भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ३] पूर्वकाण्डम् ७२९

सर्गः ३] पूर्वकाण्डम् ७२९

नलं ययौ कुशः शीघ्रं नमुचं स ययौ लवः। जाम्बीरमङ्गदश्च तथा च वसुदं नृपम् ॥४१॥ चित्रकेतुर्ययौ शीघ्रं तथा लघुभूतं नृपम्। ययौ स पुष्करः शीघ्रं तक्षकः सुरथं ययौ ॥४२॥ अजमीढं सुबाहुश्च नृपकेतुर्ययौ बलम्। नृपकेतुर्हि तत्सैन्यं चकारामोधरं सुरैः ॥४३॥ वायव्यास्त्रेण चिक्षेप तद्वलं लवणाम्भसि। तदा ते सप्त वीराश्च नलप्रमुखाः पर्वता इव ॥४४॥ युयुधुः रघुपोत्तस्य बालकैः सह संगरे। न विरेजुर्बलैर्हीनाः स्कन्धहीननगोपमाः ॥४५॥ कुशो विव्याध बाणैस्तं नलं संग्राममूर्धनि। तदा नलः प्रमिक्ष्वाणो स्वबाणैस्तं व्यतर्जयत् ॥४६॥ ततः कुशः स्वबाणौघैर्नलमस्याश्वान्ध्वजं धनुः। छत्रं सारथिनं छित्वा तन्वं बाणैस्ताडयत् ॥४७॥ नमुचं चापि विव्याध स्वबाणौघैर्लवस्ततः। नमुचश्च लवं बाणैस्तदा व्याकुलमानयेत् ॥४८॥ नमुचं निजबाणौघैश्चक्रे विरथं लवः। एव जाम्बीर पार्थैरङ्गदः संप्रताडयत् ॥४९॥ प्रताड्य जाम्बीरः परिघेणानदं रुषा। ततो जाम्बीरं बाणैरंगदोऽशातयद्भुवि ॥५०॥ चित्रकेतुः स्वबाणौधैः क्रोशेन वसुदं नृपम्। चिक्षेप स्यन्दनाद्देमाच्चन्द्रनमित्राब्रवत् ॥५१॥ तथा लघुभूतौ बाणैर्हृदि विव्याध पुष्करम्। तदा स पुष्करः कोपाद्वाणैर्लघुभूतं रथे ॥५२॥ निषिक्षिपत्रोपमं कृत्वा वादयामास दुन्दुभिम्। सुरथश्चापि तर्ह्य स तक्षकं शरवृष्टिभिः ॥५३॥ ततस्तक्षः स्वबाणौघैः सुरथं गगनांगणे। यथा भ्रामयामास शुष्कपर्णं यथा महत् ॥५४॥ अजमीढस्तदा सर्वान्पूर्वजान्व्यकुलीकृतान्। वीक्ष्य संग्राममञ्चाद्येनांतर्धानं शरवृष्टिभिः ॥५५॥ सुबाहुस्तं स्वराणीघैश्चकार विरथं तदा। अजमीढस्ततोऽन्ये स रथे स्थित्वा ययौ पुनः ॥५६॥ मुमोच पवनास्त्रं च कुशादीनां वधे रुषा। तं दृष्ट्वा नृपकेतुस्तं वज्रास्त्रं मुमोच सः ॥५७॥ तदा ते कोटिशः सर्पाः पपुस्तं पवनं क्षणात्। स्वपद्मः स नलः सर्पान्दृष्ट्वा शरुद्गलत्तद ॥५८॥


पर सवार होकर रणभूमिमें जा डटे॥४०॥ उस समय नलके सम्मुख कुश, नमुचके सम्मुख लव, जाम्बीरके सामने अङ्गद, वसुदके सम्मुख चित्रकेतु, लघुभूतके सामने पुष्कर, सुरथके सामने तक्षक, अजमीढके सामने सुबाहु और बल नामक राजाके सामने नृपकेतु जा पहुँचे। नृपकेतुने थोड़े ही समयमें समस्त सेनाका नाश कर डाला॥४१-४३॥ उसने अपने वायव्य अस्त्रसे इस मरे हुए सैनिकोको खारे समुद्रमें फेंक दिया। ऐसी अवस्थामें वर्षाकी नाईं बडे बड़े वे नल आदि सातो वीर रामजीके बालकोंके साथ युद्ध करने लगे। यह सब करते हुए भी वे राजे उसी तरह आँधी लग रहे थे, जिस तरह डालो और पत्तोसे विहीन वृक्ष हों॥४४॥४५॥ थोडी देर बाद कुशने अपने बाणोसे नलको घायल कर दिया। तब नल भी दूने वेगसे बाण चलाने लगा; किन्तु मौका पाकर कुशने बाणों द्वारा नलके रथ, घोडे, ध्वजा, धनुष, छत्र और सारथीको नष्ट करके उसके शरीरपर भी प्रहार किया॥४६॥४७॥ उधर लवने अपने बाणसमूहसे नमुचको और नमुचने अपने बाणोंसे लवको व्याकुल कर दिया॥४८॥ अनन्तर लवने अपना बाणवर्षासे नमुचके रथको काट डाला। इसी तरह अङ्गदने जाम्बीरपर प्रहार किया और जाम्बीरने परिघ चलाकर अङ्गदपर प्रहार किया। अन्तमे अङ्गदने अपने बाणोंसे जाम्बीरको धराशायी कर दिया॥४९॥५०॥ इसी प्रकार चित्रकेतुने अपने बाणोंसे वसुदको उनके रथसे उठाकर दूर फेंक दिया। यह एक बड़ी कौतुकमयी घटना थी॥५१॥ उधर लघुभूतने अपने बाणोसे पुष्करपर प्रहार किया और पुष्करने कुपित होकर अपने बाणोंसे लघुभूतको एक तरुवारकी तरह उसके रथमे ही जड़ दिया और अपनी विजयदुन्दुभी बजाई॥५२॥५३॥ इसके अनन्तर तक्षकने अपनी बाणवर्षासे सुरथको रथ समेत तथा दिया, जैस सूखे पत्तोको वायु भगा देता है॥५४॥ उसी समय अजमीढने जब देखा कि उसके वीर गुरु उसके पूर्वजोंका बहुत सता रहे हैं तो वह इन लागोंपर घार बाणवृष्टि करने लगा॥५५॥ इसी बीच सुबाहुने अजमीढ़के रथको काट डाला और वह दूसरे रथपर आरूढ होकर फिर संग्राम-भूमिमें आ डटा॥५६॥ आते ही उसने कुश आदिको मारनेके लिए पवनास्त्रका प्रयोग किया। उसके भयङ्कर पवनास्त्रको देखकर नृपकेतुने वज्रास्त्र चलाया॥५७॥ जिससे क्षणभरमे उन सपोंने उस वायु पी ली। उधर

७७०आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

मुमोच पन्नगास्त्रस्य निवृत्त्यर्थं ततोऽब्रवीत्। तदा कुशः प्रमुमोच राक्षसास्त्रं भयावहम् ॥५९॥
नद्युक्तश्च तदा वेगाद्बहुशस्त्रं तं व्यसर्जयत्। तदा कोषाल्लवश्चापि मेघास्त्रं तं व्यसर्जयत् ॥६०॥
तदा लघुभृतथापि पवनास्त्रं मुमोष सः। तदा स हनुमान् शीघ्रं व्यादाय विकटाननम् ॥६१॥
अपिबन्मरुतं वेगान्ननाद जलदस्वनः। एवं तच्च महायुद्धं पुष्पकारामसंस्थितौ ॥६२।
सीतारामौ मुदा युक्तौ लक्ष्मणामैर्ददर्शतुः। एवं युद्धं पञ्चमासानेक'दश दिनान्यभूत् ॥६३।
एकादशे दिने मार्गे गतास्तेऽस्मिन्समीरिताः। एवमेकादशैर्मास्रैकादशदिनैरपि ॥६४॥
त्रेतायुगमयैर्दिन्यैः समाप्तिं संगरस्य च। अदृष्ट्वा च कुशो वेगाद्ब्रह्मास्त्रं संदधे तदा ॥६५।

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पूर्णकाण्डे रामदास-
विष्णुदाससंवादे सोमवंशोद्भवन्नृपाणां युद्धवर्णनं नाम दोध्यः सर्गः । ३ ॥


चतुर्थः सर्गः

( सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी राजाओंमें मैत्री )

श्रीरामदास उवाच

ब्रह्मास्त्रं संदधानं तं दृष्ट्वा वेधाः सुरैः सह। सोमेन च बुधेनापि विमानेन ययौ भुवि ॥१।
विमानादवरुह्याथ तदा ब्रह्मा कुशं ययौ। कुशं तं प्रार्थयामास श त्यमस्त्रं विसर्जये ॥२।
पालयस्व वचो मेऽद्य नाके सोमाय वै मया। द्वापरान्ते वरो दत्तस्त्वजेयश्च रणाजिरे ॥३॥
भविष्यन्ति नलाद्याश्च सर्वे युष्मत्कुलोद्भवाः। पुरा न्विति सुराये हि कस्मिंश्चित्कारणांतरे ॥४॥
अतस्त्वं कुश माऽस्त्रं मे नलाद्येषु विसर्जये। तद्ब्रह्मवचनं श्रुत्वा कुशो वाक्यमथाब्रवीत् ॥५॥
अधुना क्षणमात्रेण सर्वान्दग्ध्वान्करोम्यहम्। नोचेत्कथय रामाय तस्याज्ञां मानयाम्यहम् ॥६।


रथपरसे नलने जब पन्नगास्त्र देखा तो गरुडास्त्रका प्रयोग किया ॥ ५८ ॥ उसकी निवृत्तिके लिए कुशने बड़े ही भयानक राक्षसास्त्रका प्रयोग किया ॥ ५९ ॥ उसी समय नकुशने बहुशस्त्र चलाया तब मारे क्रोधके लवने उसपर मेघास्त्रका प्रयोग कर दिया ॥ ६० ॥ इसके अनन्तर शत्रुघ्नने पवनास्त्र छोड़ा। इसी समय हनुमान्जीने अपना मुख फैलाकर सब हवा पी ली और मेघकी तरह भीषण स्वरमें गरजे। उधर विमानपर बैठे हुए पुष्कर, राम तथा सीताजी उस महायुद्धको देख रही थीं। इस संवत् वह युद्ध पाँच महीना ग्यारह दिन चला ॥ ६१-६३ ॥ ग्यारह ही दिनके लगभग अयोध्यासे हरितानपुर जानेमें लगे थे। सब मिलाकर त्रेतायुगके दिनोंके हिसाबसे उस युद्धमें ग्यारह महीने और ग्यारह दिन लगे ॥ ६४ ॥ उधर जब कुशने देखा कि अब कोई अन्य उपाय नहीं है तो ब्रह्मास्त्रका संधान किया ॥ ६५ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० राम-तेजपाण्डेयकृत 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते पूर्वकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥

श्रीरामदासने कहा-जब ब्रह्माने देखा कि कुश ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करने जा रहा है तो वे बहुतसे देवताओं और बुध तथा सोमको साथ लिये हुए विमानपर बैठकर पृथ्वीतलपर आये। यहाँ पहुंचे तो विमानसे उतर-कर कुशके पास गये और प्रार्थना की कि तुम इस ब्रह्मास्त्रका प्रयोग मत करो ॥ १ ॥ २ ॥ आज मेरे कहनेसे मेरी बात मान लो। क्योंकि एक बार मैंने स्वर्गलोकमें इन सोमवंशियोंको वरदान दिया था कि द्वापर तक संग्रामभूमिमें तुम किसीसे भी पराजित नहीं होवोगे ॥ ३ ॥ आगे चलकर तुम्हारे वंशमें नल आदि बड़े प्रतापशाली राजे होंगे ॥ ४ ॥ इस कारण हे कुश ! तुम इन नल आदि राजाओंपर ब्रह्मास्त्रका प्रयोग न करो। ब्रह्माकी बात सुनकर कुशने कहा कि मैं अभी क्षणमात्रमें इन दुष्टोंको भस्म किये देता हूँ। यदि आप कुछ कहना चाहते हों तो जाकर रामचन्द्रजीसे कहिए, मैं उन्हींकी बात मानूंगा ॥ ५ ॥ ६ ॥

सर्गः १ ] | पूर्णकाण्डम् | ७७१

सर्गः १ ]पूर्णकाण्डम्७७१

यदा त्वया वरो दत्तस्तदा किं विदितं नव । नासीच्छ्रीरामसामर्थ्यं अधुना शाठ्यंस सुवा ॥७॥ त्वयि चेद्वर्तते किंचित्सारं धर्तुं रणं मया । तर्हि कुरुष्व साहाय्यं नलादीनां सुरैर्युतः ॥८॥ पश्या रणे ममाग्नेय्यं बलं पश्यतु राघवः । सीताऽपि पुष्पकासीना जालैरन्ध्रैश्च पश्यतु ॥९॥ एवं कुशस्य वचनं श्रुत्वा लज्जापूतो विधिः । सोमेनाथ बुधेनापि नलाद्यान्निन्द वेगतः ॥१०॥ रे रे मूढाः शृणुध्वं मे वचनं हि गतायुषः । साक्षान्नारायणं रामं यूयं योद्धुं समुद्यताः ॥११॥ केनेयं शिक्षिता बुद्धिः सर्वेषां घानकारिणी । गच्छध्वं शरणं राम नोचेद् मरिष्यथ ॥१२॥ ममायं जनकः साक्षाद्रावो विष्णुनं संशयः । इति धिक्कृत्य तान्वेधाः कुशं वचनमब्रवीत् ॥१३॥ यावद्यास्याम्यहं रामान्तिकंत्वां कुशबालक । तावच्चेन्मोक्ष्यसे बाणं तर्हि मां हतवानसि ॥१४॥ इत्युक्त्वा तं कुशं वेधा नलद्यैः परिवेष्टितः । ययौ रामं सुरैर्युक्तः पुरस्कृत्य वृषध्वजम् ॥१५॥ शिवमागतमाज्ञाय पुष्पकाद्रघुनन्दनः । प्रत्युद्गम्य शिवं नत्वा प्रणाम ततो विधिम् ॥१६॥ ततस्ताम्पूजयामास त्रिवाटीरघुनन्दनः । ततः सभायां रामस्य तिष्ठन्वेधा नलादिभिः । १७॥ प्रणामान्कारयामास सोमेन च बुधेन च । ततस्तान्महसोत्थाय रामचन्द्रः करेण हि । १८॥ श्रुत्वा तेषां हि नामानि विधेरास्यात्पृथक्पृथक् । ततः पप्रच्छ वेगेन ब्रह्माणं पुरतः स्थितम् । १९॥ सर्वे किमर्थमानीतास्त्वयैते सोमवंशजाः । बद त्वं कारणं शीघ्र सत्यमेव ममाग्रतः ॥२०॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा रामं वेधा वचोऽब्रवीत् । राम राम महाबाहो पालयस्वाद्य मे वचः । २१॥ रक्षस्वैतान्नृपानद्य वरदानान्मम प्रभो । द्वापरान्तमजेयत्वं दत्तमस्ति मया पुरा ॥२२॥ ममास्त्रं सन्दधानं निवारय कुशं सुतम् । इति तद्वचनं श्रुत्वा विहस्य रघुनायकः ॥२३॥ सभायामाह ब्रह्माणमजेयत्वं त्वयोदितम् । क गतं चाद्य समरात्किमर्थमिह बागताः ॥२४॥

