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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

७७६ आनन्दरामायणे [सर्गः ५

रत्नशाणानि पात्राणि क्रीडनञ्च द्विजन्मसु । नानाविधानि वस्त्राणि रामश्चिन्तामणिं ददौ ॥२४॥
मर्त्यपुत्रं कुशं तोष्य राघवो वाक्यमब्रवीत् । वत्स गच्छ मुवं विप्र भूमिं धर्मेण पालय ॥२५॥
तवदानेनृपास्सर्वेस्थास्यन्तीह वशास्तव । भवन्त्वनादराल्पस्य युवत्वञ्चशवालक ॥२६॥
इत्युक्त्वा तन्नृपानाह युष्माभिः कस्य बालकः । मवाने माननीयोऽयं रक्षणीयश्चसर्वशाम् ॥२७॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा नृपास्तं प्रत्यूचुस्ततः । अस्मासु तिष्ठत्स्वल्पोऽस्माकं शताधिकः ॥२८॥
अन्येष्वेव नात्र संशयः मन्य... रक्ष्या वयं त्वया पूर्वं रामोऽयं तद्वद्रक्षकोऽप्ययम् ॥२९॥
रक्षिष्यति मदाऽस्माकं दृष्ट्वाऽबालपराक्रमः । इत्युक्त्वा रामचन्द्रं तं नत्वा सर्वे ते दाक्षिणोत्तराः ॥३०॥
रामेण पूजिताः सम्यक् प्रभावच्छात्रवाहनैः । ययुः कुशं पुरस्कृत्य स्वस्वदेशान्समन्विताः ॥३१॥
कुशोऽपि गच्छन् नत्वा मूर्ध्नि सीताकण्ठार्पितः । वशिष्ठेन रथे स्थित्वा पुरीं गन्तुं प्रचक्रमे ॥३२॥
तदा रामश्च तद्रजकम्पदं वस्त्रापहम् । कुब्जां बडं धोतं बहुकृत्य सादरम् ॥३३॥
पूर्ववैरमनुस्मृत्य नाने... तद्धर्मिणौ ।... रजकोऽभवत् ॥३४॥
मन्थरा पूतना जाता... ... जनकम् ॥३५॥
परिवर्त्य मुखं पृष्ठे ... रुदन् रामं च जानकीम् ॥३६॥
हस्तसङ्केततः सर्वान् ... ... नगरी शुभा श्रीरामाङ्के... ॥३७॥
गत्वा पुरीं महा... ... ॥३८॥

भेज दिया । जिस प्रकार... ॥ २१-२४ ॥ इसके बाद रामने कुशको बुलाया और उस... नाना प्रकारके रत्नों और सेना आदिके साथ अयोध्या भेज दिया ॥ २५ ॥ अपने सब... प्रकारके सकलानि, वस्त्र और चिन्तामणि... रामने कुशसे कहा—हे वत्स ! अब तुम अयोध्या जाओ और... की रक्षा करो । हे पूज्य कुश ! इस जम्बूद्वीप तथा अन्यान्य द्वीपोंके रहनेवाले... करना ॥ २५-२६ ॥ ऐसा कहनेके बाद रामने उन सब राजाओंसे कहा कि... ही मानना और सदा इसकी रक्षा करते रहना ॥ २७ ॥ रामकी बात सुनकर उन राजाओंने कहा कि यह बालक कुश आपके ही तेजसे परिपूर्ण है। इस कारण मेरे लिए यह... है। हे नृपशिरोमणि, हम तो कुछ कह रहे हैं, उसे आप सत्य मानना। जिस प्रकार आप हमारी रक्षा करते आये हैं, उसी तरह यह भी हमारी रक्षा करेगा । यह बालक अवश्य है किन्तु इसका पराक्रम बालकों जैसा नहीं है। ऐसा कहकर उन राजाओंने रामको प्रणाम किया और उन्होंने सब प्रकारके छत्र आभूषण वस्त्र सवारियां आदि देकर उन्हें हंसी खुशी विदा किया । वे सब कुशको आगे करके अपनी विकल सेनाके साथ चल पड़े ॥ २८-३१ ॥ कुशने चलते समय रामको प्रणाम किया फिर माता सीताके गलेमें हाथ डाला । उसके बाद वे गुरु वसिष्ठके साथ रथपर सवार होकर अयोध्यापुरीको चलनेको तैयार हुए ॥ ३२ ॥ उसी समय रामने उस निन्दक रजक, धोबी, तथा दासी मन्थराको सादर बुलाया और कुशके साथ अयोध्यापुरी भेज दिया ॥ ३३ ॥ पिछले वैरका स्मरण करके ही रामचन्द्रजी इन दोनोंको अपने साथ स्वर्गलोक नहीं ले गये । कृष्णावतारमें वह रजक राजा कंसका धोबी होकर उत्पन्न हुआ और दासी मन्थरा पूतना हुई । श्रीकृष्णचन्द्रजीने अपने हाथों इन दोनोंका संहार किया । रथपर बैठकर चलते समय बार-बार मुँह घुमाकर कुश आँसूभरे नेत्रोंसे राम और जानकीकी ओर निहार रहे थे । इधर राम और सीता भी अपने हाथसे कुशको जानेका संकेत कर रहे थे ॥ ३४-३६ ॥ इस तरह संकेत करते हुए कुश अपनी विशाल सेना लिये हुए अयोध्यापुरीको चल पड़े । जब पुरीमें पहुंचे तो वह सारी नगरी रामके वियोगसे रोती सी दिखायी पड़ी ॥ ३७ ॥ अस्तु, कुश पुरीमें गये और बड़े उत्साहके साथ राजसिंहासनपर बैठे । इसके बाद अपने साथ आये हुए राजाओंका उन्होंने

सर्गः ५ ] पूर्णकाण्डम् ७७७


तेऽपि नत्वा कुशं स्वं स्वं स्थलं जग्मुर्नृपोत्तमाः । करभारं ददुस्तस्मै तदाज्ञावशवर्तिनः ॥३९॥
मन्थराप्रभृतौ द्वौ तौ दैवान्पुर्या बहिर्गतौ प्रापुर्जन्यं साकेते नृणां न पुनर्भवाः ॥ ४०॥
अथ रामोऽब्रवीत्सर्वान्वार्नरान् जाह्नवीतटे । मदर्थे श्रमिनः सर्वे यूयं वानरसत्तमाः ॥४१॥
द्वापराग्रे पुनः सर्वे ब्रजे गोपा भविष्यथ ।
युष्माभिः सहिताः प्रीत्या करिष्याम्यशनादिकम् ॥ ४२ ॥
तदाऽब्रवीच्च सौमित्रिं रामः प्रीत्या पुरःस्थितम् महान् श्रमः कृतः पूर्वं सेवायां मम दण्डके ॥४३ ।
भव त्वं द्वापरे ज्येष्ठः शुश्रूषां ते करोम्यहम् । ततस्तानाह राघवः प्राह स्वान्पौराञ्छकपौनपि । ४४॥
सवनिश्च मया सार्धं प्रयातेति दशन्चितः ततो ददौ कल्पवृक्षपारिजातौ सुगन्धिषट् । ४५॥
ततस्तं पुष्पकं प्राह कुबेरं वह सादरम् ।
गच्छायैव तथेत्युक्त्वा रामं नत्वा तु पुष्पकम् ॥ ४६ ॥
सीतां पृष्ट्वा ययौ शीघ्रं राघवेनाभिमन्त्रितम् ततः प्राह रघूश्रेष्ठोमिलां मांडवीं तथा ॥४७॥
श्रुतकीर्ति समाहूय वाल्मीकेश्च मुनेः पुरः युष्माभिर्भर्तृदेहैश्च निजदेहादि वेगतः । ४८।
षोडश्यां दग्ध्वा स्वर्गलोकं गन्तव्यं मम व स्वतः । तथेति राघव प्रोचुस्तदा ताश्चोर्मिलादिकाः ।४९ ।
रामं नत्वा ययुः सर्वाः स्वं स्व तद्व्रतमुद्धय । अथ रामोऽपि तां रात्रि सीताया रुक्ममञ्चके ।५०॥
ऋषिभिः शिवब्रह्म द्यसन्द्रमृयैश्च संगतः । सौमित्राद्याः पत्नीभिः शिशियरे परया मुदा । ५१ ।

इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पूर्णकाण्डे
सर्वेषां विसर्जनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


पूजन अभिनन्दन करके विदा किया ॥ ३८ ॥ वे राजे भी कुशको प्रणाम करके अपने अपनी नगरीको चले गये और वहाँपर कुशल क्षेमम रहते हुए पूर्ववत् करभार दत्त रहे ॥ ३९। दैववश वह रामनिन्दक धोबी तथा दासी मन्थरा ये दोनों प्रवाहापरान्तेन मरकर अयोध्याके बाहर मरे । इसी लिए उन्हें फिर जन्म लेना पड़ा । वैसे तो अयोध्यामे जो लोग मरते है, उन फिर माताक गर्भम नहीं आना पडता ॥ ४० ॥ उधर सब लोगोंको विदा करके रामने सब वानरोंसे कहा- हे वानरश्रेष्ठगण ! तुम सबने मेरे लिए बड़ा कष्ट उठाया और मेरे साथ मारे-मारे फिरत रहे । आगे चलकर द्वापरमे तुम सब गोप होओगे । उस समय मै तुम्हारे साथ भोजन तथा विविध प्रकारका ल्लायें करूंगा ॥ ४१ । ४२ ॥ इसके बाद रामने लक्ष्मणसे कहा कि उस समय तुमने दण्डकवनमे मेरी सेवा करन समय बड़ा कष्ट उठाया था। अब द्वापर युगमे तुम मेरे ज्येष्ठ भ्राता बलराम होओगे और मै स्वंई तुम्हारी सेवा करूँगा । इसके अनन्तर समस्त वानरों तथा पुरवासियोंसे कहा कि तुम लोग मेरे साथ चलो । तत्पश्चात् रामने कल्पवृक्ष और परिजात ये दोनों वृक्ष इन्द्रको दे दिये फिर पुष्पक विमानसे कहा कि तुम आज ही जाकर आदरपूर्वक कुबरकी सवारीका काम करो । यह सुनकर पुष्पक राम तथा सीताको प्रणाम करके चल पड़ा। प्रस्थान समय भगवान्ने उसका भी अच्छी तरह आदर-सत्कार किया। वाल्मीकिके समक्ष रामने माण्डवी (भरतपत्नी ), उर्मिला (लक्ष्मणकी स्त्री ) तथा श्रुतकीर्ति (शत्रुघ्नकी पत्नी ) से कहा— तुम सब अपने अपने पतिके शरीरके साथ कल अपना शरीर चिताकी अग्निमे जलाकर स्वर्गलोक चले जाना । उर्मिला आदिने भगवान्की आज्ञा स्वीकार कर ली ॥ ४३-४९ ॥ वे रामको प्रणाम करके अपने-अपने तम्बूओमे चली गयीं । इसके अनन्तर राम उस रात्रिमे सीताके साथ एक सुवर्णमय मञ्चपर सो गये । शिव-ब्रह्मा आदि देवता भी ऋषियोंके साथ वहाँ ही ठहर रहे और लक्ष्मण आदि भी अपने अपने स्त्रियोंके साथ सानन्द सोए ॥ ५० । ५१ । इति पूर्णकाण्डराघवविलाससंवादे श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पण्डितरामतेजपाण्डेयकृत 'प्रमोदना'भाषाटीकासहित पूर्णकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

७७८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

षष्ठः सर्गः

( रामका वैकुण्ठारोहण ) श्रीरामदास उवाच

अथ रामः समुत्थाय प्रभाते सीतया सह । अजमीढं समाहूय मंजुलं वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥ अद्याहं सीतया स्वीयं पदं गच्छामि बन्धुभिः । वानरैः सकलैः पौरैस्त्वया ज्ञेयं तु यज्जलम् ॥ २ ॥ यद्गृहादिकं सर्वं प्रेषणीयं कुशं प्रति । यन्मत्र कीटक्रांतं तन्मया यास्यति वै दिवम् ॥ ३ ॥ अनन्तरं त्वं कुशं गत्वा सर्वं वृत्तं निवेदय । करोत्वौर्ध्वकार्याणि कुशोऽस्माकं सविस्तरम् ॥ ४ ॥ मा करोतु कुशोऽस्माकं खेदं तं त्वं निवारय । इति रामवचः श्रुत्वा साश्रुनेत्रस्तथेति सः ॥ ५ ॥ अजमीढस्तदा प्राह ननाम रघुनायकम् । अथ रामः मुने, पौरैः स्नात्वा भागीरथीजले ॥ ६ ॥ कृत्वा नित्यविधिं पूर्वं हुत्वा वह्निं सविस्तरम् । ददौ दानान्यनेकानि ब्राह्मणेभ्यस्ततस्ततः ॥ ७ ॥ ततः प्रास्थानिकं कर्म चकार स यथाविधि । वह्निं विसर्जयामास वैकुण्ठं प्रति राघवः । ८ ॥ तदा रामस्य पद्मा सा गता दक्षिणहस्ततः । मूर्तिरूपाश्च वेदा वैकुण्ठमायुर्मुदा ॥ ९ ॥ त्रिपदा प्रणवेनैव भोगास्त्वाद्विनिर्गता । नत्वा रामं ययौ शान्तिः क्षमा मेधा धृतिर्दया ॥ १० ॥ तेजो बलं यशः शौर्यं ययौ सर्वं तदा पुरः ततः पौरैः वानराश्च सर्वे भागीरथीजले ॥ ११ ॥ स्नात्वा निरुध्य वायूश्च निजदेहानि तत्यजुः । अथ रामो मुदा गङ्गां स्पृष्ट्वा दर्भासनोपरि ॥ १२ ॥ दर्भपाणिः स्थितस्तूष्णीमुत्तराभिमुखः स्त्रिया । तावत्सर्वे ददृशुस्ते देवा विष्णुं पुरःस्थितम् ॥ १३ ॥ चतुर्भुजं नीलकान्तिं पीतकौशेयधारिणम् कौस्तुभाङ्कितहृदयं श्रीवत्साङ्कोपशोभितम् ॥ १४ ॥ सीता बभूव सा लक्ष्मीर्विष्णोर्वामाङ्कमस्थिता शेषो बभूव सौमित्रिः फणाभिरभिभासुरः ॥ १५ ॥

