श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
७८८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
ग्रंथश्रुतिफलादीनि नवमे कीर्तितानि हि । नवमं पूर्णकाण्डं सम्पूर्णं नवमं त्विदम् ॥६३॥
अनुक्रमणिका चेयं मया शिष्य प्रवर्णिता । अस्याः श्रवणमात्रेण रामायणश्रुतेः फलम् ॥६४॥
रामायणपुस्तकस्य नित्यं कार्यं प्रपूजनम् । विशेषं पूजनस्यापि शृणु शिष्य वदामि ते ॥६५॥
सारकांडे विभोः स्थाने लक्ष्मणार्ये द्वितीयकम् । नवायतनगेह्यर्थं शेषाणि स्थापयेत् क्रमात् ॥६६॥
सप्त कांडानि विधिवत्तेषां पूजनमाचरेत् । अथवा राज्यकांडस्य पूर्वार्धं रामहस्त्यले ॥६७॥
राज्यकांडस्योत्तरार्धं सीतास्थाने निवेशयेत् । लक्ष्मणार्ये सारकांडं शेषाण्यग्रे क्रमण तु ॥६८॥
एवं संस्थाप्य कांडानि तेषां पूजनमाचरेत् । नवायतनपूजायाः फलमेतेन कीर्तितम् ॥६९॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पूर्णकाण्डे
अनुक्रमणिकावर्णनं नाम अष्टमः सर्गः ॥८॥
नवमः सर्गः
( ग्रन्थकी फलश्रुति )
श्रीरामचन्द्र उवाच
सारं यात्रा च यागाख्यं विलासाख्यं तु जन्मकम् । विवाहाख्यं हि राज्याख्यं श्रीमनोहरपूर्णके ।१।
कांडान्यनुक्रमेणैवानन्दरामायणे नव । त्रयोदश सारकांडे सर्गा वाल्मीकिनेरिताः ।२।
यात्राकांडे नव ज्ञेया यागकांडेऽपि वै नव । नव ज्ञेया विलासाख्ये जन्मकांडेऽपि वै नव ॥३॥
नव ज्ञेया विवाहाख्ये चतुर्विंशाश्च राज्यके । मनोहराख्ये ज्ञातव्या सर्गा अष्टादशात्र वै ॥४॥
पूर्णकांडे नव ज्ञेयाः सर्गाः पापहरा नृणाम् । एवं नवोत्तरशतं १०९ सर्गा ज्ञेयाः शुभावहा ॥५॥
वंशो और सूर्यवंशी राजाओंकी मित्रताका वर्णन है । ६० । पाँचवें सर्गमें रामचन्द्रजीके द्वारा कुश आदिके विसर्जनकी कथा है । छठें सर्गमें गङ्गाके तटपर रामकी परमधामयात्राका वर्णन है ॥ ६१ ॥ सातवें सर्गमें सूर्यवंशी राजाओंका वर्णन है और आठवें सर्गमें आनन्दरामायणकी अनुक्रमणिका बतलायी गयी है ॥ ६२ ॥ नवें सर्गमें आनन्दरामायणके श्रवणका फल आदि वर्णित है। बस, पूर्णकांड यहीं समाप्त हो जाता है। हे शिष्य, इस प्रकार मैंने तुमको समस्त आनन्दरामायणकी अनुक्रमणिका बता दी। इस अनुक्रमणिकामात्रके सुननेसे समस्त रामायण सुननेका फल प्राप्त हो जाता है ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ भक्तोको चाहिए कि नित्य इस रामायणका पूजन करें। अब इसके पूजन जो विशेषताएँ हैं उन्हें बतलाता हूँ, सुनो ॥ ६५ ॥ सारकांडको भगवान् रामचन्द्रजी, दूसरे कांडको लक्ष्मण तथा तीसरे कांडको सीता समझकर स्थापित करे। इस तरह सात कांडोंमें क्रमशः नवायतनकी स्थापना करके पूजन करें अथवा राज्यकांडके पूर्वार्धभागको रामके स्थानमें तथा उत्तरार्धको सीताके स्थानमें स्थापित करके पूजन करना चाहिए और सारकांडको लक्ष्मणकी जगहपर स्थापित करके पूजन करें। इसी तरह शेष कांडोंको क्रमशः भरत आदिके स्थानमे स्थापित करके पूजन करना चाहिए । इस तरह इस रामायणकी पूजा करनेसे रामनवायतन-पूजनका फल प्राप्त होता है ॥ ६६-६९ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत-'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते पूर्णकाण्डोऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
