भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 794

सर्गः ५ ] पूर्णकाण्डम् ७७७


तेऽपि नत्वा कुशं स्वं स्वं स्थलं जग्मुर्नृपोत्तमाः । करभारं ददुस्तस्मै तदाज्ञावशवर्तिनः ॥३९॥
मन्थराप्रभृतौ द्वौ तौ दैवान्पुर्या बहिर्गतौ प्रापुर्जन्यं साकेते नृणां न पुनर्भवाः ॥ ४०॥
अथ रामोऽब्रवीत्सर्वान्वार्नरान् जाह्नवीतटे । मदर्थे श्रमिनः सर्वे यूयं वानरसत्तमाः ॥४१॥
द्वापराग्रे पुनः सर्वे ब्रजे गोपा भविष्यथ ।
युष्माभिः सहिताः प्रीत्या करिष्याम्यशनादिकम् ॥ ४२ ॥
तदाऽब्रवीच्च सौमित्रिं रामः प्रीत्या पुरःस्थितम् महान् श्रमः कृतः पूर्वं सेवायां मम दण्डके ॥४३ ।
भव त्वं द्वापरे ज्येष्ठः शुश्रूषां ते करोम्यहम् । ततस्तानाह राघवः प्राह स्वान्पौराञ्छकपौनपि । ४४॥
सवनिश्च मया सार्धं प्रयातेति दशन्चितः ततो ददौ कल्पवृक्षपारिजातौ सुगन्धिषट् । ४५॥
ततस्तं पुष्पकं प्राह कुबेरं वह सादरम् ।
गच्छायैव तथेत्युक्त्वा रामं नत्वा तु पुष्पकम् ॥ ४६ ॥
सीतां पृष्ट्वा ययौ शीघ्रं राघवेनाभिमन्त्रितम् ततः प्राह रघूश्रेष्ठोमिलां मांडवीं तथा ॥४७॥
श्रुतकीर्ति समाहूय वाल्मीकेश्च मुनेः पुरः युष्माभिर्भर्तृदेहैश्च निजदेहादि वेगतः । ४८।
षोडश्यां दग्ध्वा स्वर्गलोकं गन्तव्यं मम व स्वतः । तथेति राघव प्रोचुस्तदा ताश्चोर्मिलादिकाः ।४९ ।
रामं नत्वा ययुः सर्वाः स्वं स्व तद्व्रतमुद्धय । अथ रामोऽपि तां रात्रि सीताया रुक्ममञ्चके ।५०॥
ऋषिभिः शिवब्रह्म द्यसन्द्रमृयैश्च संगतः । सौमित्राद्याः पत्नीभिः शिशियरे परया मुदा । ५१ ।

इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पूर्णकाण्डे
सर्वेषां विसर्जनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


पूजन अभिनन्दन करके विदा किया ॥ ३८ ॥ वे राजे भी कुशको प्रणाम करके अपने अपनी नगरीको चले गये और वहाँपर कुशल क्षेमम रहते हुए पूर्ववत् करभार दत्त रहे ॥ ३९। दैववश वह रामनिन्दक धोबी तथा दासी मन्थरा ये दोनों प्रवाहापरान्तेन मरकर अयोध्याके बाहर मरे । इसी लिए उन्हें फिर जन्म लेना पड़ा । वैसे तो अयोध्यामे जो लोग मरते है, उन फिर माताक गर्भम नहीं आना पडता ॥ ४० ॥ उधर सब लोगोंको विदा करके रामने सब वानरोंसे कहा- हे वानरश्रेष्ठगण ! तुम सबने मेरे लिए बड़ा कष्ट उठाया और मेरे साथ मारे-मारे फिरत रहे । आगे चलकर द्वापरमे तुम सब गोप होओगे । उस समय मै तुम्हारे साथ भोजन तथा विविध प्रकारका ल्लायें करूंगा ॥ ४१ । ४२ ॥ इसके बाद रामने लक्ष्मणसे कहा कि उस समय तुमने दण्डकवनमे मेरी सेवा करन समय बड़ा कष्ट उठाया था। अब द्वापर युगमे तुम मेरे ज्येष्ठ भ्राता बलराम होओगे और मै स्वंई तुम्हारी सेवा करूँगा । इसके अनन्तर समस्त वानरों तथा पुरवासियोंसे कहा कि तुम लोग मेरे साथ चलो । तत्पश्चात् रामने कल्पवृक्ष और परिजात ये दोनों वृक्ष इन्द्रको दे दिये फिर पुष्पक विमानसे कहा कि तुम आज ही जाकर आदरपूर्वक कुबरकी सवारीका काम करो । यह सुनकर पुष्पक राम तथा सीताको प्रणाम करके चल पड़ा। प्रस्थान समय भगवान्ने उसका भी अच्छी तरह आदर-सत्कार किया। वाल्मीकिके समक्ष रामने माण्डवी (भरतपत्नी ), उर्मिला (लक्ष्मणकी स्त्री ) तथा श्रुतकीर्ति (शत्रुघ्नकी पत्नी ) से कहा— तुम सब अपने अपने पतिके शरीरके साथ कल अपना शरीर चिताकी अग्निमे जलाकर स्वर्गलोक चले जाना । उर्मिला आदिने भगवान्की आज्ञा स्वीकार कर ली ॥ ४३-४९ ॥ वे रामको प्रणाम करके अपने-अपने तम्बूओमे चली गयीं । इसके अनन्तर राम उस रात्रिमे सीताके साथ एक सुवर्णमय मञ्चपर सो गये । शिव-ब्रह्मा आदि देवता भी ऋषियोंके साथ वहाँ ही ठहर रहे और लक्ष्मण आदि भी अपने अपने स्त्रियोंके साथ सानन्द सोए ॥ ५० । ५१ । इति पूर्णकाण्डराघवविलाससंवादे श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पण्डितरामतेजपाण्डेयकृत 'प्रमोदना'भाषाटीकासहित पूर्णकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