श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 725, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७०८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १३ |
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पूजा सदा राघवस्य कार्याऽत्र मानवैर्भुवि सदा स्नानं रामतीर्थे नरैः कार्यं प्रयत्नतः ॥ १०० ॥
सदा रामायणं चेदं श्रवणीयं नरैर्भुवि चिंतनीयः सदा रामो जन्ममृत्युन्निवारकः ॥ १०१ ॥
स्तोतव्यः कीर्तनीयश्च वन्दनीयोऽत्र राघवः । न किंचिदणुमात्रं हि विनारामं सदाऽऽचरेत् ॥ १०२ ॥
हनुमत्कवचं दिव्यं पठित्वाऽऽदौ नरैर्भुवि । ततः श्रीरामकवचं पठनीयं हि सर्वदा । १०३ ॥
पठंति रामकवचं हनुमत्कवचं विना । अरण्ये रोदनं तैस्तु कृतमेव न संशयः ॥ १०४ ॥
स्तोत्राणामुत्तमं स्तोत्रं सर्वभीतिनिवारकम् । श्रीरामकवचं नित्यं पठनीयं नरैर्भुवि ॥ १०५ ॥
विष्णुदास उवाच
गुरोऽहं श्रोतुमिच्छामि हनुमत्कवचं शुभम् । तथैव रामकवचं वद कृत्वा कृपां मयि ॥ १०६ ॥
श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स सावधानमनाः श्रृणु हनुमत्कवचं रामकवचं च वदामि ते ॥ १०७ ॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकाण्डे
आदिकाव्ये रामपार्षदत्वप्रदर्शनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
त्रयोदशः सर्गः
( हनुमत्कवच तथा रामकवच )
श्रीरामदास उवाच
एकदा सुखमासीनं शंकरं लोकशंकरम् । पप्रच्छ गिरिजाकांतं कर्पूरधवलं शिवम् ॥ १ ॥
पार्वत्युवाच
भगवन् देवदेवेश लोकनाथ जगत्प्रभो शोकाकुलानां लोकानां केन रक्षा भवेद्द्भुवम् ॥ २ ॥
संग्रामे संकटे घोरे भूतप्रेतादिके भये दुःखदावाग्निसंतप्तचेतसां दुःखभागिनाम् ॥ ३ ॥
धारण करें। इससे श्रीरामचन्द्रजी प्रसन्न होंगे। ९९ ॥ संसारमे मनुष्योंको चाहिए कि सदा रामचन्द्रजीकी पूजा करें और प्रयत्न करके रामतीर्थमे स्नान करें ॥ १०० ॥ सर्वदा इस आनन्दरामायणका पाठ करते हुए जन्म और मृत्युका दुःख दूर करनेवाले रामचन्द्रजीका ध्यान करते रहे। उन्हींकी स्तुति करें और उन्हींका गुणानुवाद गावें कहनेका भाव यह है कि रामचन्द्रके भजनके सिवाय कोई और काम न करें ॥ १०१॥१०२॥ पहले हनुमत्कवचका पाठ करके श्रीरामकवचका पाठ किया करें। १०३ ॥ जो लोग हनुमत्कवचका पाठ किये बिना ही श्रीरामकवचका पाठ करते हैं, वे मानो अरण्यरोदन करते हैं इसमें कोई संशय नहीं है । १०४ ॥ सब स्तोत्रोंमें उत्तम तथा सब प्रकारके भयका निवारण करनेवाले श्रीरामकवचका पाठ सांसारिक मनुष्योंको अवश्य करना चाहिए ॥ १०५ ॥ विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! हम आपके मुखसे हनुमत्कवच और रामकवच सुनना चाहते हैं। मेरे ऊपर कृपा करके बतलाइए ॥ १०६ ॥ रामदासने कहा—हे वत्स ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। मैं हनुमत्कवच और रामकवच इन दोनों कवचोंको कहूँगा। तुम सावधान होकर सुनो ॥ १०७ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते मनोहरकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
श्रीरामदास कहने लगे—एक बार संसारका कल्याण करनेवाले शिवजी बैठे हुए थे। उसी समय पार्वतीजीने कहा—हे भगवन् ! हे देवदेवेश ! हे लोकनाथ ! हे जगत्प्रभो जो लोग किसी प्रकारके शोकसे आकुल हों उनकी किस प्रकार रक्षा की जा सकती है ? जो लोग घोर संग्राम, महान् संकट, भूत प्रेत आदिकी बाधाओं अथवा दुःखरूपी दावाग्निसे जल रहे हों, उनके उद्धारार्थ कौन उपाय किया जा सकता है ? । १ ३ ।