श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 718, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ७०१
इति शंखुवचः श्रुत्वा पद्मनेत्रा कृशोदरी । काशीनाम्नी द्विजपत्नी ददौ पुण्यं निजं तदा ॥२७९॥ दत्तः स राक्षसंभ्रंशस्त्यक्त्वा देहं मलीममम् । दिव्यं विमानमारुह्य गन्वा भार्यायुतं द्विजम् ॥२८०॥ दिव्यमाल्यांबरधरो हरिलोकं जगाम सः । शम्भुरपि प्रियायुक्तो मधुमामं विवर्णयन् ॥२८१॥ ययौ कांचीपुरीं श्रेष्ठां जनान् वृत्तं निवेदयन् । भो पिशाचा यथा वृत्तं भवद्भिश्श्च कथानकम् ॥२८२॥ तन्ममं च मयाऽऽख्यातं राक्षमोद्धारणादिकम् ।
श्रीरामदास उवाच
इत्युक्त्वा नृहरिर्विप्रो गृहीत्वा स्नांजले जलम् ॥२८३॥
| ददौ दिनद्वयस्यास्य पुण्यं चैत्रकृतं निजम् | ततः प्रोवाच भार्यां तु रम्ये चन्द्रसमे प्रिये ॥२८४॥ |
| या त्वया शीतलागौरी स्नाता सीताकृते वरे | तीर्थे वरस्य दिनैकस्य देहि पुण्यं शुभानने ॥२८५॥ |
| पिशाचिन्यै समुद्धर्तुं मा विचारोऽस्तु ते हृदि | इति भर्तुर्वचः श्रुत्वा रम्भा पद्मवलोचना ।२८६॥ |
| रूपीनाम्नी मम माता ददौ पुण्यं निजं तदा | ततः पिशाचास्ते सर्वे मुक्ताः शीघ्रं शुभावहाः ॥२८७॥ |
| निजरूपाणि वै प्रापु प्रणेमुर्नृहरिं जवान् । | नत्वा स्तुत्वा पुनर्नत्वा नृसिंहं तं प्रियायुतम् ॥२८८॥ |
| आपृच्छय जग्मिरे सर्वं स्वगुरोग्रहमं प्रति | गुरुश्चापि सुतां स्वीयां तां ददावतिहर्षितः ॥२८९॥ |
| तपोन्वेष्ठाय शिष्याय कनिष्ठ यापरां सुताम् । | स्त्रीयोदमगुणोपेतां ददावप्रतिमां वराम् ॥२९०॥ |
| सतस्त्री मखियो विप्रौ जग्मतुर्ना मुदान्वितौ | स्वस्वपितुराश्रमं हि तथास्तां पितरावपि ॥२९१॥ |
| दृष्ट्वा पुत्रौ समायातौ सस्त्रियौ तोषमापतु | नृहरिश्च पिशाचुक्तोऽब्जक प्रति समाययौ ॥२९२॥ |
| चैत्रस्नानेन तत्पुत्रो रामदासाभिधस्त्वहम् । | जातस्ततस्तौ देहान्ते जग्मतुर्विष्णवं पदम् ॥२९३॥ |
| एवं शिष्य मधुस्नानमहिमा बहुभिर्नरैः । | दैवैः सिद्धैश्च गंधर्वैः सदाऽनुभवितोऽस्ति हि ॥२९४॥ |
| तस्मान्मापावश्यस्य हि स्नात्वार्थं मानवोत्तमैः | रामतीर्थेषु सर्वत्र रामचन्द्रं प्रपूजयेत् ॥२९५॥ |
इस प्रकार शंखुकी बाता सुनकर उस काशी नाम्ना द्विजपत्नी ने अपना पुण्य उसका दे दिया ॥ २७९ ॥ इसके प्रभावस उस राक्षसने अपनो वह अधम देह छोड़ दा और दिव्य विमानपर चढ़कर ब्राह्मण तथा ब्राह्मण-पत्नीको प्रणाम करता हुआ विष्णुलोकको चला गया । शम्भु भा चैत्रमासक माहात्म्यका वर्णन करता हुआ कांचीपुरीका चल पड़ा। हे पिशाचगण ! आठ ताषोन जो कथा पूछी, सा राक्षसके उद्धारस सम्बन्ध रखनेवाली सब बात कह सुनायी। रामदासने कहा-ऐसा कहकर सोमहूत बजनाम जल लिया और अपने चैत्रस्नानके पुण्यमसं दो दिनका पुण्य उस न दिया। फिर अपनी स्त्रीस कहा कि तुमन असमे जो शीतला गौरीका स्नाव किया है। उसमसे एक दिनका पुण्य इस पिशाचिनीका द दो ॥ २८०-२८५ ॥ इससे इसका उद्धार हो जायगा । इसपर कुछ विचार मत करो। इस प्रकार स्वामीकी आज्ञा सुनकर उस कमलनयनाने अपना पुण्य दे दिया। तब शीघ्र ही वे सब पिशाचयोनिसे मुक्त होकर ॥ २८६ ॥ २८७ ॥ अपने-अपने रूपको प्राप्त हा गये। इसके अनन्तर उन्होंने नृसिंहको प्रणाम किया, बारम्बार उनका स्तुति की और उनसे पूछकर अपने गुरुके आश्रमको चल गये। गुरुन भी अतिशय हर्षित होकर अपन कन्या उन्हे दे दा। उनमें ज्येष्ठ भ्राताको ज्येष्ठ कन्या तथा कनिष्ठको एक दूसरी सर्वो कन्या समर्पित की ॥ २८८-२९० ॥ इसके अनन्तर वे दोनों अपनी-अपनी स्त्रींको साथ लेकर पिताके आश्रमपर गये ॥ २९१ ॥ उनके माता-पिता भी स्त्र के साथ अपने बेटको आते देखकर प्रसन्न हुए। नृसिह भी अपनी भार्याक साथ अब्जक नगरको चल गये ॥ २९२ ॥ चैत्रस्नानके पुण्यसे उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम रामदास है और वह मैं हूँ। कुछ दिनों बाद मेरे माता-पिताका देहांत हो गया और वे विष्णुलोकको प्राप्त हुए ॥ २९३॥ हे शिष्य ! इस प्रकार चैत्रस्नानकी महिमाका कितने ही मनुष्य, देवता, सिद्ध तथा गन्धर्वाने अनुभव किया है ॥ २९४ ॥ इस कारण अच्छे मनुष्योको चाहिए कि चैत्रमासमें अवश्य