श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 804, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७८७
पञ्चदशे रामराज्यवर्णनं विस्तरात्कृतम् । वर्णिता राजनीतिः शास्त्रोक्तेनात्र षोडशे ॥४४॥ सप्तदशेऽत्र कथितं कुशकन्यास्वयंवरम् । अष्टादशे गवां प्रचुरं दानं द्विजन्मनाम् ॥४५॥ एकोनविंशे रामस्य दिनचर्येरिता शुभा । गवां विमोक्षणार्थं पुत्रैस्तु घोरसङ्ग्राम महान् ॥४६॥ एकविंशे राघवेण हास्ये दत्तो वरो मुदा । नानया तुलर्पापात्रं द्वाभ्यां संचितं शुभम् ॥४७॥ त्रयोविंशे स्मृताऽऽनन्दरामायणफलश्रुतिः । यथाशिक्षा वधूनां च धर्मशिक्षा च भूतले ॥४८॥ राज्यकाण्डं समाप्तं हि मनोहरमुदीर्यते । सर्गेऽत्र प्रथमे प्रोक्तं लघूपाख्यानं शुभम् ॥४९॥ नगराणां च मात्राणामुपदेशं द्वितीयेऽर्के । रामपूजोपशमनादि विप्रार्थं तृतीयेऽर्के ॥५०॥ रामनोभद्रविस्तारश्चतुर्थे समुदाहृतः । रामलिंगतोभद्राणां भद्राः प्रोक्ताश्च पञ्चमे ॥५१॥ नवमीव्रतविस्तारः षष्ठे प्रोक्तं च मन्त्रशं । श्रीरामनामां लघूव्याख्यानादि नि सप्तमे ॥५२॥ वेदादीनां हि सर्वेषामध्यनं फलमीरितम् । सार्द्धमासद्वयी पूजा कथिता नवमे विभोः ॥५३॥ दशमे चैत्रमासस्य महिमा समुदाहृतः । एकादशे मञ्जननामश्रवां गतिरीरिता ॥५४॥ अद्वैतं दर्शितं शक्ता ह्यग्रे चार्कद्वयस्यतु । बाहुप्रदस्य रामस्य कवचं च त्रयोदशे ॥५५॥ सीतायाः कनकदानं प्रोक्तमत्र चतुर्दशे । पञ्चदशे कवचानां सङ्ख्याता स्मृतानि हि ॥५६॥ व्रतं हनुमतः प्रोक्तं पताकारोप्य हि षोडशे । प्रोक्तं सप्तदशे माहात्म्यंयत्त्वनुत्तमम् ॥५७॥ अष्टादशे शरभंगो मण्डनं च हनूमता । अत्र मनोहरं काण्डं पूर्णकाण्डमथोच्यते ॥५८॥ वाल्मीकिना मोक्षवंशाविस्तारः प्रथमेऽकथि । रामचन्द्रस्य प्रयाणं द्वितीये हस्तिनापुरम् ॥५९॥ सूर्यसोमवंशजयोर्युद्धं प्रोक्तं तृतीयेऽर्के । सोमवंशराजनामकित्तिकीं च चतुर्थके ॥६०॥ कुशादीनां गद्यपद्यं पञ्चमेऽत्र विसर्जनेषु । वैकुण्ठारोहणं षष्ठे गङ्गायां शय्यरूपं च ॥६१॥ सप्तमे सर्वग्रंथायनुज्ञाणां वर्णनं कृतम् । अनुक्रमणिकानाम्रं प्रोक्तं पञ्चमष्टमो महान् ॥६२॥
द्वारा चार स्त्रियोंकी व्याख्याशन्ति, बारहवें सर्गमें सोलह श्लोककी बदरंग नामका वृत्तान्त, तेरहवें सर्गमें दोपलके वृक्षकी हँसी, चौदहवन कार्तवीर्यके साथ जनमका वृत्तान्त है ॥ ४०-४३ ॥ पन्द्रहवें सर्गमें रामके राज्यका सविस्तार वर्णन और सोलहव सर्गमें गगकी कही राजनीति का चर्चा है ॥ ४४ ॥ सत्रहवें सर्गमें कुशकी कन्याका स्वयम्वर, अठारहव सर्गमें ब्राह्मणोंके लिए रामकाप्रचुरके गव्यका दान ॥ ४५ ॥ उन्नीसवें सर्गमें रामकी दिनचर्या और बीसवें सर्गमें एवं अश्वत्थागोथ राजाकतरकी चेष्टा कही गयी है ॥ ४६ ॥ इक्कीसवें सर्गमें दासीके लिये रामका वरदान, बाईसवें सर्गमें सीता द्वारा दूट तुल्ययोपात्रीं युन जोड़नेकी कथा है। तेईसवें सर्गमें आनन्दरामायणका श्रवणफल, चौबीसवें सर्गमें यमका शिक्षा एवं धर्मशिक्षाका वर्णन है ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ बस, राज्यकाण्ड यही ही समाप्त हो जाता है। अब मनोहरकाण्ड प्रारम्भ होता है। इसके पहिल सर्गमें लघूपाख्यान, दूसरे सर्गमें नगरवासियों तथा माताओंके लिए उपदेशदान, तीसरे सर्गमें रामपूजा और उपासनका सविस्तार वर्णन है ॥ ४९ ॥ ॥ ५० ॥ चौथे सर्गमें रामतोभद्रका विस्तार, पांचवें सर्गमें रामलिंगतोभद्रका विस्तार, छठे सर्गमें नवमीव्रतका विस्तार, सातवें सर्गमें लक्ष रामनामजपका उद्यापन है। ५१ ॥ ५२ । आठवें सर्गमें वेदिक सुननेका फल और नवमसर्गमें ढाई महीने तक रामके पूजनका विधान है ॥ ५३ ॥ दसवें सर्गमें चैत्रमासम पूजन करनेकी महिमा, ग्यारहवें सर्गमें चैत्रस्नानसे सबको सद्गति पानेका उपाय और बारहवें सर्गमें रामन भद्ररूप स्थिरताको अद्वैत पदकी रूप समझायी है। तेरहवें सर्गमें गग द्वारा हनुमानजीका कवच और चौदहवं सर्गमें सीता के कनक मन्दिरका वर्णन है। पन्द्रहवें सर्गमें रामके अनेक प्रकारके कवच आदिका वर्णन है ॥ ५४-५६ ॥ सोलहव सर्गमें हनुमानजीका पताकारोपणव्रत है। सत्रहव सर्गमें सप्तररामायण कहा गया है। अठारहव सर्गमें हनुमानजीके द्वारा अर्जुनके बनाये शरसेतुका खंडन वर्णित है। बस, मनोहरकाण्ड यहाँ ही समाप्त हो जाता है। अब पूणकाण्डके विषय गिनाते हैं ॥ ५७॥ ५८ ॥ पूर्णकाण्डके प्रथम सर्गमें मोक्षवंशी राजाओंकी वंशावलो, दूसरे सर्गमें रामचन्द्रजीकी हस्तिनापुरके लिए यात्रा ॥ ५९ ॥ तीसरे सर्गमें सूर्य और सोमवंशी राजाओंका युद्ध और चौथ हमान साम-