श्रीरामदासने कहा — सवेरे रामचन्द्रजी सीताके साथ सबेरे उठे तो अजमीढको बुलाकर मीठी बातोंमें समझाकर कहने लगे कि आज मैं सीता बन्धुओं समस्त वानरो और प्रजाजनोंके साथ अपने परमधामकी यात्रा करूंगा ॥ १ ॥ २ ॥ मेरे जितने भी मलूकन्धान आदि वस्त्रगृह हैं, उन्हें कुशके पास अयोध्या भेज देना । बड़े जीवसे लेकर कीट पर्यन्त सब प्राणी मेरे साथ वैकुण्ठ जायँगे। मेरे चले जानेपर तुम कुशके पास चले जाना और मेरा सब समाचार कह सुनाना और यह भी कह देना कि कुश हमारी और्ध्वदैहिक क्रियाओंको खूब अच्छी तरह सम्पन्न करे । यदि मेरे परमधाम जानेके कारण कुश किस प्रकारका खेद करने लगे तो तुम उसे अच्छी तरह समझा देना । रामकी बात सुनकर अजमीढ़ने आँखोंमें आँसू भरकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और भगवान्‌को प्रणाम किया । इसके अनन्तर रामन सबके साथ गङ्गाजीमें स्नान किया, नित्यकृत्य किये, हवन किया और गङ्गातटपर स्थित ब्राह्मणोंको तरह तरहके दान दिये । ३-७ ॥ इसके बाद यात्रासे सम्बन्ध रखनेवाले जितने कर्म थे, वह सब किये । चलते समय हवनकी अग्निको वैकुण्ठधाम भेज दिया ॥ ८ ॥ उस समय रामरूपधारी विष्णुकी लक्ष्मी सात्विकी सीता रामके दक्षिण भागने वैकुण्ठधामको चली गयीं। उस समय सब वेद अपने मूर्तरूपसे वैकुण्ठधामको जा पहुँचे ॥ ९ ॥ रामके प्रणयाम करत ही शान्ति, क्षमा, मति और दया आदि गुण चले गये ॥ १० ॥ तथा तरह तेज, बल, यश और शौर्य आदि भी कुछ कर गये । इसके अनन्तर सब पुरवासियों तथा वानरोंने भी गङ्गाजीमें स्नान और प्राणायाम करके अपन शरीरोंका परित्याग कर दिया । इसके बाद सीताके साथ रामने गङ्गाजलका स्पर्श किया और कुशासनपर बैठे ॥ ११ ॥ १२ ॥ हाथमें कुशा लेकर वे उत्तरकी ओर मुख करके बैठे । उसी समय राम देवताओंके सम्मुख विष्णुभगवान्‌के रूपमें परिणत हो गये ॥ १३ । उन भगवान्‌के चार भुजायें थीं । नीलकमलके समान श्याम शरीर था। वे अपने शरीरपर पीले वस्त्र धारण किये हुए थे । कौस्तुभमणिसे उनका हृदय सुशोभित हो रहा था और श्रीवत्स उसकी निसार शोभा ही दिखा रहा था ॥ १४ ॥ गङ्गाजीके तटपर रामके वामांगमें बैठी हुई सीता लक्ष्मीके

सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७७९

सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७७९

शङ्खो बभूव भरतः शार्ङ्गपा० मध्यवन्तरं । रामे करे बभूवाथ शत्रुघ्नश्च सुदर्शनम् ॥१६॥ दैवेषु विविशुः सर्वे ये चाग्रे ह्यवागताः । चांडालकृमिकीटांस्ता अयोध्यापुरवासिनः ॥१७॥ प्रापुस्ते दिव्यदेहानि विमाने संस्थिता बहुः । तदा निनदुर्वादित्राणि देवानां गगनांगणे ॥१८॥ स्वर्पुर्दैवपत्यश्च पुष्पवृष्टिमिदंगताः । ननृतुश्चाप्सरो नगुर्गन्धर्वकिंनराः ॥१९॥ प्रणनाम तदा तार्क्ष्यः श्रीविष्णुं रश्मिसुप्रभम् । देहानि मुमुचुः सर्वे श्रोभिः सोमादिकाश्च ते ॥२०॥ पतिदेहानि चालिंग्य तदा ता ऊर्मिलादिकाः । इदामन्यौ जहुः सर्वा रम्ये भागीरथीजले ॥२१॥ अथ ता देवकन्याश्च रत्नदीपैः सहस्रशः । विष्णुं नीरजवासाद्यमलक्ष्मीयुक्तं महाभुजम् ॥२२॥ विष्णुनन्तोऽब्रवीद्वाक्यं पद्मजं मधुरं शनैः । प्रयोभ्यावासिनः सर्वे तिर्यङ्स्थावरद्रवः शुभाः ॥२३॥ एते समागता ब्रह्मण्तेषां स्थानं वदाधुना । तद्विष्णोर्वचनं श्रुत्वा तदा ब्रह्माऽब्रवीद्वचः । २४॥ मल्लोकादुपरिष्टाच्च लोकाः सांत्वानिकाऽभिधान् । इमे यांतु जनाः सर्वे मद्दद्दर्शनमलोन्मखाः ॥२५॥ ततः प्राह पुनर्विष्णुर्योऽप्याया! मृताश्च ये । अग्रे तेऽपि समायांतु लोकान्सान्त्वानिकाञ्छुभान् । २६॥ एवेति म गिरिः प्राह महाविष्णुं मुदाम्वितः । ततस्ते दिव्यदेहाश्च सर्वेऽयोध्यावासिनः ॥२७॥ नानाविमानमारूढाश्च दिव्यवस्त्रविभूषिताः । दिव्यलंकारसंयुक्ता दप्सरोभिस्केपिताः ॥२८॥ ताननुगंधगधर्वाद्यैश्यामरैर्जिताः । विरेचुर्गगने चन्द्रवदना रतिमानुगाः ॥२९॥ ततो ब्रह्मादयो देवाः प्रणेमुर्विष्णुमादरात् । तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैर्वेदघोषैर्महर्षयः ॥३०॥ तदा तुष्टाव शत्रुघ्नं विष्णुं त्रैलोक्यपालकम् । वनमालां दधानं तं दिव्यचन्दनचर्चितम् ॥३१॥

रूपमें और लक्ष्मण फणीश सुशोभित रूप भगवान्‌के स्वरूपमें परिणत हो गये ॥ १५ ॥ भरतजी शंखके रूपमें परिवर्तित होकर विष्णुभगवान्‌के दाहिने हाथमें जा विराजे । शत्रुघ्नजी विष्णुके सुदर्शनचक्र बनकर बांये हाथमें जाके जमा लिया ॥ १६ ॥ यहाँपर जितने बंदर थे, वे सब जल भये अपने अपने अंशरूपमें देवलोक शरीरोंमें प्रविष्ट हो गये । चाण्डालसे लेकर कृमि-कीट पर्यन्त सभी अयोध्यानिवासी अपने-अपने शरीरोंको छोड़कर दिव्य देह धारण करके विमानोंपर सुशोभित होने लगे । उस समय गगनांगणमें देवताओंके विविध प्रकारके बाजे बज रहे थे । १७-१८॥ देवांङ्गनाएं प्रेमपूर्वक कुसुमवर्षा कर रही थीं, अप्सरावें नाच रही थीं और गन्धर्वगण तरह-तरहके गायन गा रहे थे । १९ ॥ उसी समय गरुडन आकर भूमण्डलमें देदीप्यमान भगवान्‌को दण्डवत् प्रणाम किया। उधर सब बर्गि राजाओंने भी अपना स्त्रियों समेत अपने-अपने शरीरोंको छोड़ दिया ॥२०॥ इन सागार परम धाम बजे जानक बाद ऊर्मिला, माण्डवी तथा श्रुतकान्तिने अपने-अपने पतिके शरीरका आलिंगन करके चितामें जलकर शरीर छोड़ दिया ॥ २१ ॥ उधर समस्त देवताओंकी स्त्रियोंने हजारों रत्न-मय दीपक जलाकर लक्ष्माके हसन विष्णुभगवान्‌की आरती उतारी ॥ २२ ॥ कुछ देर बाद विष्णुभगवान्‌ने ब्रह्मासे कहा कि मेरे साथ जो अयोध्याके सब पुरवासी तथा तिर्यंचयानि तकके प्राणी यहाँ आये हैं, इनके लिए कोई स्थान बतलाइए । विष्णुभगवान्‌की बात सुनकर ब्रह्माजी बोले कि आपके दर्शनसे ये पवित्र प्राणी मेरे लोकके भी ऊपर एक सान्त्वानिक लोक है-वहीं हो जाकर निवास करें ॥ २३-२५ ॥ इसके बाद विष्णु भगवान्‌ने फिर कहा कि इनके अतिरिक्त भी जो प्राणी अयाध्यामें शरीर त्याग करें वे सब सान्त्वानिक लोक प्राप्त करें ॥२६॥ ब्रह्माजीने भगवान्‌की यह बात भी स्वीकार कर ली। इसके अनन्तर वे सब अयोध्यावासी दिव्य शरीर धारण करके नाना प्रकारके विमानोंपर जा बैठे। उस समय वे लोग अच्छे-अच्छे पहने-कपड़े पहने थे और कितनी ही सुन्दर अप्सरा। उनके शरीरोंसे सुगन्ध डाल रहा थी। उनपर दिव्य चमर चल रहे थे। सुर्यके समान देदीप्यमान तथा चन्द्रमुखी नारियाँ सब प्रकारकी सेवायें कर रही थीं ॥ २७-२९ ॥ तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओंने विष्णुभगवान्‌को प्रणाम किया और बड़े-बड़े ऋषि वेदकी ऋचाओंसे भगवान्‌की स्तुति करने लगे ॥ ३० ॥ उस लागोंके बाद श्रीशत्रुघ्नजी त्रैलोक्यरक्षक विष्णुभगवानकी स्तुति करने लगे। उस

७८० आनंदरामायणे [ सर्गः ६

शंभुरुवाच

१२३ करुणाकरं भयनाशनं दुरितापहं माधव मखसंस्थितं नलसंस्थितं परमेश्वरम् । पालकं जगतामकं भवतारकं रिपुमारकं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३२॥

ध्रुवंच वनमालिनं मनरूपिणं धरणीधरं श्रीहरिं त्रिगुणात्मकं तुलसीधरं वपुस्स्वम् । अर्ककं शरणप्रदं मधुमारकं बहुपालकं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३३॥

गोकुलं मथुरःस्थितं रजकांतकं गजमारकं मन्सुतं बकमारकं वृकवानरं तुंगाह्वयम् । नन्दजं वसुदेवजं बलिपोषणं सुरपालकं त्वां भजे जगदीश्वर नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३४॥

केशवं काकघातिनं कपिमार्क मृगमर्दनं सुंदर द्विजपालकं दिनिजार्द्दनं दनुजार्द्दनम् । श्रावकं खरमर्द्दनं ऋषिपूजितं मुनिचिंतितं त्वां भजे जगदीश्वर नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३५॥

शंखजं जलशायिनं कुशपालकं रथवाहनं सुरनूतं प्रियपुष्पकं प्रियभूसुरं लवपालकम् । श्रीधरं मधुसूदनं भरताग्रजं गरुडध्वजं त्वां भजे जगदीश्वर नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३६॥

गोप्रियं गुरुपुत्रदं वदतां वरं करुणानिधिं सव्वंपं जनतोषदं सुरपूजितं श्रुतिभिः स्तुतम् । शुक्तिदं जनमुक्तिदं जनरंजनं नृपनन्दनं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३७॥

चिद्वनं गिरजाधवन् प्राणशालि- वरदानमुद्य श्रीधरं धृतपद्मकं चक्रहस्तकं गतिदायकम् । शान्तिदं जनतारक, शङ्खधारिणं गजगामिनं त्वां भजे जगदीश्वर नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३८॥

शार्ङ्गिणं कमलाननं कमलादृशं पदपंकजं श्यामलं शरणागतं शशिगोमदं करुणाकरम् ।


समय भगवान् वनमाला धारण किये थे और उनके गान्धर्व दिव्य चन्दनका लेप किया हुआ था ॥ ३१ ॥ प्रशंसाजनकहे रघुनन्दन तुम्हारे भजन कर, भवौघ प्राप्तगमन मुक्त करनेवाले, पापनाशकारक, लक्ष्मीके पति, जगत्के परमेश्वर, सबer पालक, भक्तोंका नाशन्वान, भवसागर नाशक, शमसंहारकारी नररूप- धारी हे जगदीश्वर रघुनन्दन मै आपका प्रणाम करता हूँ ॥ ३२ ॥ ध्रुवरति वनमालाधारी, मधुनामक राक्षसका संहारक, ब्रजके पालक नवीन मेघके समान श्यामवर्ण, पृथ्वीकी रक्षा करनेवाले, सत्त्व, रज और तम इन तीनो गुणोंसे युक्त तुलसीके पति, शंकरस्वरूप आपकी विस्तार करनेवान, नररूपाधारी जगदीश्वर हे रघुनन्दन ! मै आपका भजन करता हूँ। ३३ । द्विद्गवले मथुरामें निवास करनेवाले, रजकमारी गजास्तकारी, सज्जनोंम संस्तुत, बकासुर, वृकासुर और कङ्काको मारनेवाले, नन्दसुवन वसुदेवके पुत्र पातालमे बलिके यज्ञम जानेवाले देवताओंके पालक, नररूपधारी हे जगदीश्वर रघुनन्दन ! मैं आपका भजन करता हूँ ॥ ३४ ॥ केशव, बाणसेके घिरे हुए, बालि वानरका मारनेवाले, मृगरूपधारी मारीचको मारनेवाले, सुन्दर, ब्राह्मणीके रक्षक राक्षसोंका संहार करनेवाले, सर्वदा बाल्मीकिदूत, खरको मारनेवाले, ऋषियोंसे पूजित, मुनियों द्वारा चिन्तित ओर नररूपधारी हे जगदीश्वर रघुनन्दन ! मै आपका भजन करता हूँ ॥ ३५ ॥ संसङ्गरूप बाणपण करनेवाले, तिलक शुक जैसे यशस्वी बालक हैं, रथ जिसकी सवारी है, सम्पूर्ण स्वर्ग जिनको नमस्कार करती है, जिसके सेवक विमान त्रिपथ प्रिय है, जो ब्राह्मणोमे अतिशय प्रेम रखते हैं एवं नामका जिनका बालक है जो लंकाका नाश करते हैं, जिन्होने मधुनामक दैत्यका संहार किया था जो भरतके बडे भ्राता है ओर जिनकी ध्वजामें गरुडका चिह्न बना हुआ है, ऐसे नररूपधारी हे जगदीश रघुनन्दन ! हम आपका भजन करते है ॥ ३६ ॥ जिनको गौ विशेष प्रिय है, जो यमलोकसे गुरुपुत्रको लौटा लाये थे, जो वक्ताओंमे श्रेष्ठ हैं, जो करुणाके समुद्र हैं जो सब तरहसे अपने भक्तोंकी रक्षा करते हैं, जो अपने भक्तोको प्रसन्न रखते हैं, देवतागण जिनका पूजन करते हैं चारों वेद जिसकी स्तुति करते हैं, जो सब प्रकारके भोग प्रदान करते हैं और जो अपने भक्तोंको मुक्ति प्रदान करते हैं, महाराज दशरथके पुत्र हे जगदीश्वर रघुनन्दन मैं आपका भजन करता हूँ ॥ ३७ ॥ चिद्घनरूप में, गिरजाजी मणियोकी माला धरण करनेवाले, प्राण-युक्त, श्रीधर, धैर्य प्रदान करनेवाले, गतिकारक, चक्रहस्तधारी, शान्तिदाता जनतारक, शङ्ख धारी, गजगामी, नररूप धारण करनेवाले हे जगदीश्वर रघुनन्दन ! मै आपका भजन करता हूँ ॥ ३८ ॥ धनुष

