार्थमादरात् ॥९९॥

देखकर यमके दूत उसी तरह भागत हैं, जैसे सिंहका देखकर मृग भाग जाते हैं॥ ८२॥ एक बार बहुतसे मुनि एकत्र होकर रामसे बोले- हे महाबाहो ! आगे चलकर कलियुगमें ब्राह्मण बड़े मन्दबुद्धि होंगे और पेट पालनेके लिये द्वारा २ घूमते हुए द्वार-द्वार घूमेंगे ॥ ८३ ॥ ८४ । उनका आपका स्मरण करनेके लिए अवकाश कैसे मिलेगा। अतएव उनके कल्याणार्थ हम आपसे यह भिक्ष माँग रहे हैं कि उनके हितके लिये कोई उपाय बतला दीजिए। उन मुनियोंकी बात सुनकर रामचन्द्रजी प्रसन्न मनसे बोले कि आपने बहुत उत्तम प्रश्न पूछा है। अच्छा सुनिए ८५-८७। उन लोगोंको चाहिए कि सदा मेरी मुद्रासे अंकित वस्त्र धारण करें। जो मेरी मुद्रासे अंकित कपड़े पहन रहेगें, उनसे यदि किसी प्रकारका पातक भी हो जायगा तो वह उनका नहीं लगेगा इसलिए वे सदा शंख चक्र, गदा और पद्मसे अङ्कित कपड़े पहनें। यह भी न हो सके तो केवल मेरे नाम ही से चिह्नित कपड़े पहने। शंख आदिसे चिह्नित वस्त्र भी मुझे बड़े प्रिय हैं॥ ८८-९०॥ राममुद्रासे अंकित वस्त्र मुझे बहुत प्रसन्न करता है। इसलिए लोगोंको चाहिए कि स्नान करके ऐसे ही कपड़े पहने और जपके समय इसके लिए विशेष ध्यान रक्खें ॥ ९१ ॥ मलमूत्र त्यागते समय, बिछौनेपर, खेलते समय, अपवित्रामस्थान, किसी दुष्टके के घरपर, बाजारमें, राजसभा में, रास्ते में और दुर्जनोंके संसर्गमें इस मुद्रावस्त्रको कभी भी न पहनें। भोजन करते समय और स्त्रीके साथ विहार करते समय भी इसे न पहनें ॥ ९२ ॥ ९३ ॥ स्नान करनेके अनन्तर, उत्तम तीर्थमें पूजा करते समय, पितृश्राद्ध करते समय, होम, दान, जप आदि करते समय, चान्द्रायण आदि व्रतमें, नित्यकर्म करते समय, काम्य कर्ममें, कोई नैमित्तिक कर्म करते समय और तपस्या करत समय मेरी मुद्रासे अंकित वस्त्र अवश्य पहनना चाहिए ॥ ९४ । ९५ । हे मुनीश्वरो ! यह बात बिल्कुल सत्य है कि मेरी मुद्रासे अंकित वस्त्र पहननेवालोंको मैं स्वयं मुक्ति देता हूँ ॥ ९६ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर वे सब बहुत प्रसन्न हुए और रामसे आज्ञा लेकर अपने-अपने आश्रमोंको चले गये । ९७ ॥ इसीलिए लोगोंको यह चाहिए कि हमेशा राममुद्रासे अंकित कपडे पहन और 'राम' इस दो अक्षरके मंत्रका जप करें ॥ ९८ ॥ गोपीचन्दनसे राममुद्रा