श्रीरामदासने कहा-हे शिष्य ! सार, यात्रा, याग, विलास, जन्म, विवाह, राज्य, मनोहर तथा पूर्णकाण्ड ये ही इस रामायणके नौ काण्ड हैं। सारकाण्डमें वाल्मीकिजीने तेरह सर्ग, यात्राकांडमें नौ सर्ग, जन्मकांडमें नौ सर्ग, विवाहकांडमें नौ सर्ग, राज्यकांडमें चौबीस सर्ग, मनोहरकांडमें अठारह सर्ग और पूर्णकांडमें पापोंको हरण करनेवाले कुल नौ सर्ग हैं। इस तरह इस आनन्दरामायणमें कुल मिलाकर एक सौ नौ ( १०९ ) सर्ग हैं ॥ १-५ ॥
सर्गः ९] पूर्णकाण्डम् ७८९
सारकांडे पंचविंशच्छतं श्लोकाः मन्त्रिशकाः । यात्राकाण्डे सप्तशतं पञ्चविंशत्परं स्मृताः ॥ ६ ॥
यागकांडे षट्शतं च पञ्चविंशोत्तरं शुभाः । विलासख्ये षट्शतं च चाष्टसप्तति सम्भृताः । ७ ॥
जन्मकाण्डे ह्यष्टशताः सद्रिश्लोकाः प्रकीर्तिताः । विवाहख्ये पञ्चशतं कीर्तिताः सप्तशीतयः । ८ ॥
सप्ताविंशा राज्यकाण्डेऽथुषद्विंशच्छतं स्मृताः । एकत्रिशच्छतं श्लोकाः प्रोक्ताः कांडे मनोहरे । ९ ॥
पूर्णकांडे पंचशतं सप्तसप्ततिमिश्रिताः । आनन्दरामचरिते सङ्ख्यैषा हि ह्यदृश ॥१०।
द्वे शते च द्विपंचाशच्छ्लोका ह्यत्रा मनोभिभिः । एष शिष्य मया प्रोक्त यथा पृष्ट त्वया पुरा ॥११॥
रामस्य तोषचरितं श्रवणात्पापकापहम् । पूर्णकाँडमिदं ज्ञेयं श्रवणान्पुण्यवर्धनम् ॥१२॥
सारकाण्डश्रवादेव संसारात्मुच्यते नरः । यात्राकाँडेन यात्राणां लभ्यते मानवैः फलम् ।१३।
यागकाँडेन यज्ञानां लभ्यते फलमुत्तमम् । विलासकाण्डश्रवणादप्सरोभिर्मोदते ॥१४।
जन्मकाँडेन प्राप्नोति नरः पुत्रादिमन्ततिम् । विवाहकाण्डश्रवणाद्रम्या स्त्री लभ्यते भुवि ॥१५॥
राज्यकाण्डेन राज्यं हि मानवैर्रुवि लभ्यते । काण्ड मनोहर श्रुत्वा लभ्यते मानसप्सितम् ॥१६॥
पूर्णकाण्डश्रवादेव विष्णोः पूर्णपदं लभेत् सर्वं विष्णुतनुःश्रुत्वाऽऽनन्दरामायणं स्विदम् ॥१७॥
सच्चिदानन्दरूपं म लीनो भवति मानवः । गतादणं नरैः श्रुत्वा कार्यमुद्यापनं नरैः ॥१८।
रामायणे श्रुते दद्याद्रथं हैममयं सुधीः । चतुर्वाजिसमायुक्तं तथा क्षौमपताकया ॥१९।
घंटैश्चैव समायुक्तं किङ्किणीजालनादितम् । यथाऽनेकैरुप मभ्यर्च्य धेनुं दद्यात्पयस्विनीम् ॥२०॥
ब्राह्मणान्भोजयेन्नाना-मिष्टान्नैरर्चयेद्बुधः । एवं कृतं मखन्तु महाकाव्यं फलप्रदम् ॥२१॥
रामायणं भवन्मूनं नात्र कार्या विचारणा । यस्मिन्भवन्ति सम्बन्धा रामायणमथाच्यते ॥२२॥
नरः प्रातः समुत्थायानन्दरामायणं पठेत् । यः स कामानवाप्नोति त्रैलोक्यादिविदुर्लभान् ।२३।
सारकांडमें २५३० श्लोक, यात्राकांडमें ७२५ श्लोक, यागकांडमें ६२५ श्लोक, विलासकांडमें ६७८ श्लोक, जन्मकांडमें ८०२ श्लोक, विवाहकांडमें ५६३ श्लोक । ५-८ ॥ राज्यकांडमें २६०२ श्लोक, मनोहरकांडमें ११०० श्लोक और पूर्णकाण्डम ५७७ श्लोक हैं । इस आनन्दरामायणमें कुल मिलाकर १२३५२ श्लोक हैं ॥ ९ ॥ हे शिष्य ! तुमने हमसे जैसा पूछा, वैसा रामचन्द्रजीको प्रसन्न करने और पापोंको नष्ट करनेवाले रामचरित्रको यह सुनाया। यह पूर्णकाण्ड पुण्यको बढ़ाता है ॥ १० ॥ ११ । १२ ॥ सारकाण्डके सुननेसे प्राणी इस संसारसे मुक्त हो जाता है । यात्राकाण्डका श्रवण करनेसे प्राणी सब तीर्थोंकी यात्राका पुण्य प्राप्त करता है ॥ १३ ॥ यागकाण्डके सुननेसे प्राणी यज्ञोंके करनेका फल पाता है और विलासकाण्डके सुननेसे स्वर्गकी अप्सराओंके साथ आनन्द करता है ॥ १४ ॥ जन्मकाण्डका श्रवण करनेसे प्राणी सन्तान पाता है और विवाह-कांड सुननेसे सुन्दर स्त्री मिलती है ॥ १५ ॥ राज्यकांडके सुननेसे संसारका राज प्राप्त होता है, मनोहरकांडको सुननेसे अपनी इच्छित कामना पूर्ण होती है और इस पूर्णकाण्डको सुननेसे प्राणी साक्षात् विष्णुभगवान्का पूर्णपद पाता है । जो प्राणी समस्त आनन्दरामायण सुन लेता है ॥ १६ ॥ १७ ॥ वह सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान्में लीन हो जाता है। जो लोग यह रामायण सुने, उन्हें इसका उद्यापन भी करना चाहिए ॥ १८ ॥ रामायण सुन लेनेके बाद श्रोता सुनातवालेको एक ऐसा स्वर्णरथ दे, जिसमें चार घोड़े जुते हों और ऊपर रेशमी पताका फहरा रही हो ॥ १९ ॥ उसमें विविध प्रकारके यन्त्र लगे हों और किङ्किणियोंका मीठा ध्वनि निकल रही हो । इसके बाद एक दुधारू गो दे ॥ २० । इसके पश्चात् १०० ब्राह्मणोंका भोजन कराये ऐसा करनेपर यह महाकाव्य पूर्ण फलदायी होता है इसमें किसी प्रकारका संदेह न करना चाहिए । जिसमें भगवान्का निवास हो, उसे "रामायण" कहते हैं ॥ २१ ॥ २२ ॥ जो प्राणी सवेरे उठकर इस आनन्दरामायणका पाठ करता है तो देवताओंको भी दुर्लभ उसकी कामनाय पूर्ण होती हैं ॥२३॥ चैत्र शुक्ल नवमीको रामजन्मके अवसर-
७१० आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
चैत्रमासे सिते पक्षे नवम्यां रामजन्मनि। शतमाषसुवर्णेन वायुपुत्रं विधाय च ॥२४॥ एकविंशति माषैर्वा व्यर्धमाषोद्धवा नरैः। वायुपुत्रं सचित्रं चानन्दरामायणं निवेद् ॥२५॥ मौल्यद्वारा लिखयित्वान्याँर्वा स्वयमेव वा। तत्तच्चित्रैश्च संयुक्तं सुविशोधितम् ॥२६॥ वेष्टितं पट्टवस्त्राद्यैर्नानारत्नविभूषितम्। स्कन्धे चामात्यने हर्ष पूजां दद्याणान्वितम् ॥२७॥ मध्याह्ने ब्राह्मणं पूज्य नानालङ्कारैरदन्। तस्मै देयं पुस्तकं तद्वायुपुत्रसमन्वितम् ॥२८॥ एवं यः कुरुते दानं तस्य पुण्यं वदाम्यहम्। कोटिभारसुवर्णस्य कुरुक्षेत्रे रविग्रहे ॥२९॥ दानेन पुण्यं यत्प्रोक्तं तस्माद् बहुगुणं भवेत्। अक्षरमात्रं यावन्ति सन्ति चानन्दसंज्ञके ॥३०॥ तावद्युगसहस्राणि वैकुण्ठे मोदते नरः। यज्जन्म दुर्लभं प्राप्य वेदपारगः ॥३१॥ रम्यं पवित्रमानन्ददायकं च मनोहरम्। आनन्दसंज्ञकं रामायणं पुण्यवर्धनम् ॥३२॥ रामायणमिदं येऽत्र भक्त्या शृण्वन्ति मानवाः। पुत्रैः पौत्रैः सुहृद्भिश् च वियोगं लभन्ते ते ॥३३॥ रामायणमिदं येऽत्र भक्त्या शृण्वन्ति मानवाः। भर्त्रा प्राणवरायाऽत्र न कदापि हि जायते ॥३४॥ आनन्दसंज्ञकं पुण्यं यत्र शृण्वन्ति ये स्त्रियः। सौभाग्यनगरत्यागं ता न गच्छन्ति यथा रमा ॥३५॥ ग्रामं देशान्तरं गन्तुं न गताथ यिरे नराः। तद्भाग्यावगत्यर्थं हि पठनायमिदं सदा ॥३६॥ येषां भावान् करोत्यत्र लब्धुं संरभते मनः। आनन्दसंज्ञकं वस्तु पठनाय प्रयत्नतः ॥३७॥ प्रथमे दिवसे काण्डमेकं, पठे दुभयं नवार्थं च द्वितीये च द्वितीये दिवसे पठेत् ॥३८॥ एवं क्रमेण काण्डानां वृद्धिं नीत्वा नवं दिनं नव काण्डानि नवमे दिवसे सम्पटेश्नरः ॥३९॥ अष्ट काण्डानि दशमे इत्यादिना च मनस्वी। ततश्चाष्टदिनैश्चैवानुष्ठानान्मोदं महत् ॥४०॥ अथवा क्रमण काण्डानि प्रथमं प्रथमं पठेत्। द्वितीये च द्वितीयाश्च नवमं नवमे दिने ॥४१॥ दशमं दशमं प्रोक्तं क्षयः कार्यः क्रमेण हि। क्रमद्वयं दिनषट्कनुष्ठानं सुखप्रदम् ॥४२॥
