भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 716

सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६९९

प्रासादोऽयं लवस्यात्र बहुरत्नविराजितः । यत्र चित्राण्यनेकानि मोहयन्ति मृगीदृशाम् ॥ २४८॥
चक्षूंषि जातरूपाणि योगिनामपि मानसम् । विन्यस्तरत्नविन्यासः शातकुम्भमयी बहिः ॥ २४९॥
हेमपंक्तिव सततं रत्नभानुमहाप्रभाम् । रत्नप्रासादसंयुक्तामयोध्यां पश्य सुप्रभाम् ॥ २५०॥
यदंगणं क्षालयती मदांधं स्वोर्म्यजलैः सोऽयमगर्व्यन्नः ।
अभ्रंकषैर्हेममयैः स्वकुंभैर्विराजितोऽय खलु चित्रकेतोः । २५१ ।
दिव्यप्रवालघटिते कपाटे यत्र चञ्चले । प्रासादोऽयमंगदस्य रुक्मभित्तिर्विनिर्मितः ॥ २५२।
गरुडोद्गारघटितप्रतोलीपरिशोभितः । प्रासादः पुष्कगस्यायं नयनानंदतो नृणाम् ॥ २५३॥
विशुद्धजांबूनददिव्यभूर्मेर्लसत्पताकश्चिदशामिवद्यः ।
प्रासाद एषः परमो मनोज्ञस्तक्षकस्य वीरस्य महान् विभाति ॥ २५४॥
यस्याधिभूमि नवरत्नसिंहास्मिंश्च यदैव विजिताखयोऽपि ।
लोकश्चतुर्थो न हि दृश्यतेऽतः पद ममुद्यम्य किमाविरास्ते ॥ २५५॥
अघोवमनकरिणां घटा टापयितुं किमु । उद्धस्तहस्तो यस्य रत्नसिंहो विराजते । २५६॥
सोऽयं हेमभित्तिमयः प्रासादः प्रलन्तः शुभः । सुवाहो पश्य भो भित्त्रुरत्नमानुविराजितः । २५७॥
रत्नप्रवालस्फटिकनीलकाश्मर्वनिर्मितः । प्रासादोऽयं पुण्ड्रकेतोर्महान् दोपिमरः शुभः । २५८॥
कल्हाररुत्पलैः शोणैररविन्दैः शतपत्रकै । विराजित पराङ्गह रमनीयं प्रदृश्यते ॥ २५९॥
इन्दुर्यलं रवितलेनिविद्धा यम्य भूमरः । हरंति ग्रीष्ममनापं निश्चिदर्माकरोत्करः । २६०॥
अमंदकुरुविंदानां रिन्तामैर्यत्र बाहभिः । मद्यन्ति शुकयेनापि मृदृष्टाडिमशंकया । २६१॥
एवं पश्य शुभां रम्यां पताकाभिर्विराजिताम् । विहायोध्यां मुक्तिपुरीं द्वितीयाममरावतीम् ॥ २६२॥


जिसमें म तियोश्री जाल लगे हैं, सुदर्शन चक्र एवं गरुडके चिह्न मिश्रित पताकायें फहरा रही हैं, बालसूर्यकी तरह सुन्दर यह भवन कुशलका है ॥ २४८ बहुरत्न रत्नोंसे विराजित यह लवका दिव्य भवन है, जिसमें बने हुए चित्र स्त्रियोंका मन मोह लेते हैं ॥ २४८ ॥ जहाँ कि याचियोंकी बात कौन अहङ्कार शान्तभी बन जाती है, जिस नगरीके भवनोंमें विविध प्रकारके रत्नोंकी पच्चाकारी की हुई है, जिसके बाहरकी भूमि सुवर्णमयी है, जिसकी अटारियों सूर्यमुकुटकी तरह देदीप्यमान हो रही है, उस अयोध्यापुरीको देखो । जिसके प्रांगणको धोता हुई यह सरयू नदी विराजमान है। आकाशको छूनेवाले बावण रत्नदीप कलशोंसे सुशोभित यह पूरी साक्षात् चित्रकेतु गन्धर्वकी पुरीके समान सुन्दर दीख रही है ॥ २४९-२५१ ॥ दिव्य प्रवाल मणिसे बने हुए कपाट जिसमें लगे हैं और सुवर्णकी दीवारें बनी हैं यह अङ्गदका भवन है। गरुड़मणिकी जिसमें प्रतोलीयाँ बनी हैं, नयनोंका आनन्द देनवाला वह भवन पुष्करका है। जिसके फर्श विशुद्ध सुवर्णकी बनी है और सुन्दर पताकायें जिसमें फहरा रही हैं, यह परम मनोज्ञ प्रासाद वीर तक्षकका है। २५२-२५४॥ इधर देखो, नवरत्नमय सिंह विद्यमान है। इस नवरत्नमय सिंहकी बड़ी महिमा है। इसके प्रभावसे वामन भगवान्ने तीन पैरसे तीनों लोकोंको नाप लिया था। चौथा कोई लोक ही नहीं बना था, जिसे नापते ॥ २५५॥ जिसके घरमें ऊपरकी पेंड उठाये नवरत्नका सिंह विराजमान हो तो अघ (पाप) रूपी मतवाले हाथियोंका उसे कुछ भी भय नहीं रह जाता ॥ २५६ ॥ हेमभित्तिमय रत्नके शिखरम विराजित यह प्रासाद सुबाहुका है ॥ २५७ ॥ रत्न प्रवाल, स्फटिक और नीलम काश्मीरसे निर्मित यह प्रासाद पुण्ड्रकेतुका है ॥ २५८ ॥ कल्हार उत्पल, कोक, अरविन्द तथा शतपत्रसे विराजित समस्त पापोंको हरनेवाला यह रमणीय दिखलाई पड़ रहा है ॥ २५९ ॥ जिसकी भूमि चन्द्रकान्त मणिसे बनी है। अर्थात् टपकते हुए ठंढे जलोंकी बूंदोंके गिरनेसे ग्रीष्म-ऋतुका सन्ताप दूर हो जाता है। दमकते हुए कुरुविन्द मणिके लगे रहनेसे यहां शुकोंने मूंग और अनारके फलका भ्रम हो जाता है। २६० ॥ २६१ ॥ इस प्रकारकी सुन्दर, रम्य और पताकाओंसे विराजित दूसरी