[सर्गः ६] पूर्णकाण्डम् ७८१

सत्पतिं नृपवालकं नृपवन्दितं नृपतिप्रियं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ ३९॥ निर्गुणं सगुणात्मकं नृपमण्डनं यतिवन्द्यवन्द्यपदं पुरातनमं परमेष्ठिनं स्मितभाषिणम् । ईश्वरं हनुमन्नुतं कमलाधिपं जगदार्त्तिहन्तृ भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ ४०॥ ईश्वरोक्तमेतद्गुणाष्टादशच्छन्दनामकं यः पठेद्भुवि मानवस्त्वद्भक्तिमांस्त्वन्नोदये । स्वत्पदं निजबन्धुदारसुतंयुतश्चिरमेत्य नो मोदन्तु ते पदसेवने बहुवत्सरी मम वाक्शतः ॥ ४१॥ इति स्तुत्वा महाविष्णुं प्रोवाच गिरिजापतिः । आरुहस्व गरुडेश गरुडोपरि वेगतः ॥ ४२॥ वैकुण्ठारोहणस्यायं कालो वाल्मीकिना कृतः एकादश सहस्राश्च वत्सरान्वेकादशैश्च च ॥ ४३॥ तथैकादश मासाश्च दिनान्येकादशैव च । तथैकादश नाडीश्च पलान्येकादशैव च ॥ ४४॥ गतानि तेऽत्र भूम्यां हि जन्मारभ्य राघव । वसन्तपञ्चमीनाम्नी तिथिर्वैत्रासिताऽद्य हि ॥ ४५॥ पुण्येऽह्नि स्वपदं गन्तुं स्वर्गं कुरु रमेश्वर । तदा विसृज्य शालिवाहुर्वाल्मीकिं मुनिपुङ्गवम् ॥ ४६॥ समालिंग्य मुनीन्पृष्ट्वा तस्थौ स गरुडोपरि । ध्वनत्सु देववाद्येषु स्तुवत्सु नारदादिषु ॥ ४७॥ पुष्पैर्वर्षत्सु देवेषु प्रनर्त्तन्तीष्वप्सरःसु च । नानाविमानयानैश्च समन्त परिवेष्टितः ॥ ४८॥ ययौ विष्णुः स वैकुण्ठं लोकान्पश्यन्जनैः मुनैः। वैकुण्ठे स्वपदे स्थित्वा विससर्ज शिवादिकान् ॥ ४९॥ तस्थौ लक्ष्म्याऽऽनन्दमयः परिपूर्णमनोरथः । खगेशश्चारुमत्पादः सेवानत्पर्तिभूषणः ॥ ५०॥ अयोध्यावासिनः सर्वे ययुः सातानकं पदम् । ततस्ते मुनयः सर्वे ययुः स्वं स्वं स्थल प्रति ॥ ५१॥ रामवाक्यान्याऽजमीढः सांत्वयामास तं कुशम् । स्वर्गारोहण वृत्तार्थ कथयामास तं कुशम् ॥ ५२॥


धारण किये, कमलके समान मुखवान्, कमलके भाँति नेत्रवाले, कमलके ही समान चरणकमलवाले, श्याम वर्ण, सूर्यके समान देदीप्यमान, चन्द्रमाकी मुख दूतवाल, करुणाके समुद्र एक अद्वितीय प्रभु राजाओंके रक्षक, राजाओंसे वन्दित, राजाओंके प्रिय और नररूपधारी जगदीश्वर रघुनन्दन ! मैं आपका भजन करता हूँ ॥ ३९ । निर्गुण होते हुए भी सगुणरूपधारी, राजाओंके मुकुटभूषण बुद्धिवर्द्धनकर्त्ता, परम पूजनीय, मुसकराकर बोलनेवाले, जगत्के प्रभु, हनुमानजीके द्वारा स्तुत लक्ष्मीके पति और नररूपधारी हे जगदाधार रघुनन्दन ! मैं आपका भजन करता हूँ ॥ ४० । इस प्रकार स्तुति करते हुए शिवजीने अन्तमें कहा कि प्रातःकाल सूर्योदयके समय जो कोई श्रद्धा भर वह हुए इस छन्दनामाष्टमीका पाठ करेगा, वह मेरे आशीर्वादसे अपने बन्धुओं तथा स्त्री पुत्रऽदिकके साथ यहाँ आकर बहुत कालतक आपके चरणोंकी सेवाका सुयोग पायेगा ॥ ४१ ॥ इस प्रकार स्तुति करनेके पश्चात् शिवजी ने कहा—हे रमानाथ आप शीघ्र गरुडपर आरूढ़ हो क्योंकि वाल्मीकिजीने आपके वैकुण्ठ गमनका यही समय अपने रामायणमें निर्धारित किया है। इस समय ग्यारह हजार ग्यारह वर्ष, ग्यारह महीना, ग्यारह दिन, ग्यारह नाड़ी तथा ग्यारह पल पूरे हो रहे हैं। आज चैत्र शुक्लाष्टमीकी पञ्चमी तिथि है ॥ ४२-४५ ॥ इस पवित्र दिवसका आप परमधाम जानेके लिए प्रस्थान करिए। उस समय प्रभु भुजबन्धु । उन्होंने मुनिपुङ्गव वाल्मीकि के शिक्षा हृदयसे लगाया, ऋषियोंसे आज्ञा माँगी और गरुडके ऊपर सवार हो गये, तब देवताओंने विविध प्रकारके बाजे बजाये, नारद आदि महर्षियोंने स्तुति की, देवतागण आकाशपर फूल बरसाने लगे और अप्सरायें नाचने लगीं ॥ ४६-४८ ॥ इस तरह गरुडपर बैठकर भगवान् राम सब लोगके देखते-देखते वैकुण्ठलोकको चले गये। उस धाममें पहुंचकर वे अपने विश्वामित्रके बंद और शिव आदि देवताओंका विदा कर दिया। वे आनन्दमय महाप्रभु हर प्रकारसे परिपूर्ण मनोरथ होकर लक्ष्मीके साथ आनन्दपूर्वक वहीं रहने लगे। उस समय गरुड़ भगवान्के चरणोंकी सेवा करते थे और वे विष्णु भगवान् शेषकी शय्यापर मान थे ॥ ४९-५० ॥ वे सब अयोध्यावासी भगवान्के कथनानुसार सान्तानिक लोकमें जा विराजे। इसके अनन्तर भगवान्का स्वर्गारोहण देखनेके लिए आये हुए ऋषि भी अपने अपने आश्रमोंको चले गये ॥ ५१ ॥ रामचन्द्रजीके कथनानुसार हास्तिनापुरके राजा अजमीढ़ अयोध्यामें कुशके पास गये और भगवान्का परमधामगमन-सम्बन्धी

७८२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

कुशेन मानितः सोऽपि ययौ स्वांय रजाव्हयम् । लब्ध्वा कुमुद्वतीं तस्यां कुशः पुत्रान्न निर्ममे ॥५३॥ एवं श्रीरघुनाथस्य स्वर्गारोहणकौतुकम् । ये शृण्वन्ति नरा भक्त्या तेऽपि स्वर्गं प्रयान्ति हि ॥५४॥ वैकुण्ठारोहणाख्यायमिमं नित्यं पठेत्तु यः । सोऽन्ते गच्छति वैकुण्ठं रामचन्द्रप्रसादतः ॥५५॥ इति श्रीमन्महोदिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीय पूर्णकाण्डे वैकुण्ठारोहणं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥


सप्तमः सर्गः

( सूर्यवंशवर्णन )

श्रीरामदास उवाच एवं त्वया यथा पृष्टं स्वर्गारोहणप्रद्वयम् । श्रीरामस्य मया चैतत्तथाऽऽशु निवेदितम् ॥ १ ॥ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छाऽस्ति तान्वं वद वदाम्यहम् । एव गुरुर्वचः श्रुत्वा विष्णुदासस्तमब्रवीत् ॥ २ ॥

विष्णुदास उवाच कुशात्तः सूर्यवंशोऽत्र गुरो पूर्वं त्वयोदितः । कुशाग्र श्रोतुमिच्छामि सूर्यवंशं सविस्तरम् ॥ ३ ॥

श्रीरामदास उवाच विष्णोरास्भ्य कथिता एकषष्टितमाः पुरा । एकषष्टिनृपा ह्यग्रे तान्वदामि सविस्तरम् ॥ ४ ॥ श्रीरामस्य कुशः पुत्रोऽतिथिः पुत्रः कुशस्य सः । निषधस्त्वतिथेः पुत्रो निषधस्यात्मजो नभः ॥ ५ ॥ नभाञ्जातो पुंडरीकः क्षमधन्वा तु तत्सुतः । देवानीकस्त्वमृताऽभूद्देवानीकसुतो महान् ॥ ६ ॥ अहीनः प्राप्यतस्तद्वत् पारियात्रस्तत्सूनु स्मृतः । पायात्रस्य बलः पुत्रः स्थलः पुत्री बलस्य हि ॥ ७ ॥ स्थलस्य वज्रनाभस्तु खगणस्तस्य चात्मजे । खगणाद्विधृतिर्जातो विधृतेस्तनयः शुभः ॥ ८ ॥ जातो हिरण्यनाभस्तु तस्य पुत्रः प्रकाल्पत । पुष्यास्त ध्रुवसंधिस्तु ध्रुवसंधः सुदर्शनः ॥ ९ ॥ सुदर्शनादाग्रवर्णस्तस्माच्छाधः प्रकीर्त्यत । शीघ्राज्जातो मरुः पुत्रो मरोश्च प्रश्वतः सुतः ॥ १० ॥ प्रश्रुतस्य च सन्धाई सचे पुत्रस्तु मषणः । मषणस्य महस्वाथ विश्वसाहश्च तत्सुतः ॥ ११ ॥


सब बात बतलायी और समझा दिया कि आप किस प्रकारका शक न करें ।। ५२ ।। कुशने भी अजमीढ़का भरपूर आदर-सत्कार किया । कई दिना अयोध्यामे रहकर वे हस्तिनापुर को चले गये । कुछ दिनों बाद कुशको कुमुद्वती नामकी एक दूसरी भार्या प्राप्त हुई । उससे कुशके बहुतसे पुत्र हुए ।। ५३ ।। इस प्रकार भगवान्‌के स्वर्गारोहण-वार्ताको जो लोग भक्तिपूर्वक सुनते हैं, वे भी स्वर्गलोक प्राप्त करते हैं ।। ५४ ।। जो प्राणी वैकुण्ठारोहणके इस सर्गका नित्य पाठ करता है, वह रामचन्द्रजीकी कृपासे अन्तमे वैकुण्ठ धामको प्राप्त करता है ।। ५५ ।। इति श्रीमत्काशिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतनुपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहित पूर्णकाण्ड षष्ठ सर्गः ॥ ६ ॥

श्रीरामदासने कहा- हे शिष्य ! तुमने जिस तरह हमसे भगवान्‌का स्वर्गारोहणवृत्तांत पूछा, वह मैने कह सुनाया । अब तुम क्या सुनना चाहते हो सो कहो । वह भी मैं बतलाऊँगा । इस तरह गुरुकी बात सुनकर विष्णुदास कहने लगे-हे गुरुवर ! आपने नृपतक सूर्यवंशका वर्णन किया, सो मैने सुना । अब यह जानना चाहता हूं कि कुशके आगे कौन-कौन राज हुए सो हए विस्तारपूर्वक बतलाइए ॥ १ ३ ॥ श्रीरामदास बोले-हे शिष्य, विष्णुभगवान्‌से लेकर एकसठ राजाओंका चरित्र मैने पहले सुनाया है। उनके बाद जो एकसठ राजे और हुए हैं, उन्हें मैं विस्तारपूर्वक बतलाता हूं ॥ ४ ॥ श्रीरामचन्द्रजीके पुत्र कुश, कुशके पुत्र अतिथि, अतिथिके निषध, निषधके नभ, ॥ ५ ॥ नभके पुण्डरीक, पुण्डरीकके क्षेमधन्वा, क्षेमधन्वाके देवानीक, देवानीकके अहीन, अहीनके पारियात्र, पारियात्रके बल, बलके पुत्र स्थल ॥ ६ ॥ ७ ॥ स्थलके वज्रनाभ, वज्रनाभके खगण, खगणके पुत्र विधृत, विधृतिके हिरण्यनाभ, हिरण्यनाभके पुष्य, पुष्यके ध्रुवसंधि, ध्रुवसंधिके सुदर्शन, ॥ ८ । ९ ।। सुदर्शनके अग्निवर्ण, अग्निवर्णके पुत्र शीघ्र, शीघ्रके मरु, मरुके पुत्र प्रश्वुत,