पर सौ माष हनुमान्की मूर्ति बनाकर उसके आधे अथ इसकत्स माष अथवा जैसा अपना शक्ति हो, उसके अनुसार म.घतन। मूर्ति बनवाना चाहिए। इसे जनवन्तर । खल देकर या अपने हाथसे यह ग्रन्थ लिखकर इसमें विविध प्रकारके चित्र बनाय और अच्छी तरह मशोधन करे। फिर दक्षिणाके साथ इस रामायणको रेशमी कपड़ेके टुकड़ाम बाँधकर हनुमान्जीके कन्धेपर रखकर ॥२४-२७॥ फिर दोपहर के समय इसका यथा कहन-शास्त्र विधिवत् सत्कार अर प्रहार्यका पूजा करे। उस अच्छे-अच्छे वस्त्र पहनाव और वह हनुमान्की प्रतिमा तथा पुस्तक उस ब्राह्मणका दान दे दे। ॥२८॥ इस तरह दान करनका जो फल होता है, वह में तुमको बतलाता हूँ, सूर्यग्रहण लगनेपर कुरुक्षेत्रम एक करोडभार सुवर्ण दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उससे खण्डा-गुणा अधिक फल इस प्रकार आनन्दरामायणका दान करनेसे प्राप्त होता है। ऐसा करनेपर इस आनन्दरामा-यणमे जित्तन अक्षर हैं, उतने हजार युग तक प्राणी वैकुण्ठके मध्य आनन्द करता है। इसके बाद सात जन्म तक विप्रके घरम उसका जन्म होता है और इस प्रकार वह एक बरसों सच्चा ब्राह्मण होता है ॥२९ ३१॥ यह आनन्दरामायण पवित्र, रम्य, मनोहर एवं पुण्य देने वाला है। जो लोग इसका श्रवण करते हैं, वे अपने पुत्र पौत्र तथा मित्रास कभी भी वियुक्त नहीं होते ॥३२-३३॥ और जो स्त्रियाँ रामायण भक्तिपूर्वक सुनती हैं, वे अपनी प्रियतींस कभी भी वियुक्त नहीं होती। जो स्त्रियाँ इस ग्रन्थका श्रवण करती हैं, वे लक्ष्मीकी तरह सुखी रहता हुई कभी भी अपने असल गतस वियुक्त नहीं होती ॥३४, ३५॥ इस विश्वास करनेवाले किन्हीं गाँव, देशा-न्तर अथवा तीर्थयात्राको गय हों तो उन्हें कुशलपूर्वक लानेके लिए इस आनन्दरामायणका पाठ करना चाहिए ॥३६॥ जिनका अपने किसी भावको सिद्ध करनेके लिए मन चंचल हुआ हो और उस कार्यको पूर्ण करना चाहते हों तो वे प्रयत्नपूर्वक इस आनन्दरामायणका पाठ करें ॥३७॥ पहले रोज एका काण्ड, दूसरे रोज पहला और दूसरा इन दो काण्डोका पाठ करे। इसी प्रकार फिर पहला, दूसरा और तीसरा इन तीना काण्डोंका, इस क्रम-से बढ़ाता हुआ नवें रोज नवा काण्डोंका पाठ करे। ॥३८-३९॥ फिर आठवे रोज आठ काण्ड, सातवें दिन
सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७९१
अथवा पृथक् काण्डेषु सर्गवृद्धिक्षयः क्रमात् । एकोनदिनतुल्यैस्तु मासैश्चरेद्व्रतम् ॥४३॥
अथवा प्रथमे सर्वस्त्वेक एव पठेद्ब्रहः । द्वौ सर्गौ च द्वितीयेऽह्नि वृद्धिक्षेद्वैक्रमेण हि ॥४४॥
नवोत्तरशते प्राप्ते दिने वृत्तं त्रिसप्तकं पठेत् । पुनः सप्ताष्टक्रमाच्चैव सप्तदिनोत्तरैः ॥४५॥
सप्तमासैरनुष्ठानं ज्ञेयं कार्येकसाधकम् । अथवा प्रथमे चाह्नि सर्गं प्राथमिकं पठेत् ॥४६॥
द्वितीयेऽह्नि द्वितीयञ्च तृतीयेऽह्नि तृतीयकम् । नवोत्तरशते प्राप्ते दिने च चरमं पठेत् ॥४७॥
दशोत्तरशते प्राप्ते ह्यष्टोत्तरशताभिधम् । पठेन्मार्गं क्रमेणैव शिष्य सप्तदिनोत्तरैः ॥४८॥
सप्तमासैरनुष्ठानं ज्ञेयं साधारणं नृणाम् । पञ्चानुष्ठानभेदाश्च मयैवं परिकीर्तिताः ॥४९॥
अनुष्ठानसमाप्तौ हि होमः कार्यो यथाविधि । पृथक् श्लोकं समुच्चार्य स्वाहांतं पायसैः फलैः ॥५०॥
नवान्नेनाथवा कार्यो होमो द्विजवरैः सह । ब्राह्मणान्भोजयेत्तस्य सङ्ख्यानदिनविस्तृतान् ॥५१॥
एतत्प्रातः समुत्थायानन्दरामायणं शुभम् । ये पठन्ति नरा भक्त्या ते सुखं प्राप्नुवन्ति हि ॥५२॥
द्वादशामपि चैतद्वै पठनीयं प्रयत्नतः । पारायणं नवदिनैः कार्यञ्चाशु सुखावहम् ॥५३॥
कांडं सर्गोऽथवा श्लोकस्त्वानन्दाख्यस्य प्रत्यहम् । नराः संकीर्त्तयन्त्येषां तेषां जन्म निरर्थकम् ॥५४॥