जब आपने इनको वरदान दिया था तब क्या रामकी सामर्थ्यका आपको ध्यान नहीं था ? तब तो रामको कुछ समझे नहीं, अब मूठकी प्रार्थना करने आये हैं ॥ ७ ॥ मैं कहता हूँ कि यदि आपमें कुछ शक्ति हो तो देवताओंके साथ लेकर आप नल आदिकी सहायता करिए । मैं बालक साप चचाके साथ युद्ध करूं और रामचन्द्रजी तथा सीता पुष्पक विमानके झरोखेसे मेरा और आपका समर्थ देखें ॥ ८ ॥ ९ ॥ इस प्रकार कुशकी बात सुनी तो ब्रह्माजी लज्जित हो गये और नल आदिको फटकारते हुए कहने लगे—अरे मूढो ! जान पड़ता है कि तुम लोगोंकी वायु समाप्त हो गयी है, जो साक्षान्नारायणस्वरूप रामचन्द्रजीसे युद्ध करने आये हो ॥ १० ॥ ११ ॥ सर्वनाश उपस्थित करनेवाली यह दुर्बुद्धि तुमको किसने दी है ? अब यदि अपना कल्याण चाहते हो तो रामकी शरणमें जावो, नहीं तो एक-एक करके तुम सब मार डाले जाओगे ॥ १२ ॥ मेरे पिता विष्णुभगवान् ही तो रामरूपसे इस पृथ्वीतलपर अवतरे हैं । इस तरह उन लोगोंको डाँट-फटकार करके ब्रह्माजी कुशसे कहने लगे कि मैं रामके पास जा रहा हूँ । जबतक उनके पाससे न लौट आऊँ, तबतक बाणका प्रहार न करना । ऐसा करोगे तो मानो उनका नहीं, तुमने मेरा वध किया ॥ १३ । १४ ॥ ऐसा कुशसे कहकर ब्रह्माजी शिवजीको आगे करके नल आदिके साथ-साथ श्रीरामचन्द्रजीके पास गये । जब रामने सुना कि शिवजी आ रहे हैं तो पुष्पक विमानसे उतरकर उनका स्वागत और प्रणाम करके ब्रह्माजीको भी अभिवादन किया ॥ १५ ॥ १६ ॥ इसके अनन्तर रामने शिवजी आदिकी विधिवत् पूजा की और सब लोग सभामण्डपमें गये । वहाँ ब्रह्माने सोम और बुधसे श्रीरामको प्रणाम करवाया । तब रामने इनको अपने हाथोंसे उठा लिया और ब्रह्माजीके मुखसे उनका नाम सुना । कुछ देर बाद रामने ब्रह्मा से पूछा कि आप इन सोम-वंशियोंको यहाँ किस लिए लाये हैं ? जो इसका वास्तविक कारण हो, वह मुझे बतलाइए ॥ १७–२० ॥ रामकी बात सुनकर ब्रह्माने कहा—हे राम ! हे महाबाहो ! आज आप मेरा बात मानकर इन नल आदि राजाओंकी रक्षा कीजिए । मैंने इन लोगोंको यह वरदान दे रक्खा है कि द्वापरपर्यन्त तुम लोग किसीसे पराजित नहीं होवोगे । २१ । २२ ॥ उधर कुश मेरे शस्त्र ( ब्रह्मास्त्र ) का सन्धान करके खड़े हैं। उन्हें भी

७७२आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

ब्रह्मास्यवचनं श्रुत्वा रामं प्राह विधिः कुतः। सर्वैर्वा पुरतो मेऽस्ति बलं न तु तवाग्रतः ॥२५॥
त्वं तु मे जनकः साक्षादतस्त्वां प्रार्थयाम्यहम्। ततो रामः पुनः प्राह विहस्य चतुराननम् ॥२६॥
न श्रोष्यति वचो मेऽद्य कुशोऽयं यौवनस्थितः। प्रायः कुमरा वृद्धानं वाक्यमग्रे मजन्ति न ॥२७॥
अन्यच्चापि शृणुष्व त्वं यच्छास्त्रेऽप्युच्यते वचः लालयेत्पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत् ॥२८॥
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् । अतन्मे बालकाः सर्वे कुशाद्याः स्वार्थतत्पराः ॥२९॥
न श्रोष्यन्ति वचो मेऽद्य तान्गत्वा प्रार्थयस्व हि। ततः प्राह पुनर्ब्रह्मा रणक्रोधाम्बुधौ मया ॥३०॥
वाक्यं रम्यं मंजुलं च नैवाद्य वदति प्रभो। ततः प्राह विधिं रामः पुनर्वाक्य विनोदयन् ॥३१॥
विधे त्वं गच्छ वाल्मीकिं स स्वां युक्तिं वदिष्यति। ततः स रामवाक्येन वाल्मीकिं पुष्पंके स्थितम् ॥३२॥
मुनिभिर्मुनिशालायामूर्ध्वं सर्वैः स्थितं विधिः। नत्वाऽथैः सहितो गत्वा वृतं सर्वं न्यवेदयत् ॥३३॥
विधिमाहाथ वाल्मीकिर्ज्ञात्वा राममनोगतम् । स्त्रीलब्धजीविताश्चैते भवन्तु मुनिसन्निधौ ॥३४॥
नरादीनां स्त्रियः सर्वाः प्रार्थयन्तु विदेहजाम् । कुशोऽपि जानकीवाक्याच्छान्तिमेष्यति बालकः ३५
तथेति ते नलाद्याश्च दूतान् प्रेष्याथ सादरम् । आनीय स्वकुलत्राणि शतशस्तु तदा जवात् ॥३६॥
जानकीं प्रेषयामासुस्ताः सर्वाः पार्थिवयोषितः । उपायनानि संगृह्य जानकीं प्रययुर्जवात् ॥३७॥
ददृशुर्जानकीं नारीगुप्तां स्वयमथैक्षताम् । स्नुषाभिः सेवितपदां पर्यङ्के निद्रितां मुदा ॥३८॥
ततः स्त्रीः समागताः सीता दृष्ट्वा चामन्दजीविता । मस्तकद्वयमुत्थाय धृष्ट्वाऽधौपवदर्हणा ॥३९॥
त्यक्ताहं मंचकं कृत्वा संस्थिताऽऽसीन्मणीन्द्रिता। स्नुषाभिर्नीति हे रम्या प्रणेमुस्तां परस्त्रियः ॥४०॥
तासां सीमन्तरत्नोत्थप्रभया पदपंकज । विराजन्ते सोतायाश्चित्रगत्रिषिवित्रे ॥४१॥
उपायनानि संगृह्य ताभ्य सा जनकात्मजा । समालिंग्य निवेदयाथ ताः प्राह सुस्वरं वचः ॥४२॥

आप रोक दीजिए। ब्रह्माकी बात सुनकर रामने कहा कि आपने जब इतनकी अजय कर दिया था, तब किस ये लोग संग्रामभूमि छोडकर यहाँ मेरे पास क्या आय है ? ॥ २३ । २४ ॥ रामकी यह बात सुनकर ब्रह्मा कहने लगे—सब लोगोंके लिए होते मेरे पास बल है, किन्तु आपके लिए मेरेमें कुछ भी सामर्थ्य नहीं है ॥ २५ ॥ आप मेरे पिता हैं, इसी नाते मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। फिर राम बोले कि कुश युवावस्था में है। संसारमें प्रायः देखा जाता है कि कुमार लोग वृद्धोंकी बात नहीं मानते ॥ २६ ॥ २७ । इसके अतिरिक्त शास्त्रमें भी कहा गया है कि पाँच वर्षकी अवस्थातक बच्चोंका दुलार करे, दश वर्षकी अवस्था तक डराये-धमकाये, किन्तु सोल्ह वर्षका हो जानेपर घटक साथ मित्रताका व्यवहार करना चाहिए। इसी कारण ये स्वार्थी बालक मेरी बात नहीं मानेंगे आप स्वयं जाकर उनसे प्रार्थना कीजिए। ब्रह्माने कहा कि संग्राम-कलित क्रोधके कारण आज तो वह मुझसे मीठी बात भी नहीं करता। फिर विनोदवश रामने ब्रह्मासे कहा कि आप वाल्मीकिके पास जाइए। वे आपको कोई युक्ति बतलायेंगे। रामके कथनानुसार ब्रह्मा नल आदिको अपने साथ लेकर वाल्मीकिके पास गये। वाल्मीकिजी उस समय रामके साथ पृथक विमानपर ही रहा करते थे। इससे उनके पास पहुँचने में विशेष समय नहीं लगा। वहाँ जाकर ब्रह्माने वाल्मीकिको सब वृत्तांत कह सुनाया ॥ २८-३३ ॥ रामका मनोगत अभिप्राय जानकर वाल्मीकिने ब्रह्माजीसेकहा कि अपनी स्त्रियोंकी कृपासे ये लोग जीवनदान पा सकते हैं। इसका उपाय यह है कि नल आदिकी स्त्रियाँ सीताके पास जाकर अपने पतियोंके जीवनकी भीख माँगें। यदि सीता प्रसन्न हो गयीं तो कुश भी मान जायगा ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ वाल्मीकिके कथनानुसार नल आदिने अपनी स्त्रियोंको लिवा लानेके लिए सैकड़ों दूत भेजे और वे तुरन्त उनको लिये हुए जा पहुँचे। इसके अनन्तर वे स्त्रियाँ विविध प्रकारके उपहार लेकर सीताके पास गयीं। वहाँ पहुँचकर उन स्त्रियोंने देखा कि सीता अपनी सखियोंसे घिरी हुई बैठी झपको ले रही हैं और बहुएँ उनकी सेवामें तत्पर हैं ॥ ३६-३८ ॥ जब सीताने उन स्त्रियोंको देखा तो तकिया बगलमे कर ली और उठ बैठीं। उस समय उन स्त्रियोंने उनको प्रणाम किया ॥ ३९ ॥ ४० ॥ उन राजदयनिताके सीमन्तरत्नकी प्रभासे सीताके पैर चित्र विचित्र

सर्गः ५१] पूर्णकाण्डम् ७७३


किमर्थमागता यूयं मा भैष्टवमितः परम्। कथयध्वं यथावन्मेऽभीष्टोऽद्य क्रोष्यहम् ॥४३॥
तदा ताः कथयामासुः सर्वं वृत्तं परस्तरम्। देहि करुणदानानि कुशं युद्धान्निवारय ॥४४॥
तथेति जानकी चोक्त्वा ज्ञात्वा राममनोगतम्। नार्हस्तान्मोचनीयार्थने निर्जग्मुर्भवति ॥४५॥
आश्वास्य स्त्रिकयास्तास्ताभिर्युक्ता कुशं ययौ। तदा तं मानयद्रामान्म क्रोधं त्यज कुशाधुना ॥४६॥
निवर्त्तस्व रणादद्य शृणु मे वचनं शिशो। तथेति जानकीवाक्याद्विहस्याथ कुशस्तदा ॥४७॥
भ्रात्रा सधैर्यसंयुक्तः सेनया संन्यवर्नत। पुष्पकं प्रययौ सीता नृपस्त्रीपरिवेष्टिता ॥४८॥
कुशाद्यास्ते कुमाराश्च सभायां राघवं ययुः। ततो वाल्मीकिना ब्रह्मा नलाद्यैः सहितस्तदा ॥४९॥
सनिर्जरैः सभां गत्वा सर्वां श्री राघवं यतः। कुशाद्यश्चेक्षतौऽपि प्रणामं प्रक्रम्य तस्य सन्निधौ ॥५०॥
तम्पुष्टतेनालिंगिताश्च स्त्रीभिर्नीराजनं अपि। तदा रामोऽब्रवीद्ब्रह्मन्नग्रतः महसि स्थितम् ॥५१॥
रणादवर्तिता बालाः किमग्रे तव वाञ्छितम्। न मे राज्ये छत्रपतिर्द्वितीयोऽत्र भविष्यति ॥५२॥
करणीयं नलाद्यैः किं तद्वदस्व मविस्तरम्। तदाऽऽसनादुत्थितः सः वेधा रामाग्रतः स्थितः ॥५३॥
उवाच मधुरं वाक्यं मध्वग्रं रघुनन्दनम्। राम राम महाबाहो भूभारश्च त्वया हृतः ॥५४॥
चिरकाल कृतं राज्यं वैकुण्ठ पालयधुना। कुरु मन्य वचो मेऽद्य दृष्ट्व हस्तिनापुरम् ॥५५॥
नलादिभ्यस्त्वयोध्यायां कुशो राज्यं प्रपामतु। तदा रामो विधिं प्राह ममाप्येतन्न रोचते ॥५६॥
वैकुण्ठं ह्यो गमिष्यामि सीतया बन्धुभिर्युतः। दशवर्षसहस्राणि प्रोक्तमायुर्युगेऽत्र हि ॥५७॥
तन्मया स्वीयसामर्थ्यान्कृतमत्र वध नृपाः। एकादश सहस्राणि समाप्त्यवतारकैव तु ॥५८॥
तथैकादश मासाश्च गता मे दिवसा अपि। शेषायायुश्च किञ्चिन्मे तदद्य पूर्ण भविष्यति ॥५९।


प्रकारके दीख रहे थे॥ ४१॥ इसके बाद सतीजी उनसे भली प्रकार को और उनका हृदयसे लगाकर कहने लगी कि तुम लोग यहाँ किस कामसे आयी हो ? अपना इच्छा प्रकट कर। तुम जो कुछ भी चाहोगी मैं उसका प्रबन्ध कर दूंगी। ४२।४३॥ तब उन रात्रिमान पुटस्त्रयया सब वृत्तान्त सुनाते हुए कहा हे देवि ! आज आप मेरो ठहरती हुई सुहाग रक्षार्थके लिए कुशको युद्ध करनक रोक दीजिए ॥ ४४॥ सीताने मन ही मन रामकी इच्छा जान ली। उन्होंने सोचा-ये बहुत है कि स्त्रियोंके द्वारा नर आदिको जीवनदान मिले। यह सोचकर उन्होने उन स्त्रियोंसे कहा-अच्छी बात है। इसके अनन्तर वे तुरन्त सान्त्वना लगाकर उठीं और कुशके पास जा पहुंची और कहा-बेटा शृणु ! अब तुम अपने क्रोधका परित्याग कर दो ॥ ४५ ॥ ४६॥ मेरी बात मानकर संग्रामभूमिसे लौट चलो। जानकीकी बात सुनकर कुश मुसकराये और अपने बन्धु-बान्धवों तथा सेनाको साथ लेकर लौट पडे। सीता कुशको तथा उन स्त्रियोंको अपने साथ लिये अपने पुष्पक विमानपर जा पहुँचीं। वहाँ पहुंचकर कुश आदि बालक सभामे रामचन्द्रजीके पास चले गये। इसके अनन्तर ब्रह्माजी भी वाल्मीकि तथा नल आदिका साथ लेकर सभामे रामचन्द्रजीके पास पहुँचे। कुश आदि बालक भगवान्को प्रणाम करके एक ओर खडे हो गये॥ ४७-५० ॥ रामने उनको अपने हृदयसे लगा लिया और स्त्रियोंने उनकी आरती उतारी। कुछ देर बाद रामने बह्माजीसे कहा कि आपके इच्छानुसार कुश आदि बालक तो संग्राम-भूमिसे लौट आये। अब आपकी क्या इच्छा है? अबतो मेरे राज्यमें कोई दूसरा छत्रधारी राजा नहीं रहेगा ॥ ५१॥ ५२॥ अब आप यह भी बतला दीजिए कि नल आदिका क्या करना चाहिए। रामकी यह बात सुनते ही बह्माजी उठकर रामके आगे जा बैठे और कहने लगे-हे राम ! हे महाबाहो ! आपने पृथ्वीका भार उतार किया। बहुत दिनोंतक पृथ्वीपर राज्य भी किया। अब चलकर वैकुण्ठधामकी रक्षा करिए और मेरी बात सच करनेके लिए नल आदिको हस्तिनापुरी दे दीजिए । ५३-५५॥ कुश आनन्दके साथ अयोध्याका राज्य करे। तब रामने ब्रह्मासे कहा कि यही बात मुझे भी जंच रही है॥ ५६॥ कल मैं सीता तथा अपने बान्धवोंके साथ वैकुण्ठधामको चल दूँगा। इस युगमें मनुष्यकी आयु दस हजार वर्ष निर्धारित की गयी है। किन्तु हे बह्माजी ! मैं अपनी सामर्थ्यसे उस नियमको व्यर्थ करके ग्यारह हजार ग्यारह वर्ष और ग्यारह