सर्गः ७ ] पूर्णकाण्डम् ७८३


तस्मात्प्रसेनजित्प्रोक्तस्तस्माज्जातस्तु तक्षकः । बृहद्रणस्तक्षकस्य तस्माज्जातो बृहद्रणः ॥ १२॥
तस्मादुरुक्रीयः प्रोक्तो वत्सबृहत्तु तत्सुतः । वत्सबृहदस्य व्योमस्तु व्योमाद्भानुः प्रकीर्त्यते ॥ १३॥
भानोः पुत्रो दिवाकस्तु सहदेवश्च तत्सुतः । सहदेवात्तथा वीरो वीरस्य तनयः शुभः ॥ १४॥
बृहदश्व इति ख्यातस्तस्य पुत्रस्तु भानुमान् । भानुमतः प्रतीकाशः सुप्रतीकश्च तत्सुतः ॥ १५॥
सुप्रतीकस्य पुत्रोऽभून्मरुदेव इति स्मृतः । मरुदेवात्सुनक्षत्रः सुनक्षत्राच्च पुष्करः ॥ १६॥
पुष्करस्यांतरिक्षश्च सुतपा अंतरिक्षजः । सुतपास्तनयो मित्रो मित्रजित्सुतः शुभः ॥ १७॥
बृहद्राज इति ख्यातस्तस्य बर्हिः सुतो बुधैः । ख्यातो कृतंजयः पत्रस्तस्य पुत्रो रणंजयः ॥ १८॥
रणंजयस्य तु संजयः संजयाच्छाक्य उच्यते । शाक्यपुत्रस्तु शुद्धोदः शुद्धोदाल्लांगलः स्मृतः ॥ १९॥
प्रसेनजित्लांगलस्य तत्पुत्रः क्षुद्रकः स्मृतः । क्षुद्रकाद्रणकः प्रोक्तो रणकात्सुमुखः स्मृतः ॥ २०॥
सुमुखात्तनयो जातस्तनयस्य सुतो महत् । नाम्ना सूर्यस्य धामः पूर्णो वंशस्ततः परम् ॥ २१॥
पूर्वमुक्तो मरुदिति नाम्ना यो नृपनिमिया । कलापग्राममाश्रित्य हिमाद्रौ बद्रिकाश्रमे ॥ २२॥
स तपश्चिरकालं हि करोत्यत्र समाधिमान् । कृते युगे पुनः प्रेत्ये सूर्यवंशं करिष्यति ॥ २३॥
एवं मया समाख्यातः सूर्यवंशो मनोहरः । विष्णोरारभ्य कथित एकाषष्टितमो मया ॥ २४॥
एकषष्टिनृपाणाञ्च मध्ये रामो विराजते । त्रयोविंशोत्सप्तशतं विष्णोर्मयोदिताः ॥ २५॥
एवं यथा त्वया पृष्ट शिष्य वंशानुकीर्तनम् । तन्मया कथितं सर्वं श्रवणात्पुण्यवर्धनम् ॥ २६॥

विष्णुदास उवाच
गुरो मया श्रुतं कस्यचिन्मुनेर्मुखतः पुरा । रामायणं सविस्तारं तच्चेदं नैव भासते ॥ २७॥
तस्मादत्रांतरं प्रोक्तं त्वया सर्वत्र मां गुरो । संदेहोऽनेन मे जातःतं त्वं छेत्तुमर्हासि ॥ २८॥

श्रीरामदास उवाच
पुनः पुनः कल्पभेदाज्जाताः श्रीराघवस्य च । अवताराः कोटिशोऽत्र तेषु भेदः क्वचित्क्वचित् ॥ २९॥


॥ १० ॥ प्रद्युम्नके संर्षि, संर्षिके पुत्र मर्षेण, मर्षेणके महत्वाना, महत्वानाके विश्ववाह ॥ ११ । विश्ववाहके प्रसेनजित्, प्रसेनजित् के तक्षक तक्षकके बृहद्रण बृहद्रणके उरुक्रीय उरुक्रीयके वत्सवृद्ध, वत्सवृद्धके व्योम, व्योमके भानु ॥ १२ ॥ १३ । भानुके पुत्र दिवाक, दिवाकके सहदेव, सहदेवके वीर, वीरके पुत्र बृहदश्व, बृहदश्वके भानुमान्, भानुमान्के प्रतीकाश, प्रतीकाशके पुत्र सुप्रतीक १४ ॥ १५ । सुप्रतीकके मरुदेव, मरुदेवके सुनक्षत्र, सुनक्षत्रके पुष्कर, ॥ १६ पुष्करके अन्तरिक्ष, अन्तरिक्षके सुतपा, सुतपाके पुत्र मित्र, मित्रके मित्रजित् ॥ १७ मित्रजित्के बृहद्राज, बृहद्राजके बर्हि, बर्हिके कृतंजय कृतंजयके पुत्र रणंजय ॥ १८ । रणंजयके संजय, संजयके शाक्य शाक्यके शुद्धोद शुद्धोदके लाङ्गूल ॥ १९ । लांगलके पुत्र प्रसेनजित् प्रसेनजित्के क्षुद्रक क्षुद्रकके रणक, रणकके सुमुख ॥ २०. सुमुखके तनय और तनयके पुत्र सुमित्र हुए। बस, यहां ही तक चलकर सूर्यवंश पूर्ण हो जाता है। २१ । पूर्वमें हम मरु नामक राजाका नाम गिना आये हैं। वे हिमा- लयपर बद्रिकाआश्रममें तप कर रहे हैं। सत्ययुग आनेपर वे फिर सूर्यवंशका विस्तार करेंगे ॥ २२ । २३ ॥ इस तरह मैंने विष्णुभगवान्से लेकर एकसठ राजाओं तक सूर्यवंशका वर्णन किया ॥ २४ । एकसठ राजाओंके मध्यमें भगवान् रामचन्द्रजी विराजमान हैं और उनके आगेवाले एकसठको लेकर कुल एक सौ तेईस राजे हुए ॥ २५ ॥ इस तरह हे शिष्य ! मैंने तुझे सूर्यवंशका विवरण कह सुनाया। इसके सुननेसे पुण्यकी वृद्धि होती है ॥ २६ ॥ विष्णुदासने कहा-हे गुरो ! मैंने किसी मुनिसे सुना था कि रामायण इससे भी विस्तृत है, किन्तु पूरी रामायण इस संभागमें विद्यमान नहीं है। फिर आपने जो रामायण सुनायी है, वह तो सब रामायणोंसे भिन्न है, यह एक प्रकारका सन्देह मेरे हृदयमें उत्पन्न होता है। कृपा करके आप इसका निवारण करिए ॥ २७ । २८ । श्रीरामदासने कहा कि कल्पभेदसे रामके कितने ही अवतार हुए हैं और

७८४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

कृतोऽस्ति राघवेशेन न सर्वे सदृशाः कृताः । रामायणान्यपि तथा पुरा वाल्मीकिनैव हि ॥ ३० ॥ अनेकान्यत्तरेणैव कीर्तितानि सविस्तरात् । शतकोटिमता तेषां सर्वेषां गणना कृता ॥ ३१ ॥ तस्मात्त्वया न संदेहः कार्यः शिष्य़ात्र बुद्धिमान् । यन्मया कथितं ते हि तत्सत्यं विद्धि नान्यथा ॥ ३२ ॥ यात्रोत्तरखंडांतर्गतरामायणात्पुरा । नारदादिपुराणानि व्यासेनात्र कृतानि हि ॥ ३३ ॥ हेतु भत्कथितं चेदं सम्यग्विस्मारितं द्विज । तव जातो यथा शिष्य संदेहोऽत्र कथांतगत् ॥ ३४ ॥ भविष्यति तथाऽन्येषामग्रे यदि कदा क्वचित् । नारदादिपुराणेषु दर्शनीयं हि दुर्जनैः ॥ ३५ ॥ दृष्ट्वा मदुक्तं सर्वेषु पुराणेषु पंडितैः । त्यक्तव्याः संशयम्देहाः सत्यं ज्ञेयं मयेरितम् ॥ ३६ ॥

इति शतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये पूर्णकाण्डे सूर्यवंशवर्णनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


अष्टमः सर्गः

( आनन्दरामायणकी सर्गानुक्रमणिका )

श्रीविष्णुदास उवाच

गुरोऽधुना वदस्व त्वं यन्मया पृच्छ्यते तव । अनुक्रमणिकासर्गं तथा पाठादिभिः फलम् ॥ १ ॥ कांडसंख्यां सर्गसंख्यां श्लोकसंख्यां सविस्तराम् । उद्यापनं ग्रन्थदानफलं वै शकुनेक्षणम् ॥ २ ॥ अनुष्ठानविधानं च श्रोतुं कालविनिर्णयम् । कांडानां च पृथक् संख्यां सर्वं त्वं वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥

श्रीमद्दास उवाच

अनुक्रमणिकासर्गः प्रोच्यतेऽयं मयाऽधुना । यस्याः संश्रवणात्प्रोक्तं सर्वग्रंथफलं शुभम् ॥ ४ ॥ सर्गेऽत्र प्रथमे प्रोक्तं कौसल्यायाः स्वयंवरम् । रामादीनां सुजन्मानि द्वितीये कीर्तितानि हि ॥ ५ ॥ सीतास्वयंवरं प्रोक्तं तृतीये मिथिलापुरि । शृगालादिकथनं चतुर्थे मुद्रलेन हि ॥ ६ ॥


उन अवतारोंमें कुछ न कुछ भेद पड़ ही गया है। यद्यपि सबकी लीलाएं प्रत्येक रामायणमें वर्णित हैं, किन्तु उन सबमें कुछ न कुछ भेद है। स्वयं वाल्मीकिजीने जो शतकोटि श्लोकात्मक रामायण बनायी है, उसमें भी भेद विद्यमान हैं। इस कारण हे शिष्य ! तुम किसी प्रकारका सन्देह न करके मैंने जो कुछ कहा है, उसे सच मानो ॥ २६-३२ ॥ भरतखण्डके अन्तर्गत विद्यमान रामायणके भागके ही आधारपर व्यासजीने नारदादि विविध पुराणोंका रचना की है। उसी खण्डके सहारे मैंने भी इस सविस्तर आनन्द-रामायणका वर्णन किया है। जिस तरह आज तुमने मेरा यह कथा सुनकर सन्देह उत्पन्न हुआ है, उसी तरह यदि आगे चलकर और किसी श्रोता-वक्ताको सन्देह हो तो उसे चाहिए कि उन नारद आदि पुराणोंको देखकर सन्देह निवृत्त कर लें ॥ ३३-३५ ॥ पण्डितोंको भी उचित है कि सब पुराणोंको देख और उनमें मेरी कही बातें देखकर अपना सन्देह मिटा लें और समझ लें कि मैं जो कुछ कहता हूँ, वे बातें सच हैं या नहीं ॥ ३६ ॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योतिष्मतीभाषा-टीकासहिते पूर्णकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

विष्णुदासने कहा-हे गुरु ! अब आप हमें इस रामायणकी सर्गानुक्रमणिका तथा इसके पठनका फल बताइए ॥ १, साथ ही इसकी काण्डसंख्या, सर्गसंख्या और श्लोकसंख्या आदि भी विस्तारपूर्वक कहिए। इसका उद्यापन, ग्रन्थके दानका फल, शकुनदर्शनविधान, अनुष्ठानविधि, इसके श्रवणका समय और काण्डोंकी संख्या आदि भी कहिए ॥ २, ३ ॥ श्रीरामदासने कहा-अब मैं तुम्हें इस रामायणकी सर्गानुक्रमणिका बताता हूँ। जिसके श्रवणमात्रसे समस्त रामायणके श्रवणका फल मिल जाता है ॥ ४ ॥ सारकाण्डके पहले सर्गमें कौसल्याका स्वयंवर, दूसरेमें राम आदिका जन्म, तीसरे सर्गमें जनकपुरमें सीताका स्वयंवर, चौथे

नवमे जानकीशुद्धिर्लंका दग्धाऽथ० । दशमे सेतुमाहात्म्यं राज्ञां श्रेयागमः ॥ ९ ॥

सर्गः ८ ] पूर्णकाण्डम् ७८७


दशरथपूर्वजन्म कैकेय्याश्चापि ० मे । वनप्रयाणं रामस्य प्रोक्तं पूणे मतिं त्वम् ॥ ७ ।
विराधावगमारीचवधादियमवेक्ष्यि । किष्किन्धां वालिवधो ज्ञानोद्योतं कृतं ८ ।
नवमे जानकीशुद्धिर्लंका दग्धाऽथ० । दशमे सेतुमाहात्म्यं राज्ञां श्रेयागमः ॥ ९ ॥
एकादशे रावणवधाः प्रोक्ताश्च रावणम् । सीतया सार्द्धं रामस्याऽयोध्याप्रवेशतः ॥ १० ।
त्रयोदशे राघवस्य विक्रमश्च हनूमतः समाप्तं मारकाण्डं हि यात्रामण्डमुदीर्यते ॥ ११ ।
यात्रायाके प्रथमे सर्गे क्षेत्रोत्पत्तिः प्रकीर्तिता साम्राज्यस्य विभागोऽत्र सविस्तर मुदाहृतः ॥ १२॥
तृतीये सीतया रामो यात्रार्थं प्रार्थितो मुदा । चतुर्थे रामचन्द्रस्य प्रस्थानं च कुशो प्रवि ॥ १३॥
पंचमे मुनिवाक्येन यात्रां गंतुं विनिर्णयः । षष्ठे प्रोक्ता पूर्वदेशतीर्थयात्रा सविस्तरा ॥१४॥
प्रोक्ता दक्षिणतीर्थानां यात्रा रामस्य सप्तमे । तीर्थाटनं पश्चिमाशागतम् अस्त्यन्य च ॥ १५॥
यात्रोत्तरप्रदेशस्य स्वरूपे नवमेऽहथि । यात्राकाण्डसमाप्तं तु यागकाण्डमुदीर्यते । १६ ॥
सगोऽत्र प्रथमे यज्ञ संभारकरणं गुरुः । द्वितीये रामचन्द्रस्य यज्ञागारप्रवेश वर्णितः ॥ १७॥
पृथ्वीप्रदक्षिण प्रोक्ता तृतीयेऽश्वप्रवर्तितः । कुम्भोद्भवस्य रामस्य संवादाऽत्र चतुर्थके । १८।
पञ्चमे रामनाम्नो वै ह्यष्टोत्तरशतं शुभम् । षष्ठेऽह्नि वै मणियां वाजिमेधे प्रकीर्तितम् । १९॥
ध्वजारोपरिधानं च सप्तमे समुदाहृतम् । अवभृथप्लवस्नाने राघवस्यात्र वर्णितम् ॥ २०॥
नवमे वाजिमेधस्य समाप्तिः कीर्तिताऽत्र मा । यागकाण्डं समाप्तं हि विलासकाण्डमुदीर्यते ॥ २१॥
प्रथमे रघुवीरस्य स्ववराजोऽत्र कीर्तितः । द्वितीयो गतिशालिन्या जानक्याश्चापि वर्णनम् ॥ २२॥
तृतीये राघवेणोक्तं देहरामायणं प्रिये । दिनचर्याभूषानि जानक्याश्च चतुर्थके ॥ २३॥
नलपत्रगता क्रीडा पञ्चमे क्षेमणादिकम् । विजयं पञ्चमे प्रसादे षष्ठेऽलङ्कारमण्डनम् ॥ २४॥