पुत्रार्थं रतिशालायां शृणोति पुरुषः स्त्रिया । विद्यायां वाऽप्यपुत्रोऽपुत्री पुत्रमवाप्नुयात् ॥५५॥
नवराशिषु व्रीहीणां ध्यात्वा कार्यं तु चिन्तयेत् । पूगीफलानि चत्वारि पूर्वेण कांडमुच्यते ॥५६॥
द्वितीयेन हि सर्गस्तु तृतीयेन फलेन हि । दशकोऽथ च विज्ञेयश्चतुर्थेन फलेन च ॥५७॥
श्लोको ज्ञेयः पूर्वराशेः सर्वेषां गणने रता । सर्वत्रांत्येन श्लोकेन विपरीतं फलं स्मृतम् ॥५८॥
एवं सर्वैर्दर्शनीयः शकुनश्च शुभोऽशुभः । एवं शिष्य मया चाद्य पृष्टं यत्तन्मयोदितम् ॥५९॥
सात काण्ड, छठे दिन छ काण्ड इस क्रमसे घटाता हुआ सत्रह दिनमें यह अनुष्ठान पूर्ण करे । वैसा न कर सके तो पहले रोज पहला, दूसरे दिन दूसरा, तीसरे दिन तीसरा, इस क्रमसे नौ रोजमें नौ काण्ड समाप्त करे । फिर दसवें रोज आठवां काण्ड, ग्यारहवें रोज सातवां काण्ड, इस क्रमसे घटाता हुआ सत्रह दिनोंमें यह अनुष्ठान पूर्ण करे ॥४०-४२॥ अथवा प्रत्येक कांडमें सर्गवृद्धिके क्रमसे पाठ करता हुआ सात महीनोंमें अनुष्ठान पूर्ण करे ॥४३॥ ऐसा भी न कर सके तो पहले रोज पहला सर्ग, दूसरे दिन दूसरा सर्ग, तीसरे दिन तीसरा सर्ग, इस क्रमसे एक सौ नौ दिनोंमें पूर्ण करके फिर उसी क्रमसे घटाये । इस अनुष्ठानमें भी सात ही महीनेका समय लगता है । इस अनुष्ठानको करनेसे एक कार्यकी सिद्धि हो सकती है। अथवा पहले रोज पहला सर्ग, दूसरे दिन दूसरा, तीसरे दिन तीसरा, इस क्रमसे पाठ करता हुआ एक सौ नवें दिन अन्तिम सर्गका पाठ करे ॥४४-४६॥ फिर एक सौ दसवें दिन एक सौ आठवां सर्ग, एक सौ ग्यारहवें दिन एक सौ सातवां सर्ग, इस क्रमसे पाठ करता हुआ सात महीनेमें इसे समाप्त करे । इस तरह मैंने अनुष्ठानके पांच भेद बताये । अनुष्ठान समाप्त हो जानेपर विधिवत् हवन करना चाहिए । होम करते समय ब्राह्मणोंके साथ बैठकर आनन्दरामायणके एक-एक श्लोकका उच्चारण करता हुआ खीर, फल अथवा नये अन्नसे हवन करें । हवन हो जानेपर जितने दिनोंका अनुष्ठान किया हो, उतने ब्राह्मणोंको भोजन कराये ॥४७-५१॥ जो लोग सवेरे उठकर इस रामायणका पाठ करते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं। द्वादशीको तो अवश्य इसका पाठ करना चाहिए । नौ दिनोंमें इसका सुखावह पारायण पूर्ण करना चाहिए ॥५२॥ ५३॥ जो लोग इस रामायणके एक काण्ड, एक सर्ग अथवा एक श्लोकका भी पाठ नहीं करते, उनका जन्म निरर्थक है ॥५४॥ जो मनुष्य अपनी स्त्रीके साथ रतिशालामें पुत्रप्राप्तिके लिए इस रामायणका श्रवण करता है, यह यदि पुत्रविहीन हो तो अवश्य पुत्र प्राप्त करता है ॥५५॥ अब प्रश्नकी रीति बताते हैं। अन्नकी नौ राशियें बनाकर अपने कार्यका ध्यान करे । इसके बाद चारों दिशाओंमें चार पूगीफल (सुपारी) रक्खे। पहली सुपारीमें कांड, दूसरीमें सर्ग, तीसरीमें दशक तथा चौथी सुपारीमें श्लोकका स्थापन करे। पूर्वकी राशिसे सबकी गणना करनी चाहिए । सब जगह जो अन्तिम श्लोक निकले, उससे विपरीत फल होता है ॥५६-५९॥
काण्डानि यस्मिन्नव कीर्तितानि ते हे विष्णुदासाघहरं मनोहरम् ॥६०॥
| ७९२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ९ |
|---|
आनन्दरामायणमेतदुत्तमं नवोत्तरं सर्गशतं मयेरितम् ।
काण्डानि यस्मिन्नव कीर्तितानि ते हे विष्णुदासाघहरं मनोहरम् ॥६०॥
दिने दिने पापचयान्प्रकुर्व्वन्नरः पठेत् श्लोकमपीह भक्त्या।
विमुक्तसर्वापचयः प्रयाति रामस्य सालोक्यमनन्यलभ्यम् ॥६१॥
