श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 796, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७७९
शङ्खो बभूव भरतः शार्ङ्गपा० मध्यवन्तरं । रामे करे बभूवाथ शत्रुघ्नश्च सुदर्शनम् ॥१६॥ दैवेषु विविशुः सर्वे ये चाग्रे ह्यवागताः । चांडालकृमिकीटांस्ता अयोध्यापुरवासिनः ॥१७॥ प्रापुस्ते दिव्यदेहानि विमाने संस्थिता बहुः । तदा निनदुर्वादित्राणि देवानां गगनांगणे ॥१८॥ स्वर्पुर्दैवपत्यश्च पुष्पवृष्टिमिदंगताः । ननृतुश्चाप्सरो नगुर्गन्धर्वकिंनराः ॥१९॥ प्रणनाम तदा तार्क्ष्यः श्रीविष्णुं रश्मिसुप्रभम् । देहानि मुमुचुः सर्वे श्रोभिः सोमादिकाश्च ते ॥२०॥ पतिदेहानि चालिंग्य तदा ता ऊर्मिलादिकाः । इदामन्यौ जहुः सर्वा रम्ये भागीरथीजले ॥२१॥ अथ ता देवकन्याश्च रत्नदीपैः सहस्रशः । विष्णुं नीरजवासाद्यमलक्ष्मीयुक्तं महाभुजम् ॥२२॥ विष्णुनन्तोऽब्रवीद्वाक्यं पद्मजं मधुरं शनैः । प्रयोभ्यावासिनः सर्वे तिर्यङ्स्थावरद्रवः शुभाः ॥२३॥ एते समागता ब्रह्मण्तेषां स्थानं वदाधुना । तद्विष्णोर्वचनं श्रुत्वा तदा ब्रह्माऽब्रवीद्वचः । २४॥ मल्लोकादुपरिष्टाच्च लोकाः सांत्वानिकाऽभिधान् । इमे यांतु जनाः सर्वे मद्दद्दर्शनमलोन्मखाः ॥२५॥ ततः प्राह पुनर्विष्णुर्योऽप्याया! मृताश्च ये । अग्रे तेऽपि समायांतु लोकान्सान्त्वानिकाञ्छुभान् । २६॥ एवेति म गिरिः प्राह महाविष्णुं मुदाम्वितः । ततस्ते दिव्यदेहाश्च सर्वेऽयोध्यावासिनः ॥२७॥ नानाविमानमारूढाश्च दिव्यवस्त्रविभूषिताः । दिव्यलंकारसंयुक्ता दप्सरोभिस्केपिताः ॥२८॥ ताननुगंधगधर्वाद्यैश्यामरैर्जिताः । विरेचुर्गगने चन्द्रवदना रतिमानुगाः ॥२९॥ ततो ब्रह्मादयो देवाः प्रणेमुर्विष्णुमादरात् । तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैर्वेदघोषैर्महर्षयः ॥३०॥ तदा तुष्टाव शत्रुघ्नं विष्णुं त्रैलोक्यपालकम् । वनमालां दधानं तं दिव्यचन्दनचर्चितम् ॥३१॥
रूपमें और लक्ष्मण फणीश सुशोभित रूप भगवान्के स्वरूपमें परिणत हो गये ॥ १५ ॥ भरतजी शंखके रूपमें परिवर्तित होकर विष्णुभगवान्के दाहिने हाथमें जा विराजे । शत्रुघ्नजी विष्णुके सुदर्शनचक्र बनकर बांये हाथमें जाके जमा लिया ॥ १६ ॥ यहाँपर जितने बंदर थे, वे सब जल भये अपने अपने अंशरूपमें देवलोक शरीरोंमें प्रविष्ट हो गये । चाण्डालसे लेकर कृमि-कीट पर्यन्त सभी अयोध्यानिवासी अपने-अपने शरीरोंको छोड़कर दिव्य देह धारण करके विमानोंपर सुशोभित होने लगे । उस समय गगनांगणमें देवताओंके विविध प्रकारके बाजे बज रहे थे । १७-१८॥ देवांङ्गनाएं प्रेमपूर्वक कुसुमवर्षा कर रही थीं, अप्सरावें नाच रही थीं और गन्धर्वगण तरह-तरहके गायन गा रहे थे । १९ ॥ उसी समय गरुडन आकर भूमण्डलमें देदीप्यमान भगवान्को दण्डवत् प्रणाम किया। उधर सब बर्गि राजाओंने भी अपना स्त्रियों समेत अपने-अपने शरीरोंको छोड़ दिया ॥२०॥ इन सागार परम धाम बजे जानक बाद ऊर्मिला, माण्डवी तथा श्रुतकान्तिने अपने-अपने पतिके शरीरका आलिंगन करके चितामें जलकर शरीर छोड़ दिया ॥ २१ ॥ उधर समस्त देवताओंकी स्त्रियोंने हजारों रत्न-मय दीपक जलाकर लक्ष्माके हसन विष्णुभगवान्की आरती उतारी ॥ २२ ॥ कुछ देर बाद विष्णुभगवान्ने ब्रह्मासे कहा कि मेरे साथ जो अयोध्याके सब पुरवासी तथा तिर्यंचयानि तकके प्राणी यहाँ आये हैं, इनके लिए कोई स्थान बतलाइए । विष्णुभगवान्की बात सुनकर ब्रह्माजी बोले कि आपके दर्शनसे ये पवित्र प्राणी मेरे लोकके भी ऊपर एक सान्त्वानिक लोक है-वहीं हो जाकर निवास करें ॥ २३-२५ ॥ इसके बाद विष्णु भगवान्ने फिर कहा कि इनके अतिरिक्त भी जो प्राणी अयाध्यामें शरीर त्याग करें वे सब सान्त्वानिक लोक प्राप्त करें ॥२६॥ ब्रह्माजीने भगवान्की यह बात भी स्वीकार कर ली। इसके अनन्तर वे सब अयोध्यावासी दिव्य शरीर धारण करके नाना प्रकारके विमानोंपर जा बैठे। उस समय वे लोग अच्छे-अच्छे पहने-कपड़े पहने थे और कितनी ही सुन्दर अप्सरा। उनके शरीरोंसे सुगन्ध डाल रहा थी। उनपर दिव्य चमर चल रहे थे। सुर्यके समान देदीप्यमान तथा चन्द्रमुखी नारियाँ सब प्रकारकी सेवायें कर रही थीं ॥ २७-२९ ॥ तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओंने विष्णुभगवान्को प्रणाम किया और बड़े-बड़े ऋषि वेदकी ऋचाओंसे भगवान्की स्तुति करने लगे ॥ ३० ॥ उस लागोंके बाद श्रीशत्रुघ्नजी त्रैलोक्यरक्षक विष्णुभगवानकी स्तुति करने लगे। उस