श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 805, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें७८८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
ग्रंथश्रुतिफलादीनि नवमे कीर्तितानि हि । नवमं पूर्णकाण्डं सम्पूर्णं नवमं त्विदम् ॥६३॥
अनुक्रमणिका चेयं मया शिष्य प्रवर्णिता । अस्याः श्रवणमात्रेण रामायणश्रुतेः फलम् ॥६४॥
रामायणपुस्तकस्य नित्यं कार्यं प्रपूजनम् । विशेषं पूजनस्यापि शृणु शिष्य वदामि ते ॥६५॥
सारकांडे विभोः स्थाने लक्ष्मणार्ये द्वितीयकम् । नवायतनगेह्यर्थं शेषाणि स्थापयेत् क्रमात् ॥६६॥
सप्त कांडानि विधिवत्तेषां पूजनमाचरेत् । अथवा राज्यकांडस्य पूर्वार्धं रामहस्त्यले ॥६७॥
राज्यकांडस्योत्तरार्धं सीतास्थाने निवेशयेत् । लक्ष्मणार्ये सारकांडं शेषाण्यग्रे क्रमण तु ॥६८॥
एवं संस्थाप्य कांडानि तेषां पूजनमाचरेत् । नवायतनपूजायाः फलमेतेन कीर्तितम् ॥६९॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पूर्णकाण्डे
अनुक्रमणिकावर्णनं नाम अष्टमः सर्गः ॥८॥
नवमः सर्गः
( ग्रन्थकी फलश्रुति )
श्रीरामचन्द्र उवाच
सारं यात्रा च यागाख्यं विलासाख्यं तु जन्मकम् । विवाहाख्यं हि राज्याख्यं श्रीमनोहरपूर्णके ।१।
कांडान्यनुक्रमेणैवानन्दरामायणे नव । त्रयोदश सारकांडे सर्गा वाल्मीकिनेरिताः ।२।
यात्राकांडे नव ज्ञेया यागकांडेऽपि वै नव । नव ज्ञेया विलासाख्ये जन्मकांडेऽपि वै नव ॥३॥
नव ज्ञेया विवाहाख्ये चतुर्विंशाश्च राज्यके । मनोहराख्ये ज्ञातव्या सर्गा अष्टादशात्र वै ॥४॥
पूर्णकांडे नव ज्ञेयाः सर्गाः पापहरा नृणाम् । एवं नवोत्तरशतं १०९ सर्गा ज्ञेयाः शुभावहा ॥५॥
वंशो और सूर्यवंशी राजाओंकी मित्रताका वर्णन है । ६० । पाँचवें सर्गमें रामचन्द्रजीके द्वारा कुश आदिके विसर्जनकी कथा है । छठें सर्गमें गङ्गाके तटपर रामकी परमधामयात्राका वर्णन है ॥ ६१ ॥ सातवें सर्गमें सूर्यवंशी राजाओंका वर्णन है और आठवें सर्गमें आनन्दरामायणकी अनुक्रमणिका बतलायी गयी है ॥ ६२ ॥ नवें सर्गमें आनन्दरामायणके श्रवणका फल आदि वर्णित है। बस, पूर्णकांड यहीं समाप्त हो जाता है। हे शिष्य, इस प्रकार मैंने तुमको समस्त आनन्दरामायणकी अनुक्रमणिका बता दी। इस अनुक्रमणिकामात्रके सुननेसे समस्त रामायण सुननेका फल प्राप्त हो जाता है ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ भक्तोको चाहिए कि नित्य इस रामायणका पूजन करें। अब इसके पूजन जो विशेषताएँ हैं उन्हें बतलाता हूँ, सुनो ॥ ६५ ॥ सारकांडको भगवान् रामचन्द्रजी, दूसरे कांडको लक्ष्मण तथा तीसरे कांडको सीता समझकर स्थापित करे। इस तरह सात कांडोंमें क्रमशः नवायतनकी स्थापना करके पूजन करें अथवा राज्यकांडके पूर्वार्धभागको रामके स्थानमें तथा उत्तरार्धको सीताके स्थानमें स्थापित करके पूजन करना चाहिए और सारकांडको लक्ष्मणकी जगहपर स्थापित करके पूजन करें। इसी तरह शेष कांडोंको क्रमशः भरत आदिके स्थानमे स्थापित करके पूजन करना चाहिए । इस तरह इस रामायणकी पूजा करनेसे रामनवायतन-पूजनका फल प्राप्त होता है ॥ ६६-६९ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत-'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते पूर्णकाण्डोऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
श्रीरामदासने कहा-हे शिष्य ! सार, यात्रा, याग, विलास, जन्म, विवाह, राज्य, मनोहर तथा पूर्णकाण्ड ये ही इस रामायणके नौ काण्ड हैं। सारकाण्डमें वाल्मीकिजीने तेरह सर्ग, यात्राकांडमें नौ सर्ग, जन्मकांडमें नौ सर्ग, विवाहकांडमें नौ सर्ग, राज्यकांडमें चौबीस सर्ग, मनोहरकांडमें अठारह सर्ग और पूर्णकांडमें पापोंको हरण करनेवाले कुल नौ सर्ग हैं। इस तरह इस आनन्दरामायणमें कुल मिलाकर एक सौ नौ ( १०९ ) सर्ग हैं ॥ १-५ ॥