सप्तम मूदत्त कविका मिलना तथा वृत्तान्त आदि वर्णित है ॥ ७ ॥ पाँचवें सर्गमे दशरथ और कैकेयीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त है । छठे सर्गमें रामका वनगमन और मातंग- विराध-जटायु-मारीच आदिका वध तथा आठवें सर्गमें किष्किन्धा पर्वतपर बालिवध दर्शित है ॥ ९ ॥ ८ ॥ नवें सर्गमें सीताकी खोज और लङ्कादहन, दसवें सर्गमें सेतुमाहात्म्य तथा काशी-विश्वनाथके आगमनका वर्णन है ॥ ६ ॥ एकादश सर्गमें रामके द्वारा रावण आदिका वध तथा बारहवें सर्गमें सीताके साथ रामका अयोध्या में लौटना और राज्य भिषेकका वर्णन है ॥ १० ॥ तेरहवें सर्गमें राम और हनुमान्जीके पराक्रमका वर्णन है। इस प्रकार मारकाण्ड समाप्त हो जाता है ॥ ११ ॥ अब यात्राकाण्ड कहते हैं। इसके पहिले सर्गमें राज्य क दू० इलाकाका विभाग दूसरे प्रथम साम्राज्यका विभाजन वर्णित है ॥ १२ ॥ तीसरे सर्गमें सीता द्वारा यात्राका प्रार्थना और शशुपन्नप ज हूं की ओर रामकी यात्राका वर्णन है ॥ १३ ॥ पाँचवें सर्गमें कुम्भादर मुनिका सन्नाहम कथा का सविस्तर वर्णन है ॥ १४ ॥ छठेमें पूर्व देशके यात्राका वर्णन है । १४ ॥ सातव साम दक्षिण भारतके तीर्थोका वर्णन आठवें सर्गमें पश्चिम प्रदेशके सब तीर्थोंकी यात्राका वर्णन है ॥ १५ ॥ नव सर्गमें उत्तर प्रदेशके तीर्थोंकी यात्राका वर्णन है। बस, यात्राकण्ड यहीं समाप्त हो जाता है। अब यागकण्डका विषय कहते है ॥ १६ ॥ इसके प्रथम सर्गमें यज्ञका सामग्रियोंका सविस्तर वर्णन है । दूसरे सर्गमें रामचन्द्रजीका याग में प्रस्थानका, तीसरे सर्गमें यज्ञीय अश्वकी पृथ्वी प्रदक्षिणा, चौथे सर्गमें राम और कुम्भादर मुनिका संवाद है ॥ १७ ॥ १८ ॥ पाँचवें सर्गमें रामका अष्टात्तरशतनाम स्तोत्र है। छठ सर्गमें अश्वमेध यज्ञमें जानवाली रामकी दिनचर्याका वर्णन है ॥ १९ ॥ सातवें सर्गमें ध्वजारोपणविधान माहात्म्य अवभृथस्नान और नव सर्गमें अश्वमेध यज्ञकी समाप्ति वर्णित है ॥ २० ॥ बस, यहाँ यागकाण्ड समाप्त हो जाता है । अब विलासकाण्ड प्रारम्भ होता है ॥ २१ । इसके प्रथम सर्गमें रामस्ववराज और दूसरे सर्गमें जानकजीकी रतिशालाका वर्णन है ॥ २२ । तीसरे सर्गमें सीताजीको रामने देहरामायण सुनायी है । चौथे सर्गमें सीताका दिनचर्याका वर्णन है ॥ २३, पाँचवें सर्गमें जलपत्रकी क्री ड़ाये और आलिङ्ग हरूपका विवेचन है । छठें सर्गमें ब्राह्मणपरण के लिए सीता द्वारा अलङ्कार-दानका वर्णन है।

७८६आनन्दरामायणे[ सर्ग ८

मूर्तीनां सप्तमे दानं देवर्षीणां वरान्वथा । गुणवन्त्याः पिंगलाया वरदानमथाष्टमे ॥२५॥
कुरुक्षेत्रस्य यात्रायां नवमे जानकीजयः । विलासकाव्यं समाप्तं हि जन्मकाण्डमुदीर्यते ॥२६॥
आरामे दोहदक्रीडा सीतायाः प्रथमेऽऋषि । द्वितीये विविधाः क्रीडाः संमतेनोपनयोन्मदः । २७॥
रजकस्योदितं श्रुत्वा सीतात्यागस्तृतीयेके । जन्मकर्म चतुर्थेऽथ कुशस्याथ लवस्य च ॥२८।
सर्गेऽत्र पञ्चमे प्रोक्ता रामरक्षा सुखावहा । षष्ठे लवस्य कमलहरणे जय ईरितः ॥२९।
मुद्रादिकौतुकं प्रोक्तं पुत्रयोः सप्तमे विभोः । सीतादित्यं च तद्वाम्योऽष्टमे प्रोक्तोऽत्र मंडपे ।.३०।
जन्मोपनयनादीनि बालानां नवमेऽऋषि । जन्मकाण्डं समाप्तं हि विवाहकाण्डमुदीर्यते ॥३१॥
स्वयंवरार्थं गमनं रामस्य प्रथमेऽऋषि । स्वयंवरं चांपकाया द्वितीये ममुदाहृतम् ॥३२॥
स्वयंवरं सुमत्यश्च तृतीये परिकीर्तितम् । कुमुद्वत्यास्तदन्यादि विवाहौ द्वौ चतुर्थके ॥३३।
गन्धर्वनागकन्यानां मोचनं पञ्चमेऽऋषि । षष्ठे तासां विवाहानां निश्चयः समुदाहृतः ।.३४॥
विवाहा द्वादशे प्रोक्ताः सर्वासां सप्तमेऽथ हि । अष्टमे यूपकेतोश्च वाजिनोऽथ पराक्रमः ॥३५।
प्रोक्तो मदनसुन्दर्या विवाहो नवमे महान् । पूर्णं विवाहकाण्डं च राज्यकाण्डमुदीर्यते ॥३६॥
रामनाममहत्त्वं च मार्गे प्राथमिकेऽऋषि । द्वितीयेऽत्र ममर्त्तानो रामेण गुरुपादपौ । ३७॥
रामकृष्णोपासकयो संवादश्च तृतीयेके । शनैश्चर्या व निद्रायां वरदानं तथा पुनः ॥३८॥
रामविश्लेषविरहः सीतायाः पञ्चमेऽऋषि । मूकासुरवधः षष्ठे राज्यानि चै पृथक् ॥३९॥
जयो मत्तन्मंड़स्य रामेण सप्तमे कृतः । जम्बुद्वीपजयः प्रोक्तोऽष्टमे रामस्य विस्तरात् ।४०॥
षड्दीपानां जयः प्रोक्तो नवमे राघवस्य च । यतिशूद्रगृह्यशिक्षा रामेण दशमे कृता ।४१॥
चतुःस्त्रीणां वरदानं रामेणैकादशे कृतम् । खंगोऽश्वग्रहयागी द्वादशेऽथ प्रकीर्तितम् । ४२।
अश्वत्थहसितं दारुमुखकेतज्ञा त्रयोदशे । चतुर्थे वाल्मीकिना मन्त्रमन्त्रार्थमीरितम् ॥४३॥

॥ २४ । सप्तम सर्गमें मूर्तियोंका दान और देवर्षियोंके वरदानका विधान है। अष्टम सर्गमें गुणवन्ता और पिंगलाके वरदानका वर्णन है ॥ २५ । नवम सर्गमें कुरुक्षेत्रकी यात्रामें जानकीविजयका वर्णन है । बस, यहां ही विलासकांड समाप्त हो जाता है ॥ २६ ॥ अब यहाँसे जन्मकाण्डका वर्णन करते हैं—पहिले सर्गमें दोहदक्रीड़ा तथा दूसरे सर्गमें विविध प्रकारका क्रीड ओ और नामकरण संस्कारका विधान है ॥ २७ ॥ तृतीय सर्गमें सीतात्याग तथा चौथे सर्गमें कुश-लवका जन्म-कर्म वर्णित है । पाँचवे सर्गमें रामरक्षस्तोत्रका विधान है छठे सर्गमें लवका कमलहरण और उनकी विजय वर्णित है। २८ ॥ २९ ॥ सप्तम सर्गमें मुद्रादिक कौतुकका विधान है ओर अष्टम सर्गमें सीताकी जयथका वर्णन है ॥ ३० ॥ नवम सर्गमें बालकोंके जन्म और उपनयनका विधान है । बस, जन्मकाण्ड यहीं ही समाप्त हो जाता है। अब यहांसे विवाहकाण्डप्रारब्ध होता है ॥ ३१ ॥ इसके प्रथम सर्गमें रामके गमनकी वार्ता है । दूसरे सर्गमें चम्पिकाके विवाहका वृत्तान्त है । तीसरे सर्गमें सुमतिके विवाहका वर्णन है चौथे सर्गमें कुमुद और लवके विवाहकी बातें हैं ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ पञ्चम सर्गमें गन्धर्वों तथा नागोंकी कन्याओंके छुड़ानेका हाल है । षष्ठ सर्गमें इन लागोंके विवाहकी बात पक्की हो जाती है ॥ ३४ ॥ सप्तम सर्गमें सबरू विवाहाका वर्णन तथा अष्टम सर्गमें यूपकेतुके पराक्रमका वर्णन है ॥ ३५ ॥ नवम सर्गमें मदनसुन्दरीके विवाहका वृत्तान्त है। बस विवाहकाण्ड यहाँ ही समाप्त हो जाता है। अब राज्यकांड चलता है ॥ ३६॥ राज्यकाण्डके प्रथमसर्गमें रामनाममाहात्म्य तथा दूसरे सर्गमें रामके द्वारा स्वार्तके कल्पवृक्ष और गरुिजात नामक वृक्षोंके लगानेकी बातें हैं ॥ ३७॥ तीसरे सर्गमें रामकृष्णके उपासकोंका सम्वाद, चौथे सर्गमें निद्राके लिए वरदान, पाँचवें सर्गमें सीतारामका वियोग और मूकासुरका वध, छठें सर्गमें गज्यकार्योंका वर्णन है ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ सातवें सर्गमें रामके द्वारा मत्तमुण्डकी विजय आठवें सर्गमें जम्बूद्वीपविजय, नवें सर्गमें रामके अन्य छः द्वीपोंको जीतनेका वृत्तान्त है । दसवें सर्गमें सन्यासी, शूद्र तथा गृह्यकी शिक्षाका वर्णन है ॥ ४० ॥ ४१ ॥ ग्यारहवें सर्गमें रामके

सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७८७

पञ्चदशे रामराज्यवर्णनं विस्तरात्कृतम् । वर्णिता राजनीतिः शास्त्रोक्तेनात्र षोडशे ॥४४॥ सप्तदशेऽत्र कथितं कुशकन्यास्वयंवरम् । अष्टादशे गवां प्रचुरं दानं द्विजन्मनाम् ॥४५॥ एकोनविंशे रामस्य दिनचर्येरिता शुभा । गवां विमोक्षणार्थं पुत्रैस्तु घोरसङ्ग्राम महान् ॥४६॥ एकविंशे राघवेण हास्ये दत्तो वरो मुदा । नानया तुलर्पापात्रं द्वाभ्यां संचितं शुभम् ॥४७॥ त्रयोविंशे स्मृताऽऽनन्दरामायणफलश्रुतिः । यथाशिक्षा वधूनां च धर्मशिक्षा च भूतले ॥४८॥ राज्यकाण्डं समाप्तं हि मनोहरमुदीर्यते । सर्गेऽत्र प्रथमे प्रोक्तं लघूपाख्यानं शुभम् ॥४९॥ नगराणां च मात्राणामुपदेशं द्वितीयेऽर्के । रामपूजोपशमनादि विप्रार्थं तृतीयेऽर्के ॥५०॥ रामनोभद्रविस्तारश्चतुर्थे समुदाहृतः । रामलिंगतोभद्राणां भद्राः प्रोक्ताश्च पञ्चमे ॥५१॥ नवमीव्रतविस्तारः षष्ठे प्रोक्तं च मन्त्रशं । श्रीरामनामां लघूव्याख्यानादि नि सप्तमे ॥५२॥ वेदादीनां हि सर्वेषामध्यनं फलमीरितम् । सार्द्धमासद्वयी पूजा कथिता नवमे विभोः ॥५३॥ दशमे चैत्रमासस्य महिमा समुदाहृतः । एकादशे मञ्जननामश्रवां गतिरीरिता ॥५४॥ अद्वैतं दर्शितं शक्ता ह्यग्रे चार्कद्वयस्यतु । बाहुप्रदस्य रामस्य कवचं च त्रयोदशे ॥५५॥ सीतायाः कनकदानं प्रोक्तमत्र चतुर्दशे । पञ्चदशे कवचानां सङ्ख्याता स्मृतानि हि ॥५६॥ व्रतं हनुमतः प्रोक्तं पताकारोप्य हि षोडशे । प्रोक्तं सप्तदशे माहात्म्यंयत्त्वनुत्तमम् ॥५७॥ अष्टादशे शरभंगो मण्डनं च हनूमता । अत्र मनोहरं काण्डं पूर्णकाण्डमथोच्यते ॥५८॥ वाल्मीकिना मोक्षवंशाविस्तारः प्रथमेऽकथि । रामचन्द्रस्य प्रयाणं द्वितीये हस्तिनापुरम् ॥५९॥ सूर्यसोमवंशजयोर्युद्धं प्रोक्तं तृतीयेऽर्के । सोमवंशराजनामकित्तिकीं च चतुर्थके ॥६०॥ कुशादीनां गद्यपद्यं पञ्चमेऽत्र विसर्जनेषु । वैकुण्ठारोहणं षष्ठे गङ्गायां शय्यरूपं च ॥६१॥ सप्तमे सर्वग्रंथायनुज्ञाणां वर्णनं कृतम् । अनुक्रमणिकानाम्रं प्रोक्तं पञ्चमष्टमो महान् ॥६२॥

