भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 787
७७०आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

मुमोच पन्नगास्त्रस्य निवृत्त्यर्थं ततोऽब्रवीत्। तदा कुशः प्रमुमोच राक्षसास्त्रं भयावहम् ॥५९॥
नद्युक्तश्च तदा वेगाद्बहुशस्त्रं तं व्यसर्जयत्। तदा कोषाल्लवश्चापि मेघास्त्रं तं व्यसर्जयत् ॥६०॥
तदा लघुभृतथापि पवनास्त्रं मुमोष सः। तदा स हनुमान् शीघ्रं व्यादाय विकटाननम् ॥६१॥
अपिबन्मरुतं वेगान्ननाद जलदस्वनः। एवं तच्च महायुद्धं पुष्पकारामसंस्थितौ ॥६२।
सीतारामौ मुदा युक्तौ लक्ष्मणामैर्ददर्शतुः। एवं युद्धं पञ्चमासानेक'दश दिनान्यभूत् ॥६३।
एकादशे दिने मार्गे गतास्तेऽस्मिन्समीरिताः। एवमेकादशैर्मास्रैकादशदिनैरपि ॥६४॥
त्रेतायुगमयैर्दिन्यैः समाप्तिं संगरस्य च। अदृष्ट्वा च कुशो वेगाद्ब्रह्मास्त्रं संदधे तदा ॥६५।

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पूर्णकाण्डे रामदास-
विष्णुदाससंवादे सोमवंशोद्भवन्नृपाणां युद्धवर्णनं नाम दोध्यः सर्गः । ३ ॥


चतुर्थः सर्गः

( सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी राजाओंमें मैत्री )

श्रीरामदास उवाच

ब्रह्मास्त्रं संदधानं तं दृष्ट्वा वेधाः सुरैः सह। सोमेन च बुधेनापि विमानेन ययौ भुवि ॥१।
विमानादवरुह्याथ तदा ब्रह्मा कुशं ययौ। कुशं तं प्रार्थयामास श त्यमस्त्रं विसर्जये ॥२।
पालयस्व वचो मेऽद्य नाके सोमाय वै मया। द्वापरान्ते वरो दत्तस्त्वजेयश्च रणाजिरे ॥३॥
भविष्यन्ति नलाद्याश्च सर्वे युष्मत्कुलोद्भवाः। पुरा न्विति सुराये हि कस्मिंश्चित्कारणांतरे ॥४॥
अतस्त्वं कुश माऽस्त्रं मे नलाद्येषु विसर्जये। तद्ब्रह्मवचनं श्रुत्वा कुशो वाक्यमथाब्रवीत् ॥५॥
अधुना क्षणमात्रेण सर्वान्दग्ध्वान्करोम्यहम्। नोचेत्कथय रामाय तस्याज्ञां मानयाम्यहम् ॥६।


रथपरसे नलने जब पन्नगास्त्र देखा तो गरुडास्त्रका प्रयोग किया ॥ ५८ ॥ उसकी निवृत्तिके लिए कुशने बड़े ही भयानक राक्षसास्त्रका प्रयोग किया ॥ ५९ ॥ उसी समय नकुशने बहुशस्त्र चलाया तब मारे क्रोधके लवने उसपर मेघास्त्रका प्रयोग कर दिया ॥ ६० ॥ इसके अनन्तर शत्रुघ्नने पवनास्त्र छोड़ा। इसी समय हनुमान्जीने अपना मुख फैलाकर सब हवा पी ली और मेघकी तरह भीषण स्वरमें गरजे। उधर विमानपर बैठे हुए पुष्कर, राम तथा सीताजी उस महायुद्धको देख रही थीं। इस संवत् वह युद्ध पाँच महीना ग्यारह दिन चला ॥ ६१-६३ ॥ ग्यारह ही दिनके लगभग अयोध्यासे हरितानपुर जानेमें लगे थे। सब मिलाकर त्रेतायुगके दिनोंके हिसाबसे उस युद्धमें ग्यारह महीने और ग्यारह दिन लगे ॥ ६४ ॥ उधर जब कुशने देखा कि अब कोई अन्य उपाय नहीं है तो ब्रह्मास्त्रका संधान किया ॥ ६५ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० राम-तेजपाण्डेयकृत 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते पूर्वकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥

श्रीरामदासने कहा-जब ब्रह्माने देखा कि कुश ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करने जा रहा है तो वे बहुतसे देवताओं और बुध तथा सोमको साथ लिये हुए विमानपर बैठकर पृथ्वीतलपर आये। यहाँ पहुंचे तो विमानसे उतर-कर कुशके पास गये और प्रार्थना की कि तुम इस ब्रह्मास्त्रका प्रयोग मत करो ॥ १ ॥ २ ॥ आज मेरे कहनेसे मेरी बात मान लो। क्योंकि एक बार मैंने स्वर्गलोकमें इन सोमवंशियोंको वरदान दिया था कि द्वापर तक संग्रामभूमिमें तुम किसीसे भी पराजित नहीं होवोगे ॥ ३ ॥ आगे चलकर तुम्हारे वंशमें नल आदि बड़े प्रतापशाली राजे होंगे ॥ ४ ॥ इस कारण हे कुश ! तुम इन नल आदि राजाओंपर ब्रह्मास्त्रका प्रयोग न करो। ब्रह्माकी बात सुनकर कुशने कहा कि मैं अभी क्षणमात्रमें इन दुष्टोंको भस्म किये देता हूँ। यदि आप कुछ कहना चाहते हों तो जाकर रामचन्द्रजीसे कहिए, मैं उन्हींकी बात मानूंगा ॥ ५ ॥ ६ ॥