श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 692, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें६७६ आनन्दरामायणे [ सर्ग १०
ऋषभः पापिनां शास्ता त्वं नृपं समदर्शनः । गृहाणार्थ्यं मया दत्तं यथोक्तफलदो भव ॥३९॥
इति चार्घ्यं समर्प्याथ पश्चात्स्नानं समाचरेत् । वाससी परिधायाथ कुर्यात् कर्माणि सर्वशः ॥४०॥
जानकीकांतमभ्यर्च्य प्रसूनैर्मधुसंभवैः । श्रुत्वा रामकथां दिव्यामेतन्मासप्रशंसिनीम् ॥४१॥
कोटिजन्मार्जितात्पापान्मुक्तो मोक्षमवाप्नुयात् । चैत्रे यः कांस्यभोजी हि तथा चाश्रुतसत्कथः ॥४२॥
न स्नानञ्चाप्यदत्ता च नारकानेव विंदति । यथा माघः प्रयागे हि स्नानतः पुण्यमिच्छताम्॥४३॥
कार्तिकोऽपि यथा काश्यां पञ्चगङ्गाजले स्मृतः । द्वारकायां यथा प्रोक्तो वैशाखो माधवप्रियः । ४४॥
अयोध्यायां रामतीर्थे तथा चैत्रे प्रकीर्तितः । प्रयागे मासमात्रेण यत्फलं प्राप्यते नरैः ॥४५॥
अयोध्यायां रामतीर्थे सकृत्स्नानेन तत्फलम् । वैशाखद्वादशभवं पुण्यं यद्गोमतीजले ॥४६॥
तत्पुण्यं सरयूतोयेऽयोध्यायां प्राप्यते नरैः । चैत्रे मयि त्रिभिः स्नानै रामतीर्थे न संशयः ॥४७॥
कार्तिके पंचगङ्गायां यैः स्नां द्वादशाब्दकम् । अयोध्यायां रामतीर्थे चैत्रे पक्षेण तत्फलम् ॥४८॥
अयोध्या दुर्लभा लोके नराणां पापकारिणाम् । तावद्गर्जन्ति पापानि यावद्दृष्टा न सा पुरी ॥४९॥
अयोध्याया यदाऽभावस्तदा रामकृतानि च । जगन्त्यां यानि तीर्थानि तत्र स्नानं विधीयताम्५०॥
यत्रापोध्यापुरी नास्ति स्नानार्थे सरयूर्न च । रामतीर्थं न यत्रास्ति तदा तीर्थेषु कारयेत् ॥५१॥
तैलाभ्यंगं दिवास्वापस्तथा वै कांस्यभोजनम् । खट्वानिद्रा गृहे स्नानं निषिद्धस्य च भक्षणम् ॥५२॥
चैत्रे तु वर्जयेदेतौ द्विरुक्तं नक्तभोजनम् । चैत्रे माघे तु मध्याह्ने श्रान्तानां च द्विजन्मनाम् ॥५३॥
पादावनेजनं कुर्यात्सुव्रतं तु व्रतोत्तमम् । मार्गेऽध्वगानां यो मर्त्यः प्रपादानं च चैत्रके ॥५४।
ऋषि मेरे इस अर्घ्यदानको ग्रहण करते हुए प्रसन्न हों । ३८ । हे पाषियोंपर शासन करनेवाले यमदेवता ! आप समदर्शी हैं । मेरे इस अर्घ्यदानको ग्रहण करिए और यथोचित फल दीजिए । ३९ । इस तरह अर्घ्य समर्पण करनेके अनन्तर स्नान करे । तदनन्तर कपडे बदलकर और कोई काम करना चाहिए । ४० ॥ इसके बाद वसन्त ऋतुमें उत्पन्न फूलोंसे जानकीकान्तका पूजन करे और चैत्रमासकी प्रशंसा करनेवाली कथाएं सुने । ४१ ॥ ऐसा करनेसे करोड़ों जन्मके एकत्रित पातक नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य चैत्रमासमें काँसेके पात्रमें भोजन करता है और मन्दो अञ्छा कथाने नहीं सुनता, न किसी पवित्र तीर्थमें स्नान करता है और न दान ही देता है, उसे नरकके सिवाय और किसी गतिकी प्राप्ति नहीं होती । जिस तरह कि पुण्यप्राप्तिके लिए लोग माघमासमें प्रयागस्नान करते हैं ; ४२ ॥ ४३ ॥ जैसे कात्तिकमासमें काशीकी पञ्चगङ्गामें स्नान करते हैं, वैसे वैशाखमासमें द्वारकाजीमें स्नान करते हैं, उसी तरह रामभक्तोंको चाहिए कि चैत्रमासमें अयोध्या-स्नान अवश्य करें । एक महीना प्रयागमें स्नान करनेसे जो फल प्राप्त होता है. वही फल अयोध्याके रामतीर्थमें केवल एक बारके स्नानसे मिल जाता है। बारह बार वैशाखमासमें द्वारकाकी गोमती नदीमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वही फल अयोध्याके सरयूजलमें स्नान करनेसे प्राप्त होता है। किन्तु यह फल तब मिलता है, जब चैत्र मासमें तीन बार रामतीर्थम स्नान किया जाय ॥ ४४-४७ ॥ बारह बरस तक कात्तिकमें काशीकी पञ्चगङ्गामें स्नान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही फल केवल एक पखतक अयोध्या-की सरयूजीमें स्नान करनेसे प्राप्त होता है । ४८ ॥ पापियोंके लिए अयोध्या दुर्लभ तीर्थ है; पापगण तभी तक गर्जन करते हैं, जबतक प्राणी अयोध्यापुरीका दर्शन नहीं कर लेता । ४९ । यदि किसी शावक फलकी अयोध्या प्राप्त न हो सके तो रामचन्द्रज ने जिन तीर्थोंका निर्माण किया हो वहाँपर स्नान करे ॥ ५० ॥ जहाँ कि न अयोध्या है, न सरयूजी हैं और न कोई रामतीर्थ ही है। वहाँ जो कोई भी तीर्थ हो, उसीमें स्नान कर ले ॥ ५१ ॥ तेल लगाना, दिनमें सोना, कांस्यपात्रमें भोजन करना, चारपाईपर सोना, घरमें स्नान करना, किसी प्रकारका निषिद्ध भोजन, रात्रिके समय भोजन तथा दिनमें दो बार भोजन इन आठ बातोंको चैत्रमासमें छोड़ देना चाहिए । चैत्रमासमें जो प्राणी दोपहरके समय थके हुए ब्राह्मणोंके पैर धोता है, वह मानो सर्वोत्तम व्रत करता है। जो प्राणी चैत्रमासमें राह चलनेवालोंको जल पिलाता है और रास्तेमें