आनन्दरामायणमेतदुत्तमं हे रामदासस्य मुखेन कीर्त्तितम् ।
श्रीराघवेणैव जनाघनाशनं नानाचरित्रैर्वरकौतुकैर्युतम् ॥६२॥
धन्यः स वाल्मीकिमुनिः कवीश्वरो रामायणं वै शतकोटिनिर्मितम् ।
कृतं पुरा येन सविस्तरं शुभं यस्माच्च सारं कथितं मया तव ॥६३॥
आनन्दरामायणमेतदुत्तमं श्रीजानकीक्रीडनकौतुकैर्युतम् ।
शृण्वन्ति गायन्ति वदन्ति चाऽपरान्कुर्व्वन्ति पारायणमादराच्च ये ॥६४॥
लभंति पुत्रानतिबुद्धिमत्तरान्स्त्रींश्चापि पौत्रान्परमान्मनोहरान् ।
धनानि धान्यानि पशूंश्च मानवाः श्रीरामचन्द्रस्य पदं प्रयांति ते ॥६५॥
आनन्दसंगं पठतश्च नित्यं श्रोतुश्च भक्त्या लिखितुश्च रामः ।
अतिप्रसन्नश्च सदा समीपे सीतासमेतः श्रियमातनोति ॥६६॥
आनन्दरामायणजाह्नवीयं पापापर्हत्री मलिनस्य जंतोः ।
आनन्दरामायणकामधेनुस्त्रियं जनानामभिकामदोग्ध्री ॥६७॥
रामायणं जनमनोहरमादिकाव्यं ब्रह्मादिभिः सुरवरैरपि संस्तुतं च ।
श्रद्धान्वितः पठति शृणुयान्त्स नित्यं विष्णोः प्रयाति सदनं स विशुद्धदेहः ॥६८॥
नवोत्तरशतैः सर्गे रामकीर्तनमालिकाम् । कृत्वा कण्ठे सुखं तिष्ठ शिष्येमां त्वं मयोदिताम् ॥६९॥
श्रीशिव उवाच
आनन्दरामचरितमिदं स्वीयगुरोर्मुखात् । श्रुत्वा स विष्णुदासस्तं ननामाऽर्च्य पुनः पुनः ॥७०॥
प्रकार लोगोंको चाहिए कि शुभाशुभ फल जानना हो तो इस शकुनसे जान लें। हे शिष्य ! तुमने हमसे जो कुछ पूछा, वह मैंने बतलाया ।। ५९ ।। इस तरह हमने तुमको एक सौ नौ सर्गोंवाली यह उत्तम रामायण सुनायी । इसमें समस्त पापोंको हरनेवाले नौ कांड कहे गये हैं ॥ ६० ॥ दिनों दिन पाप करनेवाला मनुष्य भी यदि इस रामायणके एक श्लोकका भी पाठ करता है तो उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं और वह रामके चरणोंकी सालोक्य मुक्ति प्राप्त करता है ॥ ६१ ॥ इस आनन्दरामायणको श्रीरामदासने सुनाया है, जिसमें रामचन्द्रजी-की अनेक कौतुकमयी कथायें वर्णित हैं ।। ६२ ।। कवीश्वर वाल्मीकि ऋषि धन्य हैं कि जिन्होंने सौ करोड़ श्लोकोंमें विस्तारपूर्वक रामचरितका वर्णन किया है। उसीका सारांश मैंने तुम्हें सुनाया है ॥ ६३ ॥ जो लोग श्रीसीताजीकी क्रीडाओंसे युक्त इस आनन्दरामायणका सादर श्रवण और गायन करते अथवा औरोंको सुनाते हैं, वे बड़े बुद्धिमान् लोग पुत्र, स्त्री, विशाल वैभव, अन्न तथा उत्तम पशुओंको प्राप्त करते हैं और अन्तमें रामचन्द्रजीके चरणोंको प्राप्त होते हैं ॥ ६४ ।। ६५ ।। जो प्राणी नित्य इस आनन्दरामायणका पाठ करते, सुनते अथवा लिखते हैं। उनपर रामचन्द्र परम प्रसन्न होकर सीताके साथ उनके हृदयमें विराजमान रहते हुए सब तरहसे उनका कल्याण करते हैं ॥ ६६ ॥ यह आनन्दरामायणरूपिणी गङ्गा पापियोंके समस्त पाप हरती है और आनन्दरामायणरूपिणी यह कामधेनु भक्तोंकी सब कामना पूर्ण करती है ॥ ६७ ॥ यह आनन्दरामायण अति मनोहर और ब्रह्मादि देवताओंसे भी संस्तुत है। जो श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करते हैं, वे लोग विशुद्धकाय होकर अन्तमें विष्णुभगवान्के लोकको पाते हैं। हे शिष्य ! एक सौ नौ सर्गोंवाली इस रामकीर्तनरूपिणी मालाको धारण करके तुम जहाँ चाहो, सुखसे रहो ।। ६८ ।। ६९ ।। श्रीशिवजी बोले—अपने गुरु श्रीरामदासके मुखसे इस
सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७९३
सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७९३
