भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 801

७८४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

कृतोऽस्ति राघवेशेन न सर्वे सदृशाः कृताः । रामायणान्यपि तथा पुरा वाल्मीकिनैव हि ॥ ३० ॥ अनेकान्यत्तरेणैव कीर्तितानि सविस्तरात् । शतकोटिमता तेषां सर्वेषां गणना कृता ॥ ३१ ॥ तस्मात्त्वया न संदेहः कार्यः शिष्य़ात्र बुद्धिमान् । यन्मया कथितं ते हि तत्सत्यं विद्धि नान्यथा ॥ ३२ ॥ यात्रोत्तरखंडांतर्गतरामायणात्पुरा । नारदादिपुराणानि व्यासेनात्र कृतानि हि ॥ ३३ ॥ हेतु भत्कथितं चेदं सम्यग्विस्मारितं द्विज । तव जातो यथा शिष्य संदेहोऽत्र कथांतगत् ॥ ३४ ॥ भविष्यति तथाऽन्येषामग्रे यदि कदा क्वचित् । नारदादिपुराणेषु दर्शनीयं हि दुर्जनैः ॥ ३५ ॥ दृष्ट्वा मदुक्तं सर्वेषु पुराणेषु पंडितैः । त्यक्तव्याः संशयम्देहाः सत्यं ज्ञेयं मयेरितम् ॥ ३६ ॥

इति शतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये पूर्णकाण्डे सूर्यवंशवर्णनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


अष्टमः सर्गः

( आनन्दरामायणकी सर्गानुक्रमणिका )

श्रीविष्णुदास उवाच

गुरोऽधुना वदस्व त्वं यन्मया पृच्छ्यते तव । अनुक्रमणिकासर्गं तथा पाठादिभिः फलम् ॥ १ ॥ कांडसंख्यां सर्गसंख्यां श्लोकसंख्यां सविस्तराम् । उद्यापनं ग्रन्थदानफलं वै शकुनेक्षणम् ॥ २ ॥ अनुष्ठानविधानं च श्रोतुं कालविनिर्णयम् । कांडानां च पृथक् संख्यां सर्वं त्वं वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥

श्रीमद्दास उवाच

अनुक्रमणिकासर्गः प्रोच्यतेऽयं मयाऽधुना । यस्याः संश्रवणात्प्रोक्तं सर्वग्रंथफलं शुभम् ॥ ४ ॥ सर्गेऽत्र प्रथमे प्रोक्तं कौसल्यायाः स्वयंवरम् । रामादीनां सुजन्मानि द्वितीये कीर्तितानि हि ॥ ५ ॥ सीतास्वयंवरं प्रोक्तं तृतीये मिथिलापुरि । शृगालादिकथनं चतुर्थे मुद्रलेन हि ॥ ६ ॥


उन अवतारोंमें कुछ न कुछ भेद पड़ ही गया है। यद्यपि सबकी लीलाएं प्रत्येक रामायणमें वर्णित हैं, किन्तु उन सबमें कुछ न कुछ भेद है। स्वयं वाल्मीकिजीने जो शतकोटि श्लोकात्मक रामायण बनायी है, उसमें भी भेद विद्यमान हैं। इस कारण हे शिष्य ! तुम किसी प्रकारका सन्देह न करके मैंने जो कुछ कहा है, उसे सच मानो ॥ २६-३२ ॥ भरतखण्डके अन्तर्गत विद्यमान रामायणके भागके ही आधारपर व्यासजीने नारदादि विविध पुराणोंका रचना की है। उसी खण्डके सहारे मैंने भी इस सविस्तर आनन्द-रामायणका वर्णन किया है। जिस तरह आज तुमने मेरा यह कथा सुनकर सन्देह उत्पन्न हुआ है, उसी तरह यदि आगे चलकर और किसी श्रोता-वक्ताको सन्देह हो तो उसे चाहिए कि उन नारद आदि पुराणोंको देखकर सन्देह निवृत्त कर लें ॥ ३३-३५ ॥ पण्डितोंको भी उचित है कि सब पुराणोंको देख और उनमें मेरी कही बातें देखकर अपना सन्देह मिटा लें और समझ लें कि मैं जो कुछ कहता हूँ, वे बातें सच हैं या नहीं ॥ ३६ ॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योतिष्मतीभाषा-टीकासहिते पूर्णकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

विष्णुदासने कहा-हे गुरु ! अब आप हमें इस रामायणकी सर्गानुक्रमणिका तथा इसके पठनका फल बताइए ॥ १, साथ ही इसकी काण्डसंख्या, सर्गसंख्या और श्लोकसंख्या आदि भी विस्तारपूर्वक कहिए। इसका उद्यापन, ग्रन्थके दानका फल, शकुनदर्शनविधान, अनुष्ठानविधि, इसके श्रवणका समय और काण्डोंकी संख्या आदि भी कहिए ॥ २, ३ ॥ श्रीरामदासने कहा-अब मैं तुम्हें इस रामायणकी सर्गानुक्रमणिका बताता हूँ। जिसके श्रवणमात्रसे समस्त रामायणके श्रवणका फल मिल जाता है ॥ ४ ॥ सारकाण्डके पहले सर्गमें कौसल्याका स्वयंवर, दूसरेमें राम आदिका जन्म, तीसरे सर्गमें जनकपुरमें सीताका स्वयंवर, चौथे