भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 753, कुल 811 में से

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पृष्ठ 753
७१६आनन्दरामायणे[ सर्गः १५

राम जय सीताराम राघवेति मनुः।

दशरथनदनेति रघुकुलेति वै ततः भूषणेति ततश्चोक्त्वा कौसल्येति ततः परम् ॥ १५०॥
विश्रामेति ततश्चोक्त्वा पंकजलोचनेति च रामेति द्व्यक्षरे चापि ह्यष्टाविंशाक्षरो मनुः ॥ १५१॥
अयं सदा कीर्तनीयो वीणावाद्येन सुस्वरः प्रोक्तः पातकविध्वंसी सर्वकामप्रदायकः ॥ १५२॥
दशरथनंदन रघुकुलभूषण कौसल्याविश्राम पंकजलोचन रामेति मनुः

सीताराम जयेत्युक्त्वा राघवेति ततः परम्। रामेति द्व्यक्षरे चापि मन्त्रस्त्वेकादशाक्षरः ॥ १५३॥
कीर्तनीयः सुस्वरेणैयं मन्त्रो वीणास्वरेण च। महापातकहन्त्रीकः सर्ववांछितदायकः ॥ १५४॥
सीताराम जय राघव रामेति मनुः।

एकादशाक्षराश्चायं मंत्रः प्रोक्तो मयाऽथ हि द्वितीयः परमो श्रेष्ठो महापातकनाशनः ॥ १५५॥
पञ्चवटीस्थितेत्युक्त्वा रामजयजयेति च दशरथानन्दनेति रामेति द्व्यक्षरे तथा ॥ १५६॥
एकविंशाक्षराश्चायं कीर्तनीयो महामनुः। कलकण्ठेन मर्त्यैश्च महापातकनाशनः ॥ १५७॥
पञ्चवटीस्थित राम जय जय दशरथनंदन रामेति मनुः।

दशरथसुतेत्युक्त्वा बालं वन्दे त्विति क्रमात् रामं घननीलमिति मत्रोऽयं षोडशाक्षरः ॥ १५८॥
द्वितीयोऽयं मया प्रोक्तः कीर्तनीयो मनोरमः वीणावाद्यस्वरेणैव वदापुण्यविवर्द्धनः ॥ १५९॥
दशरथसुतबालं वन्दे रामं घननीलमिति मनुः।

कोदंडखंडनेत्युक्त्वा दशशिरोमर्दनेति च। कौसल्यासुतं रामेति सीतारामजन पेति वै। १६०॥
राजारामेति वै चोक्त्वा एकोनत्रिंशवर्णकः। कीर्तनीयो मनुश्चायं वीणावाद्येन सुस्वरः ॥ १६१॥
कोदण्डखण्डन दशशिरोमर्दन कौसल्यासुत राम सीतारामजन राजारामेति मनुः।


चाहिए कि इस एकाक्षर मन्त्रका केवल जप करे, कीर्तन नहीं ॥ १४८॥ 'रां' यह एकाक्षर मन्त्रका स्वरूप है। पहले 'राम जय' कहकर 'सीताराम' और इसके बाद 'राघव' ऐसा कहे। यह एकादशाक्षरात्मक राममन्त्र है ॥ १४९॥ "राम जय सीताराम राघव" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। पहले "दशरथनन्दन" फिर 'रघुकुल' फिर 'भूषण' फिर 'कौसल्याविश्राम' फिर 'पंकजलोचन' और इसके बाद 'राम' ऐसा कहे। यह अट्ठाईस अक्षरोंका राममन्त्र है ॥ १५० ॥ १५१ । लोगोंको वीणा आदि वाद्योंके साथ मीठे स्वरसे सदा इस मन्त्रका जप और कीर्तन करना चाहिए, क्योंकि यह सब प्रकारका पातक नष्ट करनेवाला और अभीष्ट कामनाओंका पूर्ण करनेवाला मन्त्र है। 'दशरथनन्दन रघुकुलभूषण कौसल्याविश्राम पंकजलोचन राम' यह इस मन्त्रका स्वरूप है। 'सीताराम जय' ऐसा कहकर 'राघव' और इसके बाद 'राम' ऐसा कहे। यह एकादशाक्षर मन्त्र है ॥ १५२ ॥ १५३ ॥ यह भी सब प्रकारका पातक नष्ट करनेवाला है। 'सीताराम जय राघव राम' यह इस मन्त्रका स्वरूप है इसलिए लोगोंको चाहिए कि वीणा आदि वाद्योंके साथ मीठे स्वरसे इसका जप और कीर्तन करे । क्योंकि सब प्रकारकी कामनाएं इससे पूर्ण हो जाती हैं ॥ १५४ ॥ 'पञ्चवटीस्थित' ऐसा कहकर "राम जय जय" और उसके बाद 'दशरथनन्दन राम' ऐसा कहे। यह एकविंशाक्षर राममहामन्त्र है। इसका भी मीठे स्वरसे कीर्तन करना चाहिए। क्योंकि यह महामन्त्र बड़े-बड़े पापकोंको नष्ट कर देता है। १५५ ॥ १५६ ॥ 'पञ्चवटीस्थित राम जय जय दशरथनन्दन राम" यह इस एकविंशाक्षर राममन्त्रका स्वरूप है। "दशरथसुत" ऐसा कहकर "बालं वन्दे और इसके बाद "रामं घननीलम्' यह कहे। यह षोडशाक्षर राममन्त्र है । षोडशाक्षर मन्त्रोंम यह बड़े-बड़े पातकोंको नष्ट करनेवाला महामन्त्र है । इसे भी वीणा आदि बाजाके साथ मीठे स्वरसे गाना चाहिए क्योंकि यह अतिशय पुण्यवर्धन कारी मंत्र है ॥ १५७ ॥ १५८ ॥ "दशरथसुतबालं वन्दे रामं घननीलम्" यह इस मन्त्रका स्वरूप है । 'कोदण्डखण्डन' ऐसा कहकर 'दशशिरोमर्दन' इसके बाद "कौसल्यासुत राम सीतारामजन" और "राजाराम" कहे। यह मन्त्र एकानत्रिंशाक्षरात्मक है। इसका भी वीणा आदि वाद्योंके साथ मीठे

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