रामदासः स्वशिष्यायानंदरामायणं प्रिये । एवमुक्त्वा मुनिः संध्यां कर्तुं गोदां गमिष्यति ॥७१॥ एवं देवि तवाग्रेऽद्य मयाऽपि परिकीर्तितम् । आनन्दरामचरितं श्रवणात्पुण्यवर्धनम् ॥७२॥ रामकीर्तनमालायां मेरुस्थानं स्वयं महान् । सर्गो मया ते कथितः श्रवणान्मङ्गलप्रदः ॥७३॥
श्रीपार्वत्युवाच
यदा वाल्मीकिना देव कृतं रामायणं वरम् । तदा क्व रामदासः स मंत्रादोऽपिस्त्वयाऽकथि ॥७४॥
क्व तदा विष्णुदासोऽपि संशयो मेऽत्र जायते ।
श्रीशिव उवाच
त्रिकालज्ञा ज्ञानदृष्ट्या मुनिनाऽत्र कथान्तरे ॥७५॥
उभयोर्भाषितं संवादः सोऽपि पूर्वं प्रवर्णितः । यथा रामस्य चरितं रामान्पूर्वं प्रवर्णितम् ॥७६॥
संदेहोऽत्र त्वया नैव कार्यः पर्वतकन्यके । रामदासमुखेनैतद्राघवेणैव वर्णितम् ॥७७॥
आनन्दरामायणमादरेण श्रीरामचन्द्रेण मुनेर्मुखेन ।
तद्रामदासस्य मुखैव चोक्तं भक्तिप्रदं मुक्तिदमैतदद्य ॥७८॥
आनन्दरामायणमादरेण पुत्रे प्रसूते पठनीयमेतत् ।
विवाहकाले व्रतबन्धकाले श्राद्धे पठेत्पर्वणि मङ्गले च ॥७९॥
आनन्दरामायणमादरेण कारागृहस्थस्य विमुक्तये च ।
उत्पातशांत्यै भयनाशनाय प्रभोः कृपार्थं पठनीयमादरात् ॥८०॥
आनन्दरामायणमादरेण शृणोति वा श्रावयते च भक्त्या ।
स स्वीयकामानाखिलानवाप्य वैकुण्ठलोकं खलु गच्छति खेः ॥८१॥
आनन्दरामायणतोऽधिकानि न संति तीर्थानि हरेः स्थलानि ।
क्षेत्राण दानान्यपि पुण्यदानि तथा पुराणान्यथ कीर्तितानि ॥८२॥
प्रकार आनन्दरामायणको सुननेके बाद विष्णुदासने इस ग्रन्थका पूजन करके वारम्बार प्रणाम किया ॥७०॥ हे प्रिये ! रामदास अपने शिष्यको यह आनन्दरामायण सुनाकर सन्ध्या करनेके लिए गोदावरीके तटपर चले गये ॥ ७१ ॥ हे देवि ! जिस तरह रामदासने अपने शिष्यको यह आनन्दरामायण सुनायी थी, उसी तरह मैने भी पुण्यवर्द्धक इस उत्तम रामचरितका वर्णन कर दिया है ॥ ७२ ॥ रामके गुणोंका गान करने-वाली अनेक ग्रंथमालायें हैं। उनमें यह आनन्दरामायण सुमेरुके समान विराजमान है। इस रामायणमें भी जो सर्गोंकी माला है, उसमें यह सर्ग सुमेरुकी तरह है। इसका श्रवण करनेसे सर्वथा मङ्गल होता है ॥ ७३ ॥ श्रीपार्वतीजीने कहा-हे देव ! जब श्रीवाल्मीकिजीने यह रामायण बनायी थी, तब रामदास और विष्णुदास कहाँ थे ? जिनका संवाद आपने मुझे सुनाया। यह मेरे हृदयमें एक महान् संदेह उत्पन्न हो गया है। श्रीशिवजी बोले-हे पार्वती ! वाल्मीकिजीने अपनी त्रिकालदर्शिता दृष्टिसे इस भावी संवादको पहले ही जान लिया था। इसी कारण संवाद होनेके पहले ही उसका वर्णन कर दिया। जैसे उन्होंने रामजन्मसे पहले रामायण लिख दी थी। हे पर्वतकन्यके ! तुम इस विषयमें किसी प्रकारका संदेह न करो। रामदासके मुखसे साक्षात् रामचन्द्रजीने स्वयं इस चरित्रका वर्णन किया है। उन मुनिके मुखसे स्वयं रामचन्द्रजीने आदरपूर्वक इस रामायणको कहा है। इसीलिए यह इस संसारमें भक्ति और मुक्ति देनेवाली वस्तु बन गयी है ॥ ७४-७८ ॥ लोगोंको चाहिए कि पुत्र होनेपर, विवाहमें, यज्ञोपवीतमें, श्राद्धमें तथा किसी मङ्गलमय कार्यके समय आनन्दरामायणका पाठ अवश्य करें ॥ ७९ ॥ यदि कोई मनुष्य कारागारमें हो और उसे छुड़ानेकी आवश्यकता आ पड़े अथवा किसी उत्पात तथा भयको शांत करना हो अथवा भगवान्की कृपा प्राप्त करनी हो तो आदरपूर्वक इसका पाठ करना चाहिए ॥ ८० ॥ जो मनुष्य आनन्दरामायणका आदरपूर्वक पाठ करते या सुनते-सुनाते हैं, वे अपनी समस्त कामनायें पूर्ण करके अन्तमें वैकुण्ठलोकको जाते हैं ॥ ८१ ॥ आनन्दरामायणसे बढ़कर तीर्थ, भगवन्मन्दिर, क्षेत्र, दान तथा पुराण
