भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 717

७०८ आनन्दरामायणे [सर्गः ११

यत्र कार्त्तस्वरघटाः प्रतोलीशिरसि स्थिताः। रामं द्रष्टुमनस्तान प्राप्ताः सूर्या इवांबभूः ॥ २६३॥

नृसिंह उवाच

एवमुक्त्वा कर्कशेन पत्न्या कार्पटिकेन च । सहितश्च तदा शंभुस्सो पुरीं संविवेश सः ॥ २६४॥ रामतीर्थं ततो गत्वा कृत्वा क्षौरादिकं विधिम् उपोष्य दिनमेकं हि तीर्थश्राद्धं चकार सः ॥ २६५॥ अमावास्यां शुभां चैत्रे प्राप्तां ज्ञात्वा द्विजोत्तमः। मुक्त्यर्थं स्वपितुश्चक्रे अन्नदानं यथाविधि ॥ २६६॥ तच्चैत्रमासे रजनीशमक्षये दत्तं पितुर्मुक्तिमदं मनोहरम् । विप्रेण चान्नं पथिकस्य वाक्यतस्तस्मात्पिशाचः सुरमञ्च निर्ययौ ॥ २६७॥ अयोध्यायां ततः शंभुः कृत्वा चैत्रेऽवगाहनम् । उद्यापनविधिं चापि यथोक्तं च चकार सः ॥ २६८॥ कर्कशोऽपिमधौ स्नात्वा मुक्त्वा पापीयमुत्तरम् अयोध्यानगरीमध्ये साधुवृत्त्याऽवसद्चिरम् ॥ २६९ । श्रीरामचिंतनं कुर्वन्निनायायुष्यमक्षयम् । ततः प्राप हरेर्लोक मयोध्यामरणेन सः ॥ २७०॥ शंभुर्रापि मधौ स्नानं कृत्वा कांचीपुरीं पुनः गंतुं प्रतस्थे श्रीरामं नत्वाऽयोध्यां पुनः पुनः॥२७१ भार्यया सहितः शंभुस्तेन कार्पटिकेन च ययौ पूर्वेश्च मार्गेण यत्र तौ करिकाहरी ॥ २७२॥ स्थापितौ शपथैः कृत्वा ह्युनेस्तत्र मखागमत् । दत्त्वा दिनद्वय पुण्यमुभाभ्यां मधुमासजम् ॥ २७३॥ दत्त्वा स्वीयांजलौ तोयं तयोर्मुक्ति चकार सः । ततस्तौ करिमिहौ च दिव्यमाल्यनुलेपितौ । २७४॥ दिव्यं विमानमारुह्य विष्णुलोकं गतावभौ ततोऽग्रे द्विजवर्य्यः सः ययौ मार्गेण भार्यया ॥ २७५॥ स यत्र राक्षमुः पूर्वं स्थापितः शपथैर्वने । तं दृष्ट्व राक्षसश्रेष्ठं भार्या प्राह द्विजोत्तमः ॥ २७६॥ अपि काण्डाष्ट्ये रम्ये शृणु मे वचनं शुभम् । या त्वया शीतला गौरी स्नाता वै सरयूजले । २७७। तस्यैकदिवसस्याथ देहि पुण्यं शुभावहम् । राक्षसाय हि मद्वाक्याद्गृहीत्वा जलमञ्जलो ॥ २७८॥

अमरावतीपुरके समान ददीप्यमान इस अयोध्यापुरीको देखो ॥ २६२ ॥ जहाँ कि प्रतोलीके मस्तकपर विराज- मान सुवर्णके भवन ऐसे दीख रहे हैं, जैसे अनन्त सूर्य एक साथ रामचन्द्रजीका दर्शन करने आ गये हों ॥ २६३ ॥ नृसिंहने कहा- इस तरह कहकर अपनी पत्नी, कार्पटिक तथा कर्कशके साथ-साथ शम्भु अयोध्या पुरीमें प्रविष्ट हुआ ॥ २६४ ॥ पहल रामतीर्थपर पहुंचकर उसने क्षौर बादि कराया और एक दिनका उपवास करके तीर्थश्राद्ध किया ॥ २६५ ॥ जब चैत्रकृष्ण अमावास्या तिथि आयी ता उसने अपने पिताकी मुक्तिके लिए विधिवत् अन्नदान किया ॥ २६६ ॥ उस चैत्रमासमें अमावास्या को शम्भुने कार्पटिकके कथनानुसार जो अन्नदान किया, उसके पुण्यसे तत्काल उसका पिता पिशाचयोनिसे मुक्त होकर स्वर्गको चला गया ॥ २६७ ॥ तदनन्तर शम्भुने अयोध्यामें चैत्रस्नान और शास्त्रोक्त विधिसे उसका उद्यापन किया। कर्कश भी चैत्रस्नान करके सब पापोंसे मुक्त हो गया और साधुवृत्तिसे उसी अयोध्यामें ही बहुत दिन बिताये ॥ २६८ व २६९ ॥ अन्तमें रामका स्मरण करते-करते उसने शरीर त्याग दिया । अयोध्यामें मरनेसे उसे विष्णुलोककी प्राप्ति हुई ॥ २७० ॥ शम्भुने भी स्नान करनेके बाद श्रीरामचन्द्रजीको बारम्बार प्रणाम करके काञ्चीपुरीको जानेकी तैयारी की ॥ २७१ ॥ अपनी स्त्री और उस कार्पटिकको साथ लेकर शम्भु उसी मार्गसे लौटकर उधर चला, जहाँ कि अयोध्या आने समय सिंह और हाथीको छोड़ आया था । २७२ ॥ वहाँ पहुंचकर उसने हाथमें जल लिया और चैत्रस्नानके पुण्यमेंसे दो दिनका पुण्य देकर उन दोनोंकी उस योनिसे मुक्ति कर दी। इसके अनन्तर वे दोनों हाथी और सिंह दिव्यमाल्यसे अलंकृत हो और दिव्य विमानपर बारूढ़ होकर विष्णुलोकको चल गये। इसके बाद शम्भु अपनी स्त्रीके साथ आगे बढ़ा ॥ २७३-२७५ ॥ जात जात वह उस स्थानपर पहुंचा, जहाँ कि जाते समय शपथ करके उस राक्षसको वनमें छोड़ आया था । वहाँ राक्षसको सामने देखकर शम्भुने अपनी स्त्रीसे कहा- हे काणिके ! जो तुमने शीतला गौरीको व्रत किया है। हाथमें जल लेकर उसके एक दिनका पुण्य इस राक्षसको दे दो ॥ २७६-२७८ ॥