श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 798, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें[सर्गः ६] पूर्णकाण्डम् ७८१
सत्पतिं नृपवालकं नृपवन्दितं नृपतिप्रियं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ ३९॥ निर्गुणं सगुणात्मकं नृपमण्डनं यतिवन्द्यवन्द्यपदं पुरातनमं परमेष्ठिनं स्मितभाषिणम् । ईश्वरं हनुमन्नुतं कमलाधिपं जगदार्त्तिहन्तृ भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ ४०॥ ईश्वरोक्तमेतद्गुणाष्टादशच्छन्दनामकं यः पठेद्भुवि मानवस्त्वद्भक्तिमांस्त्वन्नोदये । स्वत्पदं निजबन्धुदारसुतंयुतश्चिरमेत्य नो मोदन्तु ते पदसेवने बहुवत्सरी मम वाक्शतः ॥ ४१॥ इति स्तुत्वा महाविष्णुं प्रोवाच गिरिजापतिः । आरुहस्व गरुडेश गरुडोपरि वेगतः ॥ ४२॥ वैकुण्ठारोहणस्यायं कालो वाल्मीकिना कृतः एकादश सहस्राश्च वत्सरान्वेकादशैश्च च ॥ ४३॥ तथैकादश मासाश्च दिनान्येकादशैव च । तथैकादश नाडीश्च पलान्येकादशैव च ॥ ४४॥ गतानि तेऽत्र भूम्यां हि जन्मारभ्य राघव । वसन्तपञ्चमीनाम्नी तिथिर्वैत्रासिताऽद्य हि ॥ ४५॥ पुण्येऽह्नि स्वपदं गन्तुं स्वर्गं कुरु रमेश्वर । तदा विसृज्य शालिवाहुर्वाल्मीकिं मुनिपुङ्गवम् ॥ ४६॥ समालिंग्य मुनीन्पृष्ट्वा तस्थौ स गरुडोपरि । ध्वनत्सु देववाद्येषु स्तुवत्सु नारदादिषु ॥ ४७॥ पुष्पैर्वर्षत्सु देवेषु प्रनर्त्तन्तीष्वप्सरःसु च । नानाविमानयानैश्च समन्त परिवेष्टितः ॥ ४८॥ ययौ विष्णुः स वैकुण्ठं लोकान्पश्यन्जनैः मुनैः। वैकुण्ठे स्वपदे स्थित्वा विससर्ज शिवादिकान् ॥ ४९॥ तस्थौ लक्ष्म्याऽऽनन्दमयः परिपूर्णमनोरथः । खगेशश्चारुमत्पादः सेवानत्पर्तिभूषणः ॥ ५०॥ अयोध्यावासिनः सर्वे ययुः सातानकं पदम् । ततस्ते मुनयः सर्वे ययुः स्वं स्वं स्थल प्रति ॥ ५१॥ रामवाक्यान्याऽजमीढः सांत्वयामास तं कुशम् । स्वर्गारोहण वृत्तार्थ कथयामास तं कुशम् ॥ ५२॥
धारण किये, कमलके समान मुखवान्, कमलके भाँति नेत्रवाले, कमलके ही समान चरणकमलवाले, श्याम वर्ण, सूर्यके समान देदीप्यमान, चन्द्रमाकी मुख दूतवाल, करुणाके समुद्र एक अद्वितीय प्रभु राजाओंके रक्षक, राजाओंसे वन्दित, राजाओंके प्रिय और नररूपधारी जगदीश्वर रघुनन्दन ! मैं आपका भजन करता हूँ ॥ ३९ । निर्गुण होते हुए भी सगुणरूपधारी, राजाओंके मुकुटभूषण बुद्धिवर्द्धनकर्त्ता, परम पूजनीय, मुसकराकर बोलनेवाले, जगत्के प्रभु, हनुमानजीके द्वारा स्तुत लक्ष्मीके पति और नररूपधारी हे जगदाधार रघुनन्दन ! मैं आपका भजन करता हूँ ॥ ४० । इस प्रकार स्तुति करते हुए शिवजीने अन्तमें कहा कि प्रातःकाल सूर्योदयके समय जो कोई श्रद्धा भर वह हुए इस छन्दनामाष्टमीका पाठ करेगा, वह मेरे आशीर्वादसे अपने बन्धुओं तथा स्त्री पुत्रऽदिकके साथ यहाँ आकर बहुत कालतक आपके चरणोंकी सेवाका सुयोग पायेगा ॥ ४१ ॥ इस प्रकार स्तुति करनेके पश्चात् शिवजी ने कहा—हे रमानाथ आप शीघ्र गरुडपर आरूढ़ हो क्योंकि वाल्मीकिजीने आपके वैकुण्ठ गमनका यही समय अपने रामायणमें निर्धारित किया है। इस समय ग्यारह हजार ग्यारह वर्ष, ग्यारह महीना, ग्यारह दिन, ग्यारह नाड़ी तथा ग्यारह पल पूरे हो रहे हैं। आज चैत्र शुक्लाष्टमीकी पञ्चमी तिथि है ॥ ४२-४५ ॥ इस पवित्र दिवसका आप परमधाम जानेके लिए प्रस्थान करिए। उस समय प्रभु भुजबन्धु । उन्होंने मुनिपुङ्गव वाल्मीकि के शिक्षा हृदयसे लगाया, ऋषियोंसे आज्ञा माँगी और गरुडके ऊपर सवार हो गये, तब देवताओंने विविध प्रकारके बाजे बजाये, नारद आदि महर्षियोंने स्तुति की, देवतागण आकाशपर फूल बरसाने लगे और अप्सरायें नाचने लगीं ॥ ४६-४८ ॥ इस तरह गरुडपर बैठकर भगवान् राम सब लोगके देखते-देखते वैकुण्ठलोकको चले गये। उस धाममें पहुंचकर वे अपने विश्वामित्रके बंद और शिव आदि देवताओंका विदा कर दिया। वे आनन्दमय महाप्रभु हर प्रकारसे परिपूर्ण मनोरथ होकर लक्ष्मीके साथ आनन्दपूर्वक वहीं रहने लगे। उस समय गरुड़ भगवान्के चरणोंकी सेवा करते थे और वे विष्णु भगवान् शेषकी शय्यापर मान थे ॥ ४९-५० ॥ वे सब अयोध्यावासी भगवान्के कथनानुसार सान्तानिक लोकमें जा विराजे। इसके अनन्तर भगवान्का स्वर्गारोहण देखनेके लिए आये हुए ऋषि भी अपने अपने आश्रमोंको चले गये ॥ ५१ ॥ रामचन्द्रजीके कथनानुसार हास्तिनापुरके राजा अजमीढ़ अयोध्यामें कुशके पास गये और भगवान्का परमधामगमन-सम्बन्धी