श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 790, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ५१] पूर्णकाण्डम् ७७३
किमर्थमागता यूयं मा भैष्टवमितः परम्। कथयध्वं यथावन्मेऽभीष्टोऽद्य क्रोष्यहम् ॥४३॥
तदा ताः कथयामासुः सर्वं वृत्तं परस्तरम्। देहि करुणदानानि कुशं युद्धान्निवारय ॥४४॥
तथेति जानकी चोक्त्वा ज्ञात्वा राममनोगतम्। नार्हस्तान्मोचनीयार्थने निर्जग्मुर्भवति ॥४५॥
आश्वास्य स्त्रिकयास्तास्ताभिर्युक्ता कुशं ययौ। तदा तं मानयद्रामान्म क्रोधं त्यज कुशाधुना ॥४६॥
निवर्त्तस्व रणादद्य शृणु मे वचनं शिशो। तथेति जानकीवाक्याद्विहस्याथ कुशस्तदा ॥४७॥
भ्रात्रा सधैर्यसंयुक्तः सेनया संन्यवर्नत। पुष्पकं प्रययौ सीता नृपस्त्रीपरिवेष्टिता ॥४८॥
कुशाद्यास्ते कुमाराश्च सभायां राघवं ययुः। ततो वाल्मीकिना ब्रह्मा नलाद्यैः सहितस्तदा ॥४९॥
सनिर्जरैः सभां गत्वा सर्वां श्री राघवं यतः। कुशाद्यश्चेक्षतौऽपि प्रणामं प्रक्रम्य तस्य सन्निधौ ॥५०॥
तम्पुष्टतेनालिंगिताश्च स्त्रीभिर्नीराजनं अपि। तदा रामोऽब्रवीद्ब्रह्मन्नग्रतः महसि स्थितम् ॥५१॥
रणादवर्तिता बालाः किमग्रे तव वाञ्छितम्। न मे राज्ये छत्रपतिर्द्वितीयोऽत्र भविष्यति ॥५२॥
करणीयं नलाद्यैः किं तद्वदस्व मविस्तरम्। तदाऽऽसनादुत्थितः सः वेधा रामाग्रतः स्थितः ॥५३॥
उवाच मधुरं वाक्यं मध्वग्रं रघुनन्दनम्। राम राम महाबाहो भूभारश्च त्वया हृतः ॥५४॥
चिरकाल कृतं राज्यं वैकुण्ठ पालयधुना। कुरु मन्य वचो मेऽद्य दृष्ट्व हस्तिनापुरम् ॥५५॥
नलादिभ्यस्त्वयोध्यायां कुशो राज्यं प्रपामतु। तदा रामो विधिं प्राह ममाप्येतन्न रोचते ॥५६॥
वैकुण्ठं ह्यो गमिष्यामि सीतया बन्धुभिर्युतः। दशवर्षसहस्राणि प्रोक्तमायुर्युगेऽत्र हि ॥५७॥
तन्मया स्वीयसामर्थ्यान्कृतमत्र वध नृपाः। एकादश सहस्राणि समाप्त्यवतारकैव तु ॥५८॥
तथैकादश मासाश्च गता मे दिवसा अपि। शेषायायुश्च किञ्चिन्मे तदद्य पूर्ण भविष्यति ॥५९।
प्रकारके दीख रहे थे॥ ४१॥ इसके बाद सतीजी उनसे भली प्रकार को और उनका हृदयसे लगाकर कहने लगी कि तुम लोग यहाँ किस कामसे आयी हो ? अपना इच्छा प्रकट कर। तुम जो कुछ भी चाहोगी मैं उसका प्रबन्ध कर दूंगी। ४२।४३॥ तब उन रात्रिमान पुटस्त्रयया सब वृत्तान्त सुनाते हुए कहा हे देवि ! आज आप मेरो ठहरती हुई सुहाग रक्षार्थके लिए कुशको युद्ध करनक रोक दीजिए ॥ ४४॥ सीताने मन ही मन रामकी इच्छा जान ली। उन्होंने सोचा-ये बहुत है कि स्त्रियोंके द्वारा नर आदिको जीवनदान मिले। यह सोचकर उन्होने उन स्त्रियोंसे कहा-अच्छी बात है। इसके अनन्तर वे तुरन्त सान्त्वना लगाकर उठीं और कुशके पास जा पहुंची और कहा-बेटा शृणु ! अब तुम अपने क्रोधका परित्याग कर दो ॥ ४५ ॥ ४६॥ मेरी बात मानकर संग्रामभूमिसे लौट चलो। जानकीकी बात सुनकर कुश मुसकराये और अपने बन्धु-बान्धवों तथा सेनाको साथ लेकर लौट पडे। सीता कुशको तथा उन स्त्रियोंको अपने साथ लिये अपने पुष्पक विमानपर जा पहुँचीं। वहाँ पहुंचकर कुश आदि बालक सभामे रामचन्द्रजीके पास चले गये। इसके अनन्तर ब्रह्माजी भी वाल्मीकि तथा नल आदिका साथ लेकर सभामे रामचन्द्रजीके पास पहुँचे। कुश आदि बालक भगवान्को प्रणाम करके एक ओर खडे हो गये॥ ४७-५० ॥ रामने उनको अपने हृदयसे लगा लिया और स्त्रियोंने उनकी आरती उतारी। कुछ देर बाद रामने बह्माजीसे कहा कि आपके इच्छानुसार कुश आदि बालक तो संग्राम-भूमिसे लौट आये। अब आपकी क्या इच्छा है? अबतो मेरे राज्यमें कोई दूसरा छत्रधारी राजा नहीं रहेगा ॥ ५१॥ ५२॥ अब आप यह भी बतला दीजिए कि नल आदिका क्या करना चाहिए। रामकी यह बात सुनते ही बह्माजी उठकर रामके आगे जा बैठे और कहने लगे-हे राम ! हे महाबाहो ! आपने पृथ्वीका भार उतार किया। बहुत दिनोंतक पृथ्वीपर राज्य भी किया। अब चलकर वैकुण्ठधामकी रक्षा करिए और मेरी बात सच करनेके लिए नल आदिको हस्तिनापुरी दे दीजिए । ५३-५५॥ कुश आनन्दके साथ अयोध्याका राज्य करे। तब रामने ब्रह्मासे कहा कि यही बात मुझे भी जंच रही है॥ ५६॥ कल मैं सीता तथा अपने बान्धवोंके साथ वैकुण्ठधामको चल दूँगा। इस युगमें मनुष्यकी आयु दस हजार वर्ष निर्धारित की गयी है। किन्तु हे बह्माजी ! मैं अपनी सामर्थ्यसे उस नियमको व्यर्थ करके ग्यारह हजार ग्यारह वर्ष और ग्यारह