७७४ | आनन्दरामायण | [ सर्गः ५


द्वादश्यां घटिकायां सोऽहं वैकुण्ठमाश्रये। ततो विधिं कुशः प्राह नलाद्या यदि मां द्विजे ॥६०॥
दास्यंति करभारं मे तर्हि तिष्ठतु छत्र ते। मदाज्ञां पालयंत्वेते तव नास्पात्सुरक्षिताः ॥६१॥
छत्रहीनाः सुखं त्वद्य वसन्तु हस्तिनापुरे। तद्वाक्यं स विधिः श्रुत्वा पुन प्राह कुशं प्रति ॥६२॥
छत्रमाज्ञापयस्यैतांस्तवज्ञावशवर्तिनः। दास्यंति करभारं त्वां मम वाक्यं हि पालय ॥६३॥
तथेति स कुशः प्राह विधिं किंचिस्मिताननः। अथ ते सोमवंशस्था नृपाः सर्वे विधिं तदा ॥६४॥
प्रोचुर्वयं त्वया स्त्रीभिर्यास्यामो दिवमद्य वै। अजमीढोऽद्य नृपनिर्भवत्वत्र गजाव्हये ॥६५॥
तथेति तान् विधिश्चोक्त्वा सभायां समुपविशत्।
अथ नृपाऽजमीढाय ब्राह्मणैरभिषिच्य च। गजाव्हये तं राजानं चकार राघवाज्ञया ॥६६॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पूर्णकाण्डे
सोमसूर्यवंशजयो मंत्रीकरणं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चमः सर्गः

(रामका मित्रों तथा राजाओंको विदा करना)

श्रीरामचन्द्र उवाच

अथ रामं सुषेणश्च सुग्रीवश्च विभीषणः। वानराः प्रार्थयामासुर्वयं राम त्वया दिवम् ॥ १ ॥
यास्यामो नात्र जीवामस्त्वया राम विना भुवि। ददस्वाज्ञां त्वया गंतुं तथाह राघवोऽपि सः ॥ २ ॥
विभीषण त्वया स्थेयं लंकायां मम वाक्यतः। प्रचरिष्यति यावन्मे रामनामावनीतले ॥ ३ ॥
त्वं गच्छाद्यैव मे वाक्यात्तथेति स विभीषणः। नत्वा रामं ययौ लंकां राघवेणातिमानितः ॥ ४ ॥
ततः प्राह जांबवंतं राघवः पुरतः स्थितम्। हे जाम्बवंस्त्वया स्थेयं यावद्भूभ्यां कथामम ॥ ५ ॥


महीने इस संसारमें रहा ॥ ५७ ॥ ५८ ॥ थोड़ी-सी आयु शेष बची थी, सा भी कल पूरी हो जायगी ॥ ५९ ॥ ठीक बारह घड़ी बाद मैं वैकुण्ठधामके लिए चल दूँगा। तदनन्तर कुशने ब्रह्माजीसे कहा कि यदि नल आदि राजे मुझे करभार दें और मेरी आज्ञानुसार चलें तो मैं आपकी आज्ञासे इनको हर तरहसे सुरक्षित रखूँगा। इनको छत्र धारण करनेका अधिकार नहीं रहेगा। अर्थात् छत्रविहीन होकर ये लोग आनन्दके साथ रह सकेंगे। कुशकी बात सुनकर ब्रह्माने कहा कि आप इन्हे छत्र धारण करनेका आज्ञा दे दीजिए। हाँ, ये सदैव आपकी आज्ञाका पालन करते हुए करभार देते रहेंगे ॥ ६०-६४ ॥ कुशने ब्रह्माकी बात स्वीकार कर ली। इसके अनन्तर उन सोमवंशी राजाओंने ब्रह्मासे कहा कि हमलोग अपनी स्त्रियें लिये हुए आपके साथ स्वर्गको चले चलेंगे। अब इस हस्तिनापुरका राजा यह अजमीढ़ बनेगा ॥ ६५ ॥ ब्रह्माने भी उनकी बात स्वीकार कर ली और सभामें बैठ गये। इसके बाद रामकी आज्ञासे ब्रह्माने ब्राह्मणों द्वारा अजमीढ़का राज्या-भिषेक कराके हस्तिनापुरीका राजा बना दिया ॥ ६६ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहित पूर्णकाण्ड चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥

श्रीरामदासने कहा-इसके बाद सुषेण, सुग्रीव, विभीषण तथा अन्यान्य वानरोंने भगवान्‌से प्रार्थना की- हे राम ! हमलोग भी आपके साथ स्वर्गको चलगें। आपके बिना हमारा इस पृथ्वीपर जीवित रहना कठिन है। कृपया हमें भी अपने साथ चलनेकी आज्ञा दीजिए। यह सुनकर रामने कहा-हे विभीषण ! तुम मेरे कहनेसे तबतक लंकामें ही रहो, जबतक संसारमें मेरे नामका प्रचार होता रहे। तुम आज ही लंका चले जाओ। विभीषणने भी भगवान्‌की बात मान ली और प्रणाम करके लङ्काको प्रस्थान कर दिया। चलते समय भगवान्‌ने विभीषणका बहुत सम्मान किया ॥ १-४ ॥ इसके अनन्तर जाम्बवान्‌से बोले-हे जाम्बवान् ! जबतक इस संसारमें मेरी कथा प्रचलित रहे, तब तक तुम इसी लोकमें रहो। द्वापरके अन्तमें फिर तुम हमारा दर्शन

सर्ग ५ ] पूर्वकाण्डम् ७७५

सर्ग ५ ] पूर्वकाण्डम् ७७५


अचरिष्यति तावत्त्वं द्वापरान्ते पुनर्मम । भविष्यति दर्शनं ते गच्छाद्यैव सुखं वस ॥ ६ । त्वया कृतं यत्साहाय्यं लङ्कायां मे वनेऽपि च । यत्तत्त्वं धनुगे भुक्त्वा द्वापरे ख्यातिमेष्यसि ॥ ७ । तथेति रामवचनाद्रामं सीतां प्रणम्य यः । जगामाश्रित्यैवं शीघ्रं राघवेणातिपूजितः ॥ ८ । रामः प्राह हनूमन्तं शृणु तिष्ठ यथासुखम् । यदा सेतौ पणस्वे हि द्वापरान्तेऽर्जुनेन वै ॥ ९ ॥ भविष्यति शरैः सेतुं कर्तुं मे दर्शनं तदा । त्वं लब्धिष्यसि गच्छाद्य सुखं वस मज्जपन् सदा ॥ १० । तद्रामवचनं श्रुत्वा नत्वा रामं च लक्ष्मणम् । सीतां प्रणम्य हनुमान गमनायोपचक्रमे ॥ ११ ॥ ततो रामो निजात्कण्ठान्नवरत्नविभूषितम् । हारं ददौ तथा सीता तं ददौ बाहुभूषणे ॥ १२॥ ततो नत्वा रामचन्द्रं सार्द्रनेत्रः स मारुतिः । परिक्रम्य ययौ वेगात्तप्तुं तु हिमपर्वतम् ॥ १३॥ ततोऽङ्गदं रामचन्द्रः पूज्य वस्त्रादिमण्डनैः । प्रेषयामास किष्किन्धां शृङ्गवेरं तु गुहकम् ॥ १४॥ पातालं प्रेषयामास राघवो मकरध्वजम् । वस्त्रादिभिश्चोपचित्वा सुहृदः स्वस्थलानि हि ॥ १५॥ ततो रामः समाहूय यूपकेतुं महामनाः । वस्त्रादिभिश्चोपचित्वा विदिशानगरं प्रति ॥ १६॥ प्रेषयामास सैन्येन सोऽपि नत्वा रघूत्तमम् । जानकीं च ययौ वेगात्स्त्रीपुत्रैः परिवारितः ॥ १७॥ एवं रामः सुबाहुं तं मथुरां प्रैषयत्तदा । एवं रामः पुष्करं च प्रेषयामास बालकम् ॥ १८॥ सैन्येन पुष्करावत्यां तक्षं तक्षशिलाह्वये । ततोऽङ्गदं गजाश्वं च प्रेषयामास राघवः ॥ १९॥ धनरत्नं चित्रकेतुं स्त्रीपुत्रबलवाहनैः । प्रेषयामास श्रीरामस्तोषितं वसनादिभिः ॥ २० ॥ ततो लवं समाहूय समीक्ष्य रघुनन्दनः । वस्त्रालंकारयानाद्यैस्तोष्य स्त्रीपुत्रसंयुतम् ॥ २१॥ उत्तरेषु कुरुष्वेनं प्रेषयामास सेनया । कामधेनुं ददौ सीता लवाय प्रसवे मुदा ॥ २२॥ ततः कुशं समाहूय रामः स्त्रीपुत्रमयुतम् । प्रेषयामास साकेतं सैन्येन पार्थिवैर्युतम् ॥ २३॥

कराएंगे। तुम भी आज ही प्रस्थान कर दो और आनन्दके साथ किसी स्थानपर निवास करो ॥ ५ ॥ ६ ॥ तुमने लङ्का और वनमे मेरी जो सहायता की है उसीके प्रभावसे द्वापरमे तुम मेरे अनुजके रूपमे विख्यात होगे। ७ ॥ रामकी बात स्वीकार करके जाम्बवान् सीताजी तथा रामको प्रणाम करके चल दिये। चलते समय रामने उनका भी अच्छी तरह सम्मान किया ॥ ८ ॥ तदनन्तर हनुमान्जीसे रामने कहा-हे वत्स ! तुम भी आनन्दके साथ इसी लोकमे निवास करो। द्वापर युगके अन्तमे जब तुम्हारी अर्जुनके साथ सेतुविषयक होड़ होगी, उस समय तुम मेरा दर्शन करोगे। अब जाओ और मेरा भजन करते हुए आनन्दके साथ रहो । ९ ॥ १० ॥ रामकी यह बात सुनकर हनुमान्जीने राम-लक्ष्मण तथा सीताको प्रणाम किया और चलनेकी तैयारी कर दी ॥ ११ ॥ चलते समय रामने अपने गलेसे एक रत्नमाला उतारकर हनुमान्जीको दी और सीताने अपना बाहुभूषण उतारकर दे दिया ॥ १२ ॥ इसके पश्चात् हनुमान्जीने आँखोंमें आँसू भरकर भगवान्को प्रणाम किया और परिक्रमा करके तपस्या करनेके लिए हिमवान् पर्वतपर चले गये ॥ १३ ॥ इसके बाद रामने अङ्गदको विविध प्रकारके वस्त्र आभूषण दिये और उन्हें किष्किन्धा भेज दिया निषादराज को शृङ्गवेरपुर भेज दिया ॥ १४ ॥ इसके बाद रामचन्द्रजीने मकरध्वजको पातालपुरी भेजा। मकरध्वजको चलते समय रामने विविध प्रकारकी भेंट दीं। इनके अतिरिक्त और-और मित्रोंको भी आदर-सत्कार करके अपने-अपने स्थानको भेज दिया । १५ । इसके बाद रामने यूपकेतुको बुलाया और विविध प्रकारके वस्त्र-भूषण देकर विदिशानगरोको भेज दिया। यूपकेतुने भी राम तथा सीताको प्रणाम किया और अपनी सेना तथा परिवारको साथ लेकर चल पड़े ॥ १६ । १७ । इसी तरह रामने सुबाहुको मथुरा भेज दिया। पुष्करको भी उनकी सेनाके साथ पुष्करावती तथा तक्षको तक्षशिला भेज दिया। फिर अङ्गदको हस्तिनापुरी-के लिए और चित्रकेतुको स्त्री-सेना तथा वाहनोंके साथ उनकी राजधानीको भेज दिया। चलते समय विविध प्रकारके वस्त्र-आभूषणोंसे रामने इनका भी सत्कार किया । १८-२० ॥ तदनन्तर राम और सीताने लव-को बुलाकर कितने ही प्रकारके वस्त्रआभूषण प्रदान किये और उनको स्त्री तथा पुत्रके साथ उन्हें उत्तरकुरु देशमें

७७६ आनन्दरामायणे [सर्गः ५

रत्नशाणानि पात्राणि क्रीडनञ्च द्विजन्मसु । नानाविधानि वस्त्राणि रामश्चिन्तामणिं ददौ ॥२४॥
मर्त्यपुत्रं कुशं तोष्य राघवो वाक्यमब्रवीत् । वत्स गच्छ मुवं विप्र भूमिं धर्मेण पालय ॥२५॥
तवदानेनृपास्सर्वेस्थास्यन्तीह वशास्तव । भवन्त्वनादराल्पस्य युवत्वञ्चशवालक ॥२६॥
इत्युक्त्वा तन्नृपानाह युष्माभिः कस्य बालकः । मवाने माननीयोऽयं रक्षणीयश्चसर्वशाम् ॥२७॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा नृपास्तं प्रत्यूचुस्ततः । अस्मासु तिष्ठत्स्वल्पोऽस्माकं शताधिकः ॥२८॥
अन्येष्वेव नात्र संशयः मन्य... रक्ष्या वयं त्वया पूर्वं रामोऽयं तद्वद्रक्षकोऽप्ययम् ॥२९॥
रक्षिष्यति मदाऽस्माकं दृष्ट्वाऽबालपराक्रमः । इत्युक्त्वा रामचन्द्रं तं नत्वा सर्वे ते दाक्षिणोत्तराः ॥३०॥
रामेण पूजिताः सम्यक् प्रभावच्छात्रवाहनैः । ययुः कुशं पुरस्कृत्य स्वस्वदेशान्समन्विताः ॥३१॥
कुशोऽपि गच्छन् नत्वा मूर्ध्नि सीताकण्ठार्पितः । वशिष्ठेन रथे स्थित्वा पुरीं गन्तुं प्रचक्रमे ॥३२॥
तदा रामश्च तद्रजकम्पदं वस्त्रापहम् । कुब्जां बडं धोतं बहुकृत्य सादरम् ॥३३॥
पूर्ववैरमनुस्मृत्य नाने... तद्धर्मिणौ ।... रजकोऽभवत् ॥३४॥
मन्थरा पूतना जाता... ... जनकम् ॥३५॥
परिवर्त्य मुखं पृष्ठे ... रुदन् रामं च जानकीम् ॥३६॥
हस्तसङ्केततः सर्वान् ... ... नगरी शुभा श्रीरामाङ्के... ॥३७॥
गत्वा पुरीं महा... ... ॥३८॥