द्वारा चार स्त्रियोंकी व्याख्याशन्ति, बारहवें सर्गमें सोलह श्लोककी बदरंग नामका वृत्तान्त, तेरहवें सर्गमें दोपलके वृक्षकी हँसी, चौदहवन कार्तवीर्यके साथ जनमका वृत्तान्त है ॥ ४०-४३ ॥ पन्द्रहवें सर्गमें रामके राज्यका सविस्तार वर्णन और सोलहव सर्गमें गगकी कही राजनीति का चर्चा है ॥ ४४ ॥ सत्रहवें सर्गमें कुशकी कन्याका स्वयम्वर, अठारहव सर्गमें ब्राह्मणोंके लिए रामकाप्रचुरके गव्यका दान ॥ ४५ ॥ उन्नीसवें सर्गमें रामकी दिनचर्या और बीसवें सर्गमें एवं अश्वत्थागोथ राजाकतरकी चेष्टा कही गयी है ॥ ४६ ॥ इक्कीसवें सर्गमें दासीके लिये रामका वरदान, बाईसवें सर्गमें सीता द्वारा दूट तुल्ययोपात्रीं युन जोड़नेकी कथा है। तेईसवें सर्गमें आनन्दरामायणका श्रवणफल, चौबीसवें सर्गमें यमका शिक्षा एवं धर्मशिक्षाका वर्णन है ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ बस, राज्यकाण्ड यही ही समाप्त हो जाता है। अब मनोहरकाण्ड प्रारम्भ होता है। इसके पहिल सर्गमें लघूपाख्यान, दूसरे सर्गमें नगरवासियों तथा माताओंके लिए उपदेशदान, तीसरे सर्गमें रामपूजा और उपासनका सविस्तार वर्णन है ॥ ४९ ॥ ॥ ५० ॥ चौथे सर्गमें रामतोभद्रका विस्तार, पांचवें सर्गमें रामलिंगतोभद्रका विस्तार, छठे सर्गमें नवमीव्रतका विस्तार, सातवें सर्गमें लक्ष रामनामजपका उद्यापन है। ५१ ॥ ५२ । आठवें सर्गमें वेदिक सुननेका फल और नवमसर्गमें ढाई महीने तक रामके पूजनका विधान है ॥ ५३ ॥ दसवें सर्गमें चैत्रमासम पूजन करनेकी महिमा, ग्यारहवें सर्गमें चैत्रस्नानसे सबको सद्गति पानेका उपाय और बारहवें सर्गमें रामन भद्ररूप स्थिरताको अद्वैत पदकी रूप समझायी है। तेरहवें सर्गमें गग द्वारा हनुमानजीका कवच और चौदहवं सर्गमें सीता के कनक मन्दिरका वर्णन है। पन्द्रहवें सर्गमें रामके अनेक प्रकारके कवच आदिका वर्णन है ॥ ५४-५६ ॥ सोलहव सर्गमें हनुमानजीका पताकारोपणव्रत है। सत्रहव सर्गमें सप्तररामायण कहा गया है। अठारहव सर्गमें हनुमानजीके द्वारा अर्जुनके बनाये शरसेतुका खंडन वर्णित है। बस, मनोहरकाण्ड यहाँ ही समाप्त हो जाता है। अब पूणकाण्डके विषय गिनाते हैं ॥ ५७॥ ५८ ॥ पूर्णकाण्डके प्रथम सर्गमें मोक्षवंशी राजाओंकी वंशावलो, दूसरे सर्गमें रामचन्द्रजीकी हस्तिनापुरके लिए यात्रा ॥ ५९ ॥ तीसरे सर्गमें सूर्य और सोमवंशी राजाओंका युद्ध और चौथ हमान साम-

७८८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

ग्रंथश्रुतिफलादीनि नवमे कीर्तितानि हि । नवमं पूर्णकाण्डं सम्पूर्णं नवमं त्विदम् ॥६३॥
अनुक्रमणिका चेयं मया शिष्य प्रवर्णिता । अस्याः श्रवणमात्रेण रामायणश्रुतेः फलम् ॥६४॥
रामायणपुस्तकस्य नित्यं कार्यं प्रपूजनम् । विशेषं पूजनस्यापि शृणु शिष्य वदामि ते ॥६५॥
सारकांडे विभोः स्थाने लक्ष्मणार्ये द्वितीयकम् । नवायतनगेह्यर्थं शेषाणि स्थापयेत् क्रमात् ॥६६॥
सप्त कांडानि विधिवत्तेषां पूजनमाचरेत् । अथवा राज्यकांडस्य पूर्वार्धं रामहस्त्यले ॥६७॥
राज्यकांडस्योत्तरार्धं सीतास्थाने निवेशयेत् । लक्ष्मणार्ये सारकांडं शेषाण्यग्रे क्रमण तु ॥६८॥
एवं संस्थाप्य कांडानि तेषां पूजनमाचरेत् । नवायतनपूजायाः फलमेतेन कीर्तितम् ॥६९॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पूर्णकाण्डे अनुक्रमणिकावर्णनं नाम अष्टमः सर्गः ॥८॥


नवमः सर्गः

( ग्रन्थकी फलश्रुति )
श्रीरामचन्द्र उवाच

सारं यात्रा च यागाख्यं विलासाख्यं तु जन्मकम् । विवाहाख्यं हि राज्याख्यं श्रीमनोहरपूर्णके ।१।
कांडान्यनुक्रमेणैवानन्दरामायणे नव । त्रयोदश सारकांडे सर्गा वाल्मीकिनेरिताः ।२।
यात्राकांडे नव ज्ञेया यागकांडेऽपि वै नव । नव ज्ञेया विलासाख्ये जन्मकांडेऽपि वै नव ॥३॥
नव ज्ञेया विवाहाख्ये चतुर्विंशाश्च राज्यके । मनोहराख्ये ज्ञातव्या सर्गा अष्टादशात्र वै ॥४॥
पूर्णकांडे नव ज्ञेयाः सर्गाः पापहरा नृणाम् । एवं नवोत्तरशतं १०९ सर्गा ज्ञेयाः शुभावहा ॥५॥


वंशो और सूर्यवंशी राजाओंकी मित्रताका वर्णन है । ६० । पाँचवें सर्गमें रामचन्द्रजीके द्वारा कुश आदिके विसर्जनकी कथा है । छठें सर्गमें गङ्गाके तटपर रामकी परमधामयात्राका वर्णन है ॥ ६१ ॥ सातवें सर्गमें सूर्यवंशी राजाओंका वर्णन है और आठवें सर्गमें आनन्दरामायणकी अनुक्रमणिका बतलायी गयी है ॥ ६२ ॥ नवें सर्गमें आनन्दरामायणके श्रवणका फल आदि वर्णित है। बस, पूर्णकांड यहीं समाप्त हो जाता है। हे शिष्य, इस प्रकार मैंने तुमको समस्त आनन्दरामायणकी अनुक्रमणिका बता दी। इस अनुक्रमणिकामात्रके सुननेसे समस्त रामायण सुननेका फल प्राप्त हो जाता है ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ भक्तोको चाहिए कि नित्य इस रामायणका पूजन करें। अब इसके पूजन जो विशेषताएँ हैं उन्हें बतलाता हूँ, सुनो ॥ ६५ ॥ सारकांडको भगवान् रामचन्द्रजी, दूसरे कांडको लक्ष्मण तथा तीसरे कांडको सीता समझकर स्थापित करे। इस तरह सात कांडोंमें क्रमशः नवायतनकी स्थापना करके पूजन करें अथवा राज्यकांडके पूर्वार्धभागको रामके स्थानमें तथा उत्तरार्धको सीताके स्थानमें स्थापित करके पूजन करना चाहिए और सारकांडको लक्ष्मणकी जगहपर स्थापित करके पूजन करें। इसी तरह शेष कांडोंको क्रमशः भरत आदिके स्थानमे स्थापित करके पूजन करना चाहिए । इस तरह इस रामायणकी पूजा करनेसे रामनवायतन-पूजनका फल प्राप्त होता है ॥ ६६-६९ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत-'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते पूर्णकाण्डोऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

श्रीरामदासने कहा-हे शिष्य ! सार, यात्रा, याग, विलास, जन्म, विवाह, राज्य, मनोहर तथा पूर्णकाण्ड ये ही इस रामायणके नौ काण्ड हैं। सारकाण्डमें वाल्मीकिजीने तेरह सर्ग, यात्राकांडमें नौ सर्ग, जन्मकांडमें नौ सर्ग, विवाहकांडमें नौ सर्ग, राज्यकांडमें चौबीस सर्ग, मनोहरकांडमें अठारह सर्ग और पूर्णकांडमें पापोंको हरण करनेवाले कुल नौ सर्ग हैं। इस तरह इस आनन्दरामायणमें कुल मिलाकर एक सौ नौ ( १०९ ) सर्ग हैं ॥ १-५ ॥

सर्गः ९] पूर्णकाण्डम् ७८९


सारकांडे पंचविंशच्छतं श्लोकाः मन्त्रिशकाः । यात्राकाण्डे सप्तशतं पञ्चविंशत्परं स्मृताः ॥ ६ ॥
यागकांडे षट्शतं च पञ्चविंशोत्तरं शुभाः । विलासख्ये षट्शतं च चाष्टसप्तति सम्भृताः । ७ ॥
जन्मकाण्डे ह्यष्टशताः सद्रिश्लोकाः प्रकीर्तिताः । विवाहख्ये पञ्चशतं कीर्तिताः सप्तशीतयः । ८ ॥
सप्ताविंशा राज्यकाण्डेऽथुषद्विंशच्छतं स्मृताः । एकत्रिशच्छतं श्लोकाः प्रोक्ताः कांडे मनोहरे । ९ ॥
पूर्णकांडे पंचशतं सप्तसप्ततिमिश्रिताः । आनन्दरामचरिते सङ्ख्यैषा हि ह्यदृश ॥१०।
द्वे शते च द्विपंचाशच्छ्लोका ह्यत्रा मनोभिभिः । एष शिष्य मया प्रोक्त यथा पृष्ट त्वया पुरा ॥११॥
रामस्य तोषचरितं श्रवणात्पापकापहम् । पूर्णकाँडमिदं ज्ञेयं श्रवणान्पुण्यवर्धनम् ॥१२॥
सारकाण्डश्रवादेव संसारात्मुच्यते नरः । यात्राकाँडेन यात्राणां लभ्यते मानवैः फलम् ।१३।
यागकाँडेन यज्ञानां लभ्यते फलमुत्तमम् । विलासकाण्डश्रवणादप्सरोभिर्मोदते ॥१४।
जन्मकाँडेन प्राप्नोति नरः पुत्रादिमन्ततिम् । विवाहकाण्डश्रवणाद्रम्या स्त्री लभ्यते भुवि ॥१५॥
राज्यकाण्डेन राज्यं हि मानवैर्रुवि लभ्यते । काण्ड मनोहर श्रुत्वा लभ्यते मानसप्सितम् ॥१६॥
पूर्णकाण्डश्रवादेव विष्णोः पूर्णपदं लभेत् सर्वं विष्णुतनुःश्रुत्वाऽऽनन्दरामायणं स्विदम् ॥१७॥
सच्चिदानन्दरूपं म लीनो भवति मानवः । गतादणं नरैः श्रुत्वा कार्यमुद्यापनं नरैः ॥१८।
रामायणे श्रुते दद्याद्रथं हैममयं सुधीः । चतुर्वाजिसमायुक्तं तथा क्षौमपताकया ॥१९।
घंटैश्चैव समायुक्तं किङ्किणीजालनादितम् । यथाऽनेकैरुप मभ्यर्च्य धेनुं दद्यात्पयस्विनीम् ॥२०॥
ब्राह्मणान्भोजयेन्नाना-मिष्टान्नैरर्चयेद्बुधः । एवं कृतं मखन्तु महाकाव्यं फलप्रदम् ॥२१॥
रामायणं भवन्मूनं नात्र कार्या विचारणा । यस्मिन्भवन्ति सम्बन्धा रामायणमथाच्यते ॥२२॥
नरः प्रातः समुत्थायानन्दरामायणं पठेत् । यः स कामानवाप्नोति त्रैलोक्यादिविदुर्लभान् ।२३।


सारकांडमें २५३० श्लोक, यात्राकांडमें ७२५ श्लोक, यागकांडमें ६२५ श्लोक, विलासकांडमें ६७८ श्लोक, जन्मकांडमें ८०२ श्लोक, विवाहकांडमें ५६३ श्लोक । ५-८ ॥ राज्यकांडमें २६०२ श्लोक, मनोहरकांडमें ११०० श्लोक और पूर्णकाण्डम ५७७ श्लोक हैं । इस आनन्दरामायणमें कुल मिलाकर १२३५२ श्लोक हैं ॥ ९ ॥ हे शिष्य ! तुमने हमसे जैसा पूछा, वैसा रामचन्द्रजीको प्रसन्न करने और पापोंको नष्ट करनेवाले रामचरित्रको यह सुनाया। यह पूर्णकाण्ड पुण्यको बढ़ाता है ॥ १० ॥ ११ । १२ ॥ सारकाण्डके सुननेसे प्राणी इस संसारसे मुक्त हो जाता है । यात्राकाण्डका श्रवण करनेसे प्राणी सब तीर्थोंकी यात्राका पुण्य प्राप्त करता है ॥ १३ ॥ यागकाण्डके सुननेसे प्राणी यज्ञोंके करनेका फल पाता है और विलासकाण्डके सुननेसे स्वर्गकी अप्सराओंके साथ आनन्द करता है ॥ १४ ॥ जन्मकाण्डका श्रवण करनेसे प्राणी सन्तान पाता है और विवाह-कांड सुननेसे सुन्दर स्त्री मिलती है ॥ १५ ॥ राज्यकांडके सुननेसे संसारका राज प्राप्त होता है, मनोहरकांडको सुननेसे अपनी इच्छित कामना पूर्ण होती है और इस पूर्णकाण्डको सुननेसे प्राणी साक्षात् विष्णुभगवान्‌का पूर्णपद पाता है । जो प्राणी समस्त आनन्दरामायण सुन लेता है ॥ १६ ॥ १७ ॥ वह सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान्‌में लीन हो जाता है। जो लोग यह रामायण सुने, उन्हें इसका उद्यापन भी करना चाहिए ॥ १८ ॥ रामायण सुन लेनेके बाद श्रोता सुनातवालेको एक ऐसा स्वर्णरथ दे, जिसमें चार घोड़े जुते हों और ऊपर रेशमी पताका फहरा रही हो ॥ १९ ॥ उसमें विविध प्रकारके यन्त्र लगे हों और किङ्किणियोंका मीठा ध्वनि निकल रही हो । इसके बाद एक दुधारू गो दे ॥ २० । इसके पश्चात् १०० ब्राह्मणोंका भोजन कराये ऐसा करनेपर यह महाकाव्य पूर्ण फलदायी होता है इसमें किसी प्रकारका संदेह न करना चाहिए । जिसमें भगवान्‌का निवास हो, उसे "रामायण" कहते हैं ॥ २१ ॥ २२ ॥ जो प्राणी सवेरे उठकर इस आनन्दरामायणका पाठ करता है तो देवताओंको भी दुर्लभ उसकी कामनाय पूर्ण होती हैं ॥२३॥ चैत्र शुक्ल नवमीको रामजन्मके अवसर-

