भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 808, कुल 811 में से

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पृष्ठ 808

सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७९१


अथवा पृथक् काण्डेषु सर्गवृद्धिक्षयः क्रमात् । एकोनदिनतुल्यैस्तु मासैश्चरेद्व्रतम् ॥४३॥
अथवा प्रथमे सर्वस्त्वेक एव पठेद्ब्रहः । द्वौ सर्गौ च द्वितीयेऽह्नि वृद्धिक्षेद्वैक्रमेण हि ॥४४॥
नवोत्तरशते प्राप्ते दिने वृत्तं त्रिसप्तकं पठेत् । पुनः सप्ताष्टक्रमाच्चैव सप्तदिनोत्तरैः ॥४५॥
सप्तमासैरनुष्ठानं ज्ञेयं कार्येकसाधकम् । अथवा प्रथमे चाह्नि सर्गं प्राथमिकं पठेत् ॥४६॥
द्वितीयेऽह्नि द्वितीयञ्च तृतीयेऽह्नि तृतीयकम् । नवोत्तरशते प्राप्ते दिने च चरमं पठेत् ॥४७॥
दशोत्तरशते प्राप्ते ह्यष्टोत्तरशताभिधम् । पठेन्मार्गं क्रमेणैव शिष्य सप्तदिनोत्तरैः ॥४८॥
सप्तमासैरनुष्ठानं ज्ञेयं साधारणं नृणाम् । पञ्चानुष्ठानभेदाश्च मयैवं परिकीर्तिताः ॥४९॥
अनुष्ठानसमाप्तौ हि होमः कार्यो यथाविधि । पृथक् श्लोकं समुच्चार्य स्वाहांतं पायसैः फलैः ॥५०॥
नवान्नेनाथवा कार्यो होमो द्विजवरैः सह । ब्राह्मणान्भोजयेत्तस्य सङ्ख्यानदिनविस्तृतान् ॥५१॥
एतत्प्रातः समुत्थायानन्दरामायणं शुभम् । ये पठन्ति नरा भक्त्या ते सुखं प्राप्नुवन्ति हि ॥५२॥
द्वादशामपि चैतद्वै पठनीयं प्रयत्नतः । पारायणं नवदिनैः कार्यञ्चाशु सुखावहम् ॥५३॥
कांडं सर्गोऽथवा श्लोकस्त्वानन्दाख्यस्य प्रत्यहम् । नराः संकीर्त्तयन्त्येषां तेषां जन्म निरर्थकम् ॥५४॥
पुत्रार्थं रतिशालायां शृणोति पुरुषः स्त्रिया । विद्यायां वाऽप्यपुत्रोऽपुत्री पुत्रमवाप्नुयात् ॥५५॥
नवराशिषु व्रीहीणां ध्यात्वा कार्यं तु चिन्तयेत् । पूगीफलानि चत्वारि पूर्वेण कांडमुच्यते ॥५६॥
द्वितीयेन हि सर्गस्तु तृतीयेन फलेन हि । दशकोऽथ च विज्ञेयश्चतुर्थेन फलेन च ॥५७॥
श्लोको ज्ञेयः पूर्वराशेः सर्वेषां गणने रता । सर्वत्रांत्येन श्लोकेन विपरीतं फलं स्मृतम् ॥५८॥
एवं सर्वैर्दर्शनीयः शकुनश्च शुभोऽशुभः । एवं शिष्य मया चाद्य पृष्टं यत्तन्मयोदितम् ॥५९॥


सात काण्ड, छठे दिन छ काण्ड इस क्रमसे घटाता हुआ सत्रह दिनमें यह अनुष्ठान पूर्ण करे । वैसा न कर सके तो पहले रोज पहला, दूसरे दिन दूसरा, तीसरे दिन तीसरा, इस क्रमसे नौ रोजमें नौ काण्ड समाप्त करे । फिर दसवें रोज आठवां काण्ड, ग्यारहवें रोज सातवां काण्ड, इस क्रमसे घटाता हुआ सत्रह दिनोंमें यह अनुष्ठान पूर्ण करे ॥४०-४२॥ अथवा प्रत्येक कांडमें सर्गवृद्धिके क्रमसे पाठ करता हुआ सात महीनोंमें अनुष्ठान पूर्ण करे ॥४३॥ ऐसा भी न कर सके तो पहले रोज पहला सर्ग, दूसरे दिन दूसरा सर्ग, तीसरे दिन तीसरा सर्ग, इस क्रमसे एक सौ नौ दिनोंमें पूर्ण करके फिर उसी क्रमसे घटाये । इस अनुष्ठानमें भी सात ही महीनेका समय लगता है । इस अनुष्ठानको करनेसे एक कार्यकी सिद्धि हो सकती है। अथवा पहले रोज पहला सर्ग, दूसरे दिन दूसरा, तीसरे दिन तीसरा, इस क्रमसे पाठ करता हुआ एक सौ नवें दिन अन्तिम सर्गका पाठ करे ॥४४-४६॥ फिर एक सौ दसवें दिन एक सौ आठवां सर्ग, एक सौ ग्यारहवें दिन एक सौ सातवां सर्ग, इस क्रमसे पाठ करता हुआ सात महीनेमें इसे समाप्त करे । इस तरह मैंने अनुष्ठानके पांच भेद बताये । अनुष्ठान समाप्त हो जानेपर विधिवत् हवन करना चाहिए । होम करते समय ब्राह्मणोंके साथ बैठकर आनन्दरामायणके एक-एक श्लोकका उच्चारण करता हुआ खीर, फल अथवा नये अन्नसे हवन करें । हवन हो जानेपर जितने दिनोंका अनुष्ठान किया हो, उतने ब्राह्मणोंको भोजन कराये ॥४७-५१॥ जो लोग सवेरे उठकर इस रामायणका पाठ करते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं। द्वादशीको तो अवश्य इसका पाठ करना चाहिए । नौ दिनोंमें इसका सुखावह पारायण पूर्ण करना चाहिए ॥५२॥ ५३॥ जो लोग इस रामायणके एक काण्ड, एक सर्ग अथवा एक श्लोकका भी पाठ नहीं करते, उनका जन्म निरर्थक है ॥५४॥ जो मनुष्य अपनी स्त्रीके साथ रतिशालामें पुत्रप्राप्तिके लिए इस रामायणका श्रवण करता है, यह यदि पुत्रविहीन हो तो अवश्य पुत्र प्राप्त करता है ॥५५॥ अब प्रश्नकी रीति बताते हैं। अन्नकी नौ राशियें बनाकर अपने कार्यका ध्यान करे । इसके बाद चारों दिशाओंमें चार पूगीफल (सुपारी) रक्खे। पहली सुपारीमें कांड, दूसरीमें सर्ग, तीसरीमें दशक तथा चौथी सुपारीमें श्लोकका स्थापन करे। पूर्वकी राशिसे सबकी गणना करनी चाहिए । सब जगह जो अन्तिम श्लोक निकले, उससे विपरीत फल होता है ॥५६-५९॥

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