श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 795, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें७७८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
षष्ठः सर्गः
( रामका वैकुण्ठारोहण ) श्रीरामदास उवाच
अथ रामः समुत्थाय प्रभाते सीतया सह । अजमीढं समाहूय मंजुलं वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥ अद्याहं सीतया स्वीयं पदं गच्छामि बन्धुभिः । वानरैः सकलैः पौरैस्त्वया ज्ञेयं तु यज्जलम् ॥ २ ॥ यद्गृहादिकं सर्वं प्रेषणीयं कुशं प्रति । यन्मत्र कीटक्रांतं तन्मया यास्यति वै दिवम् ॥ ३ ॥ अनन्तरं त्वं कुशं गत्वा सर्वं वृत्तं निवेदय । करोत्वौर्ध्वकार्याणि कुशोऽस्माकं सविस्तरम् ॥ ४ ॥ मा करोतु कुशोऽस्माकं खेदं तं त्वं निवारय । इति रामवचः श्रुत्वा साश्रुनेत्रस्तथेति सः ॥ ५ ॥ अजमीढस्तदा प्राह ननाम रघुनायकम् । अथ रामः मुने, पौरैः स्नात्वा भागीरथीजले ॥ ६ ॥ कृत्वा नित्यविधिं पूर्वं हुत्वा वह्निं सविस्तरम् । ददौ दानान्यनेकानि ब्राह्मणेभ्यस्ततस्ततः ॥ ७ ॥ ततः प्रास्थानिकं कर्म चकार स यथाविधि । वह्निं विसर्जयामास वैकुण्ठं प्रति राघवः । ८ ॥ तदा रामस्य पद्मा सा गता दक्षिणहस्ततः । मूर्तिरूपाश्च वेदा वैकुण्ठमायुर्मुदा ॥ ९ ॥ त्रिपदा प्रणवेनैव भोगास्त्वाद्विनिर्गता । नत्वा रामं ययौ शान्तिः क्षमा मेधा धृतिर्दया ॥ १० ॥ तेजो बलं यशः शौर्यं ययौ सर्वं तदा पुरः ततः पौरैः वानराश्च सर्वे भागीरथीजले ॥ ११ ॥ स्नात्वा निरुध्य वायूश्च निजदेहानि तत्यजुः । अथ रामो मुदा गङ्गां स्पृष्ट्वा दर्भासनोपरि ॥ १२ ॥ दर्भपाणिः स्थितस्तूष्णीमुत्तराभिमुखः स्त्रिया । तावत्सर्वे ददृशुस्ते देवा विष्णुं पुरःस्थितम् ॥ १३ ॥ चतुर्भुजं नीलकान्तिं पीतकौशेयधारिणम् कौस्तुभाङ्कितहृदयं श्रीवत्साङ्कोपशोभितम् ॥ १४ ॥ सीता बभूव सा लक्ष्मीर्विष्णोर्वामाङ्कमस्थिता शेषो बभूव सौमित्रिः फणाभिरभिभासुरः ॥ १५ ॥
श्रीरामदासने कहा — सवेरे रामचन्द्रजी सीताके साथ सबेरे उठे तो अजमीढको बुलाकर मीठी बातोंमें समझाकर कहने लगे कि आज मैं सीता बन्धुओं समस्त वानरो और प्रजाजनोंके साथ अपने परमधामकी यात्रा करूंगा ॥ १ ॥ २ ॥ मेरे जितने भी मलूकन्धान आदि वस्त्रगृह हैं, उन्हें कुशके पास अयोध्या भेज देना । बड़े जीवसे लेकर कीट पर्यन्त सब प्राणी मेरे साथ वैकुण्ठ जायँगे। मेरे चले जानेपर तुम कुशके पास चले जाना और मेरा सब समाचार कह सुनाना और यह भी कह देना कि कुश हमारी और्ध्वदैहिक क्रियाओंको खूब अच्छी तरह सम्पन्न करे । यदि मेरे परमधाम जानेके कारण कुश किस प्रकारका खेद करने लगे तो तुम उसे अच्छी तरह समझा देना । रामकी बात सुनकर अजमीढ़ने आँखोंमें आँसू भरकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और भगवान्को प्रणाम किया । इसके अनन्तर रामन सबके साथ गङ्गाजीमें स्नान किया, नित्यकृत्य किये, हवन किया और गङ्गातटपर स्थित ब्राह्मणोंको तरह तरहके दान दिये । ३-७ ॥ इसके बाद यात्रासे सम्बन्ध रखनेवाले जितने कर्म थे, वह सब किये । चलते समय हवनकी अग्निको वैकुण्ठधाम भेज दिया ॥ ८ ॥ उस समय रामरूपधारी विष्णुकी लक्ष्मी सात्विकी सीता रामके दक्षिण भागने वैकुण्ठधामको चली गयीं। उस समय सब वेद अपने मूर्तरूपसे वैकुण्ठधामको जा पहुँचे ॥ ९ ॥ रामके प्रणयाम करत ही शान्ति, क्षमा, मति और दया आदि गुण चले गये ॥ १० ॥ तथा तरह तेज, बल, यश और शौर्य आदि भी कुछ कर गये । इसके अनन्तर सब पुरवासियों तथा वानरोंने भी गङ्गाजीमें स्नान और प्राणायाम करके अपन शरीरोंका परित्याग कर दिया । इसके बाद सीताके साथ रामने गङ्गाजलका स्पर्श किया और कुशासनपर बैठे ॥ ११ ॥ १२ ॥ हाथमें कुशा लेकर वे उत्तरकी ओर मुख करके बैठे । उसी समय राम देवताओंके सम्मुख विष्णुभगवान्के रूपमें परिणत हो गये ॥ १३ । उन भगवान्के चार भुजायें थीं । नीलकमलके समान श्याम शरीर था। वे अपने शरीरपर पीले वस्त्र धारण किये हुए थे । कौस्तुभमणिसे उनका हृदय सुशोभित हो रहा था और श्रीवत्स उसकी निसार शोभा ही दिखा रहा था ॥ १४ ॥ गङ्गाजीके तटपर रामके वामांगमें बैठी हुई सीता लक्ष्मीके