श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 755, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७३८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १६ |
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यथा वह्निस्तूलराशिं स्पर्शित्वाः कापनां विना । कामेन वा दहेत्येव क्षणात्तद्वन्न संशयः ॥१७६॥
मंत्रैः प्रबन्धैः काव्यैश्च नानाचारित्रवर्णनैः
अत्यशुद्धैः स्तुतो रामः कल्पितैरपि स्वेच्छया । तैश्च तुष्टो भवत्यत्र श्रीरामो नात्र संशयः ॥१७७।
विनाश्रयेण रामस्य यत्कृतं स्तवनादिकम् । तेनापि तुष्टः श्रीरामो भवत्येव न संशयः ॥१७८॥
आश्रयेणापि या निन्दा कृता श्रीराघवस्य च । सा भवेन्नरकायैव नात्र कार्या विचारणा ॥१७९।
किं शास्त्रैश्च पुराणैश्च पठितैः पाठितैरपि । यदि रामे रतिर्नास्ति तैर्भवेन्मानवस्य किम् ॥१८०॥
रामप्रीतिद्युतस्यात्र मूर्खस्यापि नरस्य च । तद्भाषाकृतस्तुत्याद्यैः प्रसन्नो जायते हरिः ॥१८१।
रामचन्द्रस्य प्राप्त्यर्थं यत्कृतं मानवैर्भुवि । तेनातितुष्टः श्रीरामो भवत्येव न संशयः । १८२।
रामो गेयश्चिन्तनीयोऽत्र रामः स्तव्यो रामः सेवानीयोऽत्र रामः ।
ध्येयो रामो वंदनीयोऽत्र रामो दृश्यो रामः सर्वभूतान्तरेषु ॥१८३॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गतं श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकांडे
लक्ष्मणादीनां कवचादिनिरूपणं नाम पञ्चदशः सर्गः । १५ ।
षोडशः सर्गः
( हनुमत्पताकारोपण व्रत )
श्रीरामदास उवाच
एवं यद्यत्त्वया पृष्टं तन्मया परिवर्णितम् । किमन्यच्छ्रोतुकामस्त्वं तद्वदस्व वदामि ते ॥ १ ॥
विष्णुदास उवाच
रामायणं नरः श्रुत्वा किं विधानं समाचरेत् । तच्च वद महाभाग यद्यस्ति तत्सविस्तरम् ॥ २ ॥
श्रीरामदास उवाच
रामायणे श्रुते दद्याद्रथं हेममयं सुधीः । चतुर्भिर्वाजिभिर्युक्तं तथा क्षौमपताकया ॥ ३ ॥
जिस तरह बड़ीसे बड़ी रूईकी राशिको अग्नि जला डालती है, उसी तरह किसी कामनासे या बिना कामना होके रामका कीर्तन तत्क्षण पापराशिको भस्म कर देता है । इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १७६ ॥ मन्त्र प्रबन्ध तथा विविध प्रकारके चरित्रोंसे पूर्ण काव्योंसे या अपने बनाये अतिअशुद्ध पदोंसे ही रामका कीर्तन क्या जाता है तो भी भगवान् प्रसन्न होते हैं । इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ १७७ । बिना किसी आधारके भ बने काव्योंसे रामकी स्तुति करनेसे रामचन्द्रजी प्रसन्न होते हैं । यदि रामका आधार लेकर काव्य बनाया जाय और उसमें भगवान्की निन्दा की जाय तो वह नरकका ही साधन होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है । १७८ ॥ १७९ । यदि राममें प्रीति नहीं है तो बहुतेरे शास्त्रों और पुराणोंके पठन-पाठनसे कुछ भी लाभ नहीं होता ॥ १८० ॥ राममें प्रीति रखनेवाला मनुष्य चाहे मूर्ख ही हो किन्तु वह यदि अपनी टूटी-फूटी भाषामें भगवान्का गुण गाता है तो उससे भगवान् प्रसन्न होते हैं ॥ १८१ ॥ इनके अतिरिक्त रामचन्द्रजीकी प्राप्तिके लिए जो कुछ भी उपाय किये जाते हैं, उनसे भगवान् अतिशय प्रसन्न होते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १८२ ॥ इसलिए लोगोंको चाहिए कि सदा रामका गुण गायें, उनका स्मरण करें, सेवा करें, ध्यान करें, और संसारके प्रत्येक प्राणीमें भगवान्की अलौकिक ज्योतिका दर्शन करें ॥ १८३ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे पञ्चदशः सर्गः। १५ ॥
श्रीरामदास बोले— हे शिष्य ! तुमने मुझसे जो कुछ पूछा, सो मैने कह सुनाया । अब क्या सुनना चाहते हो, सो कहूँ ॥ १ ॥ विष्णुदासने कहा— आनन्दरामायण सुननेके अनन्तर लोगोंको क्या-क्या विधान करना चाहिए, सो आप विस्तारपूर्वक हमें बतलाइए ॥ २ ॥ श्रीरामदासने कहा—इस रामायणको सुननेके अनन्तर