भेज दिया । जिस प्रकार... ॥ २१-२४ ॥ इसके बाद रामने कुशको बुलाया और उस... नाना प्रकारके रत्नों और सेना आदिके साथ अयोध्या भेज दिया ॥ २५ ॥ अपने सब... प्रकारके सकलानि, वस्त्र और चिन्तामणि... रामने कुशसे कहा—हे वत्स ! अब तुम अयोध्या जाओ और... की रक्षा करो । हे पूज्य कुश ! इस जम्बूद्वीप तथा अन्यान्य द्वीपोंके रहनेवाले... करना ॥ २५-२६ ॥ ऐसा कहनेके बाद रामने उन सब राजाओंसे कहा कि... ही मानना और सदा इसकी रक्षा करते रहना ॥ २७ ॥ रामकी बात सुनकर उन राजाओंने कहा कि यह बालक कुश आपके ही तेजसे परिपूर्ण है। इस कारण मेरे लिए यह... है। हे नृपशिरोमणि, हम तो कुछ कह रहे हैं, उसे आप सत्य मानना। जिस प्रकार आप हमारी रक्षा करते आये हैं, उसी तरह यह भी हमारी रक्षा करेगा । यह बालक अवश्य है किन्तु इसका पराक्रम बालकों जैसा नहीं है। ऐसा कहकर उन राजाओंने रामको प्रणाम किया और उन्होंने सब प्रकारके छत्र आभूषण वस्त्र सवारियां आदि देकर उन्हें हंसी खुशी विदा किया । वे सब कुशको आगे करके अपनी विकल सेनाके साथ चल पड़े ॥ २८-३१ ॥ कुशने चलते समय रामको प्रणाम किया फिर माता सीताके गलेमें हाथ डाला । उसके बाद वे गुरु वसिष्ठके साथ रथपर सवार होकर अयोध्यापुरीको चलनेको तैयार हुए ॥ ३२ ॥ उसी समय रामने उस निन्दक रजक, धोबी, तथा दासी मन्थराको सादर बुलाया और कुशके साथ अयोध्यापुरी भेज दिया ॥ ३३ ॥ पिछले वैरका स्मरण करके ही रामचन्द्रजी इन दोनोंको अपने साथ स्वर्गलोक नहीं ले गये । कृष्णावतारमें वह रजक राजा कंसका धोबी होकर उत्पन्न हुआ और दासी मन्थरा पूतना हुई । श्रीकृष्णचन्द्रजीने अपने हाथों इन दोनोंका संहार किया । रथपर बैठकर चलते समय बार-बार मुँह घुमाकर कुश आँसूभरे नेत्रोंसे राम और जानकीकी ओर निहार रहे थे । इधर राम और सीता भी अपने हाथसे कुशको जानेका संकेत कर रहे थे ॥ ३४-३६ ॥ इस तरह संकेत करते हुए कुश अपनी विशाल सेना लिये हुए अयोध्यापुरीको चल पड़े । जब पुरीमें पहुंचे तो वह सारी नगरी रामके वियोगसे रोती सी दिखायी पड़ी ॥ ३७ ॥ अस्तु, कुश पुरीमें गये और बड़े उत्साहके साथ राजसिंहासनपर बैठे । इसके बाद अपने साथ आये हुए राजाओंका उन्होंने

सर्गः ५ ] पूर्णकाण्डम् ७७७


तेऽपि नत्वा कुशं स्वं स्वं स्थलं जग्मुर्नृपोत्तमाः । करभारं ददुस्तस्मै तदाज्ञावशवर्तिनः ॥३९॥
मन्थराप्रभृतौ द्वौ तौ दैवान्पुर्या बहिर्गतौ प्रापुर्जन्यं साकेते नृणां न पुनर्भवाः ॥ ४०॥
अथ रामोऽब्रवीत्सर्वान्वार्नरान् जाह्नवीतटे । मदर्थे श्रमिनः सर्वे यूयं वानरसत्तमाः ॥४१॥
द्वापराग्रे पुनः सर्वे ब्रजे गोपा भविष्यथ ।
युष्माभिः सहिताः प्रीत्या करिष्याम्यशनादिकम् ॥ ४२ ॥
तदाऽब्रवीच्च सौमित्रिं रामः प्रीत्या पुरःस्थितम् महान् श्रमः कृतः पूर्वं सेवायां मम दण्डके ॥४३ ।
भव त्वं द्वापरे ज्येष्ठः शुश्रूषां ते करोम्यहम् । ततस्तानाह राघवः प्राह स्वान्पौराञ्छकपौनपि । ४४॥
सवनिश्च मया सार्धं प्रयातेति दशन्चितः ततो ददौ कल्पवृक्षपारिजातौ सुगन्धिषट् । ४५॥
ततस्तं पुष्पकं प्राह कुबेरं वह सादरम् ।
गच्छायैव तथेत्युक्त्वा रामं नत्वा तु पुष्पकम् ॥ ४६ ॥
सीतां पृष्ट्वा ययौ शीघ्रं राघवेनाभिमन्त्रितम् ततः प्राह रघूश्रेष्ठोमिलां मांडवीं तथा ॥४७॥
श्रुतकीर्ति समाहूय वाल्मीकेश्च मुनेः पुरः युष्माभिर्भर्तृदेहैश्च निजदेहादि वेगतः । ४८।
षोडश्यां दग्ध्वा स्वर्गलोकं गन्तव्यं मम व स्वतः । तथेति राघव प्रोचुस्तदा ताश्चोर्मिलादिकाः ।४९ ।
रामं नत्वा ययुः सर्वाः स्वं स्व तद्व्रतमुद्धय । अथ रामोऽपि तां रात्रि सीताया रुक्ममञ्चके ।५०॥
ऋषिभिः शिवब्रह्म द्यसन्द्रमृयैश्च संगतः । सौमित्राद्याः पत्नीभिः शिशियरे परया मुदा । ५१ ।

इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पूर्णकाण्डे
सर्वेषां विसर्जनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


पूजन अभिनन्दन करके विदा किया ॥ ३८ ॥ वे राजे भी कुशको प्रणाम करके अपने अपनी नगरीको चले गये और वहाँपर कुशल क्षेमम रहते हुए पूर्ववत् करभार दत्त रहे ॥ ३९। दैववश वह रामनिन्दक धोबी तथा दासी मन्थरा ये दोनों प्रवाहापरान्तेन मरकर अयोध्याके बाहर मरे । इसी लिए उन्हें फिर जन्म लेना पड़ा । वैसे तो अयोध्यामे जो लोग मरते है, उन फिर माताक गर्भम नहीं आना पडता ॥ ४० ॥ उधर सब लोगोंको विदा करके रामने सब वानरोंसे कहा- हे वानरश्रेष्ठगण ! तुम सबने मेरे लिए बड़ा कष्ट उठाया और मेरे साथ मारे-मारे फिरत रहे । आगे चलकर द्वापरमे तुम सब गोप होओगे । उस समय मै तुम्हारे साथ भोजन तथा विविध प्रकारका ल्लायें करूंगा ॥ ४१ । ४२ ॥ इसके बाद रामने लक्ष्मणसे कहा कि उस समय तुमने दण्डकवनमे मेरी सेवा करन समय बड़ा कष्ट उठाया था। अब द्वापर युगमे तुम मेरे ज्येष्ठ भ्राता बलराम होओगे और मै स्वंई तुम्हारी सेवा करूँगा । इसके अनन्तर समस्त वानरों तथा पुरवासियोंसे कहा कि तुम लोग मेरे साथ चलो । तत्पश्चात् रामने कल्पवृक्ष और परिजात ये दोनों वृक्ष इन्द्रको दे दिये फिर पुष्पक विमानसे कहा कि तुम आज ही जाकर आदरपूर्वक कुबरकी सवारीका काम करो । यह सुनकर पुष्पक राम तथा सीताको प्रणाम करके चल पड़ा। प्रस्थान समय भगवान्ने उसका भी अच्छी तरह आदर-सत्कार किया। वाल्मीकिके समक्ष रामने माण्डवी (भरतपत्नी ), उर्मिला (लक्ष्मणकी स्त्री ) तथा श्रुतकीर्ति (शत्रुघ्नकी पत्नी ) से कहा— तुम सब अपने अपने पतिके शरीरके साथ कल अपना शरीर चिताकी अग्निमे जलाकर स्वर्गलोक चले जाना । उर्मिला आदिने भगवान्की आज्ञा स्वीकार कर ली ॥ ४३-४९ ॥ वे रामको प्रणाम करके अपने-अपने तम्बूओमे चली गयीं । इसके अनन्तर राम उस रात्रिमे सीताके साथ एक सुवर्णमय मञ्चपर सो गये । शिव-ब्रह्मा आदि देवता भी ऋषियोंके साथ वहाँ ही ठहर रहे और लक्ष्मण आदि भी अपने अपने स्त्रियोंके साथ सानन्द सोए ॥ ५० । ५१ । इति पूर्णकाण्डराघवविलाससंवादे श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पण्डितरामतेजपाण्डेयकृत 'प्रमोदना'भाषाटीकासहित पूर्णकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

७७८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

षष्ठः सर्गः

( रामका वैकुण्ठारोहण ) श्रीरामदास उवाच

अथ रामः समुत्थाय प्रभाते सीतया सह । अजमीढं समाहूय मंजुलं वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥ अद्याहं सीतया स्वीयं पदं गच्छामि बन्धुभिः । वानरैः सकलैः पौरैस्त्वया ज्ञेयं तु यज्जलम् ॥ २ ॥ यद्गृहादिकं सर्वं प्रेषणीयं कुशं प्रति । यन्मत्र कीटक्रांतं तन्मया यास्यति वै दिवम् ॥ ३ ॥ अनन्तरं त्वं कुशं गत्वा सर्वं वृत्तं निवेदय । करोत्वौर्ध्वकार्याणि कुशोऽस्माकं सविस्तरम् ॥ ४ ॥ मा करोतु कुशोऽस्माकं खेदं तं त्वं निवारय । इति रामवचः श्रुत्वा साश्रुनेत्रस्तथेति सः ॥ ५ ॥ अजमीढस्तदा प्राह ननाम रघुनायकम् । अथ रामः मुने, पौरैः स्नात्वा भागीरथीजले ॥ ६ ॥ कृत्वा नित्यविधिं पूर्वं हुत्वा वह्निं सविस्तरम् । ददौ दानान्यनेकानि ब्राह्मणेभ्यस्ततस्ततः ॥ ७ ॥ ततः प्रास्थानिकं कर्म चकार स यथाविधि । वह्निं विसर्जयामास वैकुण्ठं प्रति राघवः । ८ ॥ तदा रामस्य पद्मा सा गता दक्षिणहस्ततः । मूर्तिरूपाश्च वेदा वैकुण्ठमायुर्मुदा ॥ ९ ॥ त्रिपदा प्रणवेनैव भोगास्त्वाद्विनिर्गता । नत्वा रामं ययौ शान्तिः क्षमा मेधा धृतिर्दया ॥ १० ॥ तेजो बलं यशः शौर्यं ययौ सर्वं तदा पुरः ततः पौरैः वानराश्च सर्वे भागीरथीजले ॥ ११ ॥ स्नात्वा निरुध्य वायूश्च निजदेहानि तत्यजुः । अथ रामो मुदा गङ्गां स्पृष्ट्वा दर्भासनोपरि ॥ १२ ॥ दर्भपाणिः स्थितस्तूष्णीमुत्तराभिमुखः स्त्रिया । तावत्सर्वे ददृशुस्ते देवा विष्णुं पुरःस्थितम् ॥ १३ ॥ चतुर्भुजं नीलकान्तिं पीतकौशेयधारिणम् कौस्तुभाङ्कितहृदयं श्रीवत्साङ्कोपशोभितम् ॥ १४ ॥ सीता बभूव सा लक्ष्मीर्विष्णोर्वामाङ्कमस्थिता शेषो बभूव सौमित्रिः फणाभिरभिभासुरः ॥ १५ ॥

श्रीरामदासने कहा — सवेरे रामचन्द्रजी सीताके साथ सबेरे उठे तो अजमीढको बुलाकर मीठी बातोंमें समझाकर कहने लगे कि आज मैं सीता बन्धुओं समस्त वानरो और प्रजाजनोंके साथ अपने परमधामकी यात्रा करूंगा ॥ १ ॥ २ ॥ मेरे जितने भी मलूकन्धान आदि वस्त्रगृह हैं, उन्हें कुशके पास अयोध्या भेज देना । बड़े जीवसे लेकर कीट पर्यन्त सब प्राणी मेरे साथ वैकुण्ठ जायँगे। मेरे चले जानेपर तुम कुशके पास चले जाना और मेरा सब समाचार कह सुनाना और यह भी कह देना कि कुश हमारी और्ध्वदैहिक क्रियाओंको खूब अच्छी तरह सम्पन्न करे । यदि मेरे परमधाम जानेके कारण कुश किस प्रकारका खेद करने लगे तो तुम उसे अच्छी तरह समझा देना । रामकी बात सुनकर अजमीढ़ने आँखोंमें आँसू भरकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और भगवान्‌को प्रणाम किया । इसके अनन्तर रामन सबके साथ गङ्गाजीमें स्नान किया, नित्यकृत्य किये, हवन किया और गङ्गातटपर स्थित ब्राह्मणोंको तरह तरहके दान दिये । ३-७ ॥ इसके बाद यात्रासे सम्बन्ध रखनेवाले जितने कर्म थे, वह सब किये । चलते समय हवनकी अग्निको वैकुण्ठधाम भेज दिया ॥ ८ ॥ उस समय रामरूपधारी विष्णुकी लक्ष्मी सात्विकी सीता रामके दक्षिण भागने वैकुण्ठधामको चली गयीं। उस समय सब वेद अपने मूर्तरूपसे वैकुण्ठधामको जा पहुँचे ॥ ९ ॥ रामके प्रणयाम करत ही शान्ति, क्षमा, मति और दया आदि गुण चले गये ॥ १० ॥ तथा तरह तेज, बल, यश और शौर्य आदि भी कुछ कर गये । इसके अनन्तर सब पुरवासियों तथा वानरोंने भी गङ्गाजीमें स्नान और प्राणायाम करके अपन शरीरोंका परित्याग कर दिया । इसके बाद सीताके साथ रामने गङ्गाजलका स्पर्श किया और कुशासनपर बैठे ॥ ११ ॥ १२ ॥ हाथमें कुशा लेकर वे उत्तरकी ओर मुख करके बैठे । उसी समय राम देवताओंके सम्मुख विष्णुभगवान्‌के रूपमें परिणत हो गये ॥ १३ । उन भगवान्‌के चार भुजायें थीं । नीलकमलके समान श्याम शरीर था। वे अपने शरीरपर पीले वस्त्र धारण किये हुए थे । कौस्तुभमणिसे उनका हृदय सुशोभित हो रहा था और श्रीवत्स उसकी निसार शोभा ही दिखा रहा था ॥ १४ ॥ गङ्गाजीके तटपर रामके वामांगमें बैठी हुई सीता लक्ष्मीके

सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७७९

सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७७९

शङ्खो बभूव भरतः शार्ङ्गपा० मध्यवन्तरं । रामे करे बभूवाथ शत्रुघ्नश्च सुदर्शनम् ॥१६॥ दैवेषु विविशुः सर्वे ये चाग्रे ह्यवागताः । चांडालकृमिकीटांस्ता अयोध्यापुरवासिनः ॥१७॥ प्रापुस्ते दिव्यदेहानि विमाने संस्थिता बहुः । तदा निनदुर्वादित्राणि देवानां गगनांगणे ॥१८॥ स्वर्पुर्दैवपत्यश्च पुष्पवृष्टिमिदंगताः । ननृतुश्चाप्सरो नगुर्गन्धर्वकिंनराः ॥१९॥ प्रणनाम तदा तार्क्ष्यः श्रीविष्णुं रश्मिसुप्रभम् । देहानि मुमुचुः सर्वे श्रोभिः सोमादिकाश्च ते ॥२०॥ पतिदेहानि चालिंग्य तदा ता ऊर्मिलादिकाः । इदामन्यौ जहुः सर्वा रम्ये भागीरथीजले ॥२१॥ अथ ता देवकन्याश्च रत्नदीपैः सहस्रशः । विष्णुं नीरजवासाद्यमलक्ष्मीयुक्तं महाभुजम् ॥२२॥ विष्णुनन्तोऽब्रवीद्वाक्यं पद्मजं मधुरं शनैः । प्रयोभ्यावासिनः सर्वे तिर्यङ्स्थावरद्रवः शुभाः ॥२३॥ एते समागता ब्रह्मण्तेषां स्थानं वदाधुना । तद्विष्णोर्वचनं श्रुत्वा तदा ब्रह्माऽब्रवीद्वचः । २४॥ मल्लोकादुपरिष्टाच्च लोकाः सांत्वानिकाऽभिधान् । इमे यांतु जनाः सर्वे मद्दद्दर्शनमलोन्मखाः ॥२५॥ ततः प्राह पुनर्विष्णुर्योऽप्याया! मृताश्च ये । अग्रे तेऽपि समायांतु लोकान्सान्त्वानिकाञ्छुभान् । २६॥ एवेति म गिरिः प्राह महाविष्णुं मुदाम्वितः । ततस्ते दिव्यदेहाश्च सर्वेऽयोध्यावासिनः ॥२७॥ नानाविमानमारूढाश्च दिव्यवस्त्रविभूषिताः । दिव्यलंकारसंयुक्ता दप्सरोभिस्केपिताः ॥२८॥ ताननुगंधगधर्वाद्यैश्यामरैर्जिताः । विरेचुर्गगने चन्द्रवदना रतिमानुगाः ॥२९॥ ततो ब्रह्मादयो देवाः प्रणेमुर्विष्णुमादरात् । तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैर्वेदघोषैर्महर्षयः ॥३०॥ तदा तुष्टाव शत्रुघ्नं विष्णुं त्रैलोक्यपालकम् । वनमालां दधानं तं दिव्यचन्दनचर्चितम् ॥३१॥

रूपमें और लक्ष्मण फणीश सुशोभित रूप भगवान्‌के स्वरूपमें परिणत हो गये ॥ १५ ॥ भरतजी शंखके रूपमें परिवर्तित होकर विष्णुभगवान्‌के दाहिने हाथमें जा विराजे । शत्रुघ्नजी विष्णुके सुदर्शनचक्र बनकर बांये हाथमें जाके जमा लिया ॥ १६ ॥ यहाँपर जितने बंदर थे, वे सब जल भये अपने अपने अंशरूपमें देवलोक शरीरोंमें प्रविष्ट हो गये । चाण्डालसे लेकर कृमि-कीट पर्यन्त सभी अयोध्यानिवासी अपने-अपने शरीरोंको छोड़कर दिव्य देह धारण करके विमानोंपर सुशोभित होने लगे । उस समय गगनांगणमें देवताओंके विविध प्रकारके बाजे बज रहे थे । १७-१८॥ देवांङ्गनाएं प्रेमपूर्वक कुसुमवर्षा कर रही थीं, अप्सरावें नाच रही थीं और गन्धर्वगण तरह-तरहके गायन गा रहे थे । १९ ॥ उसी समय गरुडन आकर भूमण्डलमें देदीप्यमान भगवान्‌को दण्डवत् प्रणाम किया। उधर सब बर्गि राजाओंने भी अपना स्त्रियों समेत अपने-अपने शरीरोंको छोड़ दिया ॥२०॥ इन सागार परम धाम बजे जानक बाद ऊर्मिला, माण्डवी तथा श्रुतकान्तिने अपने-अपने पतिके शरीरका आलिंगन करके चितामें जलकर शरीर छोड़ दिया ॥ २१ ॥ उधर समस्त देवताओंकी स्त्रियोंने हजारों रत्न-मय दीपक जलाकर लक्ष्माके हसन विष्णुभगवान्‌की आरती उतारी ॥ २२ ॥ कुछ देर बाद विष्णुभगवान्‌ने ब्रह्मासे कहा कि मेरे साथ जो अयोध्याके सब पुरवासी तथा तिर्यंचयानि तकके प्राणी यहाँ आये हैं, इनके लिए कोई स्थान बतलाइए । विष्णुभगवान्‌की बात सुनकर ब्रह्माजी बोले कि आपके दर्शनसे ये पवित्र प्राणी मेरे लोकके भी ऊपर एक सान्त्वानिक लोक है-वहीं हो जाकर निवास करें ॥ २३-२५ ॥ इसके बाद विष्णु भगवान्‌ने फिर कहा कि इनके अतिरिक्त भी जो प्राणी अयाध्यामें शरीर त्याग करें वे सब सान्त्वानिक लोक प्राप्त करें ॥२६॥ ब्रह्माजीने भगवान्‌की यह बात भी स्वीकार कर ली। इसके अनन्तर वे सब अयोध्यावासी दिव्य शरीर धारण करके नाना प्रकारके विमानोंपर जा बैठे। उस समय वे लोग अच्छे-अच्छे पहने-कपड़े पहने थे और कितनी ही सुन्दर अप्सरा। उनके शरीरोंसे सुगन्ध डाल रहा थी। उनपर दिव्य चमर चल रहे थे। सुर्यके समान देदीप्यमान तथा चन्द्रमुखी नारियाँ सब प्रकारकी सेवायें कर रही थीं ॥ २७-२९ ॥ तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओंने विष्णुभगवान्‌को प्रणाम किया और बड़े-बड़े ऋषि वेदकी ऋचाओंसे भगवान्‌की स्तुति करने लगे ॥ ३० ॥ उस लागोंके बाद श्रीशत्रुघ्नजी त्रैलोक्यरक्षक विष्णुभगवानकी स्तुति करने लगे। उस

७८० आनंदरामायणे [ सर्गः ६

शंभुरुवाच

१२३ करुणाकरं भयनाशनं दुरितापहं माधव मखसंस्थितं नलसंस्थितं परमेश्वरम् । पालकं जगतामकं भवतारकं रिपुमारकं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३२॥

ध्रुवंच वनमालिनं मनरूपिणं धरणीधरं श्रीहरिं त्रिगुणात्मकं तुलसीधरं वपुस्स्वम् । अर्ककं शरणप्रदं मधुमारकं बहुपालकं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३३॥

गोकुलं मथुरःस्थितं रजकांतकं गजमारकं मन्सुतं बकमारकं वृकवानरं तुंगाह्वयम् । नन्दजं वसुदेवजं बलिपोषणं सुरपालकं त्वां भजे जगदीश्वर नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३४॥

केशवं काकघातिनं कपिमार्क मृगमर्दनं सुंदर द्विजपालकं दिनिजार्द्दनं दनुजार्द्दनम् । श्रावकं खरमर्द्दनं ऋषिपूजितं मुनिचिंतितं त्वां भजे जगदीश्वर नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३५॥

शंखजं जलशायिनं कुशपालकं रथवाहनं सुरनूतं प्रियपुष्पकं प्रियभूसुरं लवपालकम् । श्रीधरं मधुसूदनं भरताग्रजं गरुडध्वजं त्वां भजे जगदीश्वर नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३६॥

गोप्रियं गुरुपुत्रदं वदतां वरं करुणानिधिं सव्वंपं जनतोषदं सुरपूजितं श्रुतिभिः स्तुतम् । शुक्तिदं जनमुक्तिदं जनरंजनं नृपनन्दनं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३७॥

चिद्वनं गिरजाधवन् प्राणशालि- वरदानमुद्य श्रीधरं धृतपद्मकं चक्रहस्तकं गतिदायकम् । शान्तिदं जनतारक, शङ्खधारिणं गजगामिनं त्वां भजे जगदीश्वर नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३८॥

शार्ङ्गिणं कमलाननं कमलादृशं पदपंकजं श्यामलं शरणागतं शशिगोमदं करुणाकरम् ।


समय भगवान् वनमाला धारण किये थे और उनके गान्धर्व दिव्य चन्दनका लेप किया हुआ था ॥ ३१ ॥ प्रशंसाजनकहे रघुनन्दन तुम्हारे भजन कर, भवौघ प्राप्तगमन मुक्त करनेवाले, पापनाशकारक, लक्ष्मीके पति, जगत्के परमेश्वर, सबer पालक, भक्तोंका नाशन्वान, भवसागर नाशक, शमसंहारकारी नररूप- धारी हे जगदीश्वर रघुनन्दन मै आपका प्रणाम करता हूँ ॥ ३२ ॥ ध्रुवरति वनमालाधारी, मधुनामक राक्षसका संहारक, ब्रजके पालक नवीन मेघके समान श्यामवर्ण, पृथ्वीकी रक्षा करनेवाले, सत्त्व, रज और तम इन तीनो गुणोंसे युक्त तुलसीके पति, शंकरस्वरूप आपकी विस्तार करनेवान, नररूपाधारी जगदीश्वर हे रघुनन्दन ! मै आपका भजन करता हूँ। ३३ । द्विद्गवले मथुरामें निवास करनेवाले, रजकमारी गजास्तकारी, सज्जनोंम संस्तुत, बकासुर, वृकासुर और कङ्काको मारनेवाले, नन्दसुवन वसुदेवके पुत्र पातालमे बलिके यज्ञम जानेवाले देवताओंके पालक, नररूपधारी हे जगदीश्वर रघुनन्दन ! मैं आपका भजन करता हूँ ॥ ३४ ॥ केशव, बाणसेके घिरे हुए, बालि वानरका मारनेवाले, मृगरूपधारी मारीचको मारनेवाले, सुन्दर, ब्राह्मणीके रक्षक राक्षसोंका संहार करनेवाले, सर्वदा बाल्मीकिदूत, खरको मारनेवाले, ऋषियोंसे पूजित, मुनियों द्वारा चिन्तित ओर नररूपधारी हे जगदीश्वर रघुनन्दन ! मै आपका भजन करता हूँ ॥ ३५ ॥ संसङ्गरूप बाणपण करनेवाले, तिलक शुक जैसे यशस्वी बालक हैं, रथ जिसकी सवारी है, सम्पूर्ण स्वर्ग जिनको नमस्कार करती है, जिसके सेवक विमान त्रिपथ प्रिय है, जो ब्राह्मणोमे अतिशय प्रेम रखते हैं एवं नामका जिनका बालक है जो लंकाका नाश करते हैं, जिन्होने मधुनामक दैत्यका संहार किया था जो भरतके बडे भ्राता है ओर जिनकी ध्वजामें गरुडका चिह्न बना हुआ है, ऐसे नररूपधारी हे जगदीश रघुनन्दन ! हम आपका भजन करते है ॥ ३६ ॥ जिनको गौ विशेष प्रिय है, जो यमलोकसे गुरुपुत्रको लौटा लाये थे, जो वक्ताओंमे श्रेष्ठ हैं, जो करुणाके समुद्र हैं जो सब तरहसे अपने भक्तोंकी रक्षा करते हैं, जो अपने भक्तोको प्रसन्न रखते हैं, देवतागण जिनका पूजन करते हैं चारों वेद जिसकी स्तुति करते हैं, जो सब प्रकारके भोग प्रदान करते हैं और जो अपने भक्तोंको मुक्ति प्रदान करते हैं, महाराज दशरथके पुत्र हे जगदीश्वर रघुनन्दन मैं आपका भजन करता हूँ ॥ ३७ ॥ चिद्घनरूप में, गिरजाजी मणियोकी माला धरण करनेवाले, प्राण-युक्त, श्रीधर, धैर्य प्रदान करनेवाले, गतिकारक, चक्रहस्तधारी, शान्तिदाता जनतारक, शङ्ख धारी, गजगामी, नररूप धारण करनेवाले हे जगदीश्वर रघुनन्दन ! मै आपका भजन करता हूँ ॥ ३८ ॥ धनुष

[सर्गः ६] पूर्णकाण्डम् ७८१

सत्पतिं नृपवालकं नृपवन्दितं नृपतिप्रियं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ ३९॥ निर्गुणं सगुणात्मकं नृपमण्डनं यतिवन्द्यवन्द्यपदं पुरातनमं परमेष्ठिनं स्मितभाषिणम् । ईश्वरं हनुमन्नुतं कमलाधिपं जगदार्त्तिहन्तृ भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ ४०॥ ईश्वरोक्तमेतद्गुणाष्टादशच्छन्दनामकं यः पठेद्भुवि मानवस्त्वद्भक्तिमांस्त्वन्नोदये । स्वत्पदं निजबन्धुदारसुतंयुतश्चिरमेत्य नो मोदन्तु ते पदसेवने बहुवत्सरी मम वाक्शतः ॥ ४१॥ इति स्तुत्वा महाविष्णुं प्रोवाच गिरिजापतिः । आरुहस्व गरुडेश गरुडोपरि वेगतः ॥ ४२॥ वैकुण्ठारोहणस्यायं कालो वाल्मीकिना कृतः एकादश सहस्राश्च वत्सरान्वेकादशैश्च च ॥ ४३॥ तथैकादश मासाश्च दिनान्येकादशैव च । तथैकादश नाडीश्च पलान्येकादशैव च ॥ ४४॥ गतानि तेऽत्र भूम्यां हि जन्मारभ्य राघव । वसन्तपञ्चमीनाम्नी तिथिर्वैत्रासिताऽद्य हि ॥ ४५॥ पुण्येऽह्नि स्वपदं गन्तुं स्वर्गं कुरु रमेश्वर । तदा विसृज्य शालिवाहुर्वाल्मीकिं मुनिपुङ्गवम् ॥ ४६॥ समालिंग्य मुनीन्पृष्ट्वा तस्थौ स गरुडोपरि । ध्वनत्सु देववाद्येषु स्तुवत्सु नारदादिषु ॥ ४७॥ पुष्पैर्वर्षत्सु देवेषु प्रनर्त्तन्तीष्वप्सरःसु च । नानाविमानयानैश्च समन्त परिवेष्टितः ॥ ४८॥ ययौ विष्णुः स वैकुण्ठं लोकान्पश्यन्जनैः मुनैः। वैकुण्ठे स्वपदे स्थित्वा विससर्ज शिवादिकान् ॥ ४९॥ तस्थौ लक्ष्म्याऽऽनन्दमयः परिपूर्णमनोरथः । खगेशश्चारुमत्पादः सेवानत्पर्तिभूषणः ॥ ५०॥ अयोध्यावासिनः सर्वे ययुः सातानकं पदम् । ततस्ते मुनयः सर्वे ययुः स्वं स्वं स्थल प्रति ॥ ५१॥ रामवाक्यान्याऽजमीढः सांत्वयामास तं कुशम् । स्वर्गारोहण वृत्तार्थ कथयामास तं कुशम् ॥ ५२॥


