श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 793, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें७७६ आनन्दरामायणे [सर्गः ५
रत्नशाणानि पात्राणि क्रीडनञ्च द्विजन्मसु । नानाविधानि वस्त्राणि रामश्चिन्तामणिं ददौ ॥२४॥
मर्त्यपुत्रं कुशं तोष्य राघवो वाक्यमब्रवीत् । वत्स गच्छ मुवं विप्र भूमिं धर्मेण पालय ॥२५॥
तवदानेनृपास्सर्वेस्थास्यन्तीह वशास्तव । भवन्त्वनादराल्पस्य युवत्वञ्चशवालक ॥२६॥
इत्युक्त्वा तन्नृपानाह युष्माभिः कस्य बालकः । मवाने माननीयोऽयं रक्षणीयश्चसर्वशाम् ॥२७॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा नृपास्तं प्रत्यूचुस्ततः । अस्मासु तिष्ठत्स्वल्पोऽस्माकं शताधिकः ॥२८॥
अन्येष्वेव नात्र संशयः मन्य... रक्ष्या वयं त्वया पूर्वं रामोऽयं तद्वद्रक्षकोऽप्ययम् ॥२९॥
रक्षिष्यति मदाऽस्माकं दृष्ट्वाऽबालपराक्रमः । इत्युक्त्वा रामचन्द्रं तं नत्वा सर्वे ते दाक्षिणोत्तराः ॥३०॥
रामेण पूजिताः सम्यक् प्रभावच्छात्रवाहनैः । ययुः कुशं पुरस्कृत्य स्वस्वदेशान्समन्विताः ॥३१॥
कुशोऽपि गच्छन् नत्वा मूर्ध्नि सीताकण्ठार्पितः । वशिष्ठेन रथे स्थित्वा पुरीं गन्तुं प्रचक्रमे ॥३२॥
तदा रामश्च तद्रजकम्पदं वस्त्रापहम् । कुब्जां बडं धोतं बहुकृत्य सादरम् ॥३३॥
पूर्ववैरमनुस्मृत्य नाने... तद्धर्मिणौ ।... रजकोऽभवत् ॥३४॥
मन्थरा पूतना जाता... ... जनकम् ॥३५॥
परिवर्त्य मुखं पृष्ठे ... रुदन् रामं च जानकीम् ॥३६॥
हस्तसङ्केततः सर्वान् ... ... नगरी शुभा श्रीरामाङ्के... ॥३७॥
गत्वा पुरीं महा... ... ॥३८॥
भेज दिया । जिस प्रकार... ॥ २१-२४ ॥ इसके बाद रामने कुशको बुलाया और उस... नाना प्रकारके रत्नों और सेना आदिके साथ अयोध्या भेज दिया ॥ २५ ॥ अपने सब... प्रकारके सकलानि, वस्त्र और चिन्तामणि... रामने कुशसे कहा—हे वत्स ! अब तुम अयोध्या जाओ और... की रक्षा करो । हे पूज्य कुश ! इस जम्बूद्वीप तथा अन्यान्य द्वीपोंके रहनेवाले... करना ॥ २५-२६ ॥ ऐसा कहनेके बाद रामने उन सब राजाओंसे कहा कि... ही मानना और सदा इसकी रक्षा करते रहना ॥ २७ ॥ रामकी बात सुनकर उन राजाओंने कहा कि यह बालक कुश आपके ही तेजसे परिपूर्ण है। इस कारण मेरे लिए यह... है। हे नृपशिरोमणि, हम तो कुछ कह रहे हैं, उसे आप सत्य मानना। जिस प्रकार आप हमारी रक्षा करते आये हैं, उसी तरह यह भी हमारी रक्षा करेगा । यह बालक अवश्य है किन्तु इसका पराक्रम बालकों जैसा नहीं है। ऐसा कहकर उन राजाओंने रामको प्रणाम किया और उन्होंने सब प्रकारके छत्र आभूषण वस्त्र सवारियां आदि देकर उन्हें हंसी खुशी विदा किया । वे सब कुशको आगे करके अपनी विकल सेनाके साथ चल पड़े ॥ २८-३१ ॥ कुशने चलते समय रामको प्रणाम किया फिर माता सीताके गलेमें हाथ डाला । उसके बाद वे गुरु वसिष्ठके साथ रथपर सवार होकर अयोध्यापुरीको चलनेको तैयार हुए ॥ ३२ ॥ उसी समय रामने उस निन्दक रजक, धोबी, तथा दासी मन्थराको सादर बुलाया और कुशके साथ अयोध्यापुरी भेज दिया ॥ ३३ ॥ पिछले वैरका स्मरण करके ही रामचन्द्रजी इन दोनोंको अपने साथ स्वर्गलोक नहीं ले गये । कृष्णावतारमें वह रजक राजा कंसका धोबी होकर उत्पन्न हुआ और दासी मन्थरा पूतना हुई । श्रीकृष्णचन्द्रजीने अपने हाथों इन दोनोंका संहार किया । रथपर बैठकर चलते समय बार-बार मुँह घुमाकर कुश आँसूभरे नेत्रोंसे राम और जानकीकी ओर निहार रहे थे । इधर राम और सीता भी अपने हाथसे कुशको जानेका संकेत कर रहे थे ॥ ३४-३६ ॥ इस तरह संकेत करते हुए कुश अपनी विशाल सेना लिये हुए अयोध्यापुरीको चल पड़े । जब पुरीमें पहुंचे तो वह सारी नगरी रामके वियोगसे रोती सी दिखायी पड़ी ॥ ३७ ॥ अस्तु, कुश पुरीमें गये और बड़े उत्साहके साथ राजसिंहासनपर बैठे । इसके बाद अपने साथ आये हुए राजाओंका उन्होंने