७९४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
आनन्दरामायणमेतदुत्तमं प्रोक्तं मया ते गिरिजे सविस्तरम् ।
संस्मृत्य पापापहरं निरन्तरं मनोहरं लप्स्यसि राघवे मतिम् ॥८३॥
आदौ हत्वा दशास्यं द्विजवचनपुरस्त्वेन यात्राश्च यज्ञान्
कृत्वा भुक्त्वातिभोगानवनितलविशीर्णां गृहीत्वाऽथ सीताम् ।
लब्ध्वा नानावस्तुपास्तान्त्यजनिमगतान्पार्थिवादींश्च जित्वा
कृत्वा नानोपदेशान् गजपुरनिकटे स्वार्थलोकं जगाम ॥८४॥
वामे भूमिसुता पुरस्तु हनुमान्पृष्ठे सुमित्रासुतः
शत्रुघ्नो भरतश्च पार्श्वदलयोर्वायव्यकोणादिषु ।
सुग्रीवश्च विभीषणश्च युवराट् तारासुतो जाम्बवान्
मध्ये नीलसरोजकोमलरुचिं रामं भजे श्यामलम् ॥८५॥
आनन्दरामायणहारदीपमं ये पूर्णकाण्डं चरमं नरोत्तमाः ।
पठंति शृण्वंति हरेः परं पदं गच्छंति पूर्णेप्सितमालभंति ते ॥८६॥
आनन्दरामायणमेतदुत्तमं जप्यं पवित्रं श्रवणीयमादरात् ।
यन्मङ्गलानामति मङ्गलप्रदं स्मरामि नित्यं प्रणमामि सादरम् ॥८७॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितामृते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पूर्णकाण्डे उमामहेश्वर-संवादे तथा रामदासविष्णुदाससंवादे ग्रंथसंख्याकीर्तनं नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
मादिका श्रवण, इनमेंसे एक भी नहीं है ॥ ८२ ॥ हे गिरिजे ! मैंने विस्तारपूर्वक यह उत्तम आनन्द-रामायण तुम्हें सुना दिया। तुम इस पापापहारी चरित्रका निरन्तर मनन किया करो। ऐसा करनेसे तुम्हें सुन्दर भगवद्भूति प्राप्त होगी और तुम्हारी बुद्धि रामकी ओर दौड़ पड़ेगी ॥ ८३ ॥ रामने पहले रावणका वध किया। फिर ब्राह्मणके वचनका सम्मान करते हुए तीर्थोंकी यात्रायें कीं और बहुतसे यज्ञ किये। फिर विविध प्रकारके भोगोंको भोग करके पातालमें जाती हुई सीताको उबारा। तदनन्तर पृथ्वीतलके अनेक राजाओंको जीतकर बहुत सा वस्तुरत्न लाये। तत्पश्चात् लोगोंको विविध प्रकारका उपदेश देकर वे हस्तिनापुरके समीप गंगातटसे अपने परम धामको चले गये ॥ ८४ ॥ जिन रामचन्द्रजीके वाम भागमें सीता, आगे हनुमान्जी, पीछे लक्ष्मण, शत्रुघ्न तथा भरत, दायें-बायें एवं वायव्य आदि कोणोंमें सुग्रीव, विभीषण, अङ्गद तथा जाम्बवान् विराजमान हैं। उन सबके मध्यमें नीलकमलकी नाईं सुशोभित श्यामवर्ण श्रीरामचन्द्रजीका मैं भजन करता हूँ ॥ ८५ ॥ जो लोग हारकी भाँति सुन्दर इस अन्तिम पूर्णकाण्डका पाठ करते या सुनते हैं, वे परम पदको प्राप्त होते हैं और उनकी सब कामनायें पूर्ण हो जाती हैं ॥ ८६ ॥ लोगोंको चाहिए कि इस पवित्र आनन्दरामायणका आदरपूर्वक कीर्तन तथा श्रवण किया करें। क्योंकि यह मङ्गलोंका भी मङ्गल-दाता है। इसी कारण मैं तो नित्य इसका आदरपूर्वक स्मरण और नमन करता हूँ ॥ ८७ ॥ इति श्रीशतकोटि-रामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे गोण्डामण्डलान्तर्गतसिसई (टिकरिया) ग्रामनिवासि पं० रामदत्तात्मज पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते पूर्णकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
॥ इति पूर्णकाण्डं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥
श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु
समाप्तोऽयं ग्रन्थः