७१० आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

चैत्रमासे सिते पक्षे नवम्यां रामजन्मनि। शतमाषसुवर्णेन वायुपुत्रं विधाय च ॥२४॥ एकविंशति माषैर्वा व्यर्धमाषोद्धवा नरैः। वायुपुत्रं सचित्रं चानन्दरामायणं निवेद् ॥२५॥ मौल्यद्वारा लिखयित्वान्याँर्वा स्वयमेव वा। तत्तच्चित्रैश्च संयुक्तं सुविशोधितम् ॥२६॥ वेष्टितं पट्टवस्त्राद्यैर्नानारत्नविभूषितम्। स्कन्धे चामात्यने हर्ष पूजां दद्याणान्वितम् ॥२७॥ मध्याह्ने ब्राह्मणं पूज्य नानालङ्कारैरदन्। तस्मै देयं पुस्तकं तद्वायुपुत्रसमन्वितम् ॥२८॥ एवं यः कुरुते दानं तस्य पुण्यं वदाम्यहम्। कोटिभारसुवर्णस्य कुरुक्षेत्रे रविग्रहे ॥२९॥ दानेन पुण्यं यत्प्रोक्तं तस्माद् बहुगुणं भवेत्। अक्षरमात्रं यावन्ति सन्ति चानन्दसंज्ञके ॥३०॥ तावद्युगसहस्राणि वैकुण्ठे मोदते नरः। यज्जन्म दुर्लभं प्राप्य वेदपारगः ॥३१॥ रम्यं पवित्रमानन्ददायकं च मनोहरम्। आनन्दसंज्ञकं रामायणं पुण्यवर्धनम् ॥३२॥ रामायणमिदं येऽत्र भक्त्या शृण्वन्ति मानवाः। पुत्रैः पौत्रैः सुहृद्भिश् च वियोगं लभन्ते ते ॥३३॥ रामायणमिदं येऽत्र भक्त्या शृण्वन्ति मानवाः। भर्त्रा प्राणवरायाऽत्र न कदापि हि जायते ॥३४॥ आनन्दसंज्ञकं पुण्यं यत्र शृण्वन्ति ये स्त्रियः। सौभाग्यनगरत्यागं ता न गच्छन्ति यथा रमा ॥३५॥ ग्रामं देशान्तरं गन्तुं न गताथ यिरे नराः। तद्भाग्यावगत्यर्थं हि पठनायमिदं सदा ॥३६॥ येषां भावान् करोत्यत्र लब्धुं संरभते मनः। आनन्दसंज्ञकं वस्तु पठनाय प्रयत्नतः ॥३७॥ प्रथमे दिवसे काण्डमेकं, पठे दुभयं नवार्थं च द्वितीये च द्वितीये दिवसे पठेत् ॥३८॥ एवं क्रमेण काण्डानां वृद्धिं नीत्वा नवं दिनं नव काण्डानि नवमे दिवसे सम्पटेश्नरः ॥३९॥ अष्ट काण्डानि दशमे इत्यादिना च मनस्वी। ततश्चाष्टदिनैश्चैवानुष्ठानान्मोदं महत् ॥४०॥ अथवा क्रमण काण्डानि प्रथमं प्रथमं पठेत्। द्वितीये च द्वितीयाश्च नवमं नवमे दिने ॥४१॥ दशमं दशमं प्रोक्तं क्षयः कार्यः क्रमेण हि। क्रमद्वयं दिनषट्कनुष्ठानं सुखप्रदम् ॥४२॥

पर सौ माष हनुमान्‌की मूर्ति बनाकर उसके आधे अथ इसकत्स माष अथवा जैसा अपना शक्ति हो, उसके अनुसार म.घतन। मूर्ति बनवाना चाहिए। इसे जनवन्तर । खल देकर या अपने हाथसे यह ग्रन्थ लिखकर इसमें विविध प्रकारके चित्र बनाय और अच्छी तरह मशोधन करे। फिर दक्षिणाके साथ इस रामायणको रेशमी कपड़ेके टुकड़ाम बाँधकर हनुमान्‌जीके कन्धेपर रखकर ॥२४-२७॥ फिर दोपहर के समय इसका यथा कहन-शास्त्र विधिवत् सत्कार अर प्रहार्यका पूजा करे। उस अच्छे-अच्छे वस्त्र पहनाव और वह हनुमान्‌की प्रतिमा तथा पुस्तक उस ब्राह्मणका दान दे दे। ॥२८॥ इस तरह दान करनका जो फल होता है, वह में तुमको बतलाता हूँ, सूर्यग्रहण लगनेपर कुरुक्षेत्रम एक करोडभार सुवर्ण दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उससे खण्डा-गुणा अधिक फल इस प्रकार आनन्दरामायणका दान करनेसे प्राप्त होता है। ऐसा करनेपर इस आनन्दरामा-यणमे जित्तन अक्षर हैं, उतने हजार युग तक प्राणी वैकुण्ठके मध्य आनन्द करता है। इसके बाद सात जन्म तक विप्रके घरम उसका जन्म होता है और इस प्रकार वह एक बरसों सच्चा ब्राह्मण होता है ॥२९ ३१॥ यह आनन्दरामायण पवित्र, रम्य, मनोहर एवं पुण्य देने वाला है। जो लोग इसका श्रवण करते हैं, वे अपने पुत्र पौत्र तथा मित्रास कभी भी वियुक्त नहीं होते ॥३२-३३॥ और जो स्त्रियाँ रामायण भक्तिपूर्वक सुनती हैं, वे अपनी प्रियतींस कभी भी वियुक्त नहीं होती। जो स्त्रियाँ इस ग्रन्थका श्रवण करती हैं, वे लक्ष्मीकी तरह सुखी रहता हुई कभी भी अपने असल गतस वियुक्त नहीं होती ॥३४, ३५॥ इस विश्वास करनेवाले किन्हीं गाँव, देशा-न्तर अथवा तीर्थयात्राको गय हों तो उन्हें कुशलपूर्वक लानेके लिए इस आनन्दरामायणका पाठ करना चाहिए ॥३६॥ जिनका अपने किसी भावको सिद्ध करनेके लिए मन चंचल हुआ हो और उस कार्यको पूर्ण करना चाहते हों तो वे प्रयत्नपूर्वक इस आनन्दरामायणका पाठ करें ॥३७॥ पहले रोज एका काण्ड, दूसरे रोज पहला और दूसरा इन दो काण्डोका पाठ करे। इसी प्रकार फिर पहला, दूसरा और तीसरा इन तीना काण्डोंका, इस क्रम-से बढ़ाता हुआ नवें रोज नवा काण्डोंका पाठ करे। ॥३८-३९॥ फिर आठवे रोज आठ काण्ड, सातवें दिन

सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७९१


अथवा पृथक् काण्डेषु सर्गवृद्धिक्षयः क्रमात् । एकोनदिनतुल्यैस्तु मासैश्चरेद्व्रतम् ॥४३॥
अथवा प्रथमे सर्वस्त्वेक एव पठेद्ब्रहः । द्वौ सर्गौ च द्वितीयेऽह्नि वृद्धिक्षेद्वैक्रमेण हि ॥४४॥
नवोत्तरशते प्राप्ते दिने वृत्तं त्रिसप्तकं पठेत् । पुनः सप्ताष्टक्रमाच्चैव सप्तदिनोत्तरैः ॥४५॥
सप्तमासैरनुष्ठानं ज्ञेयं कार्येकसाधकम् । अथवा प्रथमे चाह्नि सर्गं प्राथमिकं पठेत् ॥४६॥
द्वितीयेऽह्नि द्वितीयञ्च तृतीयेऽह्नि तृतीयकम् । नवोत्तरशते प्राप्ते दिने च चरमं पठेत् ॥४७॥
दशोत्तरशते प्राप्ते ह्यष्टोत्तरशताभिधम् । पठेन्मार्गं क्रमेणैव शिष्य सप्तदिनोत्तरैः ॥४८॥
सप्तमासैरनुष्ठानं ज्ञेयं साधारणं नृणाम् । पञ्चानुष्ठानभेदाश्च मयैवं परिकीर्तिताः ॥४९॥
अनुष्ठानसमाप्तौ हि होमः कार्यो यथाविधि । पृथक् श्लोकं समुच्चार्य स्वाहांतं पायसैः फलैः ॥५०॥
नवान्नेनाथवा कार्यो होमो द्विजवरैः सह । ब्राह्मणान्भोजयेत्तस्य सङ्ख्यानदिनविस्तृतान् ॥५१॥
एतत्प्रातः समुत्थायानन्दरामायणं शुभम् । ये पठन्ति नरा भक्त्या ते सुखं प्राप्नुवन्ति हि ॥५२॥
द्वादशामपि चैतद्वै पठनीयं प्रयत्नतः । पारायणं नवदिनैः कार्यञ्चाशु सुखावहम् ॥५३॥
कांडं सर्गोऽथवा श्लोकस्त्वानन्दाख्यस्य प्रत्यहम् । नराः संकीर्त्तयन्त्येषां तेषां जन्म निरर्थकम् ॥५४॥
पुत्रार्थं रतिशालायां शृणोति पुरुषः स्त्रिया । विद्यायां वाऽप्यपुत्रोऽपुत्री पुत्रमवाप्नुयात् ॥५५॥
नवराशिषु व्रीहीणां ध्यात्वा कार्यं तु चिन्तयेत् । पूगीफलानि चत्वारि पूर्वेण कांडमुच्यते ॥५६॥
द्वितीयेन हि सर्गस्तु तृतीयेन फलेन हि । दशकोऽथ च विज्ञेयश्चतुर्थेन फलेन च ॥५७॥
श्लोको ज्ञेयः पूर्वराशेः सर्वेषां गणने रता । सर्वत्रांत्येन श्लोकेन विपरीतं फलं स्मृतम् ॥५८॥
एवं सर्वैर्दर्शनीयः शकुनश्च शुभोऽशुभः । एवं शिष्य मया चाद्य पृष्टं यत्तन्मयोदितम् ॥५९॥


सात काण्ड, छठे दिन छ काण्ड इस क्रमसे घटाता हुआ सत्रह दिनमें यह अनुष्ठान पूर्ण करे । वैसा न कर सके तो पहले रोज पहला, दूसरे दिन दूसरा, तीसरे दिन तीसरा, इस क्रमसे नौ रोजमें नौ काण्ड समाप्त करे । फिर दसवें रोज आठवां काण्ड, ग्यारहवें रोज सातवां काण्ड, इस क्रमसे घटाता हुआ सत्रह दिनोंमें यह अनुष्ठान पूर्ण करे ॥४०-४२॥ अथवा प्रत्येक कांडमें सर्गवृद्धिके क्रमसे पाठ करता हुआ सात महीनोंमें अनुष्ठान पूर्ण करे ॥४३॥ ऐसा भी न कर सके तो पहले रोज पहला सर्ग, दूसरे दिन दूसरा सर्ग, तीसरे दिन तीसरा सर्ग, इस क्रमसे एक सौ नौ दिनोंमें पूर्ण करके फिर उसी क्रमसे घटाये । इस अनुष्ठानमें भी सात ही महीनेका समय लगता है । इस अनुष्ठानको करनेसे एक कार्यकी सिद्धि हो सकती है। अथवा पहले रोज पहला सर्ग, दूसरे दिन दूसरा, तीसरे दिन तीसरा, इस क्रमसे पाठ करता हुआ एक सौ नवें दिन अन्तिम सर्गका पाठ करे ॥४४-४६॥ फिर एक सौ दसवें दिन एक सौ आठवां सर्ग, एक सौ ग्यारहवें दिन एक सौ सातवां सर्ग, इस क्रमसे पाठ करता हुआ सात महीनेमें इसे समाप्त करे । इस तरह मैंने अनुष्ठानके पांच भेद बताये । अनुष्ठान समाप्त हो जानेपर विधिवत् हवन करना चाहिए । होम करते समय ब्राह्मणोंके साथ बैठकर आनन्दरामायणके एक-एक श्लोकका उच्चारण करता हुआ खीर, फल अथवा नये अन्नसे हवन करें । हवन हो जानेपर जितने दिनोंका अनुष्ठान किया हो, उतने ब्राह्मणोंको भोजन कराये ॥४७-५१॥ जो लोग सवेरे उठकर इस रामायणका पाठ करते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं। द्वादशीको तो अवश्य इसका पाठ करना चाहिए । नौ दिनोंमें इसका सुखावह पारायण पूर्ण करना चाहिए ॥५२॥ ५३॥ जो लोग इस रामायणके एक काण्ड, एक सर्ग अथवा एक श्लोकका भी पाठ नहीं करते, उनका जन्म निरर्थक है ॥५४॥ जो मनुष्य अपनी स्त्रीके साथ रतिशालामें पुत्रप्राप्तिके लिए इस रामायणका श्रवण करता है, यह यदि पुत्रविहीन हो तो अवश्य पुत्र प्राप्त करता है ॥५५॥ अब प्रश्नकी रीति बताते हैं। अन्नकी नौ राशियें बनाकर अपने कार्यका ध्यान करे । इसके बाद चारों दिशाओंमें चार पूगीफल (सुपारी) रक्खे। पहली सुपारीमें कांड, दूसरीमें सर्ग, तीसरीमें दशक तथा चौथी सुपारीमें श्लोकका स्थापन करे। पूर्वकी राशिसे सबकी गणना करनी चाहिए । सब जगह जो अन्तिम श्लोक निकले, उससे विपरीत फल होता है ॥५६-५९॥

