श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७९३
रामदासः स्वशिष्यायानंदरामायणं प्रिये । एवमुक्त्वा मुनिः संध्यां कर्तुं गोदां गमिष्यति ॥७१॥ एवं देवि तवाग्रेऽद्य मयाऽपि परिकीर्तितम् । आनन्दरामचरितं श्रवणात्पुण्यवर्धनम् ॥७२॥ रामकीर्तनमालायां मेरुस्थानं स्वयं महान् । सर्गो मया ते कथितः श्रवणान्मङ्गलप्रदः ॥७३॥
श्रीपार्वत्युवाच
यदा वाल्मीकिना देव कृतं रामायणं वरम् । तदा क्व रामदासः स मंत्रादोऽपिस्त्वयाऽकथि ॥७४॥
क्व तदा विष्णुदासोऽपि संशयो मेऽत्र जायते ।
श्रीशिव उवाच
त्रिकालज्ञा ज्ञानदृष्ट्या मुनिनाऽत्र कथान्तरे ॥७५॥
उभयोर्भाषितं संवादः सोऽपि पूर्वं प्रवर्णितः । यथा रामस्य चरितं रामान्पूर्वं प्रवर्णितम् ॥७६॥
संदेहोऽत्र त्वया नैव कार्यः पर्वतकन्यके । रामदासमुखेनैतद्राघवेणैव वर्णितम् ॥७७॥
आनन्दरामायणमादरेण श्रीरामचन्द्रेण मुनेर्मुखेन ।
तद्रामदासस्य मुखैव चोक्तं भक्तिप्रदं मुक्तिदमैतदद्य ॥७८॥
आनन्दरामायणमादरेण पुत्रे प्रसूते पठनीयमेतत् ।
विवाहकाले व्रतबन्धकाले श्राद्धे पठेत्पर्वणि मङ्गले च ॥७९॥
आनन्दरामायणमादरेण कारागृहस्थस्य विमुक्तये च ।
उत्पातशांत्यै भयनाशनाय प्रभोः कृपार्थं पठनीयमादरात् ॥८०॥
आनन्दरामायणमादरेण शृणोति वा श्रावयते च भक्त्या ।
स स्वीयकामानाखिलानवाप्य वैकुण्ठलोकं खलु गच्छति खेः ॥८१॥
आनन्दरामायणतोऽधिकानि न संति तीर्थानि हरेः स्थलानि ।
क्षेत्राण दानान्यपि पुण्यदानि तथा पुराणान्यथ कीर्तितानि ॥८२॥
प्रकार आनन्दरामायणको सुननेके बाद विष्णुदासने इस ग्रन्थका पूजन करके वारम्बार प्रणाम किया ॥७०॥ हे प्रिये ! रामदास अपने शिष्यको यह आनन्दरामायण सुनाकर सन्ध्या करनेके लिए गोदावरीके तटपर चले गये ॥ ७१ ॥ हे देवि ! जिस तरह रामदासने अपने शिष्यको यह आनन्दरामायण सुनायी थी, उसी तरह मैने भी पुण्यवर्द्धक इस उत्तम रामचरितका वर्णन कर दिया है ॥ ७२ ॥ रामके गुणोंका गान करने-वाली अनेक ग्रंथमालायें हैं। उनमें यह आनन्दरामायण सुमेरुके समान विराजमान है। इस रामायणमें भी जो सर्गोंकी माला है, उसमें यह सर्ग सुमेरुकी तरह है। इसका श्रवण करनेसे सर्वथा मङ्गल होता है ॥ ७३ ॥ श्रीपार्वतीजीने कहा-हे देव ! जब श्रीवाल्मीकिजीने यह रामायण बनायी थी, तब रामदास और विष्णुदास कहाँ थे ? जिनका संवाद आपने मुझे सुनाया। यह मेरे हृदयमें एक महान् संदेह उत्पन्न हो गया है। श्रीशिवजी बोले-हे पार्वती ! वाल्मीकिजीने अपनी त्रिकालदर्शिता दृष्टिसे इस भावी संवादको पहले ही जान लिया था। इसी कारण संवाद होनेके पहले ही उसका वर्णन कर दिया। जैसे उन्होंने रामजन्मसे पहले रामायण लिख दी थी। हे पर्वतकन्यके ! तुम इस विषयमें किसी प्रकारका संदेह न करो। रामदासके मुखसे साक्षात् रामचन्द्रजीने स्वयं इस चरित्रका वर्णन किया है। उन मुनिके मुखसे स्वयं रामचन्द्रजीने आदरपूर्वक इस रामायणको कहा है। इसीलिए यह इस संसारमें भक्ति और मुक्ति देनेवाली वस्तु बन गयी है ॥ ७४-७८ ॥ लोगोंको चाहिए कि पुत्र होनेपर, विवाहमें, यज्ञोपवीतमें, श्राद्धमें तथा किसी मङ्गलमय कार्यके समय आनन्दरामायणका पाठ अवश्य करें ॥ ७९ ॥ यदि कोई मनुष्य कारागारमें हो और उसे छुड़ानेकी आवश्यकता आ पड़े अथवा किसी उत्पात तथा भयको शांत करना हो अथवा भगवान्की कृपा प्राप्त करनी हो तो आदरपूर्वक इसका पाठ करना चाहिए ॥ ८० ॥ जो मनुष्य आनन्दरामायणका आदरपूर्वक पाठ करते या सुनते-सुनाते हैं, वे अपनी समस्त कामनायें पूर्ण करके अन्तमें वैकुण्ठलोकको जाते हैं ॥ ८१ ॥ आनन्दरामायणसे बढ़कर तीर्थ, भगवन्मन्दिर, क्षेत्र, दान तथा पुराण