श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 715, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें३९८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ११
ते द्विजाः कस्य नो वन्द्या अयोध्यानागरीस्थिताः । औदार्ये कल्पतरवो गांभीर्ये सागरा इव ॥२३२॥ क्षमया क्षमया तुल्या जंगमा निगमा इव । दैन्यग्राहमहाग्रामाधिपामगस्त्यमहर्षयः ॥२३३॥ निवसंति द्विजा यत्र षड्धाः सर्वमहीभुजाम् । चतुर्वर्गफले पेत चतुरश्रममुज्ज्वलम् ॥२३४॥ चातुर्वर्ण्यमिहैवास्ते चतुरम्नायमाश्रगम् । कृमिकीटपतङ्गानां विना ज्ञानमयाभिभिः ॥२३५॥ अत्र निर्वाणपदवी सुलभाऽस्ति वनैचर । एतःपानघटान् भोक्तुं तरगान्कुश्यानिव ॥२३६॥ बिभर्ति धरणीतोयं निःश्रेणिर्योगमोक्षयोः । पश्य स्फाटिकसोपाननिविष्टमुनिसंस्तुताम् ॥२३७। सरयूनदीमुत्तराशां कुतामिव पुरन्दरा । इन्द्रनीलमहातुंगप्रतोलीचारुदर्शनाः ॥२३८॥ रामचन्द्रस्य दिव्योऽयं प्रासादस्तुलितारुणः । प्रतोली यस्य घटिता काश्मीरुपलैर्वरैः ॥२३९॥ सीतायाश्च महानैष प्रासादो रत्नतोरणः । नानारत्नैर्मण्डितश्च हेमस्तंभविराजितः । २४०॥ स्फटिकैरुपलैश्चित्रः मण्यूटीरसंश्रितः । रामतीर्थसमीपेऽयं सीतारामस्य वै पर ॥२४१॥ प्रासादो विमलो भाति तप्तकांचननिर्मितः । पताकाभिविचित्राभिः कलशैः सुविराजितः ॥२४२॥ उभयंजांबनदरत्नकुम्भः प्रवालवैदूर्यनिबद्धभूमिः । हेमप्रतोलीरचितः स एष प्रासादवर्योऽस्ति हि लक्ष्मणस्य । २४३ । चातुर्यं यत्र विश्रान्तं सकलं विश्वकर्मणः । सोऽयं भरतराजस्य प्रासादो हेमतोरणः । २४४ । तथा देदीप्यमानोऽयं रत्नभित्तिविनिर्मितः । प्रसादो दृश्यते रम्यः शत्रुघ्नस्य शुभावहः ।२४५। स्फटिकैर्भित्तिभिर्भित्तः प्रोच्चः कनकगेहिनः । प्रासादो वायुपुत्रस्य दृश्यतेऽयं महोज्ज्वलः, २४६।। य एष मुक्ताफलजालशोभी सुदर्शनार्कः खगराजकेतुः । कुशस्य रम्यस्त्वयमाविरास्ते प्रासादकुग्म किमु बालसूर्यः । २४७।
सदा आनन्द छाया रहता है। जहाँके निवासी ब्राह्मणोंके पैर इन्द्रादि देवता भी धोया करते हैं, तब व भला किसके वन्दनीय न होंगे। यहाँके विप्र उदारताम कल्पवृक्ष, गम्भीरतामें समुद्र, क्षमामे पृथ्वी, जंगमोंमें वेद तथा दरिद्रतारूपी महान् समुद्रके शोषणम अगस्त्यके सदृश हैं। संसारके सब राज इनकी मस्तक झुकाकर प्रणाम करत है। इनको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पदार्थांमें किसकी भी कमी नहीं रहती। ये आनन्दके मध्य ब्रह्मचर्य, गृहस्थ वानप्रस्थ एवं संन्यास, इन चारो आश्रमोंका उपभोग करत है ॥ २३१-२३४ ॥ यहाँपर चारों वेदोंके अनुसार चार वर्णके लोग निवास करत हैं। हे वनचर यहाँ ज्ञान और समाधिके बिना ही कीट-पतङ्ग आदिकोके लिए भी मुक्ति सुलभ है। यहाँ पापरूपी घड़ोंका जल पीनेके लिए योग और मोक्षकी निसेनी बनकर सरयूका जल शोभित हो रहा है। देखो न स्फटिक मणिकी बनी सीढ़ियोंपर मुनिगण बैठै हुए स्तुति कर रहे हैं। अयोध्याका उत्तर दिशामे इन्द्रनीलमणिसे बने मार्गके समान सुन्दर सरयू नदी बह रहा है । २३५-२३८ ॥ यह रामचन्द्रजीका दिव्य और ऊँचा प्रासाद है, जिसमें ऊँच कंगूरे बने हुए हैं। इसके आस-पासके मार्ग कश्मीरीक पत्थरोंस बने हैं ॥ २३६ ॥ इस ओर सीताका महाभवन दिखाई पड़ता है। जिसमें रत्नके तोरण और सुवर्णके स्तम्भ लगे हुए हैं ॥ २४० ॥ जहाँ तहाँ स्फटिक मणिके पत्थर लगे हैं, जिससे यह चित्र-विचित्र मालूम पर रहा है। रामतीर्थके पास ही सीता-रामका एक दूसरा भवन सुवर्णसे बना है। उसमें भी विचित्र प्रकारकी पताकाएं लगी हैं और सुन्दर कलश सुशोभित हो रहे हैं ॥ २४१ ॥ २४२ ॥ जिसमें उभारे सुवर्ण तथा रत्नोंके कलश हैं सुन्दर प्रनाल और वैदूर्यमणिकी दीवारें बनी हैं। इसके भी आस पास सुवर्णके माग बने हैं। यह श्रीलक्ष्मणजीका भवन है ॥ २४३ ॥ वह सामनेका भवन जिसके बनानेमें विश्वकर्माकी सारी चातुरी समाप्त हो चुकी है, श्रीभरतजीका भवन है। इसमें भी सुवर्णके तोरण लगे हुए हैं ॥ २४४ ॥ रत्नोंसे बनी दीवारवाला यह रम्य प्रासाद शत्रुघ्नजीका है । २४५ ॥ चांदीका कोठा ओर स्फटिक मणिसे बनी दीवारका यह सुवर्णमय प्रासाद वायुपुत्र श्रीहनुमान्जीका है ॥ २४६ .