भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 719
७०२आनन्दरामायणे[ सर्गः १२

एवं त्वया यथा पृष्टं तथा सर्वं निवेदितम् । मया काऽन्या स्पृहा तेऽस्ति श्रोतुं तद्वद वच्म्यहम् ॥ २९६॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकाण्डे चैत्रस्नानमाहात्म्ये एकादशः सर्गः ॥ ११ ॥


द्वादशः सर्गः

( श्रीरामचन्द्र द्वारा अद्वैतभावका प्रदर्शन )

विष्णुदास उवाच

गुरोऽन्यद्रामचन्द्रस्य चरित्रं वद मां प्रति । शृण्वतो मे मुहूर्नास्ति तृप्तिः श्रोतुं स्पृहैधते ॥ १ ॥

श्रीरामदास उवाच

सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु । एकदा हयमारूढो पुत्रबन्धुबलैः सह ॥ २ ॥
वनं ययौ विहारार्थं रामचन्द्रो मुदान्वितः । तत्र दृष्ट्वा मृगं श्रेष्ठं तं हन्तुं रघुनन्दनः ॥ ३ ॥
बाणमाकृष्य तत्पृष्ठे ययौ वेगेन सादरम् । वनाद्वनान्तरं रामा मृगस्य च पदानुगः ॥ ४ ॥
एकाकी हयमारूढो विवेश गहनं वनम् । पश्चाद्दूरस्थिताः सर्वे लक्ष्मणाद्या बलैः सह ॥ ५ ॥
रामोऽपि निजबाणेन मृगं हत्वा वनेऽचरत् । निर्जलेऽतितृषाक्रान्तः क्षुधाव्याप्तोऽप्यभूत्तदा ॥ ६ ॥
ततो रामो वृक्षतले क्षण तस्थौ श्रमान्वितः । तावत्तं शबरी काचिद् दृष्ट्वा रामं मुदान्विता ॥ ७ ॥
नृपं ज्ञात्वा राजचिह्नैस्तं प्रणम्य पुरःस्थिता । तां दृष्ट्वा राघवोऽप्याह वाक्यं शबरि मे शृणु ॥ ८ ॥
लक्ष्मणाद्याः स्थिता दूरं क्षुत्तृड्भ्यां पीडितोऽस्म्यहम् ।
किंचिद्यत्नं कुरुष्वात्र येन मेऽद्य सुखं भवेत् ॥ ९ ॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा शबरी वाक्यमब्रवीत् । इतोऽविदूरे आगच्छ दुग्धाब्धि सरसस्तटे ॥ १०॥
भीमवारेऽद्य नार्यश्च बहवोऽत्र समागताः । तत्र त्वं च मया राम यदि यास्यसि सांप्रतम् ॥ ११॥


स्नान करके रामतीर्थमें जाकर रामचन्द्रजीका पूजन करें ॥२९५॥ तुमने जो पूछा, मैंने सब कुछ कह सुनाया । अब क्या सुननेकी इच्छा है, सो कहो । मैं सुनाऊं । २९६ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योत्स्ना भाषाटीकासहित मनोहरकाण्डे एकादशः सर्गः ॥ ११ ॥

विष्णुदास बोले—हे गुरो ! अब रामचन्द्रजीका कोई और चरित्र सुनाइए । क्योंकि रामचरित्र सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं होती । जितना ही सुनता हूँ, सुननेकी इच्छा बढ़ती जाती है । १ ॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! तुमने बहुत ही अच्छी बात कही है, अब सावधान मनसे मेरी बात सुनो । एक बार घोड़ेपर सवार होकर रामचन्द्रजी अपने भाइयों, पुत्रों तथा सेनाके साथ मृगयाविहार करनेके लिए वनमें गये । वहाँ एक अच्छा-सा मृग देखा और उसे मारनेके लिए धनुषपर बाण चढ़ाकर उसके पीछे-पीछे दौड़ चले । जाते-जाते वे गहन वनमें पहुँच गये । फिर भी राम एक वनसे दूसरे और दूसरेसे तीसरे वनमें मृगके पीछे-पीछे दौड़ते चले जा रहे थे । लक्ष्मण आदि साथी सेनाके साथ-साथ बहुत पीछे छूट गये २-५ ॥ अन्तमें बड़ी दूर जाकर रामने उस मृगको मारा । वह स्थान निर्जल था और उन्हें भूख-प्यास जोरोंसे लगी थी ॥ ६ ॥ वहाँ ही वे एक वृक्षके नीचे बैठ गये । उसी समय किसी शबरीने रामको देखा और उनको वेश-भूषासे पहचान लिया कि ये कोई राजा हैं । वह रामके पास जा तथा प्रणाम करके सामने बैठ गयी । उसे देखकर रामने कहा हे शबरी ! तू मेरी बात सुन ॥ ७ ॥ ८ ॥ मेरे लक्ष्मण आदि साथी पीछे छूट गये हैं। मैं भूख-प्याससे बहुत दुखी हूँ। तू कोई ऐसा उपाय कर कि जिससे मेरा दुःख दूर हो जाय ॥ ९ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर शबरीने कहा—हे राम ! यहाँसे थोड़ी दूरपर तालाबके