श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 696, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६८० | आनन्दरामायणे | [ सर्ग १० |
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रामजन्ममहोत्सवार्थं प्रीत्यर्थं राघवस्य च । गृहे गृहे नरैः कार्याः पूजोपाया भक्तितः ॥१०७॥
गृहे देवालये वाऽथ गोष्ठे वृन्दावने शुभे । सम्मार्जनादिकं नित्यं कार्यं चन्दनवारिभिः ॥१०८॥
ततः पाथरजेश्चैव नानोपद्यादिकानि हि । लेखनीयानि भूम्यां तु नीलपीतादिवर्णकैः ॥१०९॥
अष्टोत्तरसहस्रस्य रामतोभद्रमुत्तमम् । शतास्यं वा लिखेद्भद्रमथवाऽन्यन्मनोरमम् ॥११०॥
तस्योपरि महत् रम्यंविचित्रवर्णश्च मण्डपः । देयो द्वाराणि चत्वारि कार्याणि तोरणानि च ॥१११॥
कदलीस्तंभयुक्तानि इक्षुदण्डयुतानि च । नानावण्टाकिङ्किणीभिर्ध्वनितान्युज्ज्वलानि च ॥११२॥
रम्यादाशर्मैडिनानि विचित्राणि शुभानि च । नानाचित्रवितानैश्च मुक्ताहारैर्युतानि च ॥११३॥
तस्यां षोडशमाषैश्च प्रतिमा काञ्चनोद्भवा ॥११४॥
द्विभुजा रामचन्द्रस्य सर्वलक्षणलक्षिता । चतुरुनिर्मापश प्रतिमा रजतोद्भवा ॥११५॥
कौशल्यायाः शुभा कार्या पूज्याया मनोरमा । यथावित्तानुसारोण पूजयप्रत्यहं नरः ॥११६॥
भेरीमृदङ्गनेयैश्च गीतनृत्यादि कम्पन । नानाप्रकारनैवेद्यैरुपचारैः सुपूजयेत् ॥११७॥
प्रतिपद्दिनमारम्य यावत्तु नवमीदिनम् । रामायणं तावदेव पठनीयमिदं शुभम् ॥११८।
यद्वै वाल्मीकिना गीतं श्रवणाम्भ्रमलप्रदम् । आनन्दसञ्ज्ञकं रम्य पठनीयं मनोरमम् ॥११९।
नव काण्डानि नवभिर्दिनैश्च पठन्नरः । दिवसे दिवसे काण्डं पठनार्थं प्रयत्नतः ॥१२०॥
अथवा प्रत्यहं सर्गाः पठितव्यास्तु द्वादश शतान्येकः कदा मध्येऽधिकः सोऽपि पठेन्नरः ॥१२१॥
अष्टोत्तरशतैः सर्गे रामकीर्तनमालिका । मेरुयुक्ता पठेद्देवं रामाग्रे नवभिर्दिनैः ॥१२२॥
सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वदानेषु यत्फलम् । रामायणस्य पठनात्तत्फलं नवरात्रके ॥१२३॥
और यान्ना आदिके अलंकृत ध्वजाराम रामजन्मकी सूचक लगा रामको प्रसन्न करनेके लिए घर-घर स्थापित करके भक्तिपूर्वक उनका पूजन करना चाहिए । १०७ । १०८॥ घरमें, देवालयमें गोशालामें तथा तुलसीकी बगीचा-में उन दिनों चन्दनके जलका छिड़काव करना चाहिए । १०८ ॥ इसके बाद पत्थरके रंगीन नील-पीत आदि वर्णोंवाले कमल आदि बनाने चाहिए । तदनन्तर अष्टोत्तरसहस्रात्मक रामतोभद्र या शतात्मक अथवा शेष छासठको अन्य उस भद्रका रचना कर १०९ । ११० । उसके ऊपर अतिशय सुन्दर चित्र-विचित्र वर्णोंका मण्डप कराये । उस मण्डपमें चार द्वार बनाये और स्थान-स्थानपर तोरणकी स्थापना करे । १११ ॥ जहाँ-तहाँ कदली खंभ तथा इक्षुदण्ड खड़ा करें । उनपर तरह तरहके घण्टा और किङ्किणी आदि लगा दे, जिनकी मधुर ध्वनि सुनायी पड़ना रहे ॥११२॥ जहांतहां मुकुर और यन्त्र-यंत्र शीशे लगा दे विविध प्रकारके चित्र लगावे तरह तरहकी चन्दन कुकुम लगावे और मोतियोंके हार लटकावे । उसमें सुवर्णमय एवं रत्नमण्डित मंचकी रचनाकर और उसपर अरू भ्रात कल्पोद्भव स... रेशम का वस्त्र बिछावे । फिर उसपद सोरह मासेकी काञ्चनमयी प्रतिमा स्थापित करे ॥ ११३ ॥ ११४ । रामचन्द्र का यह सुवर्णमयी प्रतिमा सब सुलक्षणोंसे लक्षित होनी चाहिए। ६५० अकतया वीर्यस पत्यो रजतमा प्रतिमा कौसल्याकी बनाये और उसकी पूजा करें। जैसा अपने सामर्थ्य हो, अनु अनुसार प्रतिदिन पूजन करे ॥ ११५ ॥ ११६ । उनके सामने भेरी, मृदंग, तुरही आदि बाजा बजावे और नाच गाव । नाना प्रकारके नेवेद्यो और उपचारोंसे पूजन करे ॥ ११७ ॥ प्रतिपदा तिथिसे लेकर नवमी तिथि पर्यन्त इस आनन्दरामायणका पाठ करे । ११८॥ इसका बाल्मीकि मुनिने गान किया है। यह सुननेमें मङ्गलप्रद और सनातन है। इससे इसका पाठ आवश्यक है ॥ ११९ ॥ इसके नौ कांडोंको नौ दिनमे समाप्त करना चाहिए । पाठ करनेवालेको चाहिए कि प्रयत्नपूर्वक प्रतिदिन एक एक काण्डका पाठ करे । १२० ॥ यदि ऐसा न हो सके तो प्रतिदिन बारह सर्गोंका पाठ करे । ऐसा पाठ करनेस एक सर्ग बाकी बचेगा । उसे बीचमें किसी रोज पूरा कर देना चाहिए ॥ १२१ ॥ इस तरह अष्टोत्तरशत सर्गात्मक इस रामकीर्तन-मालिकाको नौ दिनोंमे रामचन्द्रजीके समक्ष पाठ करना चाहिए ॥ १२२ ॥ सब