काण्डानि यस्मिन्नव कीर्तितानि ते हे विष्णुदासाघहरं मनोहरम् ॥६०॥

७९२आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

आनन्दरामायणमेतदुत्तमं नवोत्तरं सर्गशतं मयेरितम् ।
काण्डानि यस्मिन्नव कीर्तितानि ते हे विष्णुदासाघहरं मनोहरम् ॥६०॥
दिने दिने पापचयान्प्रकुर्व्वन्नरः पठेत् श्लोकमपीह भक्त्या।
विमुक्तसर्वापचयः प्रयाति रामस्य सालोक्यमनन्यलभ्यम् ॥६१॥
आनन्दरामायणमेतदुत्तमं हे रामदासस्य मुखेन कीर्त्तितम् ।
श्रीराघवेणैव जनाघनाशनं नानाचरित्रैर्वरकौतुकैर्युतम् ॥६२॥
धन्यः स वाल्मीकिमुनिः कवीश्वरो रामायणं वै शतकोटिनिर्मितम् ।
कृतं पुरा येन सविस्तरं शुभं यस्माच्च सारं कथितं मया तव ॥६३॥
आनन्दरामायणमेतदुत्तमं श्रीजानकीक्रीडनकौतुकैर्युतम् ।
शृण्वन्ति गायन्ति वदन्ति चाऽपरान्कुर्व्वन्ति पारायणमादराच्च ये ॥६४॥
लभंति पुत्रानतिबुद्धिमत्तरान्स्त्रींश्चापि पौत्रान्परमान्मनोहरान् ।
धनानि धान्यानि पशूंश्च मानवाः श्रीरामचन्द्रस्य पदं प्रयांति ते ॥६५॥
आनन्दसंगं पठतश्च नित्यं श्रोतुश्च भक्त्या लिखितुश्च रामः ।
अतिप्रसन्नश्च सदा समीपे सीतासमेतः श्रियमातनोति ॥६६॥
आनन्दरामायणजाह्नवीयं पापापर्हत्री मलिनस्य जंतोः ।
आनन्दरामायणकामधेनुस्त्रियं जनानामभिकामदोग्ध्री ॥६७॥
रामायणं जनमनोहरमादिकाव्यं ब्रह्मादिभिः सुरवरैरपि संस्तुतं च ।
श्रद्धान्वितः पठति शृणुयान्त्स नित्यं विष्णोः प्रयाति सदनं स विशुद्धदेहः ॥६८॥
नवोत्तरशतैः सर्गे रामकीर्तनमालिकाम् । कृत्वा कण्ठे सुखं तिष्ठ शिष्येमां त्वं मयोदिताम् ॥६९॥

श्रीशिव उवाच

आनन्दरामचरितमिदं स्वीयगुरोर्मुखात् । श्रुत्वा स विष्णुदासस्तं ननामाऽर्च्य पुनः पुनः ॥७०॥


प्रकार लोगोंको चाहिए कि शुभाशुभ फल जानना हो तो इस शकुनसे जान लें। हे शिष्य ! तुमने हमसे जो कुछ पूछा, वह मैंने बतलाया ।। ५९ ।। इस तरह हमने तुमको एक सौ नौ सर्गोंवाली यह उत्तम रामायण सुनायी । इसमें समस्त पापोंको हरनेवाले नौ कांड कहे गये हैं ॥ ६० ॥ दिनों दिन पाप करनेवाला मनुष्य भी यदि इस रामायणके एक श्लोकका भी पाठ करता है तो उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं और वह रामके चरणोंकी सालोक्य मुक्ति प्राप्त करता है ॥ ६१ ॥ इस आनन्दरामायणको श्रीरामदासने सुनाया है, जिसमें रामचन्द्रजी-की अनेक कौतुकमयी कथायें वर्णित हैं ।। ६२ ।। कवीश्वर वाल्मीकि ऋषि धन्य हैं कि जिन्होंने सौ करोड़ श्लोकोंमें विस्तारपूर्वक रामचरितका वर्णन किया है। उसीका सारांश मैंने तुम्हें सुनाया है ॥ ६३ ॥ जो लोग श्रीसीताजीकी क्रीडाओंसे युक्त इस आनन्दरामायणका सादर श्रवण और गायन करते अथवा औरोंको सुनाते हैं, वे बड़े बुद्धिमान् लोग पुत्र, स्त्री, विशाल वैभव, अन्न तथा उत्तम पशुओंको प्राप्त करते हैं और अन्तमें रामचन्द्रजीके चरणोंको प्राप्त होते हैं ॥ ६४ ।। ६५ ।। जो प्राणी नित्य इस आनन्दरामायणका पाठ करते, सुनते अथवा लिखते हैं। उनपर रामचन्द्र परम प्रसन्न होकर सीताके साथ उनके हृदयमें विराजमान रहते हुए सब तरहसे उनका कल्याण करते हैं ॥ ६६ ॥ यह आनन्दरामायणरूपिणी गङ्गा पापियोंके समस्त पाप हरती है और आनन्दरामायणरूपिणी यह कामधेनु भक्तोंकी सब कामना पूर्ण करती है ॥ ६७ ॥ यह आनन्दरामायण अति मनोहर और ब्रह्मादि देवताओंसे भी संस्तुत है। जो श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करते हैं, वे लोग विशुद्धकाय होकर अन्तमें विष्णुभगवान्के लोकको पाते हैं। हे शिष्य ! एक सौ नौ सर्गोंवाली इस रामकीर्तनरूपिणी मालाको धारण करके तुम जहाँ चाहो, सुखसे रहो ।। ६८ ।। ६९ ।। श्रीशिवजी बोले—अपने गुरु श्रीरामदासके मुखसे इस

सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७९३

सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७९३

रामदासः स्वशिष्यायानंदरामायणं प्रिये । एवमुक्त्वा मुनिः संध्यां कर्तुं गोदां गमिष्यति ॥७१॥ एवं देवि तवाग्रेऽद्य मयाऽपि परिकीर्तितम् । आनन्दरामचरितं श्रवणात्पुण्यवर्धनम् ॥७२॥ रामकीर्तनमालायां मेरुस्थानं स्वयं महान् । सर्गो मया ते कथितः श्रवणान्मङ्गलप्रदः ॥७३॥

श्रीपार्वत्युवाच
यदा वाल्मीकिना देव कृतं रामायणं वरम् । तदा क्व रामदासः स मंत्रादोऽपिस्त्वयाऽकथि ॥७४॥
क्व तदा विष्णुदासोऽपि संशयो मेऽत्र जायते ।

श्रीशिव उवाच
त्रिकालज्ञा ज्ञानदृष्ट्या मुनिनाऽत्र कथान्तरे ॥७५॥
उभयोर्भाषितं संवादः सोऽपि पूर्वं प्रवर्णितः । यथा रामस्य चरितं रामान्पूर्वं प्रवर्णितम् ॥७६॥
संदेहोऽत्र त्वया नैव कार्यः पर्वतकन्यके । रामदासमुखेनैतद्राघवेणैव वर्णितम् ॥७७॥
आनन्दरामायणमादरेण श्रीरामचन्द्रेण मुनेर्मुखेन ।
तद्रामदासस्य मुखैव चोक्तं भक्तिप्रदं मुक्तिदमैतदद्य ॥७८॥
आनन्दरामायणमादरेण पुत्रे प्रसूते पठनीयमेतत् ।
विवाहकाले व्रतबन्धकाले श्राद्धे पठेत्पर्वणि मङ्गले च ॥७९॥
आनन्दरामायणमादरेण कारागृहस्थस्य विमुक्तये च ।
उत्पातशांत्यै भयनाशनाय प्रभोः कृपार्थं पठनीयमादरात् ॥८०॥
आनन्दरामायणमादरेण शृणोति वा श्रावयते च भक्त्या ।
स स्वीयकामानाखिलानवाप्य वैकुण्ठलोकं खलु गच्छति खेः ॥८१॥
आनन्दरामायणतोऽधिकानि न संति तीर्थानि हरेः स्थलानि ।
क्षेत्राण दानान्यपि पुण्यदानि तथा पुराणान्यथ कीर्तितानि ॥८२॥


प्रकार आनन्दरामायणको सुननेके बाद विष्णुदासने इस ग्रन्थका पूजन करके वारम्बार प्रणाम किया ॥७०॥ हे प्रिये ! रामदास अपने शिष्यको यह आनन्दरामायण सुनाकर सन्ध्या करनेके लिए गोदावरीके तटपर चले गये ॥ ७१ ॥ हे देवि ! जिस तरह रामदासने अपने शिष्यको यह आनन्दरामायण सुनायी थी, उसी तरह मैने भी पुण्यवर्द्धक इस उत्तम रामचरितका वर्णन कर दिया है ॥ ७२ ॥ रामके गुणोंका गान करने-वाली अनेक ग्रंथमालायें हैं। उनमें यह आनन्दरामायण सुमेरुके समान विराजमान है। इस रामायणमें भी जो सर्गोंकी माला है, उसमें यह सर्ग सुमेरुकी तरह है। इसका श्रवण करनेसे सर्वथा मङ्गल होता है ॥ ७३ ॥ श्रीपार्वतीजीने कहा-हे देव ! जब श्रीवाल्मीकिजीने यह रामायण बनायी थी, तब रामदास और विष्णुदास कहाँ थे ? जिनका संवाद आपने मुझे सुनाया। यह मेरे हृदयमें एक महान् संदेह उत्पन्न हो गया है। श्रीशिवजी बोले-हे पार्वती ! वाल्मीकिजीने अपनी त्रिकालदर्शिता दृष्टिसे इस भावी संवादको पहले ही जान लिया था। इसी कारण संवाद होनेके पहले ही उसका वर्णन कर दिया। जैसे उन्होंने रामजन्मसे पहले रामायण लिख दी थी। हे पर्वतकन्यके ! तुम इस विषयमें किसी प्रकारका संदेह न करो। रामदासके मुखसे साक्षात् रामचन्द्रजीने स्वयं इस चरित्रका वर्णन किया है। उन मुनिके मुखसे स्वयं रामचन्द्रजीने आदरपूर्वक इस रामायणको कहा है। इसीलिए यह इस संसारमें भक्ति और मुक्ति देनेवाली वस्तु बन गयी है ॥ ७४-७८ ॥ लोगोंको चाहिए कि पुत्र होनेपर, विवाहमें, यज्ञोपवीतमें, श्राद्धमें तथा किसी मङ्गलमय कार्यके समय आनन्दरामायणका पाठ अवश्य करें ॥ ७९ ॥ यदि कोई मनुष्य कारागारमें हो और उसे छुड़ानेकी आवश्यकता आ पड़े अथवा किसी उत्पात तथा भयको शांत करना हो अथवा भगवान्की कृपा प्राप्त करनी हो तो आदरपूर्वक इसका पाठ करना चाहिए ॥ ८० ॥ जो मनुष्य आनन्दरामायणका आदरपूर्वक पाठ करते या सुनते-सुनाते हैं, वे अपनी समस्त कामनायें पूर्ण करके अन्तमें वैकुण्ठलोकको जाते हैं ॥ ८१ ॥ आनन्दरामायणसे बढ़कर तीर्थ, भगवन्मन्दिर, क्षेत्र, दान तथा पुराण

७९४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

आनन्दरामायणमेतदुत्तमं प्रोक्तं मया ते गिरिजे सविस्तरम् ।
संस्मृत्य पापापहरं निरन्तरं मनोहरं लप्स्यसि राघवे मतिम् ॥८३॥

आदौ हत्वा दशास्यं द्विजवचनपुरस्त्वेन यात्राश्च यज्ञान्
कृत्वा भुक्त्वातिभोगानवनितलविशीर्णां गृहीत्वाऽथ सीताम् ।
लब्ध्वा नानावस्तुपास्तान्त्यजनिमगतान्पार्थिवादींश्च जित्वा
कृत्वा नानोपदेशान् गजपुरनिकटे स्वार्थलोकं जगाम ॥८४॥

वामे भूमिसुता पुरस्तु हनुमान्पृष्ठे सुमित्रासुतः
शत्रुघ्नो भरतश्च पार्श्वदलयोर्वायव्यकोणादिषु ।
सुग्रीवश्च विभीषणश्च युवराट् तारासुतो जाम्बवान्
मध्ये नीलसरोजकोमलरुचिं रामं भजे श्यामलम् ॥८५॥

आनन्दरामायणहारदीपमं ये पूर्णकाण्डं चरमं नरोत्तमाः ।
पठंति शृण्वंति हरेः परं पदं गच्छंति पूर्णेप्सितमालभंति ते ॥८६॥

आनन्दरामायणमेतदुत्तमं जप्यं पवित्रं श्रवणीयमादरात् ।
यन्मङ्गलानामति मङ्गलप्रदं स्मरामि नित्यं प्रणमामि सादरम् ॥८७॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितामृते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पूर्णकाण्डे उमामहेश्वर-संवादे तथा रामदासविष्णुदाससंवादे ग्रंथसंख्याकीर्तनं नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥


मादिका श्रवण, इनमेंसे एक भी नहीं है ॥ ८२ ॥ हे गिरिजे ! मैंने विस्तारपूर्वक यह उत्तम आनन्द-रामायण तुम्हें सुना दिया। तुम इस पापापहारी चरित्रका निरन्तर मनन किया करो। ऐसा करनेसे तुम्हें सुन्दर भगवद्भूति प्राप्त होगी और तुम्हारी बुद्धि रामकी ओर दौड़ पड़ेगी ॥ ८३ ॥ रामने पहले रावणका वध किया। फिर ब्राह्मणके वचनका सम्मान करते हुए तीर्थोंकी यात्रायें कीं और बहुतसे यज्ञ किये। फिर विविध प्रकारके भोगोंको भोग करके पातालमें जाती हुई सीताको उबारा। तदनन्तर पृथ्वीतलके अनेक राजाओंको जीतकर बहुत सा वस्तुरत्न लाये। तत्पश्चात् लोगोंको विविध प्रकारका उपदेश देकर वे हस्तिनापुरके समीप गंगातटसे अपने परम धामको चले गये ॥ ८४ ॥ जिन रामचन्द्रजीके वाम भागमें सीता, आगे हनुमान्जी, पीछे लक्ष्मण, शत्रुघ्न तथा भरत, दायें-बायें एवं वायव्य आदि कोणोंमें सुग्रीव, विभीषण, अङ्गद तथा जाम्बवान् विराजमान हैं। उन सबके मध्यमें नीलकमलकी नाईं सुशोभित श्यामवर्ण श्रीरामचन्द्रजीका मैं भजन करता हूँ ॥ ८५ ॥ जो लोग हारकी भाँति सुन्दर इस अन्तिम पूर्णकाण्डका पाठ करते या सुनते हैं, वे परम पदको प्राप्त होते हैं और उनकी सब कामनायें पूर्ण हो जाती हैं ॥ ८६ ॥ लोगोंको चाहिए कि इस पवित्र आनन्दरामायणका आदरपूर्वक कीर्तन तथा श्रवण किया करें। क्योंकि यह मङ्गलोंका भी मङ्गल-दाता है। इसी कारण मैं तो नित्य इसका आदरपूर्वक स्मरण और नमन करता हूँ ॥ ८७ ॥ इति श्रीशतकोटि-रामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे गोण्डामण्डलान्तर्गतसिसई (टिकरिया) ग्रामनिवासि पं० रामदत्तात्मज पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते पूर्णकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥

॥ इति पूर्णकाण्डं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥

श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु
समाप्तोऽयं ग्रन्थः