धारण किये, कमलके समान मुखवान्, कमलके भाँति नेत्रवाले, कमलके ही समान चरणकमलवाले, श्याम वर्ण, सूर्यके समान देदीप्यमान, चन्द्रमाकी मुख दूतवाल, करुणाके समुद्र एक अद्वितीय प्रभु राजाओंके रक्षक, राजाओंसे वन्दित, राजाओंके प्रिय और नररूपधारी जगदीश्वर रघुनन्दन ! मैं आपका भजन करता हूँ ॥ ३९ । निर्गुण होते हुए भी सगुणरूपधारी, राजाओंके मुकुटभूषण बुद्धिवर्द्धनकर्त्ता, परम पूजनीय, मुसकराकर बोलनेवाले, जगत्के प्रभु, हनुमानजीके द्वारा स्तुत लक्ष्मीके पति और नररूपधारी हे जगदाधार रघुनन्दन ! मैं आपका भजन करता हूँ ॥ ४० । इस प्रकार स्तुति करते हुए शिवजीने अन्तमें कहा कि प्रातःकाल सूर्योदयके समय जो कोई श्रद्धा भर वह हुए इस छन्दनामाष्टमीका पाठ करेगा, वह मेरे आशीर्वादसे अपने बन्धुओं तथा स्त्री पुत्रऽदिकके साथ यहाँ आकर बहुत कालतक आपके चरणोंकी सेवाका सुयोग पायेगा ॥ ४१ ॥ इस प्रकार स्तुति करनेके पश्चात् शिवजी ने कहा—हे रमानाथ आप शीघ्र गरुडपर आरूढ़ हो क्योंकि वाल्मीकिजीने आपके वैकुण्ठ गमनका यही समय अपने रामायणमें निर्धारित किया है। इस समय ग्यारह हजार ग्यारह वर्ष, ग्यारह महीना, ग्यारह दिन, ग्यारह नाड़ी तथा ग्यारह पल पूरे हो रहे हैं। आज चैत्र शुक्लाष्टमीकी पञ्चमी तिथि है ॥ ४२-४५ ॥ इस पवित्र दिवसका आप परमधाम जानेके लिए प्रस्थान करिए। उस समय प्रभु भुजबन्धु । उन्होंने मुनिपुङ्गव वाल्मीकि के शिक्षा हृदयसे लगाया, ऋषियोंसे आज्ञा माँगी और गरुडके ऊपर सवार हो गये, तब देवताओंने विविध प्रकारके बाजे बजाये, नारद आदि महर्षियोंने स्तुति की, देवतागण आकाशपर फूल बरसाने लगे और अप्सरायें नाचने लगीं ॥ ४६-४८ ॥ इस तरह गरुडपर बैठकर भगवान् राम सब लोगके देखते-देखते वैकुण्ठलोकको चले गये। उस धाममें पहुंचकर वे अपने विश्वामित्रके बंद और शिव आदि देवताओंका विदा कर दिया। वे आनन्दमय महाप्रभु हर प्रकारसे परिपूर्ण मनोरथ होकर लक्ष्मीके साथ आनन्दपूर्वक वहीं रहने लगे। उस समय गरुड़ भगवान्के चरणोंकी सेवा करते थे और वे विष्णु भगवान् शेषकी शय्यापर मान थे ॥ ४९-५० ॥ वे सब अयोध्यावासी भगवान्के कथनानुसार सान्तानिक लोकमें जा विराजे। इसके अनन्तर भगवान्का स्वर्गारोहण देखनेके लिए आये हुए ऋषि भी अपने अपने आश्रमोंको चले गये ॥ ५१ ॥ रामचन्द्रजीके कथनानुसार हास्तिनापुरके राजा अजमीढ़ अयोध्यामें कुशके पास गये और भगवान्का परमधामगमन-सम्बन्धी

७८२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

कुशेन मानितः सोऽपि ययौ स्वांय रजाव्हयम् । लब्ध्वा कुमुद्वतीं तस्यां कुशः पुत्रान्न निर्ममे ॥५३॥ एवं श्रीरघुनाथस्य स्वर्गारोहणकौतुकम् । ये शृण्वन्ति नरा भक्त्या तेऽपि स्वर्गं प्रयान्ति हि ॥५४॥ वैकुण्ठारोहणाख्यायमिमं नित्यं पठेत्तु यः । सोऽन्ते गच्छति वैकुण्ठं रामचन्द्रप्रसादतः ॥५५॥ इति श्रीमन्महोदिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीय पूर्णकाण्डे वैकुण्ठारोहणं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥


सप्तमः सर्गः

( सूर्यवंशवर्णन )

श्रीरामदास उवाच एवं त्वया यथा पृष्टं स्वर्गारोहणप्रद्वयम् । श्रीरामस्य मया चैतत्तथाऽऽशु निवेदितम् ॥ १ ॥ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छाऽस्ति तान्वं वद वदाम्यहम् । एव गुरुर्वचः श्रुत्वा विष्णुदासस्तमब्रवीत् ॥ २ ॥

विष्णुदास उवाच कुशात्तः सूर्यवंशोऽत्र गुरो पूर्वं त्वयोदितः । कुशाग्र श्रोतुमिच्छामि सूर्यवंशं सविस्तरम् ॥ ३ ॥

श्रीरामदास उवाच विष्णोरास्भ्य कथिता एकषष्टितमाः पुरा । एकषष्टिनृपा ह्यग्रे तान्वदामि सविस्तरम् ॥ ४ ॥ श्रीरामस्य कुशः पुत्रोऽतिथिः पुत्रः कुशस्य सः । निषधस्त्वतिथेः पुत्रो निषधस्यात्मजो नभः ॥ ५ ॥ नभाञ्जातो पुंडरीकः क्षमधन्वा तु तत्सुतः । देवानीकस्त्वमृताऽभूद्देवानीकसुतो महान् ॥ ६ ॥ अहीनः प्राप्यतस्तद्वत् पारियात्रस्तत्सूनु स्मृतः । पायात्रस्य बलः पुत्रः स्थलः पुत्री बलस्य हि ॥ ७ ॥ स्थलस्य वज्रनाभस्तु खगणस्तस्य चात्मजे । खगणाद्विधृतिर्जातो विधृतेस्तनयः शुभः ॥ ८ ॥ जातो हिरण्यनाभस्तु तस्य पुत्रः प्रकाल्पत । पुष्यास्त ध्रुवसंधिस्तु ध्रुवसंधः सुदर्शनः ॥ ९ ॥ सुदर्शनादाग्रवर्णस्तस्माच्छाधः प्रकीर्त्यत । शीघ्राज्जातो मरुः पुत्रो मरोश्च प्रश्वतः सुतः ॥ १० ॥ प्रश्रुतस्य च सन्धाई सचे पुत्रस्तु मषणः । मषणस्य महस्वाथ विश्वसाहश्च तत्सुतः ॥ ११ ॥


सब बात बतलायी और समझा दिया कि आप किस प्रकारका शक न करें ।। ५२ ।। कुशने भी अजमीढ़का भरपूर आदर-सत्कार किया । कई दिना अयोध्यामे रहकर वे हस्तिनापुर को चले गये । कुछ दिनों बाद कुशको कुमुद्वती नामकी एक दूसरी भार्या प्राप्त हुई । उससे कुशके बहुतसे पुत्र हुए ।। ५३ ।। इस प्रकार भगवान्‌के स्वर्गारोहण-वार्ताको जो लोग भक्तिपूर्वक सुनते हैं, वे भी स्वर्गलोक प्राप्त करते हैं ।। ५४ ।। जो प्राणी वैकुण्ठारोहणके इस सर्गका नित्य पाठ करता है, वह रामचन्द्रजीकी कृपासे अन्तमे वैकुण्ठ धामको प्राप्त करता है ।। ५५ ।। इति श्रीमत्काशिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतनुपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहित पूर्णकाण्ड षष्ठ सर्गः ॥ ६ ॥

श्रीरामदासने कहा- हे शिष्य ! तुमने जिस तरह हमसे भगवान्‌का स्वर्गारोहणवृत्तांत पूछा, वह मैने कह सुनाया । अब तुम क्या सुनना चाहते हो सो कहो । वह भी मैं बतलाऊँगा । इस तरह गुरुकी बात सुनकर विष्णुदास कहने लगे-हे गुरुवर ! आपने नृपतक सूर्यवंशका वर्णन किया, सो मैने सुना । अब यह जानना चाहता हूं कि कुशके आगे कौन-कौन राज हुए सो हए विस्तारपूर्वक बतलाइए ॥ १ ३ ॥ श्रीरामदास बोले-हे शिष्य, विष्णुभगवान्‌से लेकर एकसठ राजाओंका चरित्र मैने पहले सुनाया है। उनके बाद जो एकसठ राजे और हुए हैं, उन्हें मैं विस्तारपूर्वक बतलाता हूं ॥ ४ ॥ श्रीरामचन्द्रजीके पुत्र कुश, कुशके पुत्र अतिथि, अतिथिके निषध, निषधके नभ, ॥ ५ ॥ नभके पुण्डरीक, पुण्डरीकके क्षेमधन्वा, क्षेमधन्वाके देवानीक, देवानीकके अहीन, अहीनके पारियात्र, पारियात्रके बल, बलके पुत्र स्थल ॥ ६ ॥ ७ ॥ स्थलके वज्रनाभ, वज्रनाभके खगण, खगणके पुत्र विधृत, विधृतिके हिरण्यनाभ, हिरण्यनाभके पुष्य, पुष्यके ध्रुवसंधि, ध्रुवसंधिके सुदर्शन, ॥ ८ । ९ ।। सुदर्शनके अग्निवर्ण, अग्निवर्णके पुत्र शीघ्र, शीघ्रके मरु, मरुके पुत्र प्रश्वुत,

सर्गः ७ ] पूर्णकाण्डम् ७८३


तस्मात्प्रसेनजित्प्रोक्तस्तस्माज्जातस्तु तक्षकः । बृहद्रणस्तक्षकस्य तस्माज्जातो बृहद्रणः ॥ १२॥
तस्मादुरुक्रीयः प्रोक्तो वत्सबृहत्तु तत्सुतः । वत्सबृहदस्य व्योमस्तु व्योमाद्भानुः प्रकीर्त्यते ॥ १३॥
भानोः पुत्रो दिवाकस्तु सहदेवश्च तत्सुतः । सहदेवात्तथा वीरो वीरस्य तनयः शुभः ॥ १४॥
बृहदश्व इति ख्यातस्तस्य पुत्रस्तु भानुमान् । भानुमतः प्रतीकाशः सुप्रतीकश्च तत्सुतः ॥ १५॥
सुप्रतीकस्य पुत्रोऽभून्मरुदेव इति स्मृतः । मरुदेवात्सुनक्षत्रः सुनक्षत्राच्च पुष्करः ॥ १६॥
पुष्करस्यांतरिक्षश्च सुतपा अंतरिक्षजः । सुतपास्तनयो मित्रो मित्रजित्सुतः शुभः ॥ १७॥
बृहद्राज इति ख्यातस्तस्य बर्हिः सुतो बुधैः । ख्यातो कृतंजयः पत्रस्तस्य पुत्रो रणंजयः ॥ १८॥
रणंजयस्य तु संजयः संजयाच्छाक्य उच्यते । शाक्यपुत्रस्तु शुद्धोदः शुद्धोदाल्लांगलः स्मृतः ॥ १९॥
प्रसेनजित्लांगलस्य तत्पुत्रः क्षुद्रकः स्मृतः । क्षुद्रकाद्रणकः प्रोक्तो रणकात्सुमुखः स्मृतः ॥ २०॥
सुमुखात्तनयो जातस्तनयस्य सुतो महत् । नाम्ना सूर्यस्य धामः पूर्णो वंशस्ततः परम् ॥ २१॥
पूर्वमुक्तो मरुदिति नाम्ना यो नृपनिमिया । कलापग्राममाश्रित्य हिमाद्रौ बद्रिकाश्रमे ॥ २२॥
स तपश्चिरकालं हि करोत्यत्र समाधिमान् । कृते युगे पुनः प्रेत्ये सूर्यवंशं करिष्यति ॥ २३॥
एवं मया समाख्यातः सूर्यवंशो मनोहरः । विष्णोरारभ्य कथित एकाषष्टितमो मया ॥ २४॥
एकषष्टिनृपाणाञ्च मध्ये रामो विराजते । त्रयोविंशोत्सप्तशतं विष्णोर्मयोदिताः ॥ २५॥
एवं यथा त्वया पृष्ट शिष्य वंशानुकीर्तनम् । तन्मया कथितं सर्वं श्रवणात्पुण्यवर्धनम् ॥ २६॥

विष्णुदास उवाच
गुरो मया श्रुतं कस्यचिन्मुनेर्मुखतः पुरा । रामायणं सविस्तारं तच्चेदं नैव भासते ॥ २७॥
तस्मादत्रांतरं प्रोक्तं त्वया सर्वत्र मां गुरो । संदेहोऽनेन मे जातःतं त्वं छेत्तुमर्हासि ॥ २८॥

श्रीरामदास उवाच
पुनः पुनः कल्पभेदाज्जाताः श्रीराघवस्य च । अवताराः कोटिशोऽत्र तेषु भेदः क्वचित्क्वचित् ॥ २९॥


॥ १० ॥ प्रद्युम्नके संर्षि, संर्षिके पुत्र मर्षेण, मर्षेणके महत्वाना, महत्वानाके विश्ववाह ॥ ११ । विश्ववाहके प्रसेनजित्, प्रसेनजित् के तक्षक तक्षकके बृहद्रण बृहद्रणके उरुक्रीय उरुक्रीयके वत्सवृद्ध, वत्सवृद्धके व्योम, व्योमके भानु ॥ १२ ॥ १३ । भानुके पुत्र दिवाक, दिवाकके सहदेव, सहदेवके वीर, वीरके पुत्र बृहदश्व, बृहदश्वके भानुमान्, भानुमान्के प्रतीकाश, प्रतीकाशके पुत्र सुप्रतीक १४ ॥ १५ । सुप्रतीकके मरुदेव, मरुदेवके सुनक्षत्र, सुनक्षत्रके पुष्कर, ॥ १६ पुष्करके अन्तरिक्ष, अन्तरिक्षके सुतपा, सुतपाके पुत्र मित्र, मित्रके मित्रजित् ॥ १७ मित्रजित्के बृहद्राज, बृहद्राजके बर्हि, बर्हिके कृतंजय कृतंजयके पुत्र रणंजय ॥ १८ । रणंजयके संजय, संजयके शाक्य शाक्यके शुद्धोद शुद्धोदके लाङ्गूल ॥ १९ । लांगलके पुत्र प्रसेनजित् प्रसेनजित्के क्षुद्रक क्षुद्रकके रणक, रणकके सुमुख ॥ २०. सुमुखके तनय और तनयके पुत्र सुमित्र हुए। बस, यहां ही तक चलकर सूर्यवंश पूर्ण हो जाता है। २१ । पूर्वमें हम मरु नामक राजाका नाम गिना आये हैं। वे हिमा- लयपर बद्रिकाआश्रममें तप कर रहे हैं। सत्ययुग आनेपर वे फिर सूर्यवंशका विस्तार करेंगे ॥ २२ । २३ ॥ इस तरह मैंने विष्णुभगवान्से लेकर एकसठ राजाओं तक सूर्यवंशका वर्णन किया ॥ २४ । एकसठ राजाओंके मध्यमें भगवान् रामचन्द्रजी विराजमान हैं और उनके आगेवाले एकसठको लेकर कुल एक सौ तेईस राजे हुए ॥ २५ ॥ इस तरह हे शिष्य ! मैंने तुझे सूर्यवंशका विवरण कह सुनाया। इसके सुननेसे पुण्यकी वृद्धि होती है ॥ २६ ॥ विष्णुदासने कहा-हे गुरो ! मैंने किसी मुनिसे सुना था कि रामायण इससे भी विस्तृत है, किन्तु पूरी रामायण इस संभागमें विद्यमान नहीं है। फिर आपने जो रामायण सुनायी है, वह तो सब रामायणोंसे भिन्न है, यह एक प्रकारका सन्देह मेरे हृदयमें उत्पन्न होता है। कृपा करके आप इसका निवारण करिए ॥ २७ । २८ । श्रीरामदासने कहा कि कल्पभेदसे रामके कितने ही अवतार हुए हैं और

७८४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

कृतोऽस्ति राघवेशेन न सर्वे सदृशाः कृताः । रामायणान्यपि तथा पुरा वाल्मीकिनैव हि ॥ ३० ॥ अनेकान्यत्तरेणैव कीर्तितानि सविस्तरात् । शतकोटिमता तेषां सर्वेषां गणना कृता ॥ ३१ ॥ तस्मात्त्वया न संदेहः कार्यः शिष्य़ात्र बुद्धिमान् । यन्मया कथितं ते हि तत्सत्यं विद्धि नान्यथा ॥ ३२ ॥ यात्रोत्तरखंडांतर्गतरामायणात्पुरा । नारदादिपुराणानि व्यासेनात्र कृतानि हि ॥ ३३ ॥ हेतु भत्कथितं चेदं सम्यग्विस्मारितं द्विज । तव जातो यथा शिष्य संदेहोऽत्र कथांतगत् ॥ ३४ ॥ भविष्यति तथाऽन्येषामग्रे यदि कदा क्वचित् । नारदादिपुराणेषु दर्शनीयं हि दुर्जनैः ॥ ३५ ॥ दृष्ट्वा मदुक्तं सर्वेषु पुराणेषु पंडितैः । त्यक्तव्याः संशयम्देहाः सत्यं ज्ञेयं मयेरितम् ॥ ३६ ॥

इति शतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये पूर्णकाण्डे सूर्यवंशवर्णनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


अष्टमः सर्गः

( आनन्दरामायणकी सर्गानुक्रमणिका )

श्रीविष्णुदास उवाच

गुरोऽधुना वदस्व त्वं यन्मया पृच्छ्यते तव । अनुक्रमणिकासर्गं तथा पाठादिभिः फलम् ॥ १ ॥ कांडसंख्यां सर्गसंख्यां श्लोकसंख्यां सविस्तराम् । उद्यापनं ग्रन्थदानफलं वै शकुनेक्षणम् ॥ २ ॥ अनुष्ठानविधानं च श्रोतुं कालविनिर्णयम् । कांडानां च पृथक् संख्यां सर्वं त्वं वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥

श्रीमद्दास उवाच

अनुक्रमणिकासर्गः प्रोच्यतेऽयं मयाऽधुना । यस्याः संश्रवणात्प्रोक्तं सर्वग्रंथफलं शुभम् ॥ ४ ॥ सर्गेऽत्र प्रथमे प्रोक्तं कौसल्यायाः स्वयंवरम् । रामादीनां सुजन्मानि द्वितीये कीर्तितानि हि ॥ ५ ॥ सीतास्वयंवरं प्रोक्तं तृतीये मिथिलापुरि । शृगालादिकथनं चतुर्थे मुद्रलेन हि ॥ ६ ॥


उन अवतारोंमें कुछ न कुछ भेद पड़ ही गया है। यद्यपि सबकी लीलाएं प्रत्येक रामायणमें वर्णित हैं, किन्तु उन सबमें कुछ न कुछ भेद है। स्वयं वाल्मीकिजीने जो शतकोटि श्लोकात्मक रामायण बनायी है, उसमें भी भेद विद्यमान हैं। इस कारण हे शिष्य ! तुम किसी प्रकारका सन्देह न करके मैंने जो कुछ कहा है, उसे सच मानो ॥ २६-३२ ॥ भरतखण्डके अन्तर्गत विद्यमान रामायणके भागके ही आधारपर व्यासजीने नारदादि विविध पुराणोंका रचना की है। उसी खण्डके सहारे मैंने भी इस सविस्तर आनन्द-रामायणका वर्णन किया है। जिस तरह आज तुमने मेरा यह कथा सुनकर सन्देह उत्पन्न हुआ है, उसी तरह यदि आगे चलकर और किसी श्रोता-वक्ताको सन्देह हो तो उसे चाहिए कि उन नारद आदि पुराणोंको देखकर सन्देह निवृत्त कर लें ॥ ३३-३५ ॥ पण्डितोंको भी उचित है कि सब पुराणोंको देख और उनमें मेरी कही बातें देखकर अपना सन्देह मिटा लें और समझ लें कि मैं जो कुछ कहता हूँ, वे बातें सच हैं या नहीं ॥ ३६ ॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योतिष्मतीभाषा-टीकासहिते पूर्णकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

विष्णुदासने कहा-हे गुरु ! अब आप हमें इस रामायणकी सर्गानुक्रमणिका तथा इसके पठनका फल बताइए ॥ १, साथ ही इसकी काण्डसंख्या, सर्गसंख्या और श्लोकसंख्या आदि भी विस्तारपूर्वक कहिए। इसका उद्यापन, ग्रन्थके दानका फल, शकुनदर्शनविधान, अनुष्ठानविधि, इसके श्रवणका समय और काण्डोंकी संख्या आदि भी कहिए ॥ २, ३ ॥ श्रीरामदासने कहा-अब मैं तुम्हें इस रामायणकी सर्गानुक्रमणिका बताता हूँ। जिसके श्रवणमात्रसे समस्त रामायणके श्रवणका फल मिल जाता है ॥ ४ ॥ सारकाण्डके पहले सर्गमें कौसल्याका स्वयंवर, दूसरेमें राम आदिका जन्म, तीसरे सर्गमें जनकपुरमें सीताका स्वयंवर, चौथे

नवमे जानकीशुद्धिर्लंका दग्धाऽथ० । दशमे सेतुमाहात्म्यं राज्ञां श्रेयागमः ॥ ९ ॥

सर्गः ८ ] पूर्णकाण्डम् ७८७


दशरथपूर्वजन्म कैकेय्याश्चापि ० मे । वनप्रयाणं रामस्य प्रोक्तं पूणे मतिं त्वम् ॥ ७ ।
विराधावगमारीचवधादियमवेक्ष्यि । किष्किन्धां वालिवधो ज्ञानोद्योतं कृतं ८ ।
नवमे जानकीशुद्धिर्लंका दग्धाऽथ० । दशमे सेतुमाहात्म्यं राज्ञां श्रेयागमः ॥ ९ ॥
एकादशे रावणवधाः प्रोक्ताश्च रावणम् । सीतया सार्द्धं रामस्याऽयोध्याप्रवेशतः ॥ १० ।
त्रयोदशे राघवस्य विक्रमश्च हनूमतः समाप्तं मारकाण्डं हि यात्रामण्डमुदीर्यते ॥ ११ ।
यात्रायाके प्रथमे सर्गे क्षेत्रोत्पत्तिः प्रकीर्तिता साम्राज्यस्य विभागोऽत्र सविस्तर मुदाहृतः ॥ १२॥
तृतीये सीतया रामो यात्रार्थं प्रार्थितो मुदा । चतुर्थे रामचन्द्रस्य प्रस्थानं च कुशो प्रवि ॥ १३॥
पंचमे मुनिवाक्येन यात्रां गंतुं विनिर्णयः । षष्ठे प्रोक्ता पूर्वदेशतीर्थयात्रा सविस्तरा ॥१४॥
प्रोक्ता दक्षिणतीर्थानां यात्रा रामस्य सप्तमे । तीर्थाटनं पश्चिमाशागतम् अस्त्यन्य च ॥ १५॥
यात्रोत्तरप्रदेशस्य स्वरूपे नवमेऽहथि । यात्राकाण्डसमाप्तं तु यागकाण्डमुदीर्यते । १६ ॥
सगोऽत्र प्रथमे यज्ञ संभारकरणं गुरुः । द्वितीये रामचन्द्रस्य यज्ञागारप्रवेश वर्णितः ॥ १७॥
पृथ्वीप्रदक्षिण प्रोक्ता तृतीयेऽश्वप्रवर्तितः । कुम्भोद्भवस्य रामस्य संवादाऽत्र चतुर्थके । १८।
पञ्चमे रामनाम्नो वै ह्यष्टोत्तरशतं शुभम् । षष्ठेऽह्नि वै मणियां वाजिमेधे प्रकीर्तितम् । १९॥
ध्वजारोपरिधानं च सप्तमे समुदाहृतम् । अवभृथप्लवस्नाने राघवस्यात्र वर्णितम् ॥ २०॥
नवमे वाजिमेधस्य समाप्तिः कीर्तिताऽत्र मा । यागकाण्डं समाप्तं हि विलासकाण्डमुदीर्यते ॥ २१॥
प्रथमे रघुवीरस्य स्ववराजोऽत्र कीर्तितः । द्वितीयो गतिशालिन्या जानक्याश्चापि वर्णनम् ॥ २२॥
तृतीये राघवेणोक्तं देहरामायणं प्रिये । दिनचर्याभूषानि जानक्याश्च चतुर्थके ॥ २३॥
नलपत्रगता क्रीडा पञ्चमे क्षेमणादिकम् । विजयं पञ्चमे प्रसादे षष्ठेऽलङ्कारमण्डनम् ॥ २४॥

सप्तम मूदत्त कविका मिलना तथा वृत्तान्त आदि वर्णित है ॥ ७ ॥ पाँचवें सर्गमे दशरथ और कैकेयीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त है । छठे सर्गमें रामका वनगमन और मातंग- विराध-जटायु-मारीच आदिका वध तथा आठवें सर्गमें किष्किन्धा पर्वतपर बालिवध दर्शित है ॥ ९ ॥ ८ ॥ नवें सर्गमें सीताकी खोज और लङ्कादहन, दसवें सर्गमें सेतुमाहात्म्य तथा काशी-विश्वनाथके आगमनका वर्णन है ॥ ६ ॥ एकादश सर्गमें रामके द्वारा रावण आदिका वध तथा बारहवें सर्गमें सीताके साथ रामका अयोध्या में लौटना और राज्य भिषेकका वर्णन है ॥ १० ॥ तेरहवें सर्गमें राम और हनुमान्जीके पराक्रमका वर्णन है। इस प्रकार मारकाण्ड समाप्त हो जाता है ॥ ११ ॥ अब यात्राकाण्ड कहते हैं। इसके पहिले सर्गमें राज्य क दू० इलाकाका विभाग दूसरे प्रथम साम्राज्यका विभाजन वर्णित है ॥ १२ ॥ तीसरे सर्गमें सीता द्वारा यात्राका प्रार्थना और शशुपन्नप ज हूं की ओर रामकी यात्राका वर्णन है ॥ १३ ॥ पाँचवें सर्गमें कुम्भादर मुनिका सन्नाहम कथा का सविस्तर वर्णन है ॥ १४ ॥ छठेमें पूर्व देशके यात्राका वर्णन है । १४ ॥ सातव साम दक्षिण भारतके तीर्थोका वर्णन आठवें सर्गमें पश्चिम प्रदेशके सब तीर्थोंकी यात्राका वर्णन है ॥ १५ ॥ नव सर्गमें उत्तर प्रदेशके तीर्थोंकी यात्राका वर्णन है। बस, यात्राकण्ड यहीं समाप्त हो जाता है। अब यागकण्डका विषय कहते है ॥ १६ ॥ इसके प्रथम सर्गमें यज्ञका सामग्रियोंका सविस्तर वर्णन है । दूसरे सर्गमें रामचन्द्रजीका याग में प्रस्थानका, तीसरे सर्गमें यज्ञीय अश्वकी पृथ्वी प्रदक्षिणा, चौथे सर्गमें राम और कुम्भादर मुनिका संवाद है ॥ १७ ॥ १८ ॥ पाँचवें सर्गमें रामका अष्टात्तरशतनाम स्तोत्र है। छठ सर्गमें अश्वमेध यज्ञमें जानवाली रामकी दिनचर्याका वर्णन है ॥ १९ ॥ सातवें सर्गमें ध्वजारोपणविधान माहात्म्य अवभृथस्नान और नव सर्गमें अश्वमेध यज्ञकी समाप्ति वर्णित है ॥ २० ॥ बस, यहाँ यागकाण्ड समाप्त हो जाता है । अब विलासकाण्ड प्रारम्भ होता है ॥ २१ । इसके प्रथम सर्गमें रामस्ववराज और दूसरे सर्गमें जानकजीकी रतिशालाका वर्णन है ॥ २२ । तीसरे सर्गमें सीताजीको रामने देहरामायण सुनायी है । चौथे सर्गमें सीताका दिनचर्याका वर्णन है ॥ २३, पाँचवें सर्गमें जलपत्रकी क्री ड़ाये और आलिङ्ग हरूपका विवेचन है । छठें सर्गमें ब्राह्मणपरण के लिए सीता द्वारा अलङ्कार-दानका वर्णन है।

७८६आनन्दरामायणे[ सर्ग ८

मूर्तीनां सप्तमे दानं देवर्षीणां वरान्वथा । गुणवन्त्याः पिंगलाया वरदानमथाष्टमे ॥२५॥
कुरुक्षेत्रस्य यात्रायां नवमे जानकीजयः । विलासकाव्यं समाप्तं हि जन्मकाण्डमुदीर्यते ॥२६॥
आरामे दोहदक्रीडा सीतायाः प्रथमेऽऋषि । द्वितीये विविधाः क्रीडाः संमतेनोपनयोन्मदः । २७॥
रजकस्योदितं श्रुत्वा सीतात्यागस्तृतीयेके । जन्मकर्म चतुर्थेऽथ कुशस्याथ लवस्य च ॥२८।
सर्गेऽत्र पञ्चमे प्रोक्ता रामरक्षा सुखावहा । षष्ठे लवस्य कमलहरणे जय ईरितः ॥२९।
मुद्रादिकौतुकं प्रोक्तं पुत्रयोः सप्तमे विभोः । सीतादित्यं च तद्वाम्योऽष्टमे प्रोक्तोऽत्र मंडपे ।.३०।
जन्मोपनयनादीनि बालानां नवमेऽऋषि । जन्मकाण्डं समाप्तं हि विवाहकाण्डमुदीर्यते ॥३१॥
स्वयंवरार्थं गमनं रामस्य प्रथमेऽऋषि । स्वयंवरं चांपकाया द्वितीये ममुदाहृतम् ॥३२॥
स्वयंवरं सुमत्यश्च तृतीये परिकीर्तितम् । कुमुद्वत्यास्तदन्यादि विवाहौ द्वौ चतुर्थके ॥३३।
गन्धर्वनागकन्यानां मोचनं पञ्चमेऽऋषि । षष्ठे तासां विवाहानां निश्चयः समुदाहृतः ।.३४॥
विवाहा द्वादशे प्रोक्ताः सर्वासां सप्तमेऽथ हि । अष्टमे यूपकेतोश्च वाजिनोऽथ पराक्रमः ॥३५।
प्रोक्तो मदनसुन्दर्या विवाहो नवमे महान् । पूर्णं विवाहकाण्डं च राज्यकाण्डमुदीर्यते ॥३६॥
रामनाममहत्त्वं च मार्गे प्राथमिकेऽऋषि । द्वितीयेऽत्र ममर्त्तानो रामेण गुरुपादपौ । ३७॥
रामकृष्णोपासकयो संवादश्च तृतीयेके । शनैश्चर्या व निद्रायां वरदानं तथा पुनः ॥३८॥
रामविश्लेषविरहः सीतायाः पञ्चमेऽऋषि । मूकासुरवधः षष्ठे राज्यानि चै पृथक् ॥३९॥
जयो मत्तन्मंड़स्य रामेण सप्तमे कृतः । जम्बुद्वीपजयः प्रोक्तोऽष्टमे रामस्य विस्तरात् ।४०॥
षड्दीपानां जयः प्रोक्तो नवमे राघवस्य च । यतिशूद्रगृह्यशिक्षा रामेण दशमे कृता ।४१॥
चतुःस्त्रीणां वरदानं रामेणैकादशे कृतम् । खंगोऽश्वग्रहयागी द्वादशेऽथ प्रकीर्तितम् । ४२।
अश्वत्थहसितं दारुमुखकेतज्ञा त्रयोदशे । चतुर्थे वाल्मीकिना मन्त्रमन्त्रार्थमीरितम् ॥४३॥

॥ २४ । सप्तम सर्गमें मूर्तियोंका दान और देवर्षियोंके वरदानका विधान है। अष्टम सर्गमें गुणवन्ता और पिंगलाके वरदानका वर्णन है ॥ २५ । नवम सर्गमें कुरुक्षेत्रकी यात्रामें जानकीविजयका वर्णन है । बस, यहां ही विलासकांड समाप्त हो जाता है ॥ २६ ॥ अब यहाँसे जन्मकाण्डका वर्णन करते हैं—पहिले सर्गमें दोहदक्रीड़ा तथा दूसरे सर्गमें विविध प्रकारका क्रीड ओ और नामकरण संस्कारका विधान है ॥ २७ ॥ तृतीय सर्गमें सीतात्याग तथा चौथे सर्गमें कुश-लवका जन्म-कर्म वर्णित है । पाँचवे सर्गमें रामरक्षस्तोत्रका विधान है छठे सर्गमें लवका कमलहरण और उनकी विजय वर्णित है। २८ ॥ २९ ॥ सप्तम सर्गमें मुद्रादिक कौतुकका विधान है ओर अष्टम सर्गमें सीताकी जयथका वर्णन है ॥ ३० ॥ नवम सर्गमें बालकोंके जन्म और उपनयनका विधान है । बस, जन्मकाण्ड यहीं ही समाप्त हो जाता है। अब यहांसे विवाहकाण्डप्रारब्ध होता है ॥ ३१ ॥ इसके प्रथम सर्गमें रामके गमनकी वार्ता है । दूसरे सर्गमें चम्पिकाके विवाहका वृत्तान्त है । तीसरे सर्गमें सुमतिके विवाहका वर्णन है चौथे सर्गमें कुमुद और लवके विवाहकी बातें हैं ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ पञ्चम सर्गमें गन्धर्वों तथा नागोंकी कन्याओंके छुड़ानेका हाल है । षष्ठ सर्गमें इन लागोंके विवाहकी बात पक्की हो जाती है ॥ ३४ ॥ सप्तम सर्गमें सबरू विवाहाका वर्णन तथा अष्टम सर्गमें यूपकेतुके पराक्रमका वर्णन है ॥ ३५ ॥ नवम सर्गमें मदनसुन्दरीके विवाहका वृत्तान्त है। बस विवाहकाण्ड यहाँ ही समाप्त हो जाता है। अब राज्यकांड चलता है ॥ ३६॥ राज्यकाण्डके प्रथमसर्गमें रामनाममाहात्म्य तथा दूसरे सर्गमें रामके द्वारा स्वार्तके कल्पवृक्ष और गरुिजात नामक वृक्षोंके लगानेकी बातें हैं ॥ ३७॥ तीसरे सर्गमें रामकृष्णके उपासकोंका सम्वाद, चौथे सर्गमें निद्राके लिए वरदान, पाँचवें सर्गमें सीतारामका वियोग और मूकासुरका वध, छठें सर्गमें गज्यकार्योंका वर्णन है ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ सातवें सर्गमें रामके द्वारा मत्तमुण्डकी विजय आठवें सर्गमें जम्बूद्वीपविजय, नवें सर्गमें रामके अन्य छः द्वीपोंको जीतनेका वृत्तान्त है । दसवें सर्गमें सन्यासी, शूद्र तथा गृह्यकी शिक्षाका वर्णन है ॥ ४० ॥ ४१ ॥ ग्यारहवें सर्गमें रामके

सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७८७

पञ्चदशे रामराज्यवर्णनं विस्तरात्कृतम् । वर्णिता राजनीतिः शास्त्रोक्तेनात्र षोडशे ॥४४॥ सप्तदशेऽत्र कथितं कुशकन्यास्वयंवरम् । अष्टादशे गवां प्रचुरं दानं द्विजन्मनाम् ॥४५॥ एकोनविंशे रामस्य दिनचर्येरिता शुभा । गवां विमोक्षणार्थं पुत्रैस्तु घोरसङ्ग्राम महान् ॥४६॥ एकविंशे राघवेण हास्ये दत्तो वरो मुदा । नानया तुलर्पापात्रं द्वाभ्यां संचितं शुभम् ॥४७॥ त्रयोविंशे स्मृताऽऽनन्दरामायणफलश्रुतिः । यथाशिक्षा वधूनां च धर्मशिक्षा च भूतले ॥४८॥ राज्यकाण्डं समाप्तं हि मनोहरमुदीर्यते । सर्गेऽत्र प्रथमे प्रोक्तं लघूपाख्यानं शुभम् ॥४९॥ नगराणां च मात्राणामुपदेशं द्वितीयेऽर्के । रामपूजोपशमनादि विप्रार्थं तृतीयेऽर्के ॥५०॥ रामनोभद्रविस्तारश्चतुर्थे समुदाहृतः । रामलिंगतोभद्राणां भद्राः प्रोक्ताश्च पञ्चमे ॥५१॥ नवमीव्रतविस्तारः षष्ठे प्रोक्तं च मन्त्रशं । श्रीरामनामां लघूव्याख्यानादि नि सप्तमे ॥५२॥ वेदादीनां हि सर्वेषामध्यनं फलमीरितम् । सार्द्धमासद्वयी पूजा कथिता नवमे विभोः ॥५३॥ दशमे चैत्रमासस्य महिमा समुदाहृतः । एकादशे मञ्जननामश्रवां गतिरीरिता ॥५४॥ अद्वैतं दर्शितं शक्ता ह्यग्रे चार्कद्वयस्यतु । बाहुप्रदस्य रामस्य कवचं च त्रयोदशे ॥५५॥ सीतायाः कनकदानं प्रोक्तमत्र चतुर्दशे । पञ्चदशे कवचानां सङ्ख्याता स्मृतानि हि ॥५६॥ व्रतं हनुमतः प्रोक्तं पताकारोप्य हि षोडशे । प्रोक्तं सप्तदशे माहात्म्यंयत्त्वनुत्तमम् ॥५७॥ अष्टादशे शरभंगो मण्डनं च हनूमता । अत्र मनोहरं काण्डं पूर्णकाण्डमथोच्यते ॥५८॥ वाल्मीकिना मोक्षवंशाविस्तारः प्रथमेऽकथि । रामचन्द्रस्य प्रयाणं द्वितीये हस्तिनापुरम् ॥५९॥ सूर्यसोमवंशजयोर्युद्धं प्रोक्तं तृतीयेऽर्के । सोमवंशराजनामकित्तिकीं च चतुर्थके ॥६०॥ कुशादीनां गद्यपद्यं पञ्चमेऽत्र विसर्जनेषु । वैकुण्ठारोहणं षष्ठे गङ्गायां शय्यरूपं च ॥६१॥ सप्तमे सर्वग्रंथायनुज्ञाणां वर्णनं कृतम् । अनुक्रमणिकानाम्रं प्रोक्तं पञ्चमष्टमो महान् ॥६२॥

द्वारा चार स्त्रियोंकी व्याख्याशन्ति, बारहवें सर्गमें सोलह श्लोककी बदरंग नामका वृत्तान्त, तेरहवें सर्गमें दोपलके वृक्षकी हँसी, चौदहवन कार्तवीर्यके साथ जनमका वृत्तान्त है ॥ ४०-४३ ॥ पन्द्रहवें सर्गमें रामके राज्यका सविस्तार वर्णन और सोलहव सर्गमें गगकी कही राजनीति का चर्चा है ॥ ४४ ॥ सत्रहवें सर्गमें कुशकी कन्याका स्वयम्वर, अठारहव सर्गमें ब्राह्मणोंके लिए रामकाप्रचुरके गव्यका दान ॥ ४५ ॥ उन्नीसवें सर्गमें रामकी दिनचर्या और बीसवें सर्गमें एवं अश्वत्थागोथ राजाकतरकी चेष्टा कही गयी है ॥ ४६ ॥ इक्कीसवें सर्गमें दासीके लिये रामका वरदान, बाईसवें सर्गमें सीता द्वारा दूट तुल्ययोपात्रीं युन जोड़नेकी कथा है। तेईसवें सर्गमें आनन्दरामायणका श्रवणफल, चौबीसवें सर्गमें यमका शिक्षा एवं धर्मशिक्षाका वर्णन है ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ बस, राज्यकाण्ड यही ही समाप्त हो जाता है। अब मनोहरकाण्ड प्रारम्भ होता है। इसके पहिल सर्गमें लघूपाख्यान, दूसरे सर्गमें नगरवासियों तथा माताओंके लिए उपदेशदान, तीसरे सर्गमें रामपूजा और उपासनका सविस्तार वर्णन है ॥ ४९ ॥ ॥ ५० ॥ चौथे सर्गमें रामतोभद्रका विस्तार, पांचवें सर्गमें रामलिंगतोभद्रका विस्तार, छठे सर्गमें नवमीव्रतका विस्तार, सातवें सर्गमें लक्ष रामनामजपका उद्यापन है। ५१ ॥ ५२ । आठवें सर्गमें वेदिक सुननेका फल और नवमसर्गमें ढाई महीने तक रामके पूजनका विधान है ॥ ५३ ॥ दसवें सर्गमें चैत्रमासम पूजन करनेकी महिमा, ग्यारहवें सर्गमें चैत्रस्नानसे सबको सद्गति पानेका उपाय और बारहवें सर्गमें रामन भद्ररूप स्थिरताको अद्वैत पदकी रूप समझायी है। तेरहवें सर्गमें गग द्वारा हनुमानजीका कवच और चौदहवं सर्गमें सीता के कनक मन्दिरका वर्णन है। पन्द्रहवें सर्गमें रामके अनेक प्रकारके कवच आदिका वर्णन है ॥ ५४-५६ ॥ सोलहव सर्गमें हनुमानजीका पताकारोपणव्रत है। सत्रहव सर्गमें सप्तररामायण कहा गया है। अठारहव सर्गमें हनुमानजीके द्वारा अर्जुनके बनाये शरसेतुका खंडन वर्णित है। बस, मनोहरकाण्ड यहाँ ही समाप्त हो जाता है। अब पूणकाण्डके विषय गिनाते हैं ॥ ५७॥ ५८ ॥ पूर्णकाण्डके प्रथम सर्गमें मोक्षवंशी राजाओंकी वंशावलो, दूसरे सर्गमें रामचन्द्रजीकी हस्तिनापुरके लिए यात्रा ॥ ५९ ॥ तीसरे सर्गमें सूर्य और सोमवंशी राजाओंका युद्ध और चौथ हमान साम-

७८८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

ग्रंथश्रुतिफलादीनि नवमे कीर्तितानि हि । नवमं पूर्णकाण्डं सम्पूर्णं नवमं त्विदम् ॥६३॥
अनुक्रमणिका चेयं मया शिष्य प्रवर्णिता । अस्याः श्रवणमात्रेण रामायणश्रुतेः फलम् ॥६४॥
रामायणपुस्तकस्य नित्यं कार्यं प्रपूजनम् । विशेषं पूजनस्यापि शृणु शिष्य वदामि ते ॥६५॥
सारकांडे विभोः स्थाने लक्ष्मणार्ये द्वितीयकम् । नवायतनगेह्यर्थं शेषाणि स्थापयेत् क्रमात् ॥६६॥
सप्त कांडानि विधिवत्तेषां पूजनमाचरेत् । अथवा राज्यकांडस्य पूर्वार्धं रामहस्त्यले ॥६७॥
राज्यकांडस्योत्तरार्धं सीतास्थाने निवेशयेत् । लक्ष्मणार्ये सारकांडं शेषाण्यग्रे क्रमण तु ॥६८॥
एवं संस्थाप्य कांडानि तेषां पूजनमाचरेत् । नवायतनपूजायाः फलमेतेन कीर्तितम् ॥६९॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पूर्णकाण्डे अनुक्रमणिकावर्णनं नाम अष्टमः सर्गः ॥८॥


नवमः सर्गः

( ग्रन्थकी फलश्रुति )
श्रीरामचन्द्र उवाच

सारं यात्रा च यागाख्यं विलासाख्यं तु जन्मकम् । विवाहाख्यं हि राज्याख्यं श्रीमनोहरपूर्णके ।१।
कांडान्यनुक्रमेणैवानन्दरामायणे नव । त्रयोदश सारकांडे सर्गा वाल्मीकिनेरिताः ।२।
यात्राकांडे नव ज्ञेया यागकांडेऽपि वै नव । नव ज्ञेया विलासाख्ये जन्मकांडेऽपि वै नव ॥३॥
नव ज्ञेया विवाहाख्ये चतुर्विंशाश्च राज्यके । मनोहराख्ये ज्ञातव्या सर्गा अष्टादशात्र वै ॥४॥
पूर्णकांडे नव ज्ञेयाः सर्गाः पापहरा नृणाम् । एवं नवोत्तरशतं १०९ सर्गा ज्ञेयाः शुभावहा ॥५॥


वंशो और सूर्यवंशी राजाओंकी मित्रताका वर्णन है । ६० । पाँचवें सर्गमें रामचन्द्रजीके द्वारा कुश आदिके विसर्जनकी कथा है । छठें सर्गमें गङ्गाके तटपर रामकी परमधामयात्राका वर्णन है ॥ ६१ ॥ सातवें सर्गमें सूर्यवंशी राजाओंका वर्णन है और आठवें सर्गमें आनन्दरामायणकी अनुक्रमणिका बतलायी गयी है ॥ ६२ ॥ नवें सर्गमें आनन्दरामायणके श्रवणका फल आदि वर्णित है। बस, पूर्णकांड यहीं समाप्त हो जाता है। हे शिष्य, इस प्रकार मैंने तुमको समस्त आनन्दरामायणकी अनुक्रमणिका बता दी। इस अनुक्रमणिकामात्रके सुननेसे समस्त रामायण सुननेका फल प्राप्त हो जाता है ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ भक्तोको चाहिए कि नित्य इस रामायणका पूजन करें। अब इसके पूजन जो विशेषताएँ हैं उन्हें बतलाता हूँ, सुनो ॥ ६५ ॥ सारकांडको भगवान् रामचन्द्रजी, दूसरे कांडको लक्ष्मण तथा तीसरे कांडको सीता समझकर स्थापित करे। इस तरह सात कांडोंमें क्रमशः नवायतनकी स्थापना करके पूजन करें अथवा राज्यकांडके पूर्वार्धभागको रामके स्थानमें तथा उत्तरार्धको सीताके स्थानमें स्थापित करके पूजन करना चाहिए और सारकांडको लक्ष्मणकी जगहपर स्थापित करके पूजन करें। इसी तरह शेष कांडोंको क्रमशः भरत आदिके स्थानमे स्थापित करके पूजन करना चाहिए । इस तरह इस रामायणकी पूजा करनेसे रामनवायतन-पूजनका फल प्राप्त होता है ॥ ६६-६९ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत-'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते पूर्णकाण्डोऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

श्रीरामदासने कहा-हे शिष्य ! सार, यात्रा, याग, विलास, जन्म, विवाह, राज्य, मनोहर तथा पूर्णकाण्ड ये ही इस रामायणके नौ काण्ड हैं। सारकाण्डमें वाल्मीकिजीने तेरह सर्ग, यात्राकांडमें नौ सर्ग, जन्मकांडमें नौ सर्ग, विवाहकांडमें नौ सर्ग, राज्यकांडमें चौबीस सर्ग, मनोहरकांडमें अठारह सर्ग और पूर्णकांडमें पापोंको हरण करनेवाले कुल नौ सर्ग हैं। इस तरह इस आनन्दरामायणमें कुल मिलाकर एक सौ नौ ( १०९ ) सर्ग हैं